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गीत ग़ज़ल औ गीतिका

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05 Jun 2010
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एक ग़ज़ल : लबों पर दुआएं..........

ग़ज़ल :लबों पर दुआएं..... लबों पर दुआएं , पलक पर नमी है बता ज़िन्दगी! अब तुझे क्या कमी है? हज़ारों मसाइल ,हज़ारों मसाइब मगर फिर भी ज़िन्दा यहाँ आदमी है मिरी मुफ़लिसी पे तरस खाने वालों तुम्हारा यह रोना फ़क़त मौसमी है हवादिस में जीना ,हवादिस में मरना ग़रीबों को क्या
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल : जूनून-ए-इश्क में हमनें ......

जुनून-ए-इश्क़ में हमने न जाने क्या होगा ! हैं इतने बेख़ुदी में गुम कि हम को क्या पता होगा मैं अपने इज़्तिराब-ए-दिल को समझाता हूँ रह रह कर कि जितना चाहता हूँ वो भी उतना चाहता होगा हमें मालूम है नाकामी-ए-दिल, हसरत-ए-उल्फ़त हमें तो आख़िरी दम तक वफ़ा से वास्ता
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल : यहाँ लोगो की आँखों में .....

ग़ज़ल : यहाँ लोगों की आँखों में....... यहाँ लोगों की आँखों में नमी मालूम होती है नदी इक दर्द की जैसे थमी मालूम होती है हज़ारों मर्तबा दिल खोल कर बातें कही अपनी मगर हर बार बातों में कमी मालूम होती है चलो रिश्ते पुराने फिर से अपने गर्म कर आएं दुबारा बर्फ की
 
आनन्द पाठक
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May 15 2010 07:51 PM
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एक गीतिका : तुम भीड़ खरीदी देखे हो ....

तुम भीड़ खरीदी देखे हो ,ज़ज्बात नहीं देखा होगा सत्ता की हिला दें बुनियादें ,उन्माद नहीं देखा होगा जो शीश झुका के बैठे हैं ,वो बिके हुए दरबारी हैं आदर्शों पर मर-मिटने का उत्साह नहीं देखा होगा तुम भीख बाँटते फिरते हो वादे झू्ठे आश्वासन के खाली पेटों की आहों
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल : रकीबों से क्या आप ......

एक ग़ज़ल : रक़ीबों से क्या...... रक़ीबों से क्या आप फ़रमा रहे हैं ! हमें देख कर और घबरा रहे हैं इलाही! मेरे यह अदा कौन सी है ! कि छुपते हुए भी नज़र आ रहे हैं उन्हें आईना क्या ज़रा सा दिखाया वो पत्थर उठाए इधर आ रहे हैं सुनाया जो उनको ग़मों का फ़साना वह झुझँला रहे
 
आनन्द पाठक
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एक गीतिका : जड़ो तक साजिशें गहरी ......

एक गीतिका : जड़ों तक साज़िशें गहरी..... जड़ों तक साज़िशे गहरी सतह तक हादसे थे जहाँ बारूद की ढेरी वहीं पर घर बसे थे उनकी आदतें थी आस्माँ ही देखते चलना ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली थी ,बेख़बर थे बहुत उम्मीद थी उनसे ,बहुत आवाज़ दी हमने कि जिनको चाहिए था जागना, सोए
 
आनन्द पाठक
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एक गीतिका >वातानुकूलित आप ने .......

एक गीतिका: वातानुकूलित आप ने... वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिए सत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा लिए "दिल्ली" में बस गए तपोवन को छोड़ कर "साधु" भी कैसे कैसे चेहरे चढ़ा लिए गूँगों की बस्तियों में अंधों की भीड़ थी हर युग में आप खोटे सिक्के चला लिए यह आप की कला
 
आनन्द पाठक
Feb 21 2010 10:45 AM
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एक गीत : जिसने मुझे बनाया...

जिसने मुझे बनाया ,उसका ही गीत गाया दरबारियों के आगे कभी सर नहीं झुकाया मिट्टी सा भुरभुरा तन किसके लिए सजाया यह कब रहा था अपना जो अब हुआ पराया पानी के बुलबुले पर तस्वीर ज़िन्दगी की किसने अभी उकेरा किसने अभी मिटाया इस दिल के आइने पर जो गर्द सी जमी है जब भी
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल :आंधियों से न कोई गिला कीजिए ...

आँधियों से न कोई गिला कीजिएलौ दिए की बढ़ाते रहा कीजिएसर्द रिश्ते भी इक दिन पिघल जाएगीगुफ़्तगू का कोई सिलसिला कीजिएदर्द-ए-जानां भी है,रंज-ए-दौरां भी हैक्या ज़रूरी है ख़ुद फ़ैसला कीजिएमैं वफ़ा की दुहाई तो देता नहींआप जितनी भी चाहे जफ़ा कीजिएहमवतन आप हैं ,हमज़बां
 
आनन्द पाठक
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एक सूचना :उर्दू से हिंदी

www.urdu-se-hindi.blogspot.comइस ब्लाग का मक्सद फ़कत इतना है कि उर्दू अदब में आजकल जो लिखा/पढ़ा जा रहा है या जो सरगर्मियाँ उधर हैं उन्हे अपने हिन्दीदाँ दोस्तों को ज़ियादा से ज़ियादा वाक़िफ़ कराना है जो हिन्दी में लिखते-पढ़ते हैं और उर्दू से मोहब्बत है उर्दू के
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : जिसने मुझे बनाया ....

एक गीत : जिसने मुझे बनाया ........जिसने मुझे बनाया ,उसका ही गीत गायादरबारियों की आगे कभी सर नही झुकाया दुनिया ने मुझसे चाहा दिल वो ग़ज़ल सुनाए तिरी नील-झील आँखें दिल डूब -डूब जाए कैसे उन्हें भुला दूँ दो रोटियों के बदले मासूम नन्हीं बच्ची बाजार बेंच आएदो
 
आनन्द पाठक
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स्वागत गीत : नववर्ष तुम्हारा अभिनन्दन ......

हे आशाओं के प्रथम दूत ! नव-वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन सौभाग्य हमारा है इतना इस संधि-काल के साक्षी हैं जो बीता जैसा भी बीता पर स्वर्ण-काल आकांक्षी है यह भारत भूमि हमारी भगवन! हो जाए कानन-नंदन नव-वर्ष तुम्हारा............ ले आशाओं की प्रथम किरण हम करें नए
 
आनन्द पाठक
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कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक हो भले तीरगी रास्ता पुरखतर दूर आती न मंज़िल कहीं हो नज़र हम चिरागों का क्या है जहाँ भी रखो हम वहीं से करें रोशनी का सफ़र ज़माने से पूछो न बातें हमारी गमो-दर्दे-दिल की वो रातें हमारी अगर पूछना है तो पूछो हमी से ’आनन्द’ नम क्यूँ है आँखे तुम्हारी
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : वह बैसाखी ले एक ....

वह बैसाखी ले एक हिमालय नाप गए मैं उजियारी राहों में भटक गया हूँ वह अँधियारी राहों से चलते आए मैं आदर्शों का बोझ लिए कंधों पर वह ’वैभव’ हैं ’ईमान’ बेचते आए मैं चन्दन,अक्षत,पुष्प लिए वेदी पर वह चेहरा और चढा़ कर देहरी लांघ गए वह हर दर पर शीश झुकाते चले
 
आनन्द पाठक
Dec 29 2009 11:47 AM
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एक गीत :वह तो एक बहाना भर है ....

वह तो एक बहाना भर है, वरना मेरा जीना क्या है वरना मेरा मरना क्या है पोर-पोर आँसू में डूबे गीत-गीत के अक्षर-अक्षर सजल-सजल हो उठे नयन है बह जाएंगे निर्झर-निर्झर वह तो सिर्फ़ सुनाना भर है ,वरना मेरा रोना क्या है वरना मेरा हँसना क्या है प्रीति-प्रीति अँजु
 
आनन्द पाठक
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एक प्रणय गीत : तुम हमारी जीत भी हो .....

तुम हमारी जीत भी हो हार भी | नीड़ का निर्माण करने को विकल दो विहग जाने कहाँ से आ मिले हैं विश्व में नव-गंध भर देंगे कभी - दो सुमन अब इस धरा पर खिल उठे है कल तुम्हारा रेशमी आँचल कहेगा मैं तुम्हारा रूप भी , श्रृंगार भी | खींच कर दो कोर काजल की नयन में
 
आनन्द पाठक
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एक कविता : कितने पौरुष वीर .....

कितने पौरुष वीर पुरुष है ! हाथों में बंदूक लिए नारी को निर्वसना कर के हांक रहे है सीना ताने मरा नहीं दुर्योधन अब भी जिंदा है हर गाँव शहर में अगर मरा है 'धर्मराज'का सत्य मरा है 'अर्जुन ' का पुन्सत्व मरा है 'भीम' का भीमत्व मरा है दु:शासन तो अब भी जिंदा
 
आनन्द पाठक
Dec 29 2009 11:47 AM
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एक गीत : मैं प्यार माँगता हूँ .......

एक गीत : मैं प्यार माँगता हूँ...... मैं प्यार माँगता हूँ ,अधिकार माँगता हूँ ! जीवन के इस सफ़र में श्वासों के इस भँवर में टूटे हे सपन का श्रृंगार माँगता हूँ मैं प्यार माँगता हूँ........ आदर्श के सहारे लूटी गईं बहारें उजड़ी हुई गली का गुलजार माँगता हूँ म
 
आनन्द पाठक
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श्वेत-पत्र पर खून के छींटे...

६ दिसम्बर,किसी भी वर्ष का एक सामान्य दिन,भारतीय राजनीति का का एक खास दिन,६-दिसम्बर -१९९२ ,बाबरी मस्जिद ढहाई गई, दो दिलों के बीच नफ़रत की दीवार उठाई गई.इस दिन को कोई शौर्य दिवस के रूप में मनायेगा,कोई पुरुषार्थ दिवस के रूप में ,कोई धिक्कार दिवस के रूप म
 
आनन्द पाठक
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एक गीत: जीवन के सुबह की....

एक गीत: जीवन के सुबह की.... जीवन के सुबह की लिखी हुई पाती मिलती है शाम ढले मुझको गुमनाम पूछा है तुमने जो मइया का हाल कमजोरी खाँसी से अब भी बेहाल लगता है आँखों में है मोतियाबिन बोलो तुम्हारी है कैसी ससुराल? चार-धाम करने की हठ किए बैठी खटिया पर पड़े-पड़े
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : सजीली साँझ का मौसम

एक गीत :सजीली साँझ का मौसम सजीली साँझ का मौसम ,रंगीली रात का मौसम उनीदी अधखुली पलकें कपोलों पर झुकीं अलकें पुरानी याद का मौसम, अधूरी बात का मौसम सजीली साँझ का मौसम...... नयन में खिल रहे काजल लहरता सुरमुई आँचल तुम्हारे साथ का मौसम ,नई सौगात का मौसम सज
 
आनन्द पाठक
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एक गीत :हर बार समर्पण करता हूँ...

एक गीत :हर बार समर्पण करता हूँ...हर बार समर्पण करता हूँ हर बार गया ठुकराया हूँ अधखुली उनींदी पलकों पर इक मधुर मिलन की आस रही दो अधरों पर तिरते सपने चिर अन्तर्मन की प्यास रहीहर बार याचना सावन की हर बार अवर्षण पाया हूँ तेरे घर आने की चाहत गिरता हूँ कभी
 
आनन्द पाठक
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Aug 01 2009 11:14 AM
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एक ग़ज़ल : ज़माने की अगर हम....

ज़माने की अगर हम बेरुखी से डर गए होते वह दिल की आग थी वरना कभी के मर गए हो्ते अगर हम ज़ब्त ना करते सदा-ए-दिल गमे-उल्फ़त जो टकराते पहाड़ों से पिघल पत्थर गए होते हमारा ज़िक्र भूले से कोई जो कर गया होता यकीनन उनकी आँखों में आँसू भर गए होते अगर बुतख़ाने से पहल
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : देवता बनना कहीं आसान है....

देवता बनना कहीं आसान है ,बोझ फूलों का उठाना ही कठिन | डूबने को हर किनारे मिल गए पार लगाने का नहीं कोई किनारा कल जो अपने थे पराए हो गए गर्दिशों में जब रहा मेरा सितारा दीप बन जलना कहीं आसान है,उम्र भर पीना अँधेरा ही कठिन जिंदगी अनुबंध में जीते रहे फूल
 
आनन्द पाठक
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हस्यिका :अथ श्री चमचा पुराण : कुछ दोहे

राजनीति चमचागिरी यही सार यही तत्व जितने चमचे साथ हों उतना अधिक महत्त्व मनसा वाचा कर्मणा ना होगा जो भक्त वह चमचा रह जाएगा आजीवन अभिशप्त नेता से पहले मिले चमचा जी से आप 'सूटकेस' का वज़न देख कारज लेते भांप चमचों के दो वर्ग हैं 'घर-घूसर' और 'भक्त ' घर-घूस
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : तुम बिना पढ़े ....

तुम बिना पढ़े लौटा दी मेरी आत्मकथा 'आवरण' देख पुस्तक पढ़ने की आदी हो तुम फूलों का रंगों से मोल लगाती हो मैं भीनी-भीनी खुशबू का आभारी हूँ तुम सजी-सजाई दुकानों की ग्राहक हो मैं प्यार बेचता गली-गली व्यापारी हूँ तुम सुन न सकोगी मेरी अग्नि-शिखा गीतें तुम र
 
आनन्द पाठक
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एक गज़ल : जब से तुम से मिली....

जब से तुम से मिली जिन्दगी सांस लेने लगी जिन्दगी रूह अपनी निखरने लगी आईने-सी लगी जिन्दगी कितने सपने लगी देखने चार दिन की बची जिन्दगी उनके दीदार की जुस्तजू मेरी दीवानगी जिन्दगी अब न जाएं यहाँ से कहीं छोड़ तेरी गली ज़िन्दगी यह तो है इश्क की इब्तिदा बेखुद
 
आनन्द पाठक
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हास्य क्षणिका...

हास्यिका : हो जाए कुछ हल्का- फुल्का मिर्च-मसला बैठे- ठाले 'आनंद' जी ने क्या लिख डाला सावुनी दोहे 'चारित्रिक व्यक्तित्व पर जो कीचड लग जाय 'सर्फ़-अल्ट्रा' से धोइए श्वेत-धवल हो जाय साबुन मल-मल जग मुआ धवल वस्त्र न होय एक हाथ 'ओ0के०' मल्यौ धवल-धवल ही होय
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : मालूम था मेरी देहरी ....

मालूम था मेरी देहरी को ठुकरा कर चल जाना है फिर भी तेरे स्वागत में है वन्दनवार सजाए || ऋचा-मन्त्र से आह्वान पर आह्वान करता हूँ हवन-कुण्ड में आकांक्षा की समिधा देता हूँ वही प्रतीक्षारत हैं आँखे कल भी आज वही मुझको क्या मालूम नहीं था शर्ते आने की ! मालूम
 
आनन्द पाठक
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एक गीत : जिसको दुनिया के मेले में ....

जिसको दुनिया के मेले में ढूढा किया घर के आँगन के कोने मिली जिन्दगी उम्र यूँ ही कटी भागते - दौड़ते जिन्दगी खो गई जाने किस मोडे पे 'स्वर्ण-मृगया' के पीछे कहाँ आ गए ! रिश्ते-नाते ,घर-बार सब छोड़ के प्यास फिर भी मेरी अनबुझी रह गई आकर पनघट पर ,प्यासी रही ज
 
आनन्द पाठक
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गीत ग़ज़ल औ गीतिका

हम बंजारे नगरी नगरी अपना कहाँ ठिकाना है सुबह जलाए चूल्हा-चाकी शाम हुए उठ जाना है दो दिन बाद पकी हैं रोटी ,धुँआ लग गई कोठी में महलों वाले सोच रहे हैं ,झुग्गी वाले हेन्ठी में सुबह-शाम की भाग-दौड़ में जो कुछ हासिल हो पाया लाद चले हैं खटिया-मचिया छोड़ यही
 
आनन्द पाठक
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एक गीत :नफ़रत नफ़रत से बढ़े...

नफ़रत नफ़रत से बढ़े प्यार से प्यार बढ़े अपनी बांहों में ज़माने को समेटो तो सही लोग सहमे हैं खड़े खिड़कियाँ बंद किए आँखे दहशत से भरी होंठ ताले हैं पड़े उनके दर पे भी कभी प्यार से दस्तक देना जिनकी खुशियाँ हैं बिकी सपने गिरवी हैं रखे कौन कहता है कि पत्थर तो प
 
आनन्द पाठक
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एक कविता " मृदुल अंकुर भी ...

मृदुल अंकुर भी तोड़ कर पत्थर पनपती है एक उर्जा-शक्ति अंतस में धधकती है 'मगर हम आदमी है उम्र भर लड़ते रहे नित्य-प्रति की शून्य अभावों से रोज़ सूली पर चढ़े - उतरे आँख में आंसू भरे और तुम? देवता बन कर बसे जा पहाडों में ,गुफाओं में कन्दराओं में ! या नदी के
 
आनन्द पाठक
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एक कविता : तुम जला कर....

तुम जलाकर दीप रख दो आँधियों में \ जूझ लेंगे जिन्दगी से पीते रहेंगे गम अँधेरा ,धूप ,वर्षा सब सहेंगे \ बच गए तो रोशनी होगी प्रखर मिट गए तो गम न होगा \ धूम-रेखा लिख रही होगी कहानी "जिन्दगी मेरी किसी की भीख न थी ---आनंद
 
आनन्द पाठक
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कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक पारदर्शी तेरा आवरण कर न पाया तुझे संवरण मैंने दर्शन बहुत कुछ पढ़ा पढ़ न पाया तेरा व्याकरण -- ० -- भावना का स्वरुपण हुआ अर्चना का निमंत्रण हुआ फूल क्या मैं धरूँ देवता ! ----०----- आज अपना हूँ मैं संस्मरण तुम भले ही कहो विस्मरण आज स्वीकार कर ल
 
आनन्द पाठक
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एक ग़ज़ल : मोहन के बांसुरी की जैसे तान....

मोहन के बांसुरी की जैसे तान है ग़ज़ल कोयल की कूक मीठी जैसी गान है ग़ज़ल जैसे कि मां की गोद में सोया हुआ बच्चा चेहरे पर हौले-हौले मुस्कान है ग़ज़ल खिलते हुए कमल पे ठहरी हुई शबनम छूने को मचलती हुई अरमान है ग़ज़ल मिलते कभी सफर में जैसे दो अजनबी परदेश मे
 
आनन्द पाठक
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एक समर्पण गीत ....

एक समर्पण गीत .... चेतना हो जहाँ शून्य उस मोड़ पर वेदना हो जहाँ मूक उस छोर पर हँस उठे प्राण-मन खिल उठे रोम तन गूँज भर दो मेरी बांसुरी में .... भावना के सिमटने लगे दायरे टूटने जब लगे प्रीत के आसरे मैं पुकारूं तुझे श्वांस बन कर मिलो जिन्दगी की सफ़र आख़ि
 
आनन्द पाठक