2
आभार: जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बार पुरुष बहुत जग नाहीं ||
निज कबित्त केहि लाग न नीका | सरस होउ अथवा अति फीका ||जे पर भनिति सुनत हरषाहीं | ते बार पुरुष बहुत जग नाहीं ||जग बहु नर सर सरि सम भाई | जे निज बाढी बढ़हिं जल पाई ||सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई | देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ||तुलसीदास, रामचरित मानस बालकांड रसीली हो
- 19 20 टिप्पणियां [3]
Feb 01 2010 09:46 PM


Shuffle








