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किस्सा-कहानी

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15 Jun 2010
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नीरा जाग गयी है....

आज फिर घर में बड़ी चहल-पहल थी. पूरा सामान उलट-पुलट किया जा रहा था. पापा व्यस्त थे. माँ व्यस्त थीं. छोटी बहनें चहक रहीं थीं, बस नीरा चुप थी. देख रही थी चुपचाप . किसी ने कोई काम बताया तो कर दिया, बस इतना ही. सबके चेहरों पर ख़ुशी थी , लेकिन नीरा का चेहरा
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद....

मेरे हमराह मेरा साया हैऔर तुम कह रहे हो, तन्हा हूँमैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिनयूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ* * * * * * * * * * *आंधी से टूट जाने का खतरा नजर में थासारे दरख्त झुकने को तैयार हो गएतालीम, जहन, ज़ौक, शराफत, अदब, हुनरदौलत के सामने सभी बेकार हो
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद....

मेरे हमराह मेरा साया हैऔर तुम कह रहे हो, तन्हा हूँमैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिनयूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ* * * * * * * * * * *आंधी से टूट जाने का खतरा नजर में थासारे दरख्त झुकने को तैयार हो गएतालीम, जहन, ज़ौक, शराफत, अदब, हुनरदौलत के सामने सभी बेकार हो
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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सफ़ाई की दरकार है यहां....

कोई मुम्बई जाये और हाज़ी अली की दरगाह पर ना जाये ऐसा हो सकता है क्या? हम भी पूरे भक्ति भाव से दरगाह पर गये। समुन्दर के बीच स्थित यह दरगाह सिद्ध दरगाहों में से एक मानी जाती है। समुन्दर के पानी को काट कर बनाया गया यह पवित्र स्थल लोगों ने इतना अपवित्र कर
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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" हवा उद्दंड है........"

( अपने वरिष्ठ जनों के आदेश और इच्छा का सम्मान करते हुए, इस कहानी का पुनर्प्रकाशन कर रही हूं. मेरे जिन साथियों ने इसे पूर्व में पढा है, उनसे क्षमा-याचना सहित-_"अन्नू..... उठ जाओ, छह बज गए हैं।"मम्मी की आवाज़ के साथ ही मेरी आँखें खुल गई थीं। क्या मुसीबत
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद....

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलींउन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँमुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।लाख उसको अमल में
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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नहीं चाहिये आदि को कुछ....

"ये क्या है मौली दीदी?"" आई-पॉड है.""ये क्या होता है?"" अरे!!!! आई-पॉड नहीं जानते? बुद्धू हो क्या?"इतना सा मुंह निकल आया आदि का. क्या सच्ची बुद्धू है आदि ? क्लास में तो अच्छे नंबर पाता है.....हाँ, कुछ चीज़ों के उसने नाम सुने हैं, लेकिन देखा नहीं है. "अरे
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद....

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान हैआज शायर यह तमाशा देखकर हैरान हैख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिएयह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान हैएक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान हैमस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दमतू
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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बातों वाली गली

सामने वाले घर में सामान उतरता देख अचानक ही सोया पड़ा मोहल्ला जाग सा गया. चहल-पहल बढ़ गई. हर घर के दरवाज़े से एक अदद सिर थोड़ी-थोड़ी देर में बाहर निकलता, सामने वाले घर कि टोह लेता और फिर अन्दर हो जाता. दोपहर तक सारा सामान उतर चुका था और सामने वाले घर के
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद....

लीक पर वे चलें.....-----------------लीक पर वे चलें जिनकेचरण दुर्बल और हारे हैंहमें तो जो हमारी यात्रा से बने,ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैंसाक्षी हों राह रोके खड़ेपीले बाँस के झुरमुटकि उनमें गा रही है जो हवाउसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैंशेष जो भी हैं-वक्ष
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Feb 11 2010 11:40 AM
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दस का नोट

"मम्मी तुम भी कमाल करती हो! भला दस रुपये लेकर मेला जाया जा सकता है?""क्यों? दस रूपये ,रुपये नहीं होते? फिर तुम्हें झूला ही तो झूलना है, इसमें तो दो बार झूल लोगी...""अच्छा!!! किस जमाने में हो तुम? दस रूपये में तो झूले वाला झूले की तरफ देखने भी नहीं
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद....

वो आदमी नहीं मुकम्मल बयान है, माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है. वे कर रहे थे इश्क पे संजीदा गुफ़्तगु, मैं क्या बताऊँ, मेरा कहीं और ध्यान है. सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर, झोले में उसके पास कोई संविधान है. उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप, वो
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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ओढी हुई सभ्यता

टन-टन-टन’ के साथ घड़ी ने पाँच बजने का संकेत दिया और ऑफिस में टेबिल-कुर्सी खिसकाने,फडफडाते कागजों को फाइलों में बंद करने की आवाजों ने ज़ोर पकड़ लिया। इक्के-दुक्के जूते-चप्पलों की आवाजें मेरे बगल से हो कर गुज़र गईं। प्रत्येक व्यक्ति घर जाने की जल्दी में
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Dec 29 2009 11:53 AM
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ईश्वर की इच्छा

हर अच्छे काम का श्रेय लेते हम अपने सर, और गलतियों को मढ़ देते ईश्वर पर। क्या करता है वह हमेशा काम ग़लत? तो फिर कोई क्यों पूजे उसकी मूरत?
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Dec 29 2009 11:53 AM
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अनुभव

पढियेगा बार-बार हमें यूं ना फेंकिये, हम हैं इंसान, शाम का अखबार नहीं हैं" ( बुज़ुर्गों के प्रति......)
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Dec 29 2009 11:53 AM
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चाह..........

एक बार और जाल फ़ेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो।" ( जब 18 साल की थी तब बुद्धिनाथ मिश्र आकाशवाणी छतरपुर की कौन्सर्ट में आए थे , उसी वक्त ये रचना उन्होंने सुनाई थी, तब से उनकी ज़बरदस्त प्रशंसक हूँ .)
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Dec 29 2009 11:53 AM
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तमन्ना..

हर तमन्ना यहां पूरी नहीं होती, ख्वाब जो देखा उसकी तावीर नहीं होती। करना है तसल्ली , बस इस ख़याल से; खुदा होता है मगर उसकी दीदारे-राह नहीं होती।
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Dec 29 2009 11:53 AM
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ज्योति सिंह

जो पहले दिया वो याद नहीं, पहले क्या था, हमें याद नहीं, तुम थे पर मेरे साथ नहीं, तुम्हें लेकर था, कोई ख़याल नहीं। वह सफर था बड़ा अनजाना यह है शुरुआत नई। (ज्योति सिंह मेरी अभिन्न मित्र हैं, रचना कर्म उनका पहला शगल है, कोशिश करूंगी की उनकी रचनाएं नियमित आ
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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ज्ञातव्य

अरे वाह साहब! ऐसा कैसे हो सकता है भला!! इतनी रात तो आपको यहीं हो गई, और अब आप घर जाके खाना क्यों खायेंगे?" ’देखिये शर्मा जी, खाना तो घर में बना ही होगा। फिर वो बरबाद होगा।’ ’लेकिन यहां भी तो खाना तैयार ही है। खाना तो अब आप यहीं खायेंगे।’ पापा पुरोहित
 
वन्दना अवस्थी दुबे
Dec 29 2009 11:53 AM
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अनिश्चितता में....

ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से आ लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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दस्तक के बाद

सारा कमरा बनारसी साड़ियों, सूट के कपड़ों, बच्चों के कपड़ों, शाल, स्वेटर और जेवरों से अटा पड़ा था. बहुत प्यारी-प्यारी साड़ियाँ थी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी तो बहुत ही प्यारी थी. मनीष, निशि , रीना और सीमा इन चारों के ऊपर कपड़े खरीदने की ज़िम्मेदारी थी
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद

निहत्थे आदमी के हाथ में हिम्मत ही काफ़ी है, हवा का रुख बदलने के लिये चाहत ही काफ़ी है. ज़रूरत ही नहीं अहसास को अल्फ़ाज़ की कोई, समुन्दर की तरह अहसास में शिद्दत ही काफ़ी है. बडे हथियार लेकर लेकर जंग में शामिल हुए लोगों बुराई से निपटने के लिये कुदरत ही
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अहसास

बडकी, टेबल पे नाश्ता तो लगा दो; बारात लौटने से पहले सब कम से कम नाश्ता ही कर लें....." "बडकी ...... बड़ी जीजी को गरम पानी नहीं दिया क्या? कब नहायेंगीं ? बारात आने ही वाली है.........." "बडकी....परछन का थाल तैयार किया या नहीं ?.....दुल्हन दरवाजे पर आ ज
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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ज्ञातव्य

"अरे वाह साहब! ऐसा कैसे हो सकता है भला!! इतनी रात तो आपको यहीं हो गई, और अब आप घर जाके खाना क्यों खायेंगे?"’देखिये शर्मा जी, खाना तो घर में बना ही होगा। फिर वो बरबाद होगा।’’लेकिन यहां भी तो खाना तैयार ही है। खाना तो अब आप यहीं खायेंगे।’पापा पुरोहित जी को
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अलग-अलग दायरे..

"हल्लो नीरू "'अरे !तुम आ गईं!.... आओ-आओ' मैं हाथ की झाडू वहीं छोड़ खड़ी हो गई थी, शर्म से पानी-पानी। 'तुम काम कर रहीं थीं, मैंने डिस्टर्ब कर दिया न,जल्दी आ के?''नहीं यार....वो तो आज इतवार है न, बस इसीलिए सफाई का काम देर तक चलता रहता है। अरे बैठो न!राजी
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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आस-पास बिखरे लोग...

"क्या हुआ?”"पता नहीं""तो फिर आप यहां क्या कर रहे हैं?""जो आप कर रहे हैं" नीली कमीज़ वाले के पूछने पर सफेद कमीज़ वाले ने बेहद रूखा पर मुंहतोड जवाब दिया था। चौराहे पर भीड दोगुनी हो गई थी। लोग अलग-अलग टोलियां बनाये खडे थे। नीली कमीज़ वाले की जिज्ञासा अभी तक
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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Sep 16 2009 02:16 PM
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इस्मत जैदी की गजल

मैं जा रहा हूँ मेरा इंतज़ार मत करना ,और अपनी आंखों को भी अश्कबार मत करना ।ग़रीब दोस्त हूँ कर पाउँगा नहीं पूरी ,के ख्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करना।ये जानता हूँ के तखरीब तेरी आदत है,हरे हैं खेत इन्हें रेगज़ार मत करना ।मुझे तो मेरे बुजुर्गों ने ये सिखाया
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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बड़ी हो गई हैं ममता जी....

दुलहिन ओ दुलहिन ..............देखना ज़रा , मटके वाली निकली है क्या ?" अम्मां जी का ध्यान पूजा से हट कर मटके वाली की आवाज़ पर चला गया था, और आदतन उनकी जुबां "दुलहिन -दुलहिन " पुकारने लगी थी . बस यही आदत ममता जी को बिल्कुल पसंद नहीं . अब पूजा करने बैठी
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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विलोम

मुट्ठी भर दिन चुटकी भर रातें, गगन सी चिंताएँ, किसको बताएं? जागती सी रातें, दिन हुए उनींदे, समय का विलोम कैसे सुलझाएं? भागती सी सड़कें, खाली नहीं आसमान, दो घड़ी का सन्नाटा , हम कहाँ से पायें?
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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सीमाबद्ध

अरे...........क्या कर रहे हो?' जब तक मैं कुछ समझूं, तब तक सुनील मुझे एक प्यारी सी साडी में लपेट चुके थे। और मैं भी अवश, मंत्रमुग्ध सी उसमें लिपटती जा रही थी। 'अब कुछ समझ में आया की मैं क्या कर रहा था?' 'आया जनाब , लेकिन अपने स्वेटर पर तो रहम किया होत
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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मेरी पसंद के खजाने से...

टूटते लम्हों को मुट्ठी में जकड़ने वालो, क्या मिलेगा तुम्हें,परछाईं से लड़ने वालो। उम्र भर बैठ कर रोना कोई आसान नहीं, अपनी यादें भी लिए जाओ,बिछड़ने वालो.
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अज्ञात

यादों की नागफनी सी चुभती रात, होंठों पर पथराती अंतस की बात। सब कुछ विष बोरा सा , सब कुछ बदरंग, ख़त्म नहीं होता है , दर्द का प्रसंग। ( यह रचना भी बुद्धिनाथ मिश्र की है, जो याद रहती है.)
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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"ऐसी होती है माँ"

तेरे दामन में सितारे हैं, तो होंगे ऐ फलक, मुझको अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी। लबों पे उसके कभी बददुआ नहीं होती, बस एक माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती। ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता, मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी माँ सज़दे में रहती है। (
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अनिश्चितता में...

ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से आ लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अनिश्चितता में...

ट्रेन धडधडाती हुई प्लेटफार्म से आ लगी थी। ट्रेन के आते ही लोगों की गहमागहमी अचानक ही बढ़ गई थी। यहाँ से वहां लाल यूनिफार्म में दौड़ते कुली , डिब्बे में जगह लेने को बेताब यात्री। और इस भीड़ से घिरा मैं। मैंने भी अपना सूटकेस और बैग सम्हाला और एक डिब्बे
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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'हवा उद्दंड है'

अन्नू..... उठ जाओ, छह बज गए हैं।" मम्मी की आवाज़ के साथ ही मेरी आँखें खुल गई थीं। क्या मुसीबत है! ऐसे कडाके की ठण्ड में उठना होगा! यदि इस वक्त ज़रा भी आलस किया तो 'बस ' के समय तक तैयार होना बड़ा मुश्किल होगा। बस का ख्याल आते ही एक झटके से रजाई फ़ेंक उठ
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अलग-अलग दायरे...

हल्लो नीरू " 'अरे !तुम आ गईं!.... आओ-आओ' मैं हाथ की झाडू वहीं छोड़ खड़ी हो गई थी, शर्म से पानी-पानी। 'तुम काम कर रहीं थीं, मैंने डिस्टर्ब कर दिया न,जल्दी आ के?' 'नहीं यार....वो तो आज इतवार है न, बस इसीलिए सफाई का काम देर तक चलता रहता है। अरे बैठो न!' र
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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दो का नोट

मम्मी तुम भी कमाल करती हो! भला दो रुपये लेकर मेला जाया जा सकता है?" "क्यों? दो रूपये ,रुपये नहीं होते? फिर तुम्हें झूला ही तो झूलना है, इसमें तो दो बार झूल लोगी..." "अच्छा!!! किस जमाने में हो तुम? दो रूपये में तो झूले वाला झूले की तरफ देखने भी नहीं द
 
वन्दना अवस्थी दुबे