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नारी का कविता ब्लॉग

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18 Jun 2010
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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी ------ सुभद्राकुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थीबूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थीगुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थीदूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थीचमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थीबुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थीखूब लड़ी
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ऐसा क्यों होता है !

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!ऐसा क्यों होता है जब भी कोई शब्द तुम्हारे मुख से मुखरित होते हैं उनका रंग रूप, अर्थ आकार, भाव पभाव सभी बदल जाते हैं और वे साधारण से शब्द भी चाबुक से लगते हैं,तथा मेरे मन व आत्मा सभी को लहूलुहान कर जाते है !ऐसा क्यों होता है
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धनिया का सपना

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित! धनिया लेटी है अपनी खाट पर देख रही है सुंदर सपनासोच रही है इस दुनिया में कोई तो होगा अपना,वो खुश है आज, बहुत खुशक्योंकि कुछ ही महीनों के बाद वो बनने वाली है माँ उसके मन में माँ बनने की उमंग है दिल में ममता की तरंग है, सोच
 
डा.मीना अग्रवाल
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मेरा होना या न होना

आज पढिये मुक्ति कि कविता मेरा होना या न होना मैं तभी भली थीजब नहीं था मालूम मुझेकि मेरे होने सेकुछ फर्क पड़ता है दुनिया कोकि मेरा होना, नहीं हैसिर्फ औरों के लिएअपने लिए भी है.मैं जी रही थीअपने कड़वे अतीत,कुछ सुन्दर यादों,कुछ लिजलिजे अनुभवों के साथचल रही
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मन बाबरे

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!आज मन ने मेरी बात मानी है आज समझा है वह,नहीं गँवाएगा समय व्यर्थ की बातें सोचने में,जीवन में ऐसा तो चलता ही रहता है मतभेद, विवाद,अतिवाद, या फिर....यही तो है जीवन !अब मुझे विगत बातों कोकभी नहीं सोचनाकुछ करना है ऐसाजो समाज में
 
डा.मीना अग्रवाल
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मौन

मेरे मौन को तुम मत कुरेदो ! यह मौन जिसे मैंने धारण किया है दरअसल मेरा कम औरतुम्हारा ही रक्षा कवच अधिक है !इसे ऐसे ही अछूता रहने दो वरना जिस दिन भी इस अभेद्य कवच को तुम बेधना चाहोगे मेरे मन की प्रत्यंचा से छूटने को आतुर उलाहनों उपालम्भोंआरोपों
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कितनी बार...

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!कितनी बार...कितनी बार तुम मुझे अहसास कराते रहोगे कि मेरी अहमियत तुम्हारे घर में,तुम्हारे जीवन में मात्र एक मेज़ या कुर्सी की ही है जिसे ज़रूरत के अनुसार कभी तुम बैठक में, कभी रसोई में तो कभी अपने निजी कमरे में इस्तेमाल करने के
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माँ के लिए ..........जागरण से

लबो पे जिसके कभी बद्दुआ नहीं होतीवो माँ है जो कभी खफा नहीं होतीजब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती हैमाँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है
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मातृ दिवस ना मनाये

मातृ दिवस परमाँ को करते हैं सलामऔर मातृ दिवस पर हीकहीं किसी बेटी को करते हैं हलालजब भी कहीं कोई बेटी मरती हैंएक माँ को भी तो आप ख़तम करते हैंएक बच्चे का ममत्व आप छिनते हैंआज से कुछ और साल बादशायद ना कोई माँ होगीऔर ना ही होगी कोई संतानमातृ दिवस ना
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टुकड़ा टुकड़ा आसमान

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लियेमैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख क्यों कतर दिये माँ ?क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ? अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के
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आत्म साक्षात्कार

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित!अब खुले वातायनो से सुखद, मन्द, सुरभित पवन के मादक झोंके नहीं आते,अंतर्मन की कालिमा उसमें मिल उसे प्रदूषित कर जाती है। अब नयनों से विशुद्ध करुणा जनित पवित्र जल की निर्मल धारा नहीं बहती,पुण्य सलिला गंगा की तरह उसमें भी घृणा के
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तुम क्या जानो

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित! कुछ आपबीती कुछ जगबीती पुरुष प्रधान भारतीय समाज में नारी को किस तरह से विषम परिस्थितियों में अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष करना पड़ा है । रूढिवादी रस्मों रिवाज़ और परम्पराओं की बेड़ियों से जकड़े होने के बावज़ूद भी जीवनधारा के
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नारी जीवन - तेरी यही कहानी!

जीवन जिया, मंजिलें भी मिली, एक के बाद एक बस नहीं मिला तो समय नहीं मिला। कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही , जो अपने और सिर्फ अपने लिए जिए होते तो अच्छा होता। जब समझा अपने को कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले कुछ आदेश और कुछ मनुहार करती रही सबको खुश । दूसरा चरण
 
रेखा श्रीवास्तव
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जीने की ललक अभी बाकी है

आशा जी ने नारी ब्लॉग पर कमेन्ट दिया था वहाँ से मे उनके ब्लॉग तक गयी और इस कविता को पढ़ा आप भी पढेस्वत्व पर मेरे पर्दा डाला ,मुझको अपने जैसा ढाला ,बातों ही बातों में मेरा ,मन बहलाना चाहा ,स्वावलम्बी ना होने दिया ,अपने ढंग से जीने न दिया |तुमने जो खुशी
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विश्वास

© 2008-10 सर्वाधिकार सुरक्षित! तुम किसी को कुछ भी कहो किसी को डाँटो, प्यार करो पर मैं कुछ न बोलूँमुँह न खोलूँ और बोलने से पहले स्वयं को तोलूँफिर कैसे जीऊँ !समाज की असंगतियाँ और विसंगतियाँ कब होंगी समाप्तकब मिलेगा समान रूप सेजीने का अधिकार, रेत होता
 
डा.मीना अग्रवाल
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'मज़हब' की सलीब पर टंगी औरतें

आज़ाद मुल्क की ग़ुलाम औरतें... मुस्लिम समाज में जन्म लेने की उम्रभर सज़ा भोगतीं बेबस, लाचार औरतें... आज़ाद मुल्क की ग़ुलाम औरतें... शाहबानो, इमराना और गुड़िया-सी कठमुल्लों के ज़ुल्मों की शिकार औरतें... आज़ाद मुल्क की ग़ुलाम औरतें... 'मज़हब' की सलीब पर
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नारी और नदी

नारी और नदी नारी ने सीखा नदी से बहनामौसम की हर मार को सहना क्योंकि नदी बहने के साथ-साथ सिखाती है गतिशील रहना देती है संदेश निरंतरता का देती है संदेश तत्परता का नदी देती है शीतलता हृदय को देती है तरलता मन को सिखाती है बँधना किनारों से सिखाती है जुड़ना धरती
 
डा.मीना अग्रवाल
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नारी की सृष्टि

समस्त संसार मेंएक क्षेत्र है जहांपुरुष का प्रवेश नहींनितांत नारी कीसृष्टि है वहपुरुष का समावेश सही,गृह संसार का अनाड़ी हैपुरुष प्राणीदुनिया जीतने कादावा करने वालेभी बगलें झांकतेयहां!नहीं असंभव ब्रह्माण्ड में विचरनाकिन्तुकठिन हैरसोई में चावल
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इसलिये मुझे फक्र है कि मै दूसरी औरत हूँ ।

नहीं सौपा मैने अपना शरीर उसेइसलियेकि उसने मेरे साथ सात फेरे लियेकि उसने मुझे सामाजिक सुरक्षा दीकि उसने मेरे साथ घर बसायाकि उसने मुझे माँ बनायासौपा मैने अपना शरीर उसेइस लियेक्योंकि "उस समय" उसे जरुरत थीमेरे शरीर की , मेरे प्यार , दुलार कीऔर उसके बदले नहीं
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प्रीत --- वि-- प्रीत

भाग १सालों बादघर से बाहर रहापति लौट आयाघर मे ताँता लग गयाबधाईयों का, मिठाईयों काआशीष वचनों का, प्रवचनों कागैस पर चाय बनातीपत्नी सोच रही हैंक्या वो सच में भाग्यवान हैं ?कि इतना घूम कर पतिवापस तो घर ही आयापर पत्नी खुश हैं किअब कम से कम घर से बाहरतो मै जा
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हम किराये पर लेते हें विदेशी कोख

हम बहुत तरक्की कर रहें हेंपहले बेटियों को मारते थेबहुओ को जलाते थेअब तो हमकन्या भ्रूण हत्या करते हैदूर नहीं है वो समयजब हम फक्र से कहेगेपुत्र पैदा करने के लियेहम किराये पर लेते हेंविदेशी कोखकुछ पुराने कमेंट्स यहाँ देखे और अपनी बात भी वही कहे© 2008-10
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तुम क्यूं

तुम क्यूं झेल रही हो पुरूषों को जो नित्य ही मनुष्य के खोल से बाहर आते हैं, अधिकतर पुरूष का भी लबादा नहीं रखते बन जाते है हाड़ मांस के वहषी सिर्फ मादा ही नजर आती है हर नारी जो कभी माँ,बहन-पत्नि होती है, भभूका सा काबिज हो जाता है हर लेता है समस्त
 
किरण राजपुरोहित नितिला
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वह चीख चीखकर कहती है मै आज की नारी हूँ

वह आज की नारी हैहर बात मे पुरुष से उसकी बराबरी हैशिक्षित है कमाती हैखाना बनाने जेसेनिकृष्ट कामो मेवक़्त नहीं गवाँती हैघर कैसे चलाएबच्चे कब पैदा होपति को वही बताती हैक्योकि उसे अपनी माँ जैसा नहीं बनना थापति को सिर पर नहीं बिठाना थाउसे तो बहुत आगे जाना
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यह एक दिन

हर वर्ष आता है या शायद लाया जाता है यह दिन ,आंकड़ों को टटोलते हुये कभी कहता 1000 पर 945कभी 33प्रतिशत कभी 18 प्रतिशत ,इनमें हेरफेर से हो जाता है क्या समाज में परिवर्तन ?बदल तो नही जाती मानसिकता ,प्रकृति की प्रकृति और कुछ कुछ नियति, कम तो नही होती रोज की
 
किरण राजपुरोहित नितिला
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हे नर क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुमकि नारी को हथियार बना करअपने आपसी द्वेषो को निपटाते होक्यों आज भी इतने निर्बल हो तुमकि नारी शरीर किसंरचना को बखाने बिनासाहित्यकार नहीं समझे जाते होतुम लिखो तो जागरूक हो तुमवह लिखे तो बेशर्म औरत कहते होतुम सड़को को सार्वजनिक
Mar 06 2010 11:38 AM
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अनैतिकता बोली नैतिकता से

अनैतिकता बोली नैतिकता सेमंडियों , बाजारों और कोठोपर मेरे शरीर को बेच करकमाई तुम खाते थेअब मै खुद अपने शरीर कोबेचती हूँ , अपनी चीज़ कीकमाई खुद खाती हूँतो रोष तुम दिखाते होमनोविज्ञान और नैतिकताका पाठ मुझे पढाते होक्या अपनी कमाई केसाधन घट जाने सेघबराते हों
Mar 05 2010 10:03 AM
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तुम्हारे अस्तित्व की जननी हूँ मै

पार्वती भी मैदुर्गा भी मैसीता भी मैमंदोदरी भी मैरुकमनी भी मैमीरा भी मैराधा भी मैगंगा भी मैसरस्वती भी मै लक्ष्मी भी मैमाँ भी मैपत्नी भी मैबहिन भी मैबेटी भी मैघर मे भी मैमंदिर मे भी मैबाजार मे भी मै "तीन तत्वों " मे भी मैपुजती भी मैबिकती भी मैअब और
Mar 04 2010 09:59 AM
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अघोषित अपराधी - बेटी का पिता!

वह दुनियाँ का सबसे निरीह प्राणी है - अपने जिगर के टुकड़े को साथ लिए लिए उसके बचपन से जवानी तक घूमता रहा. कभी पढ़ाई, कभी कोचिंग, औ' फिर कभी एडमिशन, कम्पटीशन, जॉब सर्चिंग हाथ पकड़े घूमता रहा, जब तक उसके पैरों तले ठोस जमीं न मिली. उस मुकाम पर पहुंचा कर फिर
 
रेखा श्रीवास्तव
Mar 03 2010 10:46 AM
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होली है !

होली की रंगोली ------------------------ बुरा न मानो होली है, ये मस्तानों की टोली है, रंगों को बौछार करें तो गाली भी हंसी ठिठोली है! सतरंगी होली के रंगों से सजे थाल में मेरी हार्दिक शुभकामनाएं आपके नजर हैं.
 
रेखा श्रीवास्तव
Feb 26 2010 11:24 AM
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नारी का एक और सच !

जीवन समर्पित किया बचपन से बुढ़ापे तक बेटी बनी, एक गर्भ से, एक घर में, जन्म लेकर पली बढ़ी सब कुछ किया. पर कही पराया धन ही गयी. बेटा सब कुछ पा गया उसको कहा-- ऐसा 'अपने घर ' जाकर करना ये मेरे वश में नहीं. पराया धन अपनी समझ से सब कुछ देकर विदा किया जिनकी अमानत
 
रेखा श्रीवास्तव
Feb 22 2010 12:30 PM
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स्त्री का सच

स्त्री सुहाती हैंकबजबनयनो कोझुका करओठ को दबा करइठलाती हैंरति बन जाती हैंयाआँखों मे आंसूंझुकी हुई गर्दनसहनशीलता कि प्रतिमाबन जीती जाती हैंजिन्दगी शांति से चलती रहेचाहे स्त्री उसमे कितनी भीतपती रहेसच बोलने सेहर स्त्री कोमना किया जाता हैंऔर
Feb 21 2010 05:38 PM
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पहला प्यार (वेलेंटाइन दिवस पर)

पहली बार इन आँखों ने महसूस कियाहसरत भरी निगाहों कोऐसा लगाजैसे किसी ने देखा होइस नाजुक दिल कोप्यार भरी आँखों सेन जाने कितनीकोमल और अनकही भावनायेंउमड़ने लगीं दिल मेंएक अनछुये अहसास केआगोश में समाते हुए महसूस किया प्यार कोकितना अनमोल थावह अहसास मेरा पहला
 
Akanksha~आकांक्षा
Feb 14 2010 06:15 AM
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एक लिंक

जो लोग नारी आधारित विषयों पर कविताओं का संकलन देखना चाहते हैं इस लिंक पर जाएलिंक
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नारीवादी नारीविरोधी

तमगा देते हो नारी को नारीवादी होने कापर मतलब क्या हैंकौन हैं नारीवादीक्या हैं आज के परिवेश मेनारी वादी कि परिभाषा तुम्हारीजो नारी खाना नहीं जानती बनानाउसको क्या तुम कहते हो नारीवादी ?तो ज़रा आओ मुझसे बेहतर खाना तुम बना कर दिखाओजो नारी स्वेटर नहीं बुनना
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जीत निश्चित है !

बाल-विवाह , सती-प्रथा ,अग्नि-परीक्षा........................जाने कितने अंगारों से गुजरीये मासूम काया !यातनाओं के शिविर में,विरोध की शिक्षा ने ,उसे संतुलन दिया ,शरीर पर पड़े निशानों ने'स्व' आकलन का नजरिया दिया !हर देहरी पर ,'बचाव' की गुहार लगाती,अपशब्द
 
रश्मि प्रभा...
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परिणाम !!!!!!!

अपना घर होगा,अपनी इच्छा ,अपने ख्यालों सेउसे एक अनोखा रंग दूंगी........ख्वाहिशों की टोकरी मेंयह भी एक ख्वाहिश रही नारी की,पर घर?वह अपना होता कहाँ है !पनाह मिलती है,खाने को दो रोटीऔर एक नाम.........बहुत कम लोगों की पोटली के ख्वाहिशसच होते हैंवरना जिधर
 
रश्मि प्रभा...
Dec 29 2009 11:40 AM
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स्वर

तुहिन कणों में हास्य मुखरसौरभ से सुरभित हर मंजर रंगों का फैला है जमघट मूक प्रकृति को मिले स्वर बाहर कितना सौन्दर्य बिखरा -पर अंतर क्यों खाली है काश कि ये सोन्दर्य सिमट मुझमे भर दे उल्लास अमिट
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स्त्री का ह्रदय

स्त्री का ह्रदय युं ही किवदंती नही बनी होगीकि स्त्री का ह्रदयधरती की तरह होता हैपर्त-दर-पर्त खोदते जाने के बादक्या क्या निकलेगा?किस-किस पर जाने-अनजानेनेह की बारिश होगी?या कि ताबड़तोड़ इधर-उधरजहाँ-कहाँ दीवारे दरकेंगीअप्रत्याक्षित संभावनाएं लिएस्त्री क
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वन्दे मातरम -- मातृ भूमि कुमाता कैसे हो जाये ??

ना जाने क्यूँ लोग बार बार उनसे कहते हैं वन्दे मातरम गाओ वन्दे मातरम और जन गण मन तो वही गाते हैं जिनके मन मे देश प्रेम होता हैं मातृ भूमि को जो चाहेगे वो ईश्वर से भी मातृ भूमि के लिये लड़ जायेगे दो बीघा जमीन बस दो बीघा जमीन नहीं होती हैं अन्न देती हैं
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एक फौज औरतो की

सदियों सेतैयार की जाती रही हैंएक फौजऔरतो की जो चलती रहेबिना प्रश्न किये , बिना मुंह खोलेकरती रहे जो शादी जनति रहे जो बच्चेजिसके सुख की परिभाषा होपति और पुत्र के सुख की कामनाऔरजो लड़ती रहे एक दूसरे सेबिना ये जाने की वोएक चाल मे फंस गयी हैंजहाँ पूरक वो