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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

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12 Jun 2010
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गुदगुदी

कुछ दिनों पहले मुझे किसी ने एक चुटकुला भेजा जिसे पढ़कर मैं अपनी हंसी रोक ही नहीं पा रही थीभिखारी : बेटी दो दिन से कुछ नहीं खाया, कुछ खाने को दे दे.लड़की: बाबा अभी खाना नहीं बना है.भिखारी:कोई बात नहीं मेरा मोबाइल नंबर ले लो जब बन जाए मिस्ड कॉल दे देना :)
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तो?

अगर चांदनी की तरह तुम मेरे जीवन में उजियारा न करती....तोतो?मैं तुम्हे प्यार न करता!अगर बारिश में तुम मोर जैसे न नाचती........ तोतो ?तो मैं तुम्हे प्यार न करता.अगर तुम्हारी हंसी में घुंघरुओं जैसा संगीत न होता......तोतो?मैं तुम्हे प्यार न करता!अगर तुम लड़की
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:)

एक दिन चाँद मेरी खिड़की पर आयाऔर बोला क्यूँ बैठी होआकाश में निगाहें लगायेअब तो मैं आ गया.मैंने भी हंसकर कहातुम तो आ गए पर क्या करूँदिल को अभी इशारा नहीं मिला कीवो भी तुझे देखने छत पर आ गया.अगर मुझे, तुझे देखने परउसकी आँखों में झांकने काअहसास न होता तोअ
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

मन कर रहा है आग लगा दूं सारी दुनिया को...जहाँ मैं इतनी मजबूर हूँ की जब चाहूँ तुमसे मिल नहीं सकती बात नहीं कर सकती पर इसमें दुनिया का क्या कसूर है? कसूर है तो सिर्फ तुम्हारा है या मेरा. . मेरा क्यूंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ और तुम्हारा क्यूंकि तुमने
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

मुझे पानी अपनी ओर खींचता है और तुम्हारी आँखों में ....मुझे पूरा समंदर नज़र आता है.
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

प्रकृति की तरह बसंत, शीत, वर्षा और गर्मी के अनुरूप अपने आप को बदल लो ....न दर्द उठेगा, न कसक. हमारा मन एक जीवित नदी है...ऊपर से सूखी रेत और भीतर से कभी न सूखने वाला निर्झर. शायद यहीं से इंसान को जीने का रस मिलता है.
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

ज़िन्दगी में अगर कोई रिश्ता छूटे तो ऐसे मोड़ पर छूटे की अगर फिर कभी मिलें तो मिलने की ख़ुशी चाहे न हो पर मिलने का दुःख भी न हो...
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रात आधी खींचकर मेरी हथेली एक उँगली से लिखा था 'प्यार’ तुमने

आज बहुत कुछ लिखने का मन है..पर मेरे विचारों मेरी भावनाओ को शब्दों में पिरो पाना बहुत मुश्किल हो रहा है......बार बार कुछ लिखती हूँ कुछ मिटाती हूँ...अचानक से याद आती है मुझे हरिवंशराय बच्चनजी की वो कविता जो मैंने न जाने कितने बरसों पहले पढ़ी थी पर आज पहली
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कुछ यादें इश्क की गलियों से

क्या अब भी कोई आता है तुमसे मिलने ऑफिस से आते वक़्त,क्या ट्रेन में बैठते वक़्त अब भी क्या तुम्हे मेरे आने का इंतज़ार रहता हैक्या कभी तुम भूल जाते हो कि अब मैं उस शहर में नहीं हूँ और तुम्हे रहती है जल्दी घर पहुचने की,क्या अब भी तुम घर पहुच कर खोल कर बैठ
Feb 15 2010 11:04 PM
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

हैं अरमान बहुत से इस दिल केऔर हैं होंसले भी बुलंद बहुत इस दिल केदेखे कब ये दिल जिद्द पर आता हैऔर तुझको तुझ से चुरा ले जाता है !चित्र साभार गूगल
Feb 15 2010 10:55 PM
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अजनबी सा अहसास

आज एकाएक फिर सीखा कि प्यार की प्रक्रिया कभी स्थिर नहीं होती या तो वह विकसित होती चलती है या निगति की और बढती है. हम सोचते हैं 'अलग हो गए', 'भूल गए', प्यार 'मर' गया, 'अब कुछ नहीं 'बचा', या की 'भूला दिया', इसलिए 'क्षमा' हो गयी. पर वास्तव में यह होता नहीं.
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

ज़िन्दगी की भाग दौड़ में कुछ छूटते रिश्ते, कुछ टूटते सपने यही है नियम प्रकृति का ?नहीं मैं नहीं मानती इन छोटी छोटी बातों को जो कर दे खाली मेरे अंतर्मन को,हारना इस दिल का काम नहीं, और छोड़ना मेरी फितरत नहीं ...
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तुम्हारे पसंदीदा डायलोग

तुम जब भी मिलती हो नयी सी लगती हो ये मेरा भ्रम है की तुम्हारा जादू ? तुम्हारी आँखे हैं की आइना, जैसे ही देखो दिल का हाल पता चल जाता है. अरे कहना था न मुझे तुमने क्यूँ तकलीफ की, हुज़ूर की खिदमत में नाचीज़ हमेशा हाज़िर है. तुम हंसती हो तो लगता है जैसे मं
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उम्मीद

एक ख़त में लिख भेजा है आज मैंने अपने मन का हाल. पर दूरियां इतनी हैं की मेरा संदेस तुम तक पहुचेगा कैसा? आज अपने ख़त को एक प्लास्टिक में बंद कर एक डिबिया में बंद कर मैंने गंगा में बहा दिया है यही सोच की यहाँ गंगा बहती है और वहां थेम्स नदी. कभी न कभी कि
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शिक्षा के बदलते प्रतिमान

कॉलेज शिक्षा विभाग में आये मुझे अभी महिना भर ही हुआ है और मैं अपने आपको इस माहौल के अनुकूल नहीं बना पा रही हूँ. महाविद्यालयों में विद्यार्थी पंजीकरण काफी ऊँचा है पर कहीं कक्षा नहीं लगती और कहीं विद्यार्थी नहीं आते. अध्यापक गण भी विद्यार्थियों को पढ़न
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

तुम एक आम का पेड़ जिसकी शीतलता ने हर पल मुझे सहलाया है, जिसके फलों की मिठास से मेरा सारा जीवन मिठास से भर गया !
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

जो नहीं है उसका अफ़सोस करने और दुःख मनाने से अच्छा है की जो है और जो मिल रहा है उसकी ख़ुशी मनाई जाए :)
Sep 22 2009 01:54 PM
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उलझे से रिश्ते

क्यूं सब कुछ सही चलते चलते अचानक से रुक जाता है क्यूं मन की उलझने कभी ख़त्म नही होती. अपने ही नही बल्कि अपने आस पास के लोगों को देखूं तो भी लगता है क्यूं कुछ रिश्ते हम सारी उमर निभाने के लिए अभि-शिप्त होते हैं क्यूं हम चाहकर भी उस बंधनो को तोड़ नही पाते
Aug 22 2009 07:46 PM
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राखी का स्वयंवर

प्रतिद्वन्दिता के चलते हुए आजकल टी वी चेनल्स मे होड़ लगी हुई है की कौन कितने ज़्यादा दर्शकों को अपनी और खीच पाए और टी. आर. पी. चार्ट में उच्च स्थान पाए. ऐसे ही एक ख्याल को ध्यान में रखते हुए राखी का स्वयंवर नाम का धारावाहिक दर्शको के सामने प्रस्तुत किया
Aug 22 2009 07:24 PM
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फ़ुर्सत के पल, भूली बातों के नाम

कभी तो हम फिर से बैठकर फ़ुर्सत मे बातें करे. जब तुम ये ना कहो फटाफट बोलो क्या बात है, ना मैं कहूँ जल्दी बोलो कॉलेज जाना है. बस बातें शुरू हो और बिना किसी अवरोध के एक बात दूसरी का सिरा पकड़े और ये सिलसिला चलता चले. कभी चाय की चुस्कियों के साथ तो कभी
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तुम एक दुनिया खूबसूरत सी

तुम्हे देखती हूँ तो लगता है सारी दुनिया मेरे पास सिमट आई है, हर ओर कोयले जीवन का मधुर संगीत सुना रही है. ज़िंदगी के जो अंधेरे कोने शेष है वहाँ जुग्नुओ की रोशनी बिखर गयी है, तपते हुए रेगिस्तान मे बालू के कणओ पर बारिश की बूंदे मोती जैसे गिर रही है, जाड
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दिल ढूंढता है फिर वही...

लंदन मे रहकर मुझे कई बार अपने देश की बहुत याद आती है. और वो भी ख़ासकर बारिश के दिनो में. यहाँ पहले ही ठंड होती है उपर से ठंडी हवा और बारिश. चलिए बारिश तो बहुत सुहाना और लुभावना मौसम हैं मुझे याद है जब मैं घर पर या हॉस्टिल मे रहती थी बारिश होते ही हम
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एक गलती सज़ा उमर भर की

चीन सरकार की नीति के अनुसार एक परिवार एक बच्चे का नारा है जो की वहाँ हो रही जनसख्या वृद्धि को रोकने का एक उपाय है. उपाय तक तो बात सही थी पर हाल ही में एक खबर के अनुसार जिन माता-पिता के एक से अधिक बच्चे हैं उन्हे जुर्माना भरना पड़ता है. माता-पिता को ब
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मैं और मेरा शोध कार्य

पिछले चार दिन कैसे बीते कुछ पता ही नही चला. जबसे रिसर्च का काम शुरू किया है तबसे कुछ ना कुछ होता ही रहता है. रिसर्च का काम करते करते समझ भी नही आ रहा था मैं सही लिख भी रही हूँ या नही. अभी तक की मेरे शोध प्रशिक्षण के हिसाब से मुझे कुछ मूलभूत नियम, क़ा
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हिन्दी ब्लॉग जगत

हिन्दी ब्लॉग जगत से जबसे मैं रूबरू हुई तबसे मुझे लगा जैसे कोई बड़ा खजाना मेरे हाथ लग गया है. एक ऐसा माध्यम जिससे हर इंसान को अभिवय्क्ति का अधिकार मिल गया है. अब किसी को अपने अंदर उमड़ रहे विचारो, भावों को प्रकट करने से डर नही लगेगा, कोई भी अपने विचार
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ज़िंदगी की परीक्षा

आज अचानक से पुराने फोटो देखते मन उदासी से भर गया. मेरा एक पुराना क्लासमेट याद आ गया जिसने 12वी मे फेल होने के कारण आत्महत्या कर ली थी. एक बहुत ही हँसमुख लड़का, जिसे देखकर लगता ही नही था उसको पढ़ाई की कोई चिंता है या वो ऐसा कदम उठा सकता है. उसकी मौत क
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पालिका बाज़ार की एक शाम

दिल्ली के पालिका बाज़ार का नाम बहुत सुना था पर कभी जाने का पहले मौका नही मिला था. किसी से भी कहो कोई लेकर ही नही जाता था और फिर हम दिल्ली जाते भी 2-3 दिन को थे. बाहर से हमेशा देखा पर कभी अंदर जाने का मौका नही मिला. फिर एक दिन मैं और प्रियंका दोनो मुं
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

ओफ्फो जब देखो तुम खाना ही बनाती रहती हो, कुछ और भी आता है की नहीं? हम्म इतने प्यार से तुम्हारे आने से पहले तुम्हारे लिए खाना तैयार रखा ताकि आने के बाद मैं काम में न जुटी रहूँ और तब भी तुम खुश नहीं. पतिदेव बताइए मैं क्या करूँ? अरे भाई कुछ और करो, बाहर
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यहाँ कचरा फेंकना मना है

इंग्लेंड आने से पहले जब मैं भारत में थी विदेशियों को हमेशा कहते सुनती थी भारतीय बहुत गंदगी मचाते हैं, जहाँ देखो कचरा फैलाते रहते हैं. यहाँ आने से पहले सब बोले अब तुम इंग्लेंड में घूमना एकदम साफ देश में. हमे भी लगा अरे वाह स्वर्ग में पहुच जाएँगे. कहाँ
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नाम, सरनेम और समाज : भाग 1

आज अचानक से ही बात चली की लड़कियो को शादी के बाद पति का उपनाम अपने नाम के पीछे लगाना चाहिए . इस बात पर बहस करते करते एसी दिमाग़ में 2 साल पुराना एक किस्सा याद आया जो अंतत अभी एक महीने पहले समाप्त हुआ . मेरा एम . फिल का दीक्षांत समारोह था . मैं बहुत ख
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अलविदा कहती ज़िंदगी

आज जब मैने तुम्हे जाते हुए देखा जाने क्यूँ लगा ज़िंदगी मुझसे दूर जा रही है. इस देश में आए मुझे 8.5 महीने हो गये हैं और यही एक रिश्ता है जो यहाँ आने के समय से आज तक मेरे साथ था. मेरी हर खुशी, हर दुख में मेरे साथ. जब कभी मैं परेशान होती थी एक प्यार भरा
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थोड़ी सी ज़मीन, थोड़ा सा आसमान

कई बार दिल और दिमाग़ की कशमकश मे इतना उलझ जाते है की कुछ समझ ही नही आता क्या करे. सब कहते है दिल को अपने काबू में रखो वरना वो तो कभी ये माँगेगा कभी वो, दिमाग़ से चलो. पर फिर दिल होता ही क्यूँ है? और जब चलना दिमाग़ ही है तो दिल और दिमाग़ एक दिशा में क
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मन और पतंग

बचपन में अकसर घर की छत पर खड़ी होकर आसमान में हवा के साथ बातें करती पतंगो को घंटों देखती थी. लाल, पीली, नीली हरी सब रंगो की पतंगे. पतंग को कभी ढील देते थे, कभी कसाव, एक दूसरे से बाज़ी मार जाने की चाह मे अपनी जान हथेली पर लिए ख़तरनाक मुंडेर और छतों पर
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निफ्ट उर्फ दर्ज़िगिरी का स्कूल

उफ्फ 8 बज गये 10 बजे निफ्ट पहुचना है और ये जे. एन. यू. में ऑटो नही दिख रहा और ये बस को भी आज ही नखरे करने हैं. यहाँ तो सर्दी की सुबह 8 बजे भी ऐसे लगता है जैसे आधी रात हो. और आज प्रियंका की एंट्रेन्स परीक्षा है क्या करूँ मैं...किसी तरह हम गोदावरी हॉस्
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कुछ खुलासा....

मेरे पिछले पोस्ट पर मैंने सभी की अलग अलग प्रतिक्रिया पढ़ी. इस पोस्ट में मैं कुछ बातें स्पष्ट करना चाहूँगी. सर्वप्रथम मेरा आक्रोश पुरुषों के प्रति नहीं है बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था, उन लोगो के प्रति है जो की स्त्री को प्रताड़ना का अधिकारी मानते है, उन
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मेरे हिस्से का...

सब कहते हैं मैं रिश्ते बनाना बहुत अच्छे से जानती हूँ, मैं रिश्तों को निभाने की बजाय जीने समझ यक़ीन करती हूँ. जिस रिश्ते की शुरुआत ख़ूबसूरती से हुई, जिसका आधार सच्चाई और विश्वास है वो रिश्ता आजीवन ख़ूबसूरत ही रहेगा. चंद लम्हों की कड़वाहट मेरे रिश्तों
May 13 2009 09:06 PM
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मुझे चाँद चाहिए

चाँद को सभी देखते हैं प्यार करते हैं क्या चाँद भी ऐसे ही लोगों को प्यार करता होगा या उसके पास बहुत सारी चोईसेस होने के कारण वो सिर्फ़ कुछ ही को चुनता होगा. कैसे चाँद के मन और मस्तिशक को समझा जाए समझ नही आता. चाँद अपनी शीतलता से सबको शांति प्रदान करता
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सपने और सच की दूरी

ज़िंदगी हर पल एक नया रूप लेकर मेरे सामने आती है कभी कभी जो सपने मैने देखे थे लगता था वोह मैं सच करके ही रहूंगी. मैने कोशिश भी की उन्हे सच करने की, पर बीच बीच मे कई उलझनो ने उन्हे तोड़ने की कोशिश की. एक पल ऐसा भी आया जब मुझे लगा मेरा हॉन्सला टूट गया ह
May 13 2009 09:06 PM
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बदलाव का दौर

कई बार मन मैं कुछ उलझने होती हैं कुछ ख्वाब होते हैं जो हर पल सोते जागते हमारा साथ देते हैं ख्वाब सच हो जाए तो बात ही क्या होती है पर जब ख्वाब सच करने के लिए कुछ निर्णय लेने होते हैं असली मुश्किल तब ही शुरू होती हैं पर ना जाने क्यूं आज मेरा मन बहुत ख़
May 13 2009 09:06 PM
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राजकुमार की उलझन,सिंद्रेल्ला की परेशानी

बचपन मैं परी की कहानी सुनती थी, जब कभी सिंद्रेल्ला पढ़ा तब भी लगा ये तो किताबों मैं ही होता है असली ज़िंदगी मैं कहाँ कोई परी कहाँ कोई राजकुमार होता है सब सपनो की दुनिया है पर नही शायद कहीं तो कुछ सच है इसमे कभी-कभी मन कहता है राजकुमार तो सभी को मिलता
May 13 2009 09:06 PM