Kusum's Journey's Image
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04 Jun 2010
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न तुम्हें देखा मैं ने , न तुमने मुझको

"न तुम्हें देखा मैं ने , न तुमने मुझको" न तुम्हें देखा मैं ने , न तुमने मुझको  फिर कैसी ये प्रीत, बतलाऊँ किसको?लगी कैसी लगन, रहूँ मैं यूँ मगन धरूँ ध्यान किसीका , पाऊँ मैं तुझकोक्या है तुम में वो, बात जपूँ दिन रातकहूँ कैसे न मैं,
 
Kusum Thakur
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मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा

(आज मेरे लिए एक विशेष दिन है . मन में कुछ बातें आईं, सोची शब्दों में पिरो दूँ. )"मिले तुमको ख़ुशी यही मन में सदा "हो तो दूर मगर लागो पास यदा हर ख़ुशी जो मिले यह आशीष सदा है कचोट कहूँ जो मैं हूँ न वहाँ है वो बात कहाँ जो कहूँ
 
Kusum Thakur
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शिव भजन

"शिव भजन "शिव शंकर कहूँ याद करते हैं हम पूजा कैसे करूँ यह नहीं है पता ।तुमको कहते हैं औघर दानी सही,इस अधम को तो यह भी नहीं है पता ।शिव शंकर ............................ ।फूल अक्षत और चन्दन धरा थाल में ,ध्यान कैसे धरूँ यह नहीं है
 
Kusum Thakur
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मुझे आज मेरा वतन याद आया

"मुझे आज मेरा वतन याद आया"मुझे आज मेरा वतन याद आया ।ख्यालों में वह तो सदा से रहा है ,मजबूरियों ने जकड़ यूँ रखा कि ।मुड़कर भी देखूँ तो गिर न पडूँ मैं ,यही डर मुझे सदा काट खाए ।मुझे आज ......................... ।छोड़ी तो थी मैं चकाचौंध को देख ,निकल न
 
Kusum Thakur
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May 20 2010 06:58 PM
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माँ

 Happy Mother's Day माँ तुम सदा ऐसे ही मुस्कुराती रहो आज के दिन सभी माओं और और मातृत्व को मेरी शुभकामनाएँ !!यों तो माँ को  कभी याद करने के लिए औपचारिकता की जरूरत नहीं होती । माँ के एहसास को तो हर पल महसूस किया जा सकता है
 
Kusum Thakur
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अबला

इस बीच अस्वस्थता काम की व्यस्तता और मानसिक तनाव की वजह से काफी कम लिख  पाई हूँ । हाँ, समाचार से दूरी नहीं बना पाई। अपने स्वभाव वश मैं छोटी सी छोटी बातों को गहराई से सोचती हूँ और कई बार ऐसा होता है कि मैं उसमे उलझकर रह जाती
 
Kusum Thakur
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संस्मरण (तीसरी कड़ी)

बाबुजी की बदली "भूटान " से "गया" हो गई और हम "गया" आ गए । हमारे आते ही बाबुजी हम दोनों भाई बहनों को स्कूल में दाखिला के लिए तैयारी करवाने लगे। बाबुजी को हम दोनों के पीछे काफी मेहनत करनी पड़ी और तब जाकर नाज़रथ अकादमी (स्कूल ) में हमारा दाखिला हो
 
Kusum Thakur
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फिर से वे सपने जगा रही जो

" फिर से वे सपने जगा रही जो "तुम्हारे ख़्वाबों में बस रही जो ये कैसी उलझन है डस रही जो ये तेरे वादे हैं सारी रस्में है याद आए सता रही जो तुमने दिया है जो सारी खुशियाँ उसे ही पलकों में सज़ा रही जो मुझे पता अब मिले
 
Kusum Thakur
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ये कैसी उल्फत जो हूँ दुखी मैं

" ये कैसी उल्फत जो हूँ दुखी मैं "  तुम्हारी चाहत पर मर मिटी मैंये कैसी उल्फत जो हूँ दुखी मैं मुझे पता तब खता हुआ जब  फिर कैसी रंजिश जो हूँ दुखी मैं मैं कैसे कह दूँ करूँ इबादत जफा मिले तो रहूँ दुखी मैं लगे तो रूह भी वफ़ा
 
Kusum Thakur
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गुम सुम सी बैठी रहती हूँ

"गुम सुम सी बैठी रहती हूँ "गुम सुम सी बैठी रहती हूँ।ख़्वाबों को ख्यालों को ,नयनों मे बसाती रहती हूँ ।थक जाते हैं मेरे ये नयन ,पर मैं तो कभी नहीं थकती ।गुम सुम ........................ ।कानों को कभी लगे आहट ,आते हैं होठों पर ये हँसी ।पल भर की ये उम्मीदें
 
Kusum Thakur
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मुझे मेरा बचपन लौटा दो

" मुझे मेरा बचपन लौटा दो "मुझे मेरा बचपन लौटा दो ,कदम्ब तो नहीं झूले पर झुला दो ।याद नहीं माँ की थपकी ,और न मधुमय तुतलाना ।स्मरण नहीं वे लम्हें अब तो ,उन लम्हों को शाश्वत ही बना दो ।मुझे मेरा ...................... ।परीकथा की परी समझ ख़ुद ,आते होठों पर
 
Kusum Thakur
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यह सोच मैं हूँ हैरान

" यह सोच मैं हूँ हैरान "बहुत कठिन है साथ में हँसना ,और किसी की खातिर रोना ,सँग सँग जीवन पथ पर फिर भी , चलना है आसान ,यह सोच मैं हूँ हैरान ।महल से न कम घर होगा ,क्या सोची थी यह कब होगा ?जीवन की सच्चाई का तब ,क्यों नहीं मुझे था भान ,यह सोच मैं हूँ हैरान
 
Kusum Thakur
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रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँ

" रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँ "रुख हवा की न बदले यही चाहती हूँऔर ज़फा से रहूँ दूर यही चाहती हूँदूरियाँ तो न चाही सिफर ही मिलायादों को बसा लूँ यही चाहती हूँतबस्सुम तो है पर शिकन कम नहींबस आँसू न निकले यही चाहती हूँजिन्दगी के सफ़र से तो दहशत नहींपर
 
Kusum Thakur
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पुष्प गुच्छ भी दे न सकी मैं

" पुष्प गुच्छ भी दे न सकी मैं "पुष्प गुच्छ भी दे न सकी मैं ,अब कैसे मैं अश्रु छुपाऊं ।तुम हो गए नक्षत्र गगन के ,सखी धरणी की न बन पाऊँ ।रस्म सदा से जो चली आई ,ग्रहण सहज कैसे कर पाऊँ ।अंतरमन में प्रश्न उलझ गए ,अब उनको कैसे सुलझाऊँ ?इस अन्जान सफ़र पर एक दिन
 
Kusum Thakur
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होली

( कई दिनों से अस्वस्थता के कारण मैं कुछ नहीं लिख पाई हूँ, न ही पढ़ पाई हूँ, पर आज बिना लिखे न रह पाई और कुछ पंक्तियाँ लिख ही डाली )" होली "दिन हो होली या कि दिवाली ,रहता था न दिल भी खाली ।चटक रंग तो बसत ह्रदय में ,उसे उतारूँ कैसे नयनन में ।देखि ज्यों मैं
 
Kusum Thakur
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Feb 28 2010 03:21 PM
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रोना भी क्या एक कला है

" रोना भी क्या एक कला है "रोना क्यों कर दुर्बलता है ?यह तो नयनों की भाषा है ।सुख देखे तो छलक जाता है ।दुःख में फिर भी सहज आता है ।लाख संभालो , न तब रुकता है ।न निकट हो कोई आहत करता है ।उमड़ घुमड़ जो बस जाता है ,श्रांत ह्रदय वह कर देता है ।रोना भी क्या एक
 
Kusum Thakur
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Feb 19 2010 05:42 PM
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कवि कोकिल विद्यापति

कवि कोकिल विद्यापति"कवि कोकिल विद्यापति" का पूरा नाम "विद्यापति ठाकुर था। धन्य है उनकी माता "हाँसिनी देवी"जिन्होंने ऐसे पुत्र रत्न को जन्म दिया, धन्य है विसपी गाँव जहाँ कवि कोकिल ने जन्म लिया।"श्री गणपति ठाकुर" ने कपिलेश्वर महादेव की अराधना कर ऐसे पुत्र
 
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कुष्ठ रोग आश्रम में एक दिन

कुष्ठ रोग आश्रम में एक दिनमेरा मन 5 फरवरी से अबतक विचलित है । कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा है , न खाने में मन लग रहा है, न ही लिखने का मन हो रहा है और न ही किसी और काम में । कल मेरे एक दोस्त ने यह सुन मुझसे बातें कर मेरा मन बहलाने की कोशिश करता रहा, पर
 
Kusum Thakur
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कहूँ याद करती !!

आज एक ऐसे व्यक्ति का जन्मदिन है जिसके साथ का एहसास मेरे जीवन में बहुत महत्व रखता है । जो मुझे १५ वर्ष की उम्र में मिला और २३ वर्षों में जन्मों का स्नेह दिया ।एक अद्भुत कलाकार , एक हंसमुख इंसान , मातृ -भक्त , एक सफल पिता और पति । ऐसा व्यक्ति जो हर रिश्ते
 
Kusum Thakur
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शोभा भी न कम हो

"शोभा भी न कम हो "रस्ते चली मैं जिस पर, छोडूँ उसे मैं कैसे ?गैरों से न मैं परेशां, खुद पर सितम न हो कम ।।धिक्कार है मनुज को, अधिकार न दिया जो ,संघर्ष में ही जीवन, संताप भी न हो कम ।।जीवन के इस सफ़र में, मिलते तो सेज दोनों ,फूलों की सेज पाकर, काँटों की
 
Kusum Thakur
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हँसी के तले शिकन जो मिले

" हँसी के तले शिकन जो मिले "मैं हँसती तो हूँ पर कहूँ मैं किसेइस हँसी के तले शिकन जो मिलेकहूँ किस तरह दर्द के सिलसिलेदिखाऊँ किसे दर्द है जो मिलेन अरमानों की हसरत है मुझेन दीवानगी न उल्फत ही मिलेहौसला है मिला उस सफ़र के लिएमैं करूँ बंदगी पर सिफर ही मिले-
 
Kusum Thakur
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भावाकुल मन ढूँढ़े तुमको

" भावाकुल मन ढूँढ़े तुमको "काश, आज आपने शब्दों को ,अर्पित कर पाती मैं तुमको ।मेरे मन के सहज भाव फिर ,नया राग दे जाती मुझको ।भूलूँ मैं कैसे उन पल को ,मुझे लगे जैसे वह कल हो ।नित्य नए एक रूप में देखी ,समझ न पाई पर मैं तुमको ।सुख की यादें बंद नयनों में
 
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रंग मंच सा लागे मुझको

" रंग मंच सा लागे मुझको "रंग मंच सा लागे मुझकोदुनियाँ को मैंने न जानी ।जीवन के इस रंग मंच परकलाकार अद्भुत देखी हैनिर्देशन का पता नहीं हैअभिनय करे मन मानी दुनिया को मैं ने न जानी ।दो अन्जाने मिल जाते हैंमिल अभिनय भी कर जाते हैअभिनय करना एक कला हैयह भी तो
 
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शब्द न मैं दे पाती हूँ

शब्द न मैं दे पाती हूँ " शब्दों के बस महाजाल में उलझ उलझ रह जाती हूँ । लब तो उद्धत कहने को क्यों संप्रेषित न कर पाती हूँ ।। भावों की न कमी नयन में बस समझ उन्हें न पाती हूँ । उनके नम उद्गारों से क्यों खुद विचलित हो जाती हूँ ।। अभिलाषा जो मेरे स्वभाव म
 
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जुस्तज़ू

जुस्तज़ू " जो प्यार मैं करूँ कैसे बगावत करूँ कैसे न उसकी अब मैं इबादत करूँ क्या खता थी मेरी मुझे नहीं है पता किससे शिकवा करूँ क्या शिकायत लब सिले हैं मेरे पर पशेमाँ भी हैं कैसे इज़हार करूँ न शिकायत करूँ जुस्तज़ू थी मेरी जो मुझे मिल गई इक कसक आबरू की ह
 
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बच्चों का बचपन

बच्चों का बचपन " याद मुझे बच्चों का बचपन , और याद उनका भोलापन । भाते थे उनका तुतलाना , और सदा उन्हें बहलाना । बचपन उनका बीता ऐसे , आँख भींचते रह गयी मैं जैसे । चाहूँ बस स्मृतियों में कैसे , संचित कर रख पाऊँ वैसे । सोच सोच मैं सुख पाऊँ बिन सोचे न रह प
 
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सुख दुःख

सुख दुःख " मूल्य है हर उस पल का , चाहे सुख या दुःख के हों । दुःख की घड़ियाँ न रहे सब दिन , तो सुख की आस निरंतर क्यों हो । जो दुःख की घड़ियाँ सहज सँग हो , तो सुख बाँटन में भी सुख हो । जो मिल जाए, और विश्वास सँग हो , तो सुख और दुःख में भेद कम हो । सुख मे
 
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दिया है बहुत कुछ इस जिन्दगी ने

दिया है बहुत कुछ इस जिन्दगी ने " दिया है बहुत कुछ इस जिन्दगी ने । हँसाकर रुलाया इसी जिन्दगी ने ।। मझधार में भी छोड़ा जिन्दगी ने। डूबने से उबारा पर जिन्दगी ने ।। मैं सम्भली नहीं सम्भाला किसी ने । मुझे गर्त में जाने से उबारा किसी ने ।। करूँ जब शिकायत इ
 
Kusum Thakur
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भास्कर श्वेता को शादी की सालगिरह की अनेक शुभकामनाएँ और आशीर्वाद !!

आशीर्वाद " करूँ याद रिश्ते का यह दिन । हो ह्रदय में सदा कहे मेरा दिल।। चलो साथ सदा भावे मुझको वह। दूँ आशीष , कर उठे मेरा यह ।। जब भी कहूँ, कहूँ बस यही कि । सँग दो तुम सदा एक दूजे का ।। ज्यो हो विश्वास एक दूजे पर । तो आसान डगर तब जीवन भर ।। - कुसुम ठा
 
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कैसे भूलूँ उस पल को !

कैसे भूलूँ उस पल को यूँ " कैसे भूलूँ उस पल को यूँ , जिसकी तपिश न हुई हो कम । दग्ध करे अब भी हर पल , थे अवसादों से भरे वे क्षण । चाही तो बस इन नयनों से , काश ! साथ वे दे पाते । अंसुवन को वश में रख लेती , तब भी यह दिल भर आता । याद जिसे करना चाहूँ मैं ,
 
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H1 N1 का पूना में प्रकोप और नागरिकों में दहशत !

पूना में बहुत से अन्तेर्देशीय स्कूल हैं जिसकी वजह से बच्चों का बाहर के देशों से आना जाना लगा रहता है। अगस्त महीने में पूना में जब स्वाइन फ्लू का प्रकोप सामने आया और एक के बाद एक लोंगों की मृत्यु इस बीमारी से होने लगी तो आम नागरिकों के बीच एक दहशत सी
 
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मुझको कब वक्त मिला

मुझको कब यह वक्त मिला " मुझको कब यह वक्त मिला कि सोच सकूँ क्या है भला और क्या बुरा है मेरे जीवन की इस तन्हाई मे । मैं कहाँ समझ पाई अपने अन्दर के उन भावों को जो समझूं भी तो कैसे करूँ मैं सिंचित उन ख्वाहिशों को । पाई ख़ुद को वीराने में सोची उसको क्षणिक
 
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मेरे दोस्त को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई !

चाहूँ मैं कहना बहुत कुछ , पर शब्दों की बंदिश न भाए । उपहार मैं चाहूँ कुछ देना , दूँ क्या यह समझ न आए । अपनी भावनाओं को कैसे , करुँ आज मैं व्यक्त । भावना तो मूक ही होती , स्नेह स्वरुप मैं लाई हूँ । जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ! -कुसुम -
 
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पूर्ण विराम

पूर्ण विराम सुना जब कहते हुए कि _ अर्ध विराम उनके जीवन में , इसकी तो कल्पना भी न थी । देखी जब मैं हूँ अकेली , गयी पास कही कानों में _ कुछ तो बोलो हो क्यों चुप ? पर वह चुप्पी ऐसी कि , स्वप्न क्या तंद्रा भी टूटी । सारे सपने और लगी भी छूटी , पर मन माना
 
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मुझे मेरा बचपन लौटा दो

मुझे मेरा बचपन लौटा दो " मुझे मेरा बचपन लौटा दो , कदम्ब तो नहीं झूले पर झुला दो । याद नहीं माँ की थपकी , और न मधुमय तुतलाना । स्मरण नहीं वे लम्हें अब तो , उन लम्हों को सास्वत ही बना दो । मुझे मेरा ...................... । परीकथा की परी समझ ख़ुद , आते
 
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यादें (दूसरी कड़ी )

मुझे अपने बचपन की बहुत कम बातें ही याद , पर कुछ बातें जिसे माँ बराबर दुहराती रहती थी और हमेशा सबको बताती थी, वह मानस पटल पर इस तरह बैठ गए हैं कि अब शायद ही भूल पाऊँ । उनमें कुछ हैं मेरे और मेरे भाई के बीच का प्रेम। मेरे बाबूजी उस समय भूटान में थे , म
 
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भड़ास

भड़ास " राज बाल की हिम्मत को दिया चुनौती कईयों ने पत्रकार तो पत्रकार चिट्ठाकार भी कम नहीं पत्रकारों ने बिक्री बढ़ाई अखबार और पत्रिकाओं की दूरदर्शन ने टी आर पी बढ़ाई नेताओं के झूठे मंतव्यों से फिर चिट्ठाकार क्यों पीछे रहें हमने अपने चिट्ठों से राज बाल के
 
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मेरा एक १०० वाँ पोस्ट

मेरा १०० वाँ पोस्ट मेरे उस साथी को समर्पित जिसने कभी मुझ पर विश्वास किया ।) "जीवन तो है क्षण भंगुर" बिछड़ कर ही समझ आता, क्या है मोल साथी का । जब तक साथ रहे उसका, क्यों अनमोल न उसे समझें । अच्छाइयाँ अगर धर्म है, क्यों गल्तियों पर उठे उँगली । सराहने म
 
Kusum Thakur
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यादें

एक बार मुझे किसी पत्रिका के लिए कुछ लिखने को कहा गया। मैं बस इतना ही लिख पाई मैं क्या लिखूं मेरी तो लेखनी ही छिन गयी है। पर आज महसूस करती हूँ कि मुझे एक अलौकिक लेखनी और उस लेखनी के रचना की जिम्मेदारी दे दी गयी है। न जाने क्यों आज लिखने की इच्छा हो रह
 
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संजो रहे बस स्मृतियों को

संजो रहे बस स्मृतियों को " समय भी इतना बदल जायेगा कभी सोची न थी । कभी हम भी सोचेंगे अपने लिए सोची न थी । हम तो रहते थे प्रतिपल , स्नेह सुधा लुटाने को । स्वयं के लिए न सोची अब तक , आज लगे सब बदला बदला । समय भी इतना बदल जाएगा कभी सोची न थी । कभी हम भी
 
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