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*साधना*

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13 Jun 2010
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कबीर के श्लोक - २५

कबीर थोरै जलि माछुली, झीवरि मेलिउ जालु॥ ऐह टोंघनै न छूटसहि, फिरि करि समुंदु समालि॥४९॥ कबीर जी कहते है कि यदि मच्छ्ली उस जगह पर है जहाँ पानी कम है तो वह ऐसी जगह पर आसानी से मछुआरे के जाल मे फँस जाती है। इसी लिए मच्छली को माध्यम बना कर कबीर जी हम से कहना
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक - २४

कबीर परदेसी कै घाघरै, चहु दिसि लागी आगि॥ खिंथा जलि कोइला भई, तागे आंच न लाग॥४७॥ कबीर जी कहते है कि यह जो परदेसी है इस के घाघरे के चारो ओर आग लगी हुई है। इस की जो गोदड़ी है वह तो जल कर कोयला हुई जाती है।लेकिन इस के बीच जो धागा है उसे आँच तक नही लगती। कबीर
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक -२३

कबीर मै जानिउ पड़िबो भलो, पड़िबे सिउ भल जोगु॥ भगति न छाडऊ राम की, भावै निंदऊ लोगु॥४५॥ कबीर जी पिछ्ले श्लोको मे भोग विलासादि और विषय विकारादि को छोड़ने कि बात कहने के बाद अब पढ़ने की बात पर अपना मत रख रहे हैं।वे कहते है कि मैने सुना था कि धर्म ग्रंथो को पढ़ना
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक -२२

को है लरिका बेचई, लरिकी बेचै कोइ॥ साझा करै कबीर सिउ, हरि संगि बनजु करेइ॥४३॥ कबीर जी कह्ते है कि कोई लड़के बेच रहा है और कोई लड़कीयां बेच रहा है। लेकिन कबीर जी कहते है कि हम तो उस के साथ व्यापार करेगें जो ईश्वर के साथ सौदा कर रहा है। कबीर जी इस श्लोक द्वारा
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक -२१

कबीर लूटना है त लूटि लै, राम नाम है लूटि॥ फिरि पाछै पछुताहुगे, प्रान जाहिंगे छूटि॥४१॥ कबीर जी कहते है कि यदि तुझे कुछ लूटने की चाह है तो तू उस राम नाम की लूट कर ले।क्योकि एक राम का नाम ही लूटने योग्य है।यदि तूने अभी इस राम नाम को नही लूटा तो जब तेरे
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक -२०

कबीर गरबु न कीजीए, रंकु न हसीऐ कोइ॥ अजहु सु नाउ समुंद्र महि, किआ जानऊ किआ होइ॥३९॥ कबीर जी पिछले श्लोको की तरह इस श्लोक मे भी गर्व करने का एक कारण और बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जो लोग धनवान हो जाते है उन लोगो को गरीब इन्सान की दयनीय स्थिति को देख कर
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक -१९

कबीर गरबु न कीजीऐ, चाम लपेटे हाड॥ हैवर ऊपरि छ्त्र तर, ते फुनि धरती गाड॥३७॥ कबीर जी कहते है कि इस शरीर का गर्व नही करना चाहिए।यह हमारा शरीर हड्डीयों पर लपेटी हुई चमड़ी मात्र तो है। गर्व किस बात का करना ? वे लोग जो कभी घोड़ो पर सवार होते थे, जिन के सिर पर
 
परमजीत सिँह बाली
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कबीर के श्लोक -१८

कबीर बेड़ा जरजरा, फूटे छेंक हजार॥ हरूऐ हरूऐ तिरि गए, डूबे जिन सिर भार॥३५॥ कबीर जी कह्ते है कि यह जो बेड़ा अर्थात समुद्री जहाज है यह बहुत ही नाजुक हालत मे हैं और इस मे हजारों छेद हो चुके हैं। लेकिन हजारो छेद होने के बावजूद भी जो हल्के हल्के थे। वे तो तैरते
 
परमजीत बाली
Apr 22 2010 06:49 AM
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कबीर के श्लोक -१७

कबीर कसऊटी राम की, झूठा टिकै न कोइ॥ राम कसऊटी सो सहै,जो मरि जीवा होइ॥३३॥ कबीर जी कह्ते है कि उस परमात्मा के समक्ष झूठा कभी नही टिक पाता।क्योकि उस परमात्मा की कसौटी ही ऐसी है कि जब तक मनुष्य अपने अंहकार को नही मार लेता तब तक वह उस तक नही पहुँच पाता।अर्थात
 
परमजीत बाली
Apr 15 2010 06:42 AM
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कबीर के श्लोक -१६

कबीरा तुही कबीर तू ,तेरो नाऊ कबीरु॥ राम रतनु तब पाईऐ,जऊ पहले तजहि सरीरु॥३१॥ कबीर जी इस श्लोक मे कहते है कि तू ही सब से बड़ा है और सर्वत्र तू ही है। तेरा नाम ही कबीर है अर्थात भगत और भगवान मे कोई भेद नही है।लेकिन यह भेद तभी मिटता जब हम इस शरीर का मोह छोड़
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - १५

कबीर मरता मरता जगु मुआ, मरि भी न जानिआ कोइ॥ ऐसे मरने जे मरै, बहुरि न मरना होइ॥२९॥ कबीर जी कहते है कि यह संसार निरन्तर मृत्यु का ग्रास बनता जा रहा है,लेकिन यह सब देख कर भी हम मौत को भुलाए बैठे रहते हैं। यदि हम इसी तरह मरते है तो हमारे बार बार मरने पर भी
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - १४

कबीर ऐह तनु जाइगा, सकहु त लेहु बहोरि॥ नांगे पावहु ते गऐ , जिन के लाख करोरि॥२७॥ कबीर जी कहते है कि ये शरीर निश्चय ही नष्ट हो जाएगा।यदि किसी को यकीन नही है तो वह प्रयत्न कर के देख ले। इस शरीर को नष्ट होने से कभी बचाया नही जा सकता।कबीर जी कहते है कि चाहे
 
परमजीत बाली
Mar 22 2010 07:28 AM
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कबीर के श्लोक - १३

कबीर प्रीति इक सिउ कीऐ, आन दुबिधा जाइ॥ भावै लांबे केस करु, भावै घररि मुडाइ॥२५॥ कबीर जी कहते है कि जब तक उस एक परमात्मा से हमारा संबध नही बन जाता, तब तक संसारी परेशानीयों से, मान अपमान से,नही बचा जा सकता। किसी मजहब या मान्यता का दिखावा मात्र कर लेने से उस
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - १२

राम पदारथु पाइ कै, कबीरा गांठि न खोल॥ नही पटणु नही पारखू , नही गाहकु नही मोलु॥२३॥ कबीर जी कहते है कि जिसने उस परमात्मा को पा लिया है, उस परमात्मा की कृपा पा ली है। उसे इस बारे मे दुसरो से नही कहना चाहिए।क्योकि ऐसा कोई बाजार नही है जहाँ कोई इस राम पदार्थ
 
परमजीत बाली
Mar 08 2010 06:57 AM
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कबीर के श्लोक - ११

कबीर सूखु न ऐह जुगि,करहि जु बहुतै मीत॥ जो चितु राखहि एक सिउ,ते सुखु पावहि नीत॥२१॥ कबीर जी कहते है कि इस मनुष्य जन्म मे सुख कहीं भी नही है।भले ही हम अपने परिवार को बड़ा कर ले। मित्रों की संख्या को बड़ा ले।यदि किसी को सुख चाहिए तो उसे उस परमात्मा से संबध
 
परमजीत बाली
Mar 01 2010 06:51 AM
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कबीर के श्लोक - १०

कबीर माइआ डोलनी,पवनु वहै हिवधार॥ जिनि बिलोइआ तिनि खाइआ,अवर बिलोवनहार॥१९॥ इस श्लोक मे कबीर जी पिछले श्लोक मे कहे विचार को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं।वह कहते है कि माया रूपी यह जो दूध है, इसे हमारी श्वास रूपी शीतल पवन बिलोवने की तरह बिलोती जा रही है।जो लोग
 
परमजीत बाली
Feb 22 2010 06:48 AM
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कबीर के श्लोक - ९

कबीर साकतु ऐसा है,जैसी लसन की खानि॥ कोने बैठे खाईऐ,परगट होइ निदानि॥१७॥ कबीर जी कहते हैं कि जो ईश्वर को भूला हुआ जीव है वह लसन की कोठरी के समान है। क्योकि जो भी इस लसन का सेवन कही भी बैठ कर करता है तो भी इस की गंध के कारण उसे सेवन करने वाला, अपने आप को
 
परमजीत बाली
Feb 15 2010 11:23 PM
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कबीर के श्लोक - ८

कबीर संतन की झुंगीआ भली,भठि कुसती गाउ॥ आगि लगऊ तिह धउलहर,जिह नाही हरि को नाउ॥१५॥ इस श्लोक मे कबीर जी अपने निजि विचार व्यक्त कर रहे हैं कि यदि कोई संत है, परमात्मा का प्यारा है।ऐसे संत की छोटी सी झोपड़ी भी मुझे भली दिखती है,अच्छी दिखती है। जबकि बुरे इन्सान
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - ७

कबीर दीनु गवाइआ दुनी सिउ,दुनी न चाली साथि॥ पाइ कुहाड़ा मारिआ, गाफिल अपनै हाथि॥१३॥ कबीर जी इस श्लोक मे कहते है कि हम सदा दुनिया दारी में ही लगे रहते है,जिस कारण हम जिस काम के लिए दुनिया मे आए हैं,वही भूल जाते हैं और दुनिया दारी में ही रम जाते हैं।जबकि हम
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - ६

कबीर चंदन का बिरवा भला, बेड़िउ ढाक पलास॥ उइ भी चंदन होइ रहे,बसे जु चंदन पासि॥११॥ कबीर जी इस श्लोक मे कहते है कि चंदन का एक छोटा-सा पौधा भी अपने गुणो के कारण उपयोगी होता है भले ही वह ढाक और पलास जैसे पेड़ -पौधों से घिरा हुआ हो।क्योकि चंदन के पास रहने के
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - ५

कबीर सोई मारीऐ,जिह मूऐ सुखु होइ॥भले भले सभु को कहै,बुरे न मानै कोइ॥९॥कबीर जी इस श्लोक मे कहते है कि हमे उसे मारना चाहिए जिस के मरने से हमे सुख की प्राप्ती होती है।जिस के मरने पर सभी लोग भला मानते है और उस के हमारे द्वारा मारे जाने पर हमे कोई बुरा भी नही
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक -४

कबीर सब ते हम बुरे,हम तजि भले सभु कोए॥जिनि ऐसा करि बूझिआ,मीतु हमारा सोए॥७॥इस श्लोक में कबीर जी कहते है कि सब से बुरे हम ही होते है,हमे छोड़ कर बाकि सभी तो भले ही हैं।जब यह बात समझ मे आती है,उस समय वह सभी लोग अपने लगने लगते है जो इस प्रकार जान जाते
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक- २१

जां कुआरी ता चाउ,विवाही तां मामले॥फरीदा ऐहो पछोताउ,वति कुआरी ना थीऐ॥६३॥कलर केरी छपड़ी,आई ऊलथै हंझ॥चिंजू बोड़नि ना पीवहि,ऊंडण सधी ढंझ॥६४॥हंसु ऊडरि क्रोधै पईआ,लोकु विडारणि जाइ॥गहिला लोकु जाणदा,हंसु ना क्रौधा खाइ॥६५॥फरीद जी कहते हैं कि जब कन्या कुआरी होती
 
परमजीत बाली
Dec 29 2009 11:51 AM
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फरीद के श्लोक - ३४

काइ पटोला पाड़ती कंबलड़ी परिरेइ॥नानक घर री बैठिआ सहु मिलै जे नीअति रासि करेइ॥१०४॥म: ५॥फरीदा गरबु जिना वडिआईआ धनि जोबनि आगारु॥खाली चले धणी सिउ टिबे जिउ मीहारु॥१०५॥फरीदा तिना मुख डरावणे जिना विसारिउन नाउ॥ऐथै दुख घणेरिआ अगै ठऊर न ठाउ॥१०६॥यह श्लोक गुरु अमर
 
परमजीत बाली
Dec 29 2009 11:51 AM
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फरीद के श्लोक - २४

महला५॥फरीदा खालकु खलक महि, खलक वसै रब माहि॥मंदा किस नो आखीऐ, जां तिसु बिनु कोई नाहि॥७५॥फरीदा जि दिहि नाला कपिआ,जे गलु कपहि चुख॥पवनि न इतीं मामले, सहां न इती दुख॥७६॥चबण चलण रतंन,से सुणीअर बहि गऎ॥हेड़े मुती धाह, से जानी चलि गऎ॥७७॥यह श्लोक वास्तव में गुर
 
परमजीत बाली
Dec 29 2009 11:51 AM
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फरीद के श्लोक - २२

चलि चलि गईआं पंखीआं,जिन्नी वसाए तल॥फरीदा सरु भरिआ भी चलसी,थकै कवल ईकल॥६६॥फरीदा इट सिराणे,भुई सवणु,कीड़ा लड़िओ मासि॥केतणिआ जुग वापरे,इकतु पईआ पासि॥६७॥फरीदा भंनी घड़ी सवंनवी,टुटी नागर लजु॥अजराईल फरेसता ,कै घरि नाठी अजु॥६८॥फरीदा भंनी घड़ी सवंनवि,टुटी नागर ल
 
परमजीत बाली
Dec 29 2009 11:51 AM
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कबीर के श्लोक -३

कबीर ऐसा एक आधु,जो जीवत मिरतकु होइ॥निरभै होइ के गुन रवै,जत पेखऊ तत सोइ॥५॥कबीर जी कहते है कि इस संसार मे कोई बिरला ही होता है जो अपने जीवन को इस तरह जीए जैसे कोई जीवत व्यक्ति किसी मरे हुए के समान इस संसार से संबध रखता है।निरभय हो कर सुख और दुख से ऊपर
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक -२

कबीर डगमग किआ करहि,कहा ढुलावहि जीउ॥सरब सूख के नाइको,राम नाम रसु पीउ॥३॥कबीर जी कहते है कि हे प्राणी तू अपने मन को किन बातों मे उलझा रहा है,क्यो तू क्षणिक सुखो मे लग कर अपने मन को बहला रहा है। तुझे तो उस परमपिता परमेश्वर जो कि सभी सुखो का स्वामी है, सभ
 
परमजीत बाली
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कबीर के श्लोक - १

कबीर मेरी सिमरनी, रसना ऊपर रामु॥आदि जुगादी सगल भगत,ता को सुखु बिस्रामु॥१॥कबीर जी कहते है कि मेरी सिमरनी अर्थात मेरी माला तो मेरी जीभ है जिस पर में राम नाम का जाप जपता हूँ। ऐसा सिर्फ मैं ही कर रहा हूँ यह बात नही है आदि से परमात्मा का सिमरन प्रभु भगत इ
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ४१

निवणु सु अखरु,खवणु गुणु,जिहबा मणीआ मंतु॥ऐ त्रै भैणे वेस करि,तां वसि आवी कंतु॥१२७॥मति होदी होइ इआणा॥ताणु होदे होऐ निताणा॥अणहोदे आपु वंडाऐ॥कोइ ऐसा भगतु सदाऐ॥१२८॥इकु फिका न गालाइ,सभना मै सचा धणी॥हिआउ न कैही ठाहि, माणक सभ अमोलवे॥१२९॥सभना मन माणिक,ठाहणु मूलि
 
परमजीत बाली
Aug 08 2009 12:42 AM
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फरीद के श्लोक - ४०

किआ हंसु किआ बगुला, जा कउ नदरि धरे॥जे तिसु भावै नानका, कागहु हंसु करे॥१२४॥सरवर पंखी हेकड़ो,फाहीवाल पचास॥ऐहु तनु लहरी गडु थिआ, सचे तेरी आस॥१२५॥कवणु सु अखरु,कवणु गुणु,जिहबा मणीआ मंतु॥कवणु सु वेसो हऊ करी,जितु वसि आवै कंतु॥१२६॥उपरोक्त श्लोक गुरु नानक देव जी
 
परमजीत बाली
Jul 28 2009 12:39 AM
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फरीद के श्लोक - ३९

हौ ढूढेदी सजणा,सजणु मैडे नालि॥नानक अलखु न लखीऐ,गुरमुखि देऐ दिखालि॥१२१॥हंसा देखि तरंदिआ, बगा आइआ चाउ॥ढुबि मुऐ बग बपुड़े, सिरु तलि उपरि पाउ॥१२२॥मै जाणिआ वड हंसु है,तां मै कीता संगु॥जे जाणा बगु बपुड़ा,जनमि न भेड़ी अंगु॥१२३॥यह श्लोक गुरू रामदास जी के उच्चार
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३८

फरीद दरवेसी गाखड़ी,चोपड़ी परीति॥इकनि किनै चालीऐ,दरवेसावी रीति॥११८॥तनु तुधै तनूर जिउ,बालण हड बलंनि॥पैरी थकां,सिरि जुलां,जे मूं पिरी मिलंनि॥११९॥तनु न तपाऐ तनूर जिउ, बालणु हड न थालि॥सिरि पैरी किआ फेड़िआ,अंदरि पिरी निहालि॥१२०॥फरीद जी कहते हैं कि फकीरी का रा
 
परमजीत बाली
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फरिद के श्लोक - ३७

ढूढेदीऐ सुहाग कू,तउ तनि काई कोर॥जिना नाउ सुहागणी, तिना झात न होर॥११४॥सबर मंझ कमाण, ऐ सबरु,का नीहणो॥सबर संदा बाणु, खालकु खता न करी॥११५॥सबर अंदरि साबरी,तनु ऐवै जालेनि॥होनि नजीकि खुदाऐ दै,भेतु न किसै देनि॥११६॥सबरु ऐहु सुआउ,जे तूं बंदा दिड़ु करहि॥वधि थीवह
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३६

फरीदा दुनी वजाई वजदी तूं भी वजरि नालि॥सोई जीउ न वजदा जिसु अलरु करदा सार॥११०॥फरीदा दिल रता इसु दुनी सिउ दुनी न कितै कंमि॥मिसल फकीरां गाखड़ी सु पाईऐ पुर करंमि॥१११॥पहले पहरै फुलड़ा, फलु भी पछा राति॥जो जागंनि,लहंनि से,साई कंने दाति॥११२॥दाती साहिब संदीआ,किआ
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३५

फरीदा पिछल राति न जागिउरि जीवदड़े मुइउरि॥जे तै रबु विसारिआ त रबि न विसरिउरि॥१०७॥फरीदा कंतु रंगावला वडा वेमुरताजु॥अलर सेती रतिआ ऐहु सचावां साजु॥१०८॥फरीदा दुखु सुखु इक करि दिल ते लाहि विकारु॥अलर भावै सो भला तां लभी दरबारु॥१०९॥फरीद जी कहते हैं कि यदि तू
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३३

फरीदा हउ बलिहारी तिन पंखिआ जंगल जिंना वासु॥ककरु चुगनि थलि वसनि रब न छोडनि पासु॥१०१॥फरीदा रुति फिरी वणु कंबिआ पत झड़े झड़ि पारि॥चारे कुंडा ढूंढीआं रहणु किथाउ नारि॥१०२॥फरीदा पाड़ि पटोला धज करी कंबलड़ी परिरेउ॥जिनी वेसी सरु मिलै सेई वेस करेउ॥१०३॥फरीद जी कहते
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३२

फरीदा दरीआवै कंनै बगुला,बैठा केल करे॥केल करेदे हंझ नो, अचिंते बाज पऎ॥बाज पऎ तिसु रब दे, केलां विसरीआं॥जो मनि चिति न चेते सनि,सो गाली रब कीआं॥९९॥साडे त्रै मण देहुरी,चलै पाणी अंनि॥आइउ बंदा दुनी विचि,वति आसूणी बंनि॥मलकल मऊत जां आवसी,सभ दरवाजे भंनि॥तिना
 
परमजीत बाली
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फरीद के श्लोक - ३१

कंधी उते रुखड़ा किचरकु बंनै धीरु॥फरीदा कचै भांडे रखीऎ, किचरु ताई नीरु॥९६॥फरीदा महल निसखण रहि गऎ,वासा आइआ तलि॥गोरां से निमाणीआ,बहसनि रूहां मलि॥८७॥फरीदा मऊते दा बंना ऐवै दिसै, जिउ दरीआवै डाहा॥अगै दोजकु तपिआ सुणीऎ,हूल पवै काहारा॥इकना नो सभ सोझी आई,इकि फि
 
परमजीत बाली