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कवि कोकास

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11 Jun 2010
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विवाह समारोहों में क्या कभी आपने इन्हे देखा है ?

यह विवाहों का मौसम है । जहाँ से गुज़रो शहनाई बजती सुनाई देती है । जिनका विवाह हो रहा है वे भी प्रसन्न हैं और साथ ही उनके माता पिता भी ,कि चलो एक ज़िम्मेदारी पूरी हो गई । पता नहीं कब तक हमारे यहाँ बच्चों के विवाह को माता पिता अपनी ज़िम्मेदारी समझते रहेंगे ।
 
शरद कोकास
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यह कविता उस पसीने के बारे में नहीं है ।

उफ़ यह गर्मी , उफ़ यह पसीना ।कहते हैं गर्मी के बारे में सोचने से गर्मी कम नहीं होती और पसीने के बारे में सोचने से पसीना बहना कम नहीं होता ।मैंने भी एक बार पसीने के बारे में सोचने की कोशिश की थी और बन गई एक कविता । अब इसे पढ़कर यह न कहियेगा कि पसीने के बारे
 
शरद कोकास
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दो लोग क्या करेंगे इस दुनिया का

  कभी कभी ऐसा होता है कि बातें काम नहीं करतीं और कविता अपना काम कर जाती है | इन दिनों जो कुछ भी चल रहा है ब्लॉग जगत में वह सब जानते हैं | मुझे एक मित्र ने सलाह दी कि आप चुप क्यों हैं आप को भी कुछ कहना चाहिये | मैं ठहरा एक सीधा-सादा कवि , मैं क्या
 
शरद कोकास
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तुम्हे मेरी दाढ़ी अच्छी लगती है ..

शरद बिल्लोरे की एक कविता शरद और मैं भोपाल के रीजनल कॉलेज में साथ साथ थे  । कविता लिखने की शुरुआत के साथ साथ बहुत सारी बदमस्तियाँ हमने कीं । मैं सोच रहा था इस बार फिर उसकी किसी शरारत के बारे में लिखूंगा लेकिन मैं सिर्फ सोचता रहा और कुछ लिख नहीं पाया
 
शरद कोकास
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“हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे

            मई 1984 में जबलपुर में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कविता रचना शिविर हुआ था । दस दिनों तक कविता पर लगातार बातचीत होती रही । हम सभी शिविरार्थी युवा थे 22-24 साल की उम्र ,सवाल तो इस
 
शरद कोकास
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May 01 2010 01:43 AM
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इस भीषण गर्मी में भी नौकरी करनी पड़ती है ?

कई साल पहले की बात है । ऐसे ही जब ग्रीष्म का आगमन हुआ एक दिन दफ्तर में एक मित्र से बात चल रही थी । वे कहने लगे  “ यार गर्मी के दिनों में दफ्तर जाना बहुत अखरता है ।“ मैने कहा “ क्या करोगे भाई नौकरी तो नौकरी है , करनी ही पड़ेगी । आखिर मौसम को भी
 
शरद कोकास
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कूकते कूकते चुप क्यों हो जाती है कोयल

                 ग्रीष्मागमन हो रहा है । किसी दिन नींद से जल्दी जागिये और सुबह सुबह कहीं खेतों की ओर निकल जाइये , ठंडी ठंडी हवा , नींद  से जागा हुआ रास्ता , टहलने निकले
 
शरद कोकास
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हम सब इज़्ज़तदार हैं......

हम सब इज़्ज़तदार लोग हैं .. । हम में से कितने लोग हैं जो इस बात से इंकार करेंगे ? कोई नहीं ना । ग़रीब  से ग़रीब आदमी भी कहता है " हमारी भी कुछ इज़्ज़त है । " वैसे पैसे और इज़्ज़त का कोई सम्बन्ध भी नहीं है । फिर भी कहा जाता है कि इज़्ज़त की फिक्र न पैसे वाले
 
शरद कोकास
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कोई कितनी दफ़ा मर सकता है प्रेम के कारण

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शरद कोकास
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सिर्फ इक्कीस बरस का जीवन जिसने जिया ..

नवरात्रि आठवाँ दिन इन कवयित्रियों को आपने पढ़ा - प्रथम दिन से लेकर आपने अब तक फातिमा नावूत , विस्वावा शिम्बोर्स्का, अन्ना अख़्मातोवा .गाब्रीएला मिस्त्राल और अज़रा अब्बास , दून्या मिख़ाइल और शीमा काल्बासी की कवितायें पढ़ीं । इन पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आपने
 
शरद कोकास
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वे नहीं सूंघ सकतीं बेकरी की डबलरोटी

नवरात्रि पर्व : सातवाँ दिन अब तक जिनकी कवितायें आपने पढ़ीं : फातिमा नावूत , विस्वावा शिम्बोर्स्का, अन्ना अख़्मातोवा .गाब्रीएला मिस्त्राल ,अज़रा अब्बास , और दून्या मिख़ाइल कवितायें पढ़ीं । अब तक जिन्होने अपनी उपस्थिति दर्ज की: लवली कुमारी ,हरि शर्मा ,पारुल
 
शरद कोकास
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पाकिस्तान में भी अच्छी कविता होती है ..

                                 नवरात्रि पंचम दिवस । 20.03.2010 अब तक आपने पढ़ा - फातिमा नावूत
 
शरद कोकास
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दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे

नवरात्रि चतुर्थ दिवस  गाब्रीएला मिस्त्राल की  कविता 19.03.2010 । नवरात्रि के तीसरे दिन प्रकाशित अन्ना अख़्मातोवा की कविता पर अशोक कुमार पाण्डेय ने अपनी विशेष टिप्पणी में कहा अन्ना आख़्तामोवा की यह कविता एक सघन सांकेतिकता की कविता है। 'लक्ष्मण
 
शरद कोकास
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नवरात्रि द्वितीय दिवस - विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविता

नवरात्रि के प्रथम दिन प्रकाशित फातिमा नावूत की कविता पर खुशदीप सहगल ने कहा दुनिया में खुशियों को सही तरीके से तकसीम कोई ख़ातून (महिला) ही कर सकती है. श्याम कोरी 'उदय' ,विनोद कुमार पाण्डेय , रंजना , राज भाटिय़ा और साधना वैद को यह कविता बहुत पसन्द आई .
 
शरद कोकास
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नवरात्रि प्रथम दिवस - फातिमा नावूत की कविता

 आज चैत्र की नवरात्रि का प्रथम दिन है । आज प्रथम दिवस पर प्रस्तुत है  मूल अरबी में लिखने वाली नील नदी के देश मिस्त्र की कवयित्री फातिमा नावूत की यह कविता । जब मैं कोई देवी बनूँगी मैं निर्वसन कर दूँगी ग्लोब को मानचित्र को धूल-धूसरितइतिहास की
 
शरद कोकास
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नवरात्रि पर्व पर विदेश की कुछ कवयित्रियों की कवितायें

                                 पिछले साल मैने आश्विन शुक्ल प्रतिप्रदा से  प्रारम्भ होने
 
शरद कोकास
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धूप ढलने से पहले मैं बड़ा आदमी बन जाउंगा

स्कूल- कॉलेज की परीक्षायें प्रारम्भ हो चुकी हैं । हर घर में अनुशासन पर्व चल रहा है । सब कुछ नियमित समय पर हो रहा है ,बच्चों की पढ़ाई-लिखाई ,खाना-पीना ,सोना-जागना । टी.वी. देखने ,घूमने –फिरने ,गपशप और सोने का का समय घट गया है , पढ़ने का समय बढ़  गया है
 
शरद कोकास
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अमीबा की तरह वह अपने घर से अलग हुई

                       अपने घर से बाहर निकलकर किसी अनजान शहर में नौकरी करने के लिये जाना एक अकेली लड़की के लिये कितना कठिन काम है इस बात का अन्दाज़ लगाना उन
 
शरद कोकास
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अब मैं कोई भी रंग पहनूँ हूँ तो मै मनुष्य ही ना

रंगों पर लोगों की प्रतिक्रिया को लेकर मुझे पहली बार गुस्सा तब आया जब एक मित्र ने मेरी हरी कमीज़ देखकर मुँह बिचकाया .." हरी कमीज़ ..क्यों धर्म बदल लिया है क्या ? दूसरी बार गुस्सा तब आया जब एक मित्र ने भगवे रंग की कमीज़ को देख कर कहा ..क्यों परिषद के सदस्य बन
 
शरद कोकास
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Feb 28 2010 08:29 AM
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अद्भुत हो सकता है यह दृश्य , मुम्बई से बाहर रहने वालों के लिये

                   लोकल ट्रेन को मुम्बई की जीवन रेखा कहा जाता है । बी ई एस टी  वहाँ की बस सर्विस है । जैसे ही दिन निकलता है मुम्बई की अधिकांश जनता बस और लोकल
 
शरद कोकास
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इतनी बड़ी उम्र की मैडम से प्रेम ..वह भी मिस वेलेंटाईन

वेलेंटाइन डे का नाम जब पहली बार सुना तब हम गधा पचीसी की उम्र पार कर चुके थे और बाकायदा इष्ट मित्रों और सम्बन्धियों की उपस्थिति में दोपाये से चौपाये बन चुके थे । दाँपत्य जीवन में प्रेम ,भोजन में रोटी की तरह शामिल था और ज़िन्दगी का मज़ा आने लगा था ।
 
शरद कोकास
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दादर पुल पर भीख माँगते हुए भगवान

मुम्बई शहर में दादर इलाका आपने न देखा हो ऐसा हो ही नहीं सकता । मैने बचपन में उर्दू के प्रसिद्ध लेखक कृश्न चन्दर का प्रसिद्ध उपन्यास “दादर पुल के बच्चे “ पढ़ा था । इस उपन्यास में मुम्बई में भिखारियों के गिरोह का वर्णन था । वे किस तरह बच्चों को पकड़ते हैं और
 
शरद कोकास
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मुम्बई पर कुछ धार्मिक कवितायें -सिटी पोयम्स मुम्बई

मुम्बई केवल औद्योगिक नगरी नहीं है । यहाँ के लोगों की व्यस्तता देख कर ऐसा लगता है कि शायद इन लोगों के जीवन में धर्म-कर्म या पूजा -पाठ के लिये समय ही नहीं होगा । लेकिन ऐसा नहीं है ।मैने जब महालक्ष्मी मन्दिर ,सिद्धि विनायक और हाजी अली में लोगों की भीड़ देखी
 
शरद कोकास
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इनकी रोशनी में नहीं दिखाई देते अपने दुख दर्द

सिटी पोयम्स मुम्बई श्रंखला के अंतर्गत चार कवितायें  1.सिटी पोयम्स मुम्बई – ऊँचे टॉवर्स ऊंचे टॉवर्स की खिड़कियों से छन छन कर आती रोशनी भली लगती है इनकी रोशनी में नहीं दिखाई देते अपने दुख दर्द इन रोशनियों के पीछे छुपे दुख दर्द भी कहाँ दिखाई देते हैं ।
 
शरद कोकास
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चलो..मिट्टी खराब नहीं हुई आदमी की ।

                मृत्यु जीवन का एक शाश्वत सत्य है और एक सजीव के लिये अनिवार्य लक्षण । मृत्यु के पश्चात देह का अंतिम संस्कार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना  जीते जी देह का
 
शरद कोकास
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एक युवा अपनी प्रेमिका से कह रहा है ...स्माइल प्लीज़ ?

            मुम्बई दिनांक 28 दिसम्बर 2009 । गेट वे ऑफ इंडिया के सामने खड़ा हूँ । ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेज़ों ने भारत पर अपने विजय की खुशी में इसे बनवाया था । उन लोगों ने जिनके राज्य में  कहते
 
शरद कोकास
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मेरे चाचा - मामा का गाँव मुम्बई

मेरे चाचा- मामा का गाँव मुम्बई                                         मैं बचपन से मुम्बई जाता रहा हूँ । उस समय से जब माटुंगा रेल्वे वर्कशॉप में बड़े
 
शरद कोकास
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नये साल में "लोहे के घर" में यात्रा करते हुए एक कविता

कई दिनों के बाद यात्रा से लौटा हूँ ..मुम्बई गया था ,बीमार चाचा जी से मिलने । व्यस्तता और भागदौड़ कुछ ऐसी रही कि ब्लॉगर मित्रों से और कवि कथाकार मित्रों से मुलाकात ही नहीं कर पाया । जाते समय सोचता रहा कि सबसे मिलूंगा लेकिन यह सम्भव नहीं हुआ । यहाँ तक कि
 
शरद कोकास
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भाईचारा और सद्भावना पर अब ब्लॉग भी लिखते हैं

प्रेम,मोहब्ब्त,भाईचारा ,सद्भावना,कितनी बड़ी बडी बातें करते हैं हम मनुष्य ।साहित्य रचते हैं ,भाषण देते हैं, सभायें करते हैं,गोष्ठियाँ करते हैं ,जनान्दोलन करते हैं ,नाटक करते हैं और अब ब्लॉग भी लिखते हैं । भाईचारा इन दिनों सगे भाईयों के बीच भी नहीं पनप
 
शरद कोकास
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कोई चेहरा गाज़र के हलुवे की प्लेट सा लगता है

सुबह सुबह मुँह खोलो तो निकलती है ढेर सारी भाफ़ ..ऐसा लगता है कोई चाय की केटली रखी हो दिल के भीतर । आलिंगन के लिये बढ़ते हुए हाथ गर्म कम्बल की तरह दिखाई देते हैं , सुबह की गुनगुनी धूप में मफलर से लिपटा हुआ कोई चेहरा गाज़र के हलुवे की प्लेट सा  लगता
 
शरद कोकास
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इसके लिये भी भूमिका लिखूँ.....?

छह दिसम्बर उन्नीस सौ ब्यानबे रेल में सवार होकर अतिथि आये बसों में चढ़कर अतिथि आये पैदल पैदल भी अतिथि आये कारों में बैठकर भी अतिथि आये बनाये गये तोरणद्वार बान्धे गये बन्दनवार पाँव पखारे गये खूब हुआ खूब हुआ परम्परा का निर्वाह जुलूस निकले जय जयकार हुई श
 
शरद कोकास
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भोपाल गैस कांड की याद में एक बेमौसम कविता -शरद कोकास

भोपाल गैस कांड में जो प्रभावित लोग ज़िन्दा बच गये थे वे भी आज खुश कहाँ हैं ? पिछले 25 बरसों में जाने कितने लोग धीरे धीरे मर चुके हैं गैस के प्रभाव की वज़ह से । वे जिनके फेफड़े और अन्य अंग प्रभावित हो गये थे वे ,जिनकी बीमारी की मूल वज़ह वह गैस थी और यह बा
 
शरद कोकास
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रेल के डिब्बे में रात होते ही गठरी हो जाता है आदमी

हमारा समाज भी एक  रेल के डिब्बे की तरह ही है । आपने सोचा है कभी कि क्लास या वर्ग की अवधारणा सर्वप्रथम आम आदमी ने रेल के डिब्बे से ही जानी । यह भी अनायास नहीं हुआ कि एक ज़माने में थर्ड क्लास कहलाने वाला डिब्बा अपग्रेड कर सेकंड क्लास कर दिया गया ले
 
शरद कोकास
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मुम्बई 26 /11 की याद में...शहीदों को श्रद्धांजलि सहित

मेरी 1986 की डायरी से आतंकवाद के खिलाफ़ लिखी एक कविता                       नोंच कर फेंक दी मैने अपनी आँखें  मैने फिर सुनी नींद में गोलियाँ च
 
शरद कोकास
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हम सभी खानाबदोश है...

हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अपनी जड़ों से उखड़कर  नई जगहों पर जमने की कोशिश कर रहे हैं ..। खानाबदोशों की तरह हमारे पूर्वज जाने कहाँ से भटकते हुए आये और कहीं किसी जगह पर स्थायी हो गये । फिर उस पीढ़ी से कुछ लोग निकले रोजी-रोटी की तलाश में और नई जग
 
शरद कोकास
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सुविधा के दिनों में गर्दिश के दिनों की याद पैदा करती है रूमानियत

यह जीवन भी रेल में की गई यात्रा की तरह है जहाँ एक स्टेशन से हम यात्रा प्रारम्भ करते है और किसी एक स्टेशन पर समाप्त करते हैं । प्रारम्भ का स्टेशन तो हमें पता होता है लेकिन गंतव्य के स्टेशन का हमें पता नहीं होता  वह कब आयेगा ..हम सशंकित होकर हर कि
 
शरद कोकास
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स्वप्न देखने के लिये टिकट लेना कतई ज़रूरी नहीं है ।

रात के सन्नाटे में  दूर कहीं किसी रेलगाड़ी की सीटी की आवाज़ सुनाई देती है । एक रेल धड़धड़ाते हुए किसी पुल से गुजर जाती है ..हवा में तैर जाता है एक हल्का सा कम्पन और सन्नाटे में गूंजता है दुश्यंत का यह शेर... ‘तू किसी रेल सी गुजरती है..मै किसी पुल सा
 
शरद कोकास
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आसान नहीं है किसी जवान मौत को बर्दाश्त कर लेना

बस बीस –इक्कीस साल उम्र थी अनिकेत की । मेरे  मित्र अशोक कृष्णानी का बेटा जो अभी चार दिन पहले एक छोटे से स्टेशन पर न जाने किस उहापोह में रेल की पटरी पार करते हुए तेज़ गति से आती हुई रेल से टकरा गया । अच्छा खासा निकला था घर से और एक दिन बाद उसकी यह
 
शरद कोकास
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आखिर हम घर किसके लिये बनाते हैं ?

मेरे पिता स्व.जगमोहन कोकास ,मध्यप्रदेश के बैतूल शहर से शिक्षक की नौकरी करने के लिये निकले और महाराष्ट्र के भंडारा नामक शहर में आ बसे । अपने से बड़े दो किसान भाईयों की मदद और अपना परिवार पालने  की ज़द्दोज़हद में कुछ इस तरह फँसे रहे कि रिटा
 
शरद कोकास
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यह अक्तूबर का चमकदार उतार है

आज 24 अक्तूबर है .. हवा में कल रात थोड़ी ठंडक महसूस की मैने .. खिड़की से हवा का एक झोंका आया और उसने कहा .याद है तुम्हे, तुम्हारे मित्र कुमार अम्बुज ने इन्ही  दिनों के लिये एक कविता लिखी थी ..‘ अक्तूबर का उतार ‘.. अरे हाँ ,मुझे याद आया , मैने रैक
 
शरद कोकास