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TRUTH (Collection of my poems)

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07 Jun 2010
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निकालेंगे यहीं से एक नहर ~~

रूठे बादलों तुम्हारा रूठना सबक दे गया बेशक तूँ हमारे दुख-दर्द न हर तय कर लिया है हमने निकालेंगे यहीं से एक नहर ……………………………… जैसे ही बादलों ने धरा को मेंह दी उसे लगा साजन आने वाले हैं वह रचने लगी मेंहदी
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पीठ पर आक्सीजन ~~

लतर ने अपना लंच और पानी का कैप्सूल पाकेट में डाला, होमवर्क का माईक्रोचिप कलाई पर चिपकाया और स्कूल जाने के लिये तैयार हो गयी. उसने माँ से कहा कि वह स्कूल जा रही है. माँ ने उसे उसका नया नवेला 20 किलो की क्षमता वाला आक्सीजन सीलिंडर उसके पीठ पर बाँधा. वह वज़न
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राख झाड़ दो ~~

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'पीना और जीना'

वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में मेरी व्यंग्य रचना 'पीना और जीना' पढने के लिये क्लिक करें पीना और जीना
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ये हरामज़ादे नौकर भी ऐसे ही हैं? (लघुकथा)

आज तो आप छा गये, क्या लच्छेदार बोले आप !! देखा नहीं लोग तालियाँ किस कदर पीट रहे थे. अजी ज़र्रानवाजी है आपकी. और आपने विषय भी तो ज़बरदस्त लिया था, वो क्या था! हाँ याद आया - "बाल मजदूरी समाज के लिये कलंक" जी हाँ! अच्छा अब मुझे इजाजत दीजिये. अरे
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आधा तुम्हारे लिये और आधा मेरे लिये, बाकी बचे सो ... (लघुकथा)

उसने अपनी प्रजा से कहा जाओ और मेहनत करो, खेतों में रोटियाँ उगाओ. हम तुम्हें खुशहाल देखना चाहते है. उसके कारिन्दे उन्हें शर्ते बताने लगे : "कोई भी रोटी खाने की हिमाकत न करे. उत्पादित रोटी पहले यहा लाया जायेगा. राजा पहले उसका निरीक्षण करेंगे और फिर
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ब्लागर मिलन में उपजी नई सम्भावना ~~

दिल्ली ब्लागर मिलन (23 मई 2010) अन्य कई ब्लागर मिलन से कुछ मायनों में ज्यादा सकारात्मकता दे गया. आशंकित मन से ब्लागर मिलन का प्रारम्भ बेशक थोड़ा बिलम्ब से हुआ हो पर बाद में यह केवल मिलन न रहकर (वैसे मिलन तो था ही) नवीन सम्भावनाओं के तलाश का सुन्दर पटल बन
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दिल्ली ब्लागर मिलन : जलज़ला भी आया

दिल्ली ब्लागर सम्मेलन बहुत ही सुकून और सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ, जलज़ला भी आया पर वह नहीं जो आप सोच रहे हो मुझे पता है आप क्या जानने को आतुर हो अपने बाल नोच रहे हो. जलज़ला  विचारों का आया जलज़ला  सदभाव का आया जलज़ला  मुस्कराहटों का
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लो जी दिल्ली ब्लागर मिलन का फोटो देखें (रिपोर्ट थोड़ी देर में)

    मिलन स्थल                                     रिपोर्ट की प्रतीक्षा करें .......
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Breaking News : दिल्ली ब्लॉगर मिलन प्रारंभ

दिल्ली ब्लॉगर मिलन प्रारंभ. अब तक तकरीबन २० ब्लॉगर पहुँच चुके हैं. ब्लागरों के आने का सिलसिला जारी है.शेष मिलन का आँखों देखा हाल थोड़ी देर में. आप भी नाज़ादीक कहीं हैं तो तुरंत पहुँचाने की कोशिश करें.
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ब्लागर मिलन 23 मई 2010 (रविवार) को : स्थल का निरीक्षण सम्पन्न. आपको भी आना है

एक छोटी सी ब्लागर मीटिंग आज भी हुई उसी स्थान पर जहाँ कल हमें मिलना है मैं यानि कौन? (मैं तो रहूँगा मौन) संगीता पुरी और राजीव तनेजा मिले, मिलते ही हम खिले. आपको भी निमंत्रण है चलिये फिर कल मिलते हैं आज से ज्यादा कल खिलते हैं निमंत्रण पत्र ऊपर है डाऊनलोड
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हमसफर के साथ सफर .. एक अनुभव

शादी की पचीसवीं वर्षगांठ (20 मई) पर एक अनुभव (संस्मरण) साझा कर रहा हूँ. ----- लोग भी तो आदी हो गये थे तुम्हें और मुझे साथ-साथ देखने को. शुरूआती दिनों में बेशक साथ-साथ होने पर प्रश्न खड़े हुए हों पर समयांतराल के बाद साथ-साथ न होने पर प्रश्न खड़े होते थे.
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'कुत्तों पर रिसर्च' ~~

वैशाखानन्द प्रतियोगिता में मेरी रचना 'कुत्तों पर रिसर्च' पढ़ने के लिये क्लिक करें :   वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में : श्री M VERMA http://www.taauji.com/2010/05/m-verma_19.html
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अब उठा ही लो कुदाली .....

चिडियो ने वतन है छोडा विचरण करते यहाँ अब तो चहुँ ओर काग जी, थोथे हैं पक्षी संरक्षण के आँकड़े ये तो हैं महज कागजी. ************ खयाली घोड़े तुमने तो बहुत कुदा ली, लौट आओ हकीकत में अब उठा ही लो कुदाली.
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माँ अमलतास है ~~

माँ एक शब्द नहीं एहसास है एक अटूट रिश्ता; एक विश्वास है कभी देखना गौर से बच्चे के लिये स्वेटर बुनते हुए उसे ऊन को जब वह तीलियो से उलझाती है अपने मन की अनगिनत गांठ खोलती है; सुलझाती है लोरियां गाती है सारी रात नहीं सोती है पर बच्चे की पलकों पर सपन बोती है
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एहसासों की छुवन ~~

धूल के मानिन्द दिग्भ्रमित से उड़ते रहे एहसास मेरे, चूर-चूर हो रहे हर पल; हर क्षण विश्वास मेरे. तुम इन्हें गर अपने एहसासों की छुवन से भीगो दो तो शायद इन्हें इनका ठांव मिल जाये दूर हो भटकन इनकी गर भोर की उजास लिये इन्हें इनका गांव मिल जाये ~~~
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रावण फ़िर अस्तित्व ले रहा है ~~~

रावण अस्तित्व ले रहा हैहर रामलीला ग्राऊँड के बाहरन जाने कितने कारीगर लगाये गये हैंपिछले साल से बड़ा रावण बनाने के लियेकोई इसका हाथ बना रहा हैकोई धड़, कोई सिर तो कोई पैरकोई इसका जिस्म बना रहा हैकोई इसका तिलिस्म बना रहा हैअभी यह पड़ा रहेगापर एक दिन यह खड़ा हो
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Sep 24 2009 06:23 PM
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किसी के मरने की खबर नहीं है ~~

~~~गगन चूमने को आतुर थायह अधबना मकानसहसा धराशायी हो गयाआश्रय देने को आतुर थापलांश मे आततायी हो गयाहम भी तो आदी हैंढहन देखने कोहर बार हम बनाते हैंएक नई लंकालंकादहन देखने कोहमारी आँखें तलाशती हैंबिखरी हुई रक्ताभ ईटेंमांस के लोथड़े और रक्त की छीटेंआज के इस
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Sep 21 2009 06:30 PM
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चलो अब इसमें संस्कार बोऊँ !!

~~~~~~~वह असंस्कारित थामैने उसे संस्कार देना चाहामैंने उसे जिन्दगी कासार देना चाहामैने कहा बोलो 'प्रणाम'वह फुसफुसायाअपनी जुबान हिलायाऔर बोला 'रोटी'मैं समझ गया किवह भूखा हैमैने उसे रोटी खिलाईठंडा पानी पिलाया वह शातिर था -वह अपनी भूख को भुना रहा था वह अब
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--- सुरूर छाता है ! ! ( रोटी ने तवे से जो कहा मैंने सुना)

*रोटी ने तवे से कहातुम्हारा अस्तित्व तोबहुत करामाती हैतुम्हारी आँच मुझको तोबहुत भाती हैतुम्हारे वजूद नेमुझको सपन दिया हैसच कहूँ तोएक मीठी सी तपन दिया हैतवा बोलापर ये आग मेरा नहीं हैमैं तो महज़ वाहक हूँतुम्हारे और चूल्हे के बीचमैं तो नाहक़ हूँचीत्कार कर उठी
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Aug 09 2009 12:34 PM
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---- शायद तुम आ जाओ #

उस दिन तय था किहम मिलेंगेइसी दरख्त के नीचेपरिन्दों की चहकन सुनते हुएबैठा रहा मैं ख्वाब बुनते हुएसमय के भान से परे हो गया थाऔर ---------- और तुम नहीं आई.आज जबकि तय है कितुम नहीं मिलोगीइस दरख्त के नीचेतनहा आँखें मीचेपरिन्दों की चहकन सुनते हुएबैठा रहा हूँ
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Aug 03 2009 05:51 PM
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ख़त फ़िर मेरे हाथ में है --

एक ख़त जो लिखा था मैंने तुम्हे कभीवो ख़त आज फिरमेरे हाथ में हैख़त लिखकरछा गया था दिलो-दिमाग पर बेइंतिहा सुरूरशायद मन में था कहीं न कहींतुम्हे ख़त लिखने पर गुरूरमुझे याद है उस दिनख़त लिखकर ख़त को अनायास मैंनेचूम लिया थाइतना हल्का हो गया था किख़ुद का भी
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Jul 26 2009 06:42 PM
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माँ एहसास है --

माँ एक शब्द नहीं एहसास है एक अटूट रिश्ता; एक विश्वास है कभी देखना गौर से बच्चे के लिये स्वेटर बुनते हुए उसे ऊन को जब वह तीलियो से उलझाती है अपने मन की अनगिनत गांठ खोलती है; सुलझाती है लोरियां गाती है सारी रात नहीं सोती है पर बच्चे की पलकों पर सपन बोत
Jul 18 2009 08:22 PM
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निरावेशन की शून्यता मंजूर नहीं --

तुम प्रोटोन मैं इलेक्ट्रोन तुम्हारा आकर्षण खींचता है मुझे तुम्हारी ओर अनवरत; निरंतर पर मैं आर्बिट से आबध्द तुम्हारी ओर आ भी तो नहीं सकता . तुम आवेशित; मैं आवेशित फिर बीच में क्यों है न्यूट्रोन निरावेशित उफ़! मैं तुमसे दूर जा भी तो नहीं सकता शायद, तुम
Jul 11 2009 04:41 PM
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तलाश जलते तवे की ----!!

जलते तवे पर एक बूँद सा मैं जला. पलांश में आया भयानक जलजला और मैं, भाप बनकर उड़ चला शायद दिल में हसरत थी बादल बनने की; तुम्हारे छत पर चादर सा तनने की भीगो देना चाहता था तुम्हारा छत; बरसना चाहता था अनवरत तुम जहां आकर गुनगुनाती हो हर बारिश के साथ भीग जा
Jul 05 2009 05:39 PM
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एक कबूतर दब गया था ----

तुमने कहा -- रूको, मत जाओ मैनें समझा -- रूको मत, जाओ और मैं चुपचाप चला आया था -- उस दिन बिना किसी शोर बिना किसी तूफान कितना भयानक ज़लज़ला आया था -- उस दिन काश ! तुमने देखा होता चट्टान का खिसकना काश ! तुमने भी देखा होता वह मंजर जब एक मकान ढहा था अधबना औ
Jul 02 2009 05:47 PM
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चार दुधमुहे बच्चे मरे हैं ---

ये आग जो लगी है जल्दी काबू कर ली जाती पर क्या करें सभी कर्मचारी अभी तक तो पिछली लगी आग को ही बुझा रहे हैं वे तो बहुत मसरूफ हैं आग फ़िर न लगे इसके उपाय सुझा रहे हैं और फ़िर इतनी बड़ी आग पर जल्दी काबू पाना भी आग की तौहीन है आग तो आग है इसका क्या! यह कभी ल
Jun 30 2009 06:46 AM
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परिभाषाओं की बही -----

कुछ भी करिए सब सही है देखते नहीं मेरे हाथ में परिभाषाओं की बही है! मेरे अपने जब करते हैं तो बलात्कार को भी मैं ' स्वीकार' लिखता हूँ किसी और के लिए तो गुफ्तगू को भी मैं 'अनाचार' लिखता हूँ सच के खिलाफ पल में झूठ की गवाही दिला देता हूँ जानता हूँ इस तथ्य
Jun 28 2009 06:10 AM
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भुगती हुई अंतर्कथा ----

नज़्म सी नाज़ुक एहसास की टहनी झुकी विश्वास न जाने क्यूँ देहरी तक आकर रुकी भीड़ में ठिठकी हुई नीड़ की व्यथा मानवीय संत्रास की भुगती हुई अंतर्कथा ---- . अश्क का कुहराम नयन में आठो पहर जीजिविषा - संग्राम शयन में आठो पहर पहचान सर उठाते नहीं सागर सा मथा मानव
Jun 25 2009 05:48 PM
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तुम पुनर्नवा हो क्या -----?

तुम आसपास कहीं नहीं पर तुम्हारे ख़याल की आहट से सरगोशियां होती हैं शाख-ए-वज़ूद को मेरे तुम हिला देती हो कुछ अधमरे एहसासों को तुम जिला देती हो तुम हवा हो क्या-----? तुम ज़ुबान से दिलासा नहीं देती नज़र की छुवन से ही सकूं दे जाती हो और मैं सो जाता हूं सपन
Jun 23 2009 08:07 PM
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उस ख़त को पढ़ लेने के बाद ----

जेठ की दोपहरी में आँचल को लहराकर एक छत लिखा है मिल गया आज मेरे नाम तुमने जो ख़त लिखा है एहसासों के मुँह पर उंगली रख बोलने से मना कर दिया मैंने उस ख़त को डायरी में रख खोलने से मना कर दिया मैंने मुझे पता है, उस लिफाफे में महज़ एक कोरा कागज़ ही होगा अल्
Jun 21 2009 08:32 AM
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नदी नहा कर पोछ रही बदन --- (शब्द चित्र)

मुहअंधेरे - भोर में, नदी नहा कर पोंछ रही थी बदन सूरज की आँख खुल गयी नज़ारा देख शर्म से लाल हुआ बढ़ने लगी तपन ------------------- हवाएं सरसराते हुए चुपके से शाखों को झुला रहीं थी झूला सूरज ने देख लिया हो रहा है -- आगबबूला
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सारी दास्ताँ बयाँ कर गयीं ----

मैं तुम मदहोश फिर भी खामोश; गुमसुम मगर ये चुगलखोर तुम्हारी वाचाल कुमकुम ये क्या कर गयीं सारी दास्तान बयाँ कर गयी --
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आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं --

क्या कहा? आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं वे शहर लूटने के मनसूबे बना रहे हैं पर वे तो अभी बहुत दूर हैं मेरे बाजुओं पर यकीन करो उनके मनसूबे मैं चूर-चूर कर दूँगा मुँह-हाथ मैं ज़रा धोने जा रहा हूँ बहुत थका हूँ मैं ज़रा सोने जा रहा हूँ। हालात पर तुम नज़र रखन
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अगली बार जब तुम मुझसे मिलना - -

अगली बार जब तुम मुझसे मिलना तन नहीं तुम अंतर्मन हो जाना तेरा एहसास बन जाए मेरी साँस इतनी तुम सघन हो जाना अगली बार जब तुम मुझसे मिलना मुझे पहचानना मत मत करना कोई वायदा मत छूना मुझे छुवन से गुजरने देना मुझे अनजानी चुभन से अगली बार जब मुझसे मिलना तुम अग
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ज़मीन को कसकर पकड़े रहना ! ! !

दरख्त ! तुम छू लोगे आसमान की बुलंदियां एक दिन बस, ज़मीन को कसकर पकड़े रहना. आंधियां आयेंगी आने दो, थोड़ा झुककर इन्हे गुज़र जाने दो तुम धूप की तपिश में निखर जाओगे, नई कोंपले फिर पनपेंगी रिमझिम फुहार जब पाओगे, तुम्हारी छांव में मुसाफिर फिर सुस्तायेंगे अप
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अस्मत लुटना आम बात है ---

सर के ऊपर घर नहीं है आतताईयों को अब कोई डर नहीं है चलती ट्रेन में अस्मत का लुटना आम बात है खबर नहीं है चीखने- चिल्लाने का कोई भी असर नहीं है रंजो-गम से परे हो जाओ सुनो मत बहरे हो जाओ आँख को देखने मत दो पैर को चलने मत दो अँधेरा बेशक हो दीया कोई जलने म
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लोकतंत्र की पुष्टि के लिए ----

तीन सौ सत्तर मारे गए केवल आठ हज़ार गुंडे मैदान में उतारे गए नोट के लिए उस माँ का बच्चा लाया था उसे यहाँ वोट के लिए कहीं खो गया, पर मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया यह बिल्कुल सही है प्रमाण यह है मरने वालों में कोई भी 'जेड प्लस' वाला नहीं था छोटे
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कहीं बात आम न हो जाए --

सागर की बादलों से हुई खामोश गुफ्तगू को एक लहर ने सुना मन ही मन कुछ गुना और यह बात शहर से कहने को चुना वह था बेहद भावविभोर तभी तो करता हुआ शोर भागा किनारे की ओर --- सागर को हुआ संकोच कहीं बात आम न हो जाए वह बिना बात के बदनाम न हो जाए उसने, उसे रोकने क
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चौराहे पर लाश ---

उसकी लाश चौराहे पर पड़ी हैं गिद्धों की निगाहें उसपर गड़ी हैं सड़ांध -- बदबू -- रक्त की धार -- कोई नहीं जानता किसने उसको मारा हर तमाशबीन के हाथ में बंद है एक नारा सभी तज़बीज़ रहे हैं कब मुट्ठी खोलने का वक्त आए! सब इस ताक में हैं उसका हाथ सबसे ऊँचा लहराए!