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02 Feb 2010
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कहां हैं नाज़ी

तब एक कविता पढी थी.....................पहले नाज़ी आये कम्युनिस्टों के लिये,फ़िर यहूदियों के लिये,फ़िर ट्रेड यूनियनों के लिये,फ़िर कैथोलिकों के लिये,फ़िर प्रोटेस्टेन्टो लिये...........पर अब नाज़ी नही है .वो घुस गये हैं हर किसी में,कम्युनिस्टों में,ईसाइयों
 
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चौथे ईडियट हम

तो मैने भी 3 ईडियट देख ली और पाया कि 3 ईडियट पर्दे पर थे और सैकड़ो हाल में, जिसमें मैं भी शामिल था। हीरानी ने जो वादा किया था उसे पूरा किया है, मनोरंजक फ़िल्म बना कर . रैन्चो जो एक गरीब माली का लड़का है अपने मालिक के लड्के के लिये पढाई करता है।और डिग्री
 
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मुर्दों से खेलते हो बार-बार किस लिए,

पिछले दिनों ब्लॉग पर धर्म को लेकर बड़ा विवाद रहा .कुछ लोगों ने एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने की पुरजोर कोशिश की.जिसका कोइ औचित्य नहीं था .सच्चाई तो ये है की आज के वैज्ञानिक और तार्किक युग में कोइ भी धर्म अपने मूल रूप में सत्य साबित नहीं हो सकता.कोइ
 
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रोज परवान चढ़ता है एक प्यार का बुखार

रोज एक दुनिया लेती है जन्म और रोज मर जाती है एक दुनिया। रोज एक हौसला होता है बलंद, और रोज ही पस्त होता है एक हौसला। रोज उगती है एक उम्मीद, और एक उम्मीद रोज दम भी तोड़तीहै। रोज परवान चढ़ता है एक प्यार का बुखार, और रोज उतर जाता है एक खुमार प्यार का। तो
 
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मै ही तुम्हारे प्यार के काबिल नही !

कल ही एक ग़जल कही जो आप सब की नजर है। ........... उसकी बातों मे कहीं कुछ इल्म का गुमान है., ये कोई बाजीगरी है सबको ये इमकान है.! वो किसी से पूछ कर चलता नहीं था रास्ते., फ़िर कहां से पाई मंजिल हर कोई हैरान है! अब के बारिश में बरसती आ रही है उसकी याद.,
 
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अपने ही गिराते है नशेमन पर बिजलियाँ !

ये कहाँ आ गए हम यूँ हि साथ साथ चलते ? जसवंत सिह को कुछ ऐसा ही लग रहा होगा .गुजरात में उनकी किताबपर बैन लगाया गया है । बैन लगाने वाले वही लोग है जो कभी अपने ही थे. इस बैन पर मै आपको वेताल की ही तरह एक कहानी सुनाता हूँ .सत्त्रहवी शताब्दी में फ्रांस में दो
 
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Aug 28 2009 01:26 PM
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हंगामा है क्यौं बरपा ?

तो फ़िर एक हंगामा हो गया. ऐसे समाज मे जहां लोग गीता, बाइबिल और कुरान पर हाथ रख कर झूठ बोलते है, वहीं कुछ ऐसे भी है जो शायद पैसे, शोहरत या खेल के लिये सच बोलने को तैयार हैं ".सत्यमेव जयते" जिस देश का मूल मन्त्र है, और जिस संस्कृति मे सिखाया जाता है सत्यम
 
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दोस्त्तों बारहां एक सवाल आपको भी तंग करता है और मुझे भी ,और जब हम उसकी तलाश में दूर तक जाते हैं तो हमें पता चलता है कि सवाल तो वहीं खडा है, अनुत्तरित । से उलझती हुई कविता आपकी नजर है. आदमी आखिर है क्या ? एक बेवजह मुश्तगुबार, या असंगत चाह्तों का अम्बा
 
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हाय माइकल

माइकल फिर जिन्दा हो गए .कई बार जब जिन्दगी मारती है तब मौत जिन्दा कर देती है .ये मौत ही है जो जिंदगी का गहरा अहसास करती है.अस्तित्व का सबसे गहरा बोध किसी के न होने पर ही होता है.दसियों साल से सन्नाटे में पड़े माइकल तूफ़ान हो गए .पर शायद आखिरी बार !माइकल
 
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चालिस के पहले या चालिस के बाद

तो फिर एक चुनाव खत्म हुआ और एक सरकार बन गई. कॉग्रेस क्यों जीती और बीजेपी क्यों हारी इस पर अनेक विशलेषण आ रहें है , और आएंगे भी. पर जहां तक कम्युनिस्ट भाइयों का सवाल है , मुझे जार्ज बर्नाड शॉ कि एक बात याद आती है. शॉ ने एक बार कहा था कि अगर आप चालिस स
 
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बैडफैथ

आप सब का आभार . आभार इसलिये कि आप सबने अपने बीच मुझे बर्दाश्त किया . . एक मित्र ने मुझसे पूछा हैआखिर क्या है बैड्फ़ेथ ? बैड्फ़ैथ अपने आप से ही बोला गया झूठ है.अपने आप को दिया गया फ़रेब है , धोखा है. ऐसी आत्म्प्रवन्चना है जिसमे आदमी खुद की जिम्मेदारियो स
 
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दुरास्था

कौन सच मानता है ? तुमने माना कि वो ईश्वर का बेटा है, तुमने माना कि वो ख़ुदा का दूत है, तुमने माना कि वो पैगम्बर है , तुमने माना कि वो शास्ता है,अवधूत है , तुमने माना कि वहां स्वर्ग है जन्नत है , तुमने माना कि वहां दोज़ख में आग है , तुमने माना कि मरना
 
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