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प्रकाश पाखी

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14 Mar 2010
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विदा... प्रकाश पाखी

कई दिनों से कुछ समस्याओं से दो चार हो रहा हूँ.एक तो लेप टॉप का भट्टा बैठ गया है.दूसरा मेरी लिखी पोस्ट कहीं अप डेट नहीं हो रही ही.तीसरा एम् बी ए की परीक्षा शुरू हो रही है.चौथा वित्तीय वर्ष के अंतिम माह में लक्ष्य को पूरा करना है.पांचवी हाई कोर्ट में नौ
 
प्रकाश पाखी
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बार्बी,शमाशा और स्टाइलिश के साथ मेरी होली

होली पर साहस और सुरूर दोनों बढ़ जाते है मुझसे पूछा गया कि आप अपनी मनपसंद होली किसके साथ मनाना चाहेंगे और हम किस पिनक में आत्म स्वीकरोक्ति कर बैठे कि हम अपनी होली अपनी भूतपूर्व प्रेमिकाओं के साथ मनाना चाहेंगे.और होली पर मित्र लोग(जिनके होने पर आपको किसी
 
प्रकाश पाखी
Mar 04 2010 07:49 AM
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...कुछ और दिखाता चेहरा

मेरे अंतर्मन को बाहर लाता चेहरा हूँ मैं कुछ और तो कुछ और दिखाता चेहरामन की मर्जी, तन बहका, कैसे काली रात में दिन में फिर मिल जाए तो क्यूँ घबराता चेहरा क्या अदा, क्या जलवा, जादू सा उसकी बातों में यादों में गुम दरपन से यूँ शरमाता चेहरा अब न तुम आते हो ना
 
प्रकाश पाखी
Feb 21 2010 03:53 PM
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ज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार से

रात भर आवाज देता है कोई उस पार सेसाथ दे अब और भी चाहा नहीं संसार सेदेख के उनको नजर भर प्यार का दरिया बहाज्यूँ घटाएं रातभर जलजल हुई मल्हार सेआज आजादी कहाँ है ये कहाँ की बंदगीआँख के आगे जफा तो जी रहे लाचार से आज जाने दे मुझे क्यूँ रोकता तकरार पे प्रेम के
 
प्रकाश पाखी
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आधुनिक भक्ति वेदान्त का शेयर कर्म योग

अर्जुन उवाच- हे जनार्दन,हे,केशव!जब आप घर बर्बाद करवाने और दिवालिया हो जाने के साधनों में अन्य कई प्रकार के साधनों को भी श्रेष्ठ मानते है,तो फिर मुझे शेयर बाजार में पैसा लगाने के घोर कर्म में क्यों लगाना चाहते है.आपके अनेकार्थक मिले जुले उपदेशों से मेरी
 
प्रकाश पाखी
Feb 01 2010 02:01 PM
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लिए फूल पत्थर के ताजिर मिले, चमन आज फिर बदगुमाँ हो गया

मेरा चाँद आगोश में झुक गया कि नीचा बहुत आसमाँ हो गया न इजहार हम से हुआ न मनाही नजर से इश्क खुद बयाँ हो गया गुलों तितलियों से कभी खुश हुआ बटुक वो सखी बागबाँ हो गया सितम पर सितम इस कदर कर गए रहम पर खुदा बेजुबाँ हो गया मिटा कौम पर दे के गम पुरनमीबचा रंज जो
 
प्रकाश पाखी
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राजस्थान पत्रिका द्वारा सड़क सुरक्षा पर आयोजित सेमीनार

इक्कीसवां राष्ट्रीय सडक सुरक्षा सप्ताह देश भर में आम लोगो में वाहन चालन और सुरक्षा नियमों के प्रति परवाह और जागरूकता उत्पन्न करने के लिए मनाया गया.हमारे भीलवाडा जिले में यह जिस उत्साह से मनाया गया वह सुखद था.इसकी ख़ास बात यह रही कि मीडिया ने आम लोगों में
 
प्रकाश पाखी
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पुल टूटे तो परवा किसको डाली है रेती थोडा माल

जब तू बीता पिछला साल दुबले रह गए अपने हाल जनता ढूंढें मिले न दाल मोटो को फिर मोटा माल इंसाफी में फिर फिर देरी काले कोट को रंग गुलाल दूर देश के बैंक भले हैं काला पैसा उसमे डाल सारे गुंडे शागिर्दों ने निर्वाचन में ठोकी ताल चुनना तो इक मजबूरी है पांच बर
 
प्रकाश पाखी
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आज मैं ऊपर,आसमां नीचे..

रात के डिनर में पी के सर के यहाँ फिश फ्राई और सैलाना रेसिपी का कालिया तर खाकर आनंदित हो गए.बहुत दिनों बाद दिमाग काम के बोझ से मुक्त था.मेरे लम्बे पूजा पाठ की वजह से इस बात की आशंका जताई गई कि मैं सुबह फ्लाईट मिस करवा सकता हूँ.पर मैंने सुबह चार बजे उठ
 
प्रकाश पाखी
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दौड़ धूप के बीच बना एक प्रोग्राम

हफ्ते के पहले दो दिन व्यस्तता के चरम में बीते.आठ तारीख को मुख्यालय मीटिंग में हुक्म मिला की हर हाल में कम्प्यूट्राईजेशन बुधवार तक शुरू होजाना चाहिए.हालांकि हम इस तकनीक में अल्पज्ञानी ही है पर विभाग तो अभी मध्यकाल से निकल कर आधुनिक काल में प्रवेश कर र
 
प्रकाश पाखी
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जरा बेचूक हो पीना कि ये रिश्तों का पानी है

काफी दिनों से बाहर होने से ब्लॉग जगत से दूर रहा।गुवाहाटी और कोलकता की लम्बी यात्रा और कई मधुर संस्मरण मन में इस तरह से समाये है कि कुछ करने का जी नहीं कर रहा है.वापस आया तो हफ्ते भर के सारे बकाया काम मेरा इन्तजार कर रहे थे. ब्लॉग जगत के सारे मित्रो स
 
प्रकाश पाखी
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भ्रष्ट्र स्थितप्रज्ञ (भक्तिवेदांत)

हे अघोषित आय के परम भक्त!देहधारी जीव भले ही अपने भ्रष्ट आचरण से परम सुख प्राप्त कर ले पर नौ सौ चूहों को खाते ही हज पर चलने को तत्पर मार्जार की भांति दया,भलाई, सेवा,ईमानदारी की इच्छा फडफडाने लगती है.लेकिन परमावस्था में नोटों के बण्डल नजर आते ही वह तत्
 
प्रकाश पाखी
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शब्द जो कविता न बन सके

१ उनका सोने का दिल है और भावों में समन्दर बसता है. ये चट्टानी सीने वाले है पर बहुत मासूम अनेक बातों में. वो पिघले फौलादो से हिला देते है मगरूर चोटियों को, उनकी वर्दी को कर सलाम पाखी, वतन महफूज है नेक हाथों में. (बहुत पहले गौतम भाई की एक पोस्ट पर किया
 
प्रकाश पाखी
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प्रतियोगी परीक्षा का भक्ति वेदांत -अध्याय २ (लगातार)

श्री भगवान् उवाच- हे,घंटाल कम्पीटीटर !मैंने सांख्य द्वारा गलाकाट कम्पीटिशन के इस ज्ञान का वर्णन किया है.अब मैं निष्काम भाव से लोगों का गला कैसे काटा जाय उस कर्म योग का वर्णन करता हूँ, उसे सुनो.हे पार्थ!तुम यदि ऐसे ज्ञान से अपने नजदीक रहने वाले,या मदद
 
प्रकाश पाखी
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नई ब्लॉगवाणी के लिए सुझाव-मैथिली जी सिरिल जी शुक्रिया!

मैथिली जी और सिरिल जी आपका शुक्रिया, आप का काम बहुत बड़ा है और इसके लिए आपको कष्ट तो उठाना ही होगा.विवाद हमेशा उन लोगों की देन होते है जिनकी रचनात्मकता की सीमाएं होती है.पर ब्लॉगवाणी को सुधारते समय हमें इसके फोर्मेट को सकारात्मक पठन से जोड़ना चाहिए.प
 
प्रकाश पाखी
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प्रतियोगिता परीक्षा का भक्ति वेदान्त -अध्याय २

संजय उवाच करूणा से व्याप्त,शोकयुक्त अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन को देखकर मधुसूदन कृष्ण ने ये वचन कहे।श्रीभगवानुवाच- हे अर्जुन!तुम्हारे मन में यह कल्मष कैसे आगया?यह उस पी सी एस एस्पैरेंट के तनिक भी अनुकूल नहीं है जो प्रतियोगिता का मूल्य पहचानता है.इससे
 
प्रकाश पाखी
Sep 21 2009 08:51 PM
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प्रतियोगी परीक्षा का भक्ति वेदांत-अध्याय 1

पी सी एस प्रतियोगी अर्जुन ने अपने सामने लाखों की संख्या में कीडे मकोडों की तरह खड़े बेरोजगार और बेहतर रोजगार की तलाश में युद्ध के लिए आये महारथी प्रतियोगियों को देखकर धुरंधर प्रतियोगेश्वर श्री कृष्ण से कहा-हे कृष्ण,इस प्रकार पी सी एस में चयन के लिए इस
 
प्रकाश पाखी
Sep 16 2009 09:13 PM
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सच सच कहना आज कहाँ है... !

जिन गलियों में तुम और मैं कदम कदम पर साथ चले थेउन गलियो की उड़ती धूल मन में मीलो महक रही हैचौराहों पर घंटो घंटे बातों बातों बिता दिए थेमूंग फलियो के उन छिलकों में कुछ कुछ दाने मेरे भी थेमूवी में वो मीठी सीटी बजा बजा के मजे लिए थेआगे बैठी सुन्दर लड़की
 
प्रकाश पाखी
Aug 30 2009 04:04 PM
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चाहिए न और पाखी हासिल अब जो पुरनमी है

बहरे रमल मुसमन मशकूल के बारे में गुरुदेव सुबीरजी के पिछली पोस्ट में जानकारी दी गयी थी.विचार आया कि कुछ अभ्यास किया जाए.फाएलातु फाएलातुन फाएलातु फाएलातुन(२१२१ २१२२ २१२१ २१२२)इस पर कोशिश करने लगा,फिर लगा कि क्षमता से बड़ा काम पकड़ लिया है...पर मर खप कर गजल
 
प्रकाश पाखी
Aug 10 2009 07:30 PM
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पीठ के जो जख्म थे सब राजदारों ने दिए

यह गजल नहीं है बस एक कविता है.मैने पूरी कोशिश की थी कि रदीफ़ और काफिये का ख्याल रखूँ पर कहन इतना बुरी तरह से टूट रहा था कि मुझे लगा इसे एक कविता ही रहने दिया जाए.सो जैसी भी है आप के सामने पेश है... ये पता है तू लगा ले लाख बाजी जान की मतलबी दुनिया बड़
Jul 17 2009 04:38 PM
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भाई(विक्रम)और टल्ली (बेताल)

यह कहानी भाई लोगों की है।भाई लोगों ने अपने ब्लॉग को चलाने का काम मुझे सौंप दिया है.बदले में वे मुझसे हफ्ता नहीं वसूलेंगे.खैर, मैंने संजय से सलाह कर के काम ले लेने में ही अपनी खैर समझी.भाई लोगों को बता दिया कि टपोरी लेंग्वेज अपुन के बस की नहीं है.इसलि
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वो राग रागिनी सी चंचल

वो राग रागिनी सी चंचल झंकृत मन को कर देती बाला कहाँ सुरा तीव्र है मदमय तनमन जीवन देती स्वप्न लगे कभी सत्य लगे जो क्षण क्षण सरगम बजती सुरमय तपते थरथर अधरों पर जब पावस वीणा सजती शांत सरोवरों की हलचल बन किसी किनारे चल देती वो राग रागिनी सी चंचल झंकृत मन
Jun 19 2009 01:35 AM
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राज्य सेवा में आठ वर्ष पूरे...बधाई और शुभकामनाएं

आज के दिन आठ वर्ष पहले १०८ अन्य साथियों के साथ राज्य सेवा में प्रवेश लिया था.मुझे याद है कि ट्रेन में जगह नहीं मिली थे तो अखबार बिछा कर सोते सोते आये थे.जब चयन हुआ था तो माँ की आँखे सजल हुई थी,बेरोजगारी और अनिश्चितता मेरे जीवन से लेकर परिवार तक पसरी
Jun 11 2009 10:11 PM
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क्षत्रिय उग्ररूप का शिलालेख

सार्थवाह धनगुप्त ने अपने कारवाँ पर नजर डाली.टीले की ऊंचाई से वह अपनी बैलगाडियों की पंक्ति का अंतिम छोर अच्छी तरह से देख पा रहा था.वह वर्षों से अपने कारवाँ के साथ व्यापार करता आ रहा था.पर इस मार्ग से कई बरसों बाद गुजर रहा था.आज का मार्ग कुछ अधिक ही दु
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क्षत्रिय उग्ररूप का शिलालेख

सार्थवाह धनगुप्त ने अपने कारवाँ पर नजर डाली.टीले की ऊंचाई से वह अपनी बैलगाडियों की पंक्ति का अंतिम छोर अच्छी तरह से देख पा रहा था.वह वर्षों से अपने कारवाँ के साथ व्यापार करता आ रहा था.पर इस मार्ग से कई बरसों बाद गुजर रहा था.आज का मार्ग कुछ अधिक ही दु
May 18 2009 08:46 PM
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क्षत्रिय उग्ररूप का शिलालेख

सार्थवाह धनगुप्त ने अपने कारवाँ पर नजर डाली.टीले की ऊंचाई से वह अपनी बैलगाडियों की पंक्ति का अंतिम छोर अच्छी तरह से देख पा रहा था.वह वर्षों से अपने कारवाँ के साथ व्यापार करता आ रहा था.पर इस मार्ग से कई बरसों बाद गुजर रहा था.आज का मार्ग कुछ अधिक ही दु
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होतीं परवाजें लम्बी पर सफ़र तन्हा होते है.

जिनके इशारों को ढूंढती है कई नजरें उनको चाहते कई दिल वो बेखबर तन्हा होते है हजारों सजदों का ईनाम हासिल जिन्हें कई तकदीरों के मालिक वो अक्सर तन्हा होते है उनके आँगन में लगे है मेले हमेशा से बाहर खुशियों के आलम वो अन्दर तन्हा होते है. मुश्किलों में हाथ
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पलक झपकी न थी कि मंजर बदल गया 'पाखी'...

ताश पत्तों के घरौंदे से गुजरा था तूफ़ान कोई न जाने कहाँ कहाँ तक बिखर गई जिन्दगी सारी बड़ी भीड़ में बच्चे सा खो गया अरमान कोई बदहवास उसने उसे ढूँढा कहाँ नहीं जिन्दगी सारी भर आये दिल और ग़मजदा आँखों के कोनें निकल के दरिया वहां से बहती रही जिन्दगी सारी प
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एक पहलवान का पहला प्यार

अखाडे में सुबह की कसरत करके हमने अपने गुरु उदैसिंघ जो पहलवानी और जिंदगानी के हमारे इकलौते गुरु थे को प्रणाम किया और घर की ओर चल दिए.गुरूजी वैसे तो कॉलेज में हिंदी पढाते थे पर वंहा भी उनकी शैली अखाडे के मुगदर घुमाने से मिलती जुलती थी. अखाडे से निकलते
Apr 28 2009 11:36 PM
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रिश्ता

मुन्नी,तेरा नारियल आया है...!"मेरी सखी शान्ति लगभग हांफती सी कह रही थी। " क्या??" "पगली,रामपुर गाँव के सबसे बड़े खानदान से रिश्ता आया है।"वह चहकते हुए कह रही थी. मेरे मन में गुदगुदी सी हो रही थी। देखते देखते गाँव की सारी औरते घर पर आने लगी।घर पर चहल
Apr 28 2009 11:36 PM
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मिला सपनों का राजकुमार(सम्पूर्ण)

मुन्नी,तेरा नारियल आया है...!"मेरी सखी शान्ति लगभग हांफती सी कह रही थी। " क्या??" "पगली,रामपुर गाँव के सबसे बड़े खानदान से रिश्ता आया है."वह चहकते हुए कह रही थी. मेरे मन में गुदगुदी सी हो रही थी। देखते देखते गाँव की सारी औरते घर पर आने लगी.घर पर चहल
Apr 28 2009 11:36 PM
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मुझसे प्यार करो माँ...!

रेत का तकिया घर में भाई आया है,इस बात का उत्सव पूरा कुटुंब मना रहा था. सुबह उठने के बाद किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि मैंने दूध भी पिया है कि नहीं. तब मैं इतनी छोटी थी कि ज्यादा याद नहीं है.हाँ,इतना याद है कि कुटम्ब के सारे लोग बहुत खुश थे.दादी खुश होकर
Apr 28 2009 11:36 PM
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वो अश्क किसके थे जिनमे भीगी थी जिन्दगी सारी

अबसार भीगे थे,जुबाँ खामोश, थी मन में बेकरारी किस इजबार से मुस्करा रहे थे किसी ने क्या ईशारा कर लिया छोड़ के आये जात मजहब अजलाल औ दुनियादारी तब डर न था बैठ बारूद पे हमने शरारा कर लिया शानो पे सर रख ग़म और इब्तिदा सुनाते थे रात सारी जब छोड़ गए, अब्तर-आशि
Apr 28 2009 11:36 PM
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इंस्टीटयुट फॉर प्यूर एंड अप्लाइड बाबागिरी

संस्थान के विशाल एवं हरे भरे केम्पस में बनी सीमेंट की शानदार सड़क पर रेंगती हुई एक स्कोडा ओक्टाविया कार एडम बिल्डिंग के गेट पर रुकती है।प्रकृति द्वारा प्रदत्त शकल के अतिरिक्त अन्य प्रयुक्त सहायक सामग्री से सज्जन दिखने का प्रयास करते मि।कबाड़वाला अपने
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तेजा बा की कुर्सी

काफीदिनों से अपनी एम्प्लोय्बिलिटी अथवा रोजगार प्राप्त करने की क्षमता बढ़ाने की सोच रहा था।परन्तु रोजगार हमें पंचम वर्ण में शामिल जातियों की भांति अस्पृश्य मानते हुए हमारी छाया से भी सावधानी से दूरी बनाये हुए था.पिछले कई दिनों से हमारी बढ़ी हुई दाढी भी
Apr 28 2009 11:36 PM
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सच सच कहना आज कहाँ है...

जिन गलियों में तुम और मैं कदम कदम पर साथ चले थे उन गलियो की उड़ती धूल मन में मीलो महक रही है चौराहों पर घंटो घंटे बातों बातों बिता दिए थे मूंग फलियो के उन छिलकों में कुछ कुछ दाने मेरे भी थे मूवी में वो मीठी सीटी बजा बजा के मजे लिए थे आगे बैठी सुन्दर
Apr 28 2009 11:36 PM
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कहाँ अब किनारे भी बच पायेगे

१) किनारे को गर किनारा चाहिए, नहीं अब दरिया दुबारा चाहिए , ओ मेरी दामन की लहरों , किसे अब यहाँ ठिकाना चाहिए , दरिया और लहरें निकल जायेंगे , दोनों किनारे भी मिल जायेंगे , बचेगी फकत माटी इस राह पे , कहाँ अब किनारे भी बच पायेगे (२) दर्द दिल के करीब हो त
Apr 28 2009 11:36 PM
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मैं बस यह किनारा नहीं छोड़ पाया ...

सारे तरीके आजमा लिए थे .. बस, एक सितारा नही तोड़ पाया उस पार से किसीने किए थे इशारे काफ़ी मैं बस यह किनारा नही छोड़ पाया सपने भी थे ,थी मंजिले वहीं जा रहे थे वहां कारवां कई और ये मेरी बुजदिली थी कि मैं एक आशियाँ नही छोड़ पाया किसी ने रात के अंधेरे में र
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मेरी पहली अभिव्यक्ति....बकरा

काफ़ी दिनों से इस उधेड़ बुन में था की हिन्दी में ब्लॉग कैसे लिखा जाय ?खैर, संजय ने समस्या सुलझा दी .नतीजे में एक और ब्लॉग आत्मा आपके सामने है। आज कुछ मल्टी लेवल मार्केटिंग के बन्दे मेरे पास आए.देश के लाखो बिना मेहनत के रातोरात करोड़पति बनने का सपना द
Apr 28 2009 11:36 PM
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भाईलोग-पीकेभिडे.ब्लागस्पाट.कॉम

ऐ सर्किट,क्या है की अब अपुन भाईलोगों को भी कुछ आगे का सोचना चाहिए." भाई ने पूरी संजीदगी से कहा. "भाई एकदम सच बोला,पण अपुन तो पहले से ही सोचता है...क्या कोई लफडा हुआ..." "नहीं रे ...मेरा मतलब दुनिया बदल रही है..अपुन लोग पिछड़ रेले है.." "हाँ,भाई मुझे