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क्षितिज

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08 Mar 2010
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बेटी की बिदाई

1बेटी, तुझे घर से बिदा किया थालेकिन एक सशक्त हाथों में सौंप कर।उस समय तूने पूछा था,वहां कौन है मेरा?न बन्धु न बान्धवीन तुम न पिता,न भाई न बहन।मैने कहा था सब कुछ वहीं है,समझाया था, आंसू पोछे थे तेरे।तेरी गोद भर कर,नन्हां सा टीका लगा कर,कहा था, अब वही है
 
उषा वर्मा
Feb 27 2010 08:05 PM
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शब्द

शब्द ,तुम सूर्य के वंशधरनचिकेता की अग्नि तुम्हीं,तुम्हीं मेरी आकांक्षा के आकाश।शब्द तुम कस्तूरी का सुवासपागस करती रही सदाजीवन भर जंगल जंगलरही भटकती मैं अभिशापितसूर्य तुम ज्योति-पुंज के हस्ताक्षरमेरे जीवन का उल्लासठगा सा खोया सोया था चुपचापजान न पाईवह सब
 
उषा वर्मा
Feb 27 2010 07:51 PM
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बादल का जन्मदिन

आवश्यक है कि मैं लिखूं.तुम्हारे जन्म दिन की तारीख़,मालूम ही न पड़ाकि यह बदली कब उमड़ी,और कब शब्द झंझावात बन उसे ले उड़े।कहां बरस कर वुलवुले फट पड़े।हरी हो गई सूखी दरार पड़ी धरतीउसने भी नहीं बताया पताउन बादलों का,तुम्हारा जन्म दिन उसे भी याद नहीं था।
 
उषा वर्मा
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स्मृति

हवा की तरह लिपट जाती है, छाया की तरह पीछे पीछे चलती है। पुकारने पर मेरी ही आवाज़, देर तक खंडहरों में गूंजती है आज उसे क्या हुआ है,बार बार मुझे छल जाती है। प्रवंचना की ऐसी सुलगती आग । ठगिनी कितनी बार,कितने जोगी का ऱूप लेकर पर्वत की ऊंचाइयों को लांघ कर,
 
उषा वर्मा
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कली और फूल

कली जब तककली रहती हैवह नारी बनी रहती है।लेकिन फूल खिलते हीपुरुष बन जाता है ।होते यदिकामता प्रसाद गुरु,ज़िन्दा ,तो उनसे पूछती ,कली और फूल का.यह व्याकरण कैसा ?----यह टेस्ट पोस्ट है-----
 
उषा वर्मा
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मैने एक सपना देखा था

मैने एक सपना देखा था. एक सपना जो ख़ुद-ब-ख़ुद अपने पैरों चल कर आया था। मैने उसे नहीं बुलाया था। उस सपने का न कोई मजहब था , न कोई वतन था, न कोई रूप- रंग था। यह महज़ यादों का एक सिलसिला था।
 
उषा वर्मा
Dec 29 2009 11:58 AM
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कली और फूल

कली और फूल कली जब तक कली रहती है वह नारी बनी रहती है। लेकिन फूल खिलते ही पुरुष बन जाता है । होते यदि कामता प्रसाद गुरु, ज़िन्दा ,तो उनसे पूछती , कली और फूल का. यह व्याकरण कैसा ?
 
उषा वर्मा
Dec 29 2009 11:58 AM
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शुभ-कामनाएं

शुभ कामनाएं मधुमय उपवन में पंछी युगल बन तुम रहो। स्नेह की झिलमिल अरुणिमा पथ प्रशस्त करती रहो। चित्र बनते जा रहे हैं तूलिका थकती नहीं। चांदनी को एक टुकड़ा बन सदा झरती रहो। राह कितनी हो कठिन धूप कितनी तेज़ हो। स्निग्ध मानव मन तुम्हारा बस साथ तुम चलती र
 
उषा वर्मा
Dec 29 2009 11:58 AM
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याचना

ह्रदय की वीथिका में, साथ तुम चलते रहो। आहत मन तुम्हें जब भी पुकारे गीत बन ढलते रहो। मन तिमिर में डूब कर, ढूंढ़े सहारा जब कभी तड़ित से चमक कर, तुम प्रभा देते रहो। और प्राची से कभी जब, झांकता हो वह अरुण, मुस्करा कर तुम सदा, संकेत बस देते रहो। किनारा मा
 
उषा वर्मा
Dec 29 2009 11:58 AM
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प्यार

प्यार मुक्ति है बंधन हीन,स्वतंत्र, उतार केंचुली, निरवस्त्र,बाधा नहीं, पारदर्शी अरहस्य। प्यार एक समर्पण है, अबाध आकर्षण, मिटने में ही जीवन, निःशब्द अबंधन। प्यार मीरा सी दीवानी, तर्क नहीं केवल पूजन, राधा बंशी की अनुगामी। प्यार, शक्ति है अजेय जया सी, अं
 
उषा वर्मा
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क्षितिज

क्षितिज अपूर्व तुम्हारा मिलन है तुम भरमाते आह्लादित करते और मन को एक सहारा देते कि मिलते हैं पृथ्वी और आकाश। तुम्हारा मिलन एक असत्य सत्य है, तुम्हें न दिन लिहाज न रात का डर है अपूर्व तुम्हारा मिलन है।
 
उषा वर्मा
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तुम्हारी विरासत

तुम्हारी विरासत बची हुई जिंदगी का एक टुकड़ा है मेरे पास। इसे मैं अंधेरे से छीन कर लाई हूं। देर तो हो गई है, सन्नाटा कितना ही भयानक हो उसमें भटकते स्मृतियों के पदचाप, अपनी आहट से हमें जगा देते हैं। इसमें फूटेंगी सुबह की किरने। मुस्कराती कोंपलों से यह
 
उषा वर्मा
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क्षितिज

ग्यारह सितंबर के बाद प्रकृति ने विनाश किया था तब तुम भी रोये थे। बिजली चमक कर गिर कर पेड़ ही नहीं हमारे आशियाने को भी जला गई थी। सैलाब ने पेड़ पौधे जानवर ही नहीं आदमी को भी बहा दिया था तब हम साथ-साथ रोये थे हमने एक दूसरे को पुकारा था सहारा दिया था जो
 
उषा वर्मा
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निर्जीव परम्परा

निर्जीव परम्परा उस दिन एक पूरा का पूरा आसमान, मेरे सिर पर टूट प़डा था। आसमान जो चाँद सितारों से जड़ा था। तब मैंने जाना, कि उस आकाश में चाँद सितारे ही नहीं, कील कांटे भी थे। और उस मलबे के नीचे मैं असहाय बेबस, तुम्हें पुकारती रही। किन्तु तुम अपने अस्ति
 
उषा वर्मा
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तुम साथ थे हमारे

तुम साथ थे हमारे माना कि ग़म बहुत थे, रस्ते बड़े कठिन थे, लेकिन यही क्या कम था तुम साथ थे हमारे। झंझा उठा भयानक, तूफ़ां से घिर गये हम छूटा कहां किनारा, कुछ भी न देख पाये, बिजली चमक के सहसा , दिखला गई नये किनारे। तुम साथ थे हमारे । मांगा कहां था हमने,
 
उषा वर्मा
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क्या तुम्हें मालूम है?

क्या तुम्हें मालूम है? तुम्हारे आते ही, बेला महक उठा चारों तरफ़ से मेघ घिरे आकाश में , एक ध्रुव तारा चमक उठा । हिम खंड पिघल कर, विस्तार पा गया। खेत खलिहानों में समा गया। इच्छाओं आकांक्षाओं के तमाम पौधे लहलहा उठे। अग्निबाहु फैल कर तपिश के, तमाम राज़ ख
 
उषा वर्मा
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क्षितिज

शव संकट पता चला है विश्वस्त सूत्र से कि मची हुई है हलचल कुछ सरकारी हल्कों में, लंदन के दो गज़ ज़मीं बची नहीं है, कूच ए यार में । एक विशेषज्ञ के अनुसार। केवल विशेष लोग ही फैला कर पैर कब्र में कर सकते हैं विश्राम। किन्तु आयोजन विशेष है। जनता आम के लिए
 
उषा वर्मा
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एकऐतिहासिक दिन

एक ऐतिहासिक दिन “आदेश जिधर देते हैं, इतिहास उधर झुक जाता है” समय बदलता है, समय के प्रतिमान बदलते हैं। इंग्लैंड के इतिहास में अनोखा दिन जब एक अफ़्रीकन बिशप जॉन टकर मुगाबी सेन्टामू को धर्म-मुकुट पहना कर ऑर्च-बिशप ऑफ़ यॉर्क की गद्दी पर बैठाया गया। इतिहा
 
उषा वर्मा
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क्षितिज

बुद्ध से एक प्रश्न भंते, आपने कहा था मुक्ति का एक रास्ता है। इच्छाओं के दमन से, मिलती है मुक्ति आवागमन से। मैं तो एक नारी हूं। इच्छाओं का दमन ही सिखाया था, माता पिता ने, पति पुत्र ने। क्या मुझे मुक्ति मिलेगी? आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी।
 
उषा वर्मा
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मेरी प्रथम प्रविष्टि

मेरी प्रथम प्रविष्टि.
 
उषा वर्मा