तुम्हारी कसक मेरे घावों पर लगी उस बैंडेड की उधड़ी पैबंद है जहां से झांकता मेरा घाव अब लोगों को भी नज़र आने लगा है। ये घाव कभी सी नहीं सकेगा कोई, तुम्हारे अहसासों की पुलटिस (मरहम) बार-बार इन घावों को हरा करती रहेगी, ये टीस हमेशा उठती रहेगी। बार बार आवाज़
भारत एक कृषि प्रधान देश है, साथ ही तुर्रमखाओं का देश भी है। यहां तुर्रमखाओं ने अपनी तुर्रमई की बदौलत पड़ोसियों को जलने-कुढ़ने पर मजबूर कर दिया है, ‘पड़ोसियों की जलन आपकी शान’ सभी को याद होगा। कि किस तरह से एक कंपनी की टीवी खरीदने से दूसरों के जलन की
वक्त इतना नहीं बीता कि, अभी सब कुछ ठीक न हो सके। सबकुछ समेटा जा सकता है। बहुआयामी विकास के जिस चेहरे और मोहरे को गढ़ने के चलते हमने बहुत कुछ खो दिया है। वो हम फिर से पा सकते है। भारत की विकास दर पर भले ही हल्ला होता है । लेकिन विकास की आड़ में बढ़ती
रोम-रोमहर रग-रग परदुखती हर नसजब रह-रह करजलते ज़ख्मों पर वार करेकष्टों की बंदिश पार करेद्रवित ह्रदयकुछ यादों मेंसिमटे, बिखरे जज्बातों मेंओझल आंचल के ख्वाबों मेंदुखती है रगचीत्कार सी करती हैकहती हैउनको मिले सज़ा जो मिलीकभी न कहीं किसेक्यों बांटी तब मौत
प्रश्न पूछते क्लास में,मास्टर वेंकट राव, गुण माता के दूध में,क्या-क्या हैं बतलाओ, क्या क्या हैं बतलाओ,तभी एक बोला बच्चा,बिना उबाले पी सकते हैं, इसको कच्चा,अदर दूध से मदर दूध,होता पॉवरफुल,इसमें चीनी नहीं,डालनी पड़ती बिल्कुल,हाथ खड़ेकर सोनू बोला,लाख
सूनी गलियों में उनका आनाकुछ ऐसा लगता हैज्यों बदन तपाती गर्मी मेंशीत हवाओं का सहलानाहिम सी सुंदर उसकी छवि मेंथोड़ी गर्माहट घुल जानामृग-नयनी सी जंगल में वोहै ढूंढ रही कस्तूरी कोनहीं जानती, वो नादां हैवो खुशबू उसमें ही हैमोम सी नाजुक वो गुड़िया हैमखमल के
अद्भुत, अदम्य, साहस की परिभाषाजिससे दूर रहे हमेशा निराशाघुंघरुओं की तरह बजने की आदतएक इत्तेफाक़, एक इबादतहर किसी को कायल कर देनाबगैर तीर के घायल कर देनालूट ले बगैर कुछ होते हुए भीपा जाए बहुत कुछ न कुछ होते हुए भीज़िंदगी को मिसाल बनाकरहर लम्हे को तराश
चमचों का इतिहास कलिकाल से चला आ रहा है। सबने अपने अपने चमचे बनाए। और चमचे थे कि बनते चले गए। कलिकाल की परंपराओं को जीवत रखना वर्तमान का ठेका है। इस लिहाज़ से हर कोई परंपराओं का ठेकेदार है। चमचैली परंपरा इन्हीं कारणों से जीवित है। सभी इसको जीवित रखना
सिकुड़ती रातबाहें फैलाता दिनकरसर्द हवाओं पर अब अधिकार जताती गर्महवासच ही है वक्त से पहले दस्तक दे चुकी हैगर्म-आहटबदन पर चिपचिपा पसीनागले में पानी की कमी सेचुभते शूलशुष्क हवा के साथ उड़ती धूलफाग में मुरझा चले हैंधरती पर कुछ निरीह फूलऊपर अंबर नीचे धरती की
(मैडम को भठियारन का टाइटिल इसलिए दिया जा रहा है। क्योंकि एक रसूख युक्त खानदान में जन्म लेने के बाद भी वो अपने जीवन में सिर्फ भाड़ ही झोंक पाईं थी। वो इंसान का रक्त चूस कर उस रक्त को भाड़ में घासलेट की तरह इस्तेमाल किया करती थीं।) मइय्यत थी, तो याद आया
वो विचारशील भी थे। और चूतिया भी। कहने में भी उतना ही अंतर था। जितना करने में। कभी किसी की सुनी नहीं। हमेशा अपना हाथ जगन्नाथ समझा। फिर भले ही हाथ में कोढ़ ही क्यों न हो गया हो। वो जो कर रहे हैं, जिन हाथों से कर रहे हैं, बस कर रहे हैं। किसी से कोई मतलब
काम जो बेहतर लगे। वो करो। ऐसा कतई न करो जो दूसरे के मन का हो। या यूं कहें कि जो हमने सोचा वही बेहतर है। अपनी बेहतरी से गद्दारी न करो। दरअसल नाजियों की जिस सेना ने यहूदियों समेत कइयों को अपने अत्याचार का शिकार बनाया । उस सेना को कई यहूदियों ने अपनी बेहतरी
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले की बात है। कभी मां फूलमती, बाबा चौकसी नाथ के मंदिर के करीब एक फौजी का निवास हुआ करता था। निवास के नाम पर कोई सरकारी आवास नहीं था। बल्कि एक 16 फुट लंबे और दस फिट चौड़ा कमरा ही उनके नाम आवंटित था। सरकार की रिहायश उनसे मुंह
अभी कल ही की बात है ऑफिस से निकला ही था दिमाग में कुछ हलचल सी थी मन व्यथित सा था आंखों में चुभन थी दिनभर के काम की सब कुछ तो ठीक था लेकिन फिर भी पता नहीं वो कौन सी बात थी जो टीस दे रही थी। अजीब सी उदासी अजीब सा मौसम न जाने क्या होने वाला था। कि अनाया
कुछ ही दिन पहले की बात है। नोएडा से गृहनगर लौट रहा था । चुनावों में सारी बसें लगी होने के कारण ट्रेन में काफी भीड़ चल रही थी बीते दिनों। मैं लखनऊ मेल में गाजियाबाद से बैठा। उस दिन भी ट्रेन में भयंकर भीड़ थी। लेकिन एक डिब्बा खाली था। दरअसल ये वो वाला
दवा और दारु का संग बड़ा पुराना है। ज्यादा सुरा पान के बाद दवा पान की ही जरुरत पड़ती है। जिसने मधुपान नहीं किया वो जीवन के एक सुख से वंचित रह गया। ऐसा मैं नहीं कहता, पीने वाले खिलाड़ापीर कहते है। आरजू बानो कहती है कि पीना बहुत ज़रूरी है जीने के वास्ते
प्रस्तुत होने वाली पंक्तियां मेरे पड़ोसी बर्बाद गुलिस्तां की पंडिताई से अवतरित हैं(नोट-बर्बाद गुलिस्तां माने पंडित का घर)। ये कहानी श्री-श्री 108 कदाचित् तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधेश्याम उपाध्याय की करतूतों से प्ररित होकर लिखी
छरहरी काया, इठलाता बदन, बिल्कुल हिरणी के जैसा। आंखों में तीर सा चुभने वाला शार्प सा काजल, होंठों पर गुलाब की झलक। एक दम मादक सी हंसी। और उस पर गालों में पड़ने वाला भंवर। ओफ्फो एक अनूठी याद थी वो। लगता था कुदरत ने सारी फुरसत उसी पर उड़ेल दी हो। उसके ब
बारि मथे घृत होई, सिकता ते बरु तेल,। बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धांत अपेल ।। महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस के उत्तर कांड में इन पंक्तियों का ज़िक्र किया है। जिसका अर्थ है कि हवा को मथने से घी बन सकता है, और रेत से तेल निकल सकता है, लेकिन बिना ई
सतत्, निरंतर, लगातार, यही परिभाषा है समय की। जो न कभी थकता है, न किसी का इंतज़ार करता है, और न ही किसी का मोहताज है। सबको इसी के हिसाब से चलना पड़ता है। मिट्टी की खुशबू हमेशा ज़हन में बसी रहती है सो आज भी वही सुगंध एक बार फिर हिलोरें मारने लगी। और खु
छोटा सा था । बस ये समझें, जब पैदा ही हुआ था। कोमल से पैरों में, मां ने पहनाया था। ऊन से बुना जूता, ताकि मेरे पैरों की कोमलता बरकरार रहे । मोजे से दिखने वाले वो जूते जब गंदे हो जाते थे, तो मां उन पर पॉलिश न करके,निरमा से धो देती थी । दिन में कई बार गं
पीढ़ी बदल चुकी है। आदिकाल नहीं रहा। बेचारे नंगे पुंगे वो लोग जो पत्तों से अपने तन को ढका करते थे । सिलाई मशीन से सिले कपड़ों के दिवाने हो चुके हैं। वो खेतिहर मजदूर भी नहीं रहे जो अपने जीवन यापन के लिए जानवरों पर निर्भर होते थे, जानवरों से खेती करवाना
उन गलियों में सड़कें नहीं होती। सड़कों के नाम पर उनके ही द्वारा बनाई गई कुछ पगडंडियां होती हैं जिनके किनारे बसता है भारत का श्रमजीवी भविष्य। टीन के नीचे सोता भारत का बहुत बड़ा तबका। ये तबका और श्रमजीवी भविष्य 24 घंटे संघर्ष में बिताता है या यूं कहें
नई सुबह, नया उजियारा नए से रंग, लगे हर कोई प्यारा दर पर दस्तक देती होली प्यार और ठिठोली इन रंगों में रंग दो सबको हो जाओ सब अपने ये रंग आज सबको रंग देंगे उल्लास के रंग से हर्ष के रंग से उमंग के रंग से तरंग के रंग से कुछ ऐसी ही रंगत भरती है ये होली ये
नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों ने समूचे विश्व को एक बार फिर झकझोर दिया.....इस भीषण हमले में जिस देश का नाम आया वो कोई चौंकाने वाला नहीं था....यानि भारत का पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान....देश की शान पर हुए इस सबसे बड़े हमले के बाद उन चर्चाओं ने एक
देख रहा था दूर सूर्य को सिर्फ अंधेरा पाया नवजीवन की इस बेला में घोर कष्ट था छाया मानव दानव बन बैठा है मन में छिपा कपट बैठा है इंतजा़र में बूढ़ी मां ने त्याग दिया इन आंखों को मन को मारा उस बेवा ने छीना जिसका पति उन्होंने ये इंतज़ार की सिसकन है ये सिसक
मैं ताजमहल एक मोहब्बत का पैगाम शाहजहां और मुमताज की मोहब्बत का मेरे नाम ने सिखाई दुनिया को मोहब्बत और सिखाया भाईचारा मुझे देखा है दुनिया ने एक ऐसा ही ताज मेरा भाई है वो महाराष्ट्र की अंगड़ाई है वो ताज है मायानगरी का वो ताज है सपनों की नगरी का वो ताज
मुझे उम्मीद है। एक रोज़, ठोकर लाएगी रंगत। उसका रंग उस दिन, उस खूं सा लाल नहीं होगा। जो खूं जमा हुआ है, कुछ ठोकरों की बदौलत। गिरेबां में झांककर देखूंगा उस दिन, कि ठोकर क्यों लगी थी। लेकिन अब तक, हर ठोकर जवाब सवाल पूछती है मुझसे? कि क्यों मुझे हर बार,
हाल ही की बात है हमारे खबरनबीसों के दफ्तर में गुटखा, पान, सुपारी खाने पर पाबंदी लगा दी गई है। यानि कार्यालय परिसर में जो गुटखा खाता दिखाई दिया उस पर औकातानुसार कार्यवाही की जाएगी। दफ्तर में अंदर से लेकर बाहर तक इस हिदायती फरमान की चिट्ठियों को चिपकाय
बूढ़ा होता है हर कोई ढलती हुई उम्र के साथ ऐसा बूढ़ा न हो कोई उस बूढ़े, बुढ़िया के जैसा न खाना है न दाना है साथ नहीं है अपनों का एक सहारा बस बाकी है लाठी और अकेलेपन का सावन भी अब बूढ़ा सा है पतझड़ से सारे मौसम हैं एक अकेली कोंपल को बस तरसे विचलित सा उ
ज़रा विचारिए कि जब हमारे सामने यमराज की खौफजदा कल्पना होती है। तो चित्र में भैंसे पर सवार एक बेहद ही बेडौल और खाए-पिए खानदान से ताल्लुक रखने वाले मनुष्य की छवि अकस्मात ही सामने आ जाती है। हाथ में कांटेदार गदा और अपने मन में मौत सरीखा भय लिए यमराज की
बीबीसी हिंदी डॉट काम की खबर से प्रेरित होकर लिखा गया है, जिसमें ये कहा गया था कि हाल ही में एक भारतीय टिड्डा ब्रिटेन जा पहुंचा है।) यूं तो हमारे एक मित्रवर हैं जिनका राशि का नाम घासीराम है। लेकिन न तो वो आतंकी हैं। और न ही घासखोर। उनके अंदर कोई भी ऐस
मैं हिंदुस्तान हूंहिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाईइन सबकी शान हूंमैं हिंदुस्तान हूंमेरी धरा ही, मेरी मां हैमेरी अपनी भारत मांखून से सींची इस धरती परनाज़ मुझे हर दम रहताइस मिट्टी में जन्मे जो है गर्व उसे हर पल रहताएक टीस मुझे जब-तब रहतीजब गुलाम भारत था मैंउखड़ी
उस आने वाली बारिश की बूंदो नेहवा को, श्रंगार का अहसास कराया।घर की कुछ यादों का,दोस्तों की चटपटी बातों का,और मां के दुलार का,मन को बहुत कुछ याद आया,उस सफ़र में।छुक-छुक दौड़ रही थी गाड़ीमेरे घर की ओर। खेतों को सहलाती पवन,खेल रही थी,खेल कुछ और।काली घटाओं
गरुड़ पुराण के बारे में तो सबने सुन रखा होगा। ये 19 हजार श्लोकों का एक ऐसा पुलिंदा, जिसकी जरुरत तब पड़ती है। जब किसी की मृत्यु हो जाती है। तथाकथित जिस व्यक्ति की मृत्यु होती होती है, उसकी आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए इस पुथन्ने का पाठ किया जाता
मैं हूं एक वृक्ष देता हूं लोगों को छांव मुझपर बसते हैं पंछी बनाकर अपना गांव चाह नहीं मेरी कुछ भी है सिर्फ चाहता हरियाली सर्दी, गर्मी हर मौसम में मेरा जीवन खुशहाली लेकिन एक दर्द है मुझको मत काटो मेरे यौवन को इतना अहसान करो मुझ पर भी बख्शो मेरे जीवन को
एक बार चीफ प्रॉक्टर ने विद्यालय में लगाया राउंड लंबा था ग्राउंड हाथ में डंडा शक्ल से पंडा रोबीला चेहरा देखकर बच्चे सकपकाए दौड़कर अपनी कक्षाओं में आए किसी कक्षा में कुछ बच्चे शोर कर रहे थे और गालियों से अलंकृत कर रहे थे चीफ प्रॉक्टर को गुस्सा आया डंडा