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टूटी-फूटी

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08 Jun 2010
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क्या उसे मनुष्य और नारी के फर्क की समझ है…?

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किचेन संभालने को शादी…?

मैं जाने कब सुधरुँगी ? सोचती हूँ - भगवान ने जब मुझे बनाया तो पाँच हाथ की ज़बान क्योँ दे दिया…? मिले तो पूछूँ…? क्यों मैं बात-बात पर जवाब दिए बिना नही मानती…? आए दिन किसी न किसी को मेरी बात से परेशानी हो ही जाती है। जबकि मै किसी को परेशान  करना नहीं
 
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न नारी स्वातंत्र्यमर्हति (नारी स्वतंत्र रहने योग्य नहीं है… )!!!

इस सूक्तिवाक्य को पढ़ने के बाद मैं सन्न रह गयी। मनुस्मृति में एक ओर कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ तो दूसरी ओर नारी को स्वतंत्रता के अयोग्य ही ठहरा दिया गया। आखिर ऐसा क्यों कहा गया ? बर्षों पहले दूरदर्शन पर एक विज्ञापन आता था जिसे
 
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एक भिखारन को सरकारी सम्मान...!?!

आपने श्रीमती रागिनी शुक्ला की लिखी दो कहानियाँ दुलारी और कर्ज शीर्षक से सत्यार्थमित्र पर पढ़ी और सराही हैं। रागिनी दीदी की लिखी एक और मार्मिक कहानी यहाँ प्रस्तुत है। यह कहानी भी एक वास्तविक पात्र के दुखड़े को सच-सच बयान करती है: हत्‌भाग्य दादी के यहाँ
 
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जिस दिन एक गृहिणी के कार्यों को महत्व मिलने लगेगा उसी दिन नारीवादी आन्दोलन समाप्त हो जायेगा…।

मेरा भी अजीब दिमाग है छोटी-छोटी बातों को पकाने के लिए बैठ जाती हूं। कई दिनों से इस उधेड़-बुन में लगी हूं कि क्या पति-पत्नी एक साथ रह कर स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को समाज में व्यक्त नही कर सकते? क्या उनके विचार अलग-अलग होने का मतलब उनके आपस में अच्छ
 
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Dec 21 2009 03:25 PM
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संतोषी भला कि महत्वाकांक्षी...?

बचपन से यह सुनते आते हैं कि संतोष का फल मीठा होता है। अपने मन को हमेशा संतोष करने लिए तैयार करना चाहिए। बड़े-बुजुर्ग यही सिखाते रहे। लेकिन मुझे लगता है कि किसी के भीतर यदि इस आत्म संतोष की अधिकता है तो इसका अर्थ है अपने आप को एक बीमारी की दावत देना। प
 
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चम्पा आई रे...!

आज मैं बहुत खुश हूँ। मालूम है क्यों? इसलिए नहीं कि किचेन में व्यस्त हूँ बल्कि इसलिए कि आज मेरी चम्पा आ रही है। अब आप पूछेंगे चम्पा कौन है? अरे!.. वही जिसके रहने से मेरी आँखों में खुशियां हमेशा बरकरार रहती है। जिसके चले जाने से मुझे ब्लॉग देखे कई सप्ताह
 
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टैग: गाँव
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ब‍उका की तो बन आयी...!

मेरे गाँव में एक लड़का था- ब‍उका। ‘ब‍उका’ मतलब अक्ल से कमजोर, मन्द बुद्धि और किस्मत का मारा। यह नाम उसे गाँव वालों ने उसकी दशा देखकर दे रखा था। उसके पैदा होने के कुछ दिनो बाद ही उसकी माँ भगवान को प्यारी हो गयी थी। बच्चे को किसी तरह उसकी चाची-काकी ने
 
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टैग: गाँव
Sep 14 2009 04:30 AM
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कौन सा दिन सुहाना है...? रविवार...???

सप्ताह में रविवार सबसे सुहाना होता है यह मेरा नही गणितज्ञों का मानना है। क्या आपने कभी विचार किया है कि यह दिन इतना सुहाना क्यों होता  है? सप्ताह में ६ दिन काम करने के बाद रविवार की छुट्टी का इंतजार पूरी दुनिया करती है। जहाँ तक रही गणितज्ञों की बात
 
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Aug 28 2009 08:20 PM
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घरघुसना कहीं का, जब देखो तब अपनी बीबी का मुँह देखता रहता है...

परिवार को चलाने के लिए माँ-बाप घर के अंदर एक आचार संहिता और कुछ नियम-कानून बनाते हैं। वे यह उम्मीद भी करते हैं कि परिवार में रहने वाले सभी छोटे-बड़े इस नियम कानून के भीतर रहकर ही संबधों का निर्वाह करें। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि यही माता-पिता अपने
 
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चींटी की खटिया खड़ी, टिड्डा करता मौज... कहानी में ट्विस्ट है...!

हिन्दी भारत समूह से आने वाला एक सन्देश मिला। प्रेषक थे श्री भगवान दास त्यागी जी। इस अंग्रेजी सन्देश में The Ant and the Grasshopper नामक कहानी को आधार बनाकर भारतीय राजनैतिक समाज की एक विडम्बना को दर्शाया गया है। मुझे यह आख्यान अच्छा और सच्चा लगा। मैन
 
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कानून की मदद करना मूर्खता है…।

चलती ट्रेन में सामान चोरी चले जाने की घटना सुनी तो बहुत थी। मेरे श्रीमान्‌ जी मुझे बार-बार सावधान रहने की हिदायत भी दिया करते थे। कभी जनरल या स्लीपर क्लास में यात्रा नहीं करने देते। हमेशा अपने साथ ही ले जाते और ले आते। लेकिन इस बार भाग्य का लिखा कुछ
 
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घर में लगा कम्प्यूटर... क्या नीचे क्या ऊपर?

टूटी-फूटी शुरू करने के बाद एक सज्जन ने मेरे मेल पर सन्देश भेंजा कि उनको कम्प्यूटर के बारे में सरल भाषा में जानकारियाँ चाहिए जो उनके स्कूल में बच्चों के काम आ सके। कम्प्यूटर का ज्ञान देने के लिए उनको मुझसे बेहतर शायद और कोई नही दिखा। ऐसा उनकी पारखी नज
 
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हरा ही हरा… पर गाय ने नहीं चरा !? :(

सत्यार्थ के मुण्डन के उद्देश्य से गाँव जाना हुआ। करीब दस दिनों के बाद घर वापस आकर देख रही हूँ कि आस-पास काफी कुछ बदल गया है। बेटे के सिर पर उग आयी फसल तो परम्परा के अनुसार कटवा- छँटवा कर ‘कोट माई’ के स्थान पर चढ़वा दिया। लेकिन इस अवधि में यहाँ घर के च
 
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मेरा नाम अन्हरी नही, रीता है...!

उस दिन मेरे गाँव में बड़ा अजीब वाकया हो गया था। एक गरीब के घर बारात आयी थी। अपनी क्षमता के अनुसार स्वागत सत्कार किया था उसने। दूल्हे को विवाह मण्डप में ले जाकर बिटिया का पाणिग्रहण करा दिया। दोनो कोहबर में गये। फिर एक विशेष रस्म करने के लिए दूल्हे को आ
 
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घर में ब्लॉगेरिया का प्रकोप …भूल गये बालम!!!

मैने सुना था कि आइंस्टीन अपने घर का पता ही भूल जाया करते थे। आज मेरे घर भी कुछ ऐसा अजीबोगरीब हादसा हुआ। यहाँ कसूरवार भौतिकी की कोई उलझन नहीं थी। …शायद ब्लॉगरी रही हो इसके पीछे। पढ़कर आप भी पूछेंगे जैसे मैं पूछ रही हूँ- “क्या ब्लॉगरी करते-करते ऐसा भी ह
 
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मुकदमेंबाज की दवा

हमारे गाँव के उत्तर-पश्चिम कोने पर एक ब्राह्मण परिवार रहता है। जो वर्षों पहले कहीं बाहर से आये थे और इन्हें गाँव के बड़कवा १ ‘ बाबा ’ के परिवार ने थोड़ी जमीन दे दी थी तबसे वहीं ये लोग घर बनाकर रहने लगे थे। इस परिवार में माँ-बाप के अलावा, दो बेटे और एक
 
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कानून के रक्षक या भक्षक... मानव या दानव?

पिछले दिनों शहर में डॉक्टर्स और वकीलों के बीच भिड़न्त हो गई। कारण ये कि दो महीने से एक वकील साहब अस्पताल में भर्ती थे, दुर्भाग्यवश ना जाने किस कारण से ये भगवान को प्यारे हो गये। वकीलों में डॉक्टरों के खिलाफ़ रोष पैदा हो गया और ये उस डॉक्टर के विरुद्ध ध
 
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सब कुछ उल्टा-पुल्टा… पर अच्छा ही रहा।

आज रात की भयंकर आँधी ने मेरे घर की चार दिवारी को ढहा दिया। तूफ़ान ने किचेन गार्डेन को क्षत-विक्षत कर दिया। आधी रात को सोते वक्त दिवाल गिरने की आवाज सुनकर ही मन चिन्ताग्रस्त हो गया। मेरी सब्जी कैसे बचेगी..? …सवेरा होने का इन्तजार करते रात गुजरी। ….श्री
 
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क्या हम सभ्य समाज में जी रहे हैं…?

डार्विन के अनुसार जैविक विकास के विभिन्न चरणों में जीवन संघर्ष के फलस्वरुप सर्वाधिक सफ़ल जीवन व्यतीत करने वाले सदस्य योग्यतम होते हैं। इनकी सन्तान भी स्वस्थ होती हैं जिनसे इनका वंश चलता रहता है।संघर्ष में जो अधिक सक्षम होते हैं वही विजयी होकर योग्यतम
 
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अब मैं भी हाजिर हूँ ... अपनी टूटी-फूटी के साथ

मेरे अज़ीज हिन्दी चिठ्ठाकार सज्जनों, एक जद्दोजहद मेरे मन में बहुत दिनों से थी। ...आज उसे परे धकेलकर मैने फ़ैसला कर ही लिया। जी हाँ, मैने अपना एक अलग ब्लॉग बना लिया है। मैं हिन्दी भाषा और टाइपिंग की बहुत अच्छी जानकार नहीं हूँ। बस मुझे टूटी-फूटी ही आती ह
 
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