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31 May 2010
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पैरों के निशान

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Navnit Nirav
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कुछ पंक्तियाँ पर्चियों से.....

(आजकल समय का अभाव सा हो गया है। पंक्तियाँ मन में जरूर आती हैं लेकिन विस्तार नहीं ले पायीं। कुछ कागजों पर, डायरी के पीछे, पर्स में रखे कार्ड्स पर। उनमें से कुछ आपके लिए बिना किसी संशोधन के । ) १ Normal 0 false false false EN-IN X-NONE HI /* Style
 
Navnit Nirav
May 29 2010 08:25 PM
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अलविदा

चंद कतरे ही हैं आंसुओं के ,लेकिन आज मेरी आँख नम है,सपने तो आज भी मेरे ही हैं,पर उनमें दोस्तों का प्यार कम है.जाने को तो सब जाते हैं,पर इन रिश्तों की बात अलग है ,साथ रहते हैं तो हँसते हंसाते,जाने के बाद रुलाते बहुत हैं चलते- चलते जैसे जेठ कि दुपहरी में,
 
Navnit Nirav
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कुछ कहना है मुझे.....

देखते-देखते वक्त गुजर गया, आखिर जाने के दिन आ गए, एक –एक करके बना था जो कारवां, उससे बिछड़ने के दिन आ गए. आज सुबह –सुबह मन में, एक ख्याल आया, जो सामान इकट्ठे किये हैं मैंने, इन गुजरे सालों में, क्यों न उनको समेटता चलूँ, जाना तो अवश्यम्भावी है, क्यों न मन
 
Navnit Nirav
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प्यार में पगी कविता सी कोई

मेरे सपनो को नया रंग दो,जीवन भर तुम मेरा संग दो।पतझड़ में भी रहे जो हरी सी, मन में मेरी ऐसी उमंग दो।रहूँ सोचता हर घडी मैं जिसको,प्यार की वो मीठी तरंग दो।कागज़ से कोरे इस मन को, अपने प्यार के रंग से रंग दो।चन्दन चन्दन महकूँ हरदम,मेरे जीवन को ऐसी सुगंध दो
 
Nihar Khan
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रंग और रिश्ते

आओ, मन को खुशी से भर दें,दिल के जज्बातों को रंग दें, फागुन की इस अलमस्ती में,बीते लम्हों संग भी चल लें।हम वक्त को कहते पाजी है, बेघर कर करता है यादों को,बचपन से साथ रहे जो अब तक ,रिश्ते- नातों के वादों को,इक अहसास रहे मन में, छूटे रिश्ते भी हैं अपने ,
 
Navnit Nirav
Feb 28 2010 11:42 PM
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जिद्दी

अब कैसे तुझको समझाऊँ?मेरे दिल तू तो जिद्दी है,क्यों करता है उन बातों पे गौर?जो मैंने यूँ ही कह दी है। पहले तू कहता है मुझसे,कुछ कह दूँ तुझसे प्यार से,जो कुछ सोचा है मैंने अब तक,अपने प्यार के इकरार में,न बोलूं तो लगता है तुझको,मैंने कुछ बात छुपाई है, जब
 
Navnit Nirav
Feb 18 2010 02:08 PM
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अब दर्द नहीं जाता

कितना भी मुस्कुरा लें, अब दर्द नहीं जाता,अक्सर रात को तन्हा चाँद,मुझको तन्हा कर जाता।चंद बादलों से मिलकर, अब भी रो देता है आसमां,सच है अपनों के मरहम से, इक दर्द नहीं जाता।जब भी जाना है सहरा को ,वो खूबसूरत ही लगता है,जब तक कोई काफिला, कहीं भटक नहीं
 
Navnit Nirav
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इस बार की सर्दी...

१कितनी ही सर्दियाँ आई गयीं,किन्तु इस बार की सर्दी का,अंदाज कुछ निराला है ,कोहेरे से ढका है पूरा दिन ,और रात को पड़ता पाला है ।सूरज की क्या बिसात जो,लोगों को दर्शन दे जाये,कैसे झांके चाँद बेचारा ?कुहासे ने घूंघट जो डाला,कहीं मफलर, कहीं स्वेटर,कहीं टोपी ,
 
Navnit Nirav
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युवा मंथन

इस साल फिर से सूखा पड़ा है । शहरी क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच जो आर्थिक खाई है, अब वो और गहरी हो जायेगी । शहर फिर से कितने ही बेकार लोगों को गाँव छोड़ने पर मजबूर कर देगा । कौन इनकी मदद करेगा ? और क्यों करेगा ?........ ये बड़ा अहम् सवाल है । इ
 
Navnit Nirav
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दादाजी

चांदनी रात में, जब बरसात होती है, उस समय, वह स्याह रात भी, कुछ खास होती है, खिड़की में खड़े होकर, आकाश की ओर देखता हूँ, चंदा की रोशनी संग, झरती हुई बूंदों को, निर्मल चाँदनी में, चमकती हुई बूंदों को, लगता है आसमान में रहने वाले, अनगिनत तारे टूटकर, आज ध
 
Navnit Nirav
Dec 29 2009 11:47 AM
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बादल भैया

इस इस कविता में एक गाँव की छोटी सी बच्ची जो बरसात नहीं होने से परेशां है। उसके मन में कई विचार आते हैं। बादल को अपना भाई मानकर वह उनसे कुछ कहती है ) कई दिनों से राह देखती, मेरी आँखें पथराती, ग्रीष्म की गर्म हवाओं से , भेजी थी मैंने तुमको पाती , तीक्ष
 
Navnit Nirav
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बादलों से बातें

बरसात शुरू हो गई है । बादल आने लगे हैं ।) चलो हम बादलों से बात करते हैं, कुछ अपने दिल के जज्बात कहते हैं, संदेशे भेजते हैं बूंदों से जब वो , न जाने हमसे क्या फरियाद करते हैं। लेकर कई गम समंदर औ पोखरों के, हवा में झूमते हैं वो जज्बाती होके, गम ठहरे गर
 
Navnit Nirav
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प्यार

इस ज़माने में सभी प्यार करते हैं कुछ इकरार, तो कुछ इजहार करते हैं, कुछ ऐसे भी शख्स हैं यहाँ , जो इससे इंकार भी करते हैं, कुछ प्रेम पत्रों के सहारे करते हैं, कुछ गीतों, नज्मों से करते हैं, कुछ दिल से करते हैं , कुछ दिल ही में करते हैं, कुछ शौक के लिए
 
Navnit Nirav
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रास्ते पर जिंदगी

कई बार हम मानव कुछ ख्वाब बुनते हैं .... सच्चे ख्वाब । सच्चे इसलिए क्यों कि हम उन्हें पूरा करने की हर सम्भव कोशिश करते हैं । पर कई बार ऐसा होता है कि हम जो बात सोचते हैं उसे पूरा करने में काफी वक्त लग जाता है । कई बार विपरीत परिस्थितियों का सामना भी क
 
Navnit Nirav
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लौट आई जिंदगी (पलामू चुनाव के बाद)

आज फिर सुबह हुई, निरभ्र खुला आसमान, ठंढी हवाएं, धीमी -धीमी गुनगुनाती हुई। छिट-पुट बादलों से छनकर, सीधे बदन को छूती सूरज की किरनें, पंछियों के कलरव, वातावरण का धीमा शोर, और न जाने कितना कुछ । पर कल ऐसा नहीं था, ये सब कुछ खामोश था , दहशत की चादर में लि
 
Navnit Nirav
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व्यथा एक युवा की

इतनी दूर निकल आये हैं हम , अपने बसेरे से , कि वापस लौटना अब मुमकिन नहीं , मन तो कहता है , चल मिल आयें अपनों से , पर दिल है कि इजाजत ही नहीं देता । कितने अरमां लिए हम , निकले हैं अपने घर से , नए आशियाने की तलाश ने , दूर किया हमें अपने जन से , हर दिशा
 
Navnit Nirav
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एक दीया, मेरे दोस्त तुम भी जलाना.....

अमावस की रात , जब अँधेरी हो जाती है , स्याह - सा लगता है , यह सारा जमाना , तवे पर जब कभी कालिख जम जाये , मुश्किल होता है तब उसको मिटाना , एक दीपशिखा जो युगों तक जलती है , अनवरत संसार के हर तम् हरती है , हर बार दीयों की कोशिश यही होती है , मिलकर संसार
 
Navnit Nirav
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हमशक्ल

अचानक ही उस दिन महसूस हुआ था मुझे , कि तुम मेरे कैम्पस में हो , जब देखा था मैंने , वही गुलाबी सूट पहने , ( जिस पर मैं फ़िदा था ) सिंगल सी छोटी बनाये , ठीक तुम्हारे कद वाली उस सांवली सी लड़की को , दूर से । मन की भावनाएं , जो उनींदी सी थीं , मानों उन्हें
 
Navnit Nirav
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नानी कहे कहानी

व्याकुल हो बच्चे बैठे हैं , छोड़ के सारी शैतानी , न कोई मस्ती करता है , न कोई करता मनमानी , दूर देश में रहती है , सुंदर परियों की रानी , मधुर - मधुर सपनों को ले , नानी कहे कहानी । परीलोक है सुंदर देश , कभी न होता किसी को क्लेश , बहती है वहां दूध की नद
 
Navnit Nirav
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गाँव की याद

तन झुलसाती गर्मी बीती,और ये पावस बीत गया,यहाँ अजब सी हवा चली,एक क्षण मैं कुछ सोच न पाया ,कल तक जिन गलियों में खेला,उनको कैसे मैं भूल गया,साथ छूटने का गम है मुझको,पर उसने भी न मुझे बताया,भूल चला था मैं तुझको भी,मेरे गाँव, आज मुझे तू याद आया।तुझ संग कभी
 
Navnit Nirav
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जिंदगी और रंग

दिल दिमाग के दरम्यान,सिमट आती है जिंदगी,जब अपनी सोच के जालों में,उलझ सी जाती है जिंदगी।मन की सतहों पर,गुजरे पलों के स्केच से बनते हैं,धीरे -धीरे उनमें फिर,यादों के रंग भरते हैं,अलग-अलग अनोखे रंग,कुछ चटकीले, कुछ फीके रंग,कुछ नए रिश्तों से हल्के
 
Navnit Nirav
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तस्वीरें

(आज टीचर्स डे पर ये कविता मैंने पढ़ी)इक सोच मेरे मन में,यूँ ही आ जाती है ,दिल में दबी यादों पर,दस्तक दे जाती है,इक ट्रैफिक-सा चलता हैघटनाएं एक- एक करके आती हैं,भीड़ में अकेला होता हूँ मैं,वे शोर करती गुजर जाती हैं। मैं सोचता हूँ अक्सर,कि शायद आप भी सोचते
 
Navnit Nirav
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मसूरी

(मैं अपनी समर ट्रेनिंग के लिए इस बार देहरादून में था। रात में गेस्ट हॉउस की छत से मसूरी दिखाई देती थी। उसी को देख कर मैंने कुछ पन्तियाँ लिखी हैं । ये पन्तियाँ उस समय लिखीं गई हैं जब तक मैं मसूरी नहीं गया था ।)शाम ढलते ही कौन छिड़क जाता है,रंगीन सितारे
 
Navnit Nirav
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कवायद

अब तो हर नज्म तेरी खातिर लिखता हूँ,अशआरों के चंद टुकड़े भी जोड़ता हूँ,अक्सर जबां तो चुप ही रहती है,जब प्यार कलम औ पन्ने का देखता हूँ । जब भी देखता हूँ तुम्हारी खामोश नजरें,मेरी पलकों को झुकना पड़ता है , होठ सकुचाते हैं मुस्कुराने में ,मस्तक ख़ुद -ब-ख़ुद ही
 
Navnit Nirav
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बरसात में

बूंदों की पायल लेकर, मग्न हो उनकी झंकार में, बादल की डफली लेकर, बना नया फनकार मैं, विदा हो रही गर्मी के संग, सावन की बारात में, गाँव मैं बरसों बाद गया था, भींग गया बरसात में । बूंदों की ऐसी धूम मची, हर शख्श वहां दीवाना हुआ, मेघों की छतरी लेकर, मौसम भ
 
Navnit Nirav
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परदेशी

सावन में इस बार, फिर से झमका पानी, याद आ गई उस, नवयवना की कहानी, पूरे सावन बैठ झूले पर, कजरी गाती रहती , परदेशी पिया की याद में , अक्सर खोयी रहती, इस आशा में शायद, परदेशी लौट आए, फिर से उसका यह सावन हरा भरा हो जाये। - नवनीत नीरव -
 
Navnit Nirav
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मन गीला नहीं होता

मेरा मानना है कि यदि कविता बहुत लम्बी हो तो अक्सरहां उसके भाव तनु हो जाते हैं। जब बात ब्लॉग पर कविता लिखने की हो तो लम्बी कविता लिखने से आजतक मैं बचता रहा। परन्तु यह कविता जिसे मैंने आज लिखा है , न चाहते हुए भी थोड़ी लम्बी हो गई है आशा है कि आप इसे अप
 
Navnit Nirav
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भारतवासी....

एक कविता देश के निवसियों के नाम , जो मैंने २००५ में लिखी थी .....) टेढी मेढ़ी पगडण्डी पर , हवाएं दौड़ा करती हैं , पहाड़ों के सीने से लिपट कर , घटाएं बरसा करती करती हैं, रंग - बिरंगे पंछियों के, जहाँ कलरव गूंजा करते हैं , होली के रंगों सी बोली , सबके मन
 
Navnit Nirav
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माँ

तुम हो जीवन की बगिया में , ममता की अमृत धारा , सींच रही हो सदियों से , हर बगिया , घर आँगन सारा । हर सुबह - सुबह देखा तुमको , किरणों के संग जगते ही , कई काम लिए अपने हाथों में , बिना थके हुए करते ही । झाडू के संग सफाई हो , या फुलवारी की निराई , हर जरू
 
Navnit Nirav
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अपने......

मैंने अपने सीनियर्स के फेयर वेल पर कुछ पन्तियाँ लिखीं थीं जो आज मैं आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ ।) चल , चल के देख लें उनको , अभी जो अपने थे। सुबह गुलाबी धूप से , रातों में , आंखों के सपने थे। माना सफर नहीं था , मीलों का , माना शिकारा न था , झीलों का
 
Navnit Nirav
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चाहत पंछी की

बस्तियों से गुजरना हमारी चाहत नहीं , बागों से विचारना हमारी चाहत नहीं , समंदर की लहरों ' औ ' अनजानी राहों पर , सबको गीत सुनना हमारी चाहत नहीं । हमारी तो चाहत है बस एक ही , शाम ढले नीड़ों में लौटने की , जहाँ की हर खुशियाँ समेटे हुए , चुग्गा और दानों की
 
Navnit Nirav
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पुरानी प्रेमिका

अक्सर देखा है मैंने , पेड़ से पत्तों को अलग होते हुए , हर साल पतझड़ में । हर बार वो टूटते हैं , फिर नए पत्ते जुड़ते हैं , यह सिलसिला हर साल , दुहराया जाता है । पर उन पत्तों का क्या ? जो टूट कर बिखर जाते हैं , जैसे वास्ता ही नहीं रहा हो , कभी एक दूसरे
 
Navnit Nirav
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बातें यादों की

लम्हों की बात करुँ तो , ये पल में गुजर जाते हैं , कैद करुँ मुट्ठी में तो , रेत से फिसल जाते हैं । सफर की बात करुँ तो , कई हसीन चेहरे मिल जाते है , चाहे गर रोकना तो , यादें छोड़ जाते हैं । मौसमों की बात करुँ तो , कई रंग निखर आते हैं , चटकी हुई हर कली क
 
Navnit Nirav
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पानी की खोज में .....

गर्मी अपने चरम पर है। सारे ताल - तलैया सूख चुके हैं । सबसे ज्यादा परेशानी उन महिलाओं को होती है जिन्हें अपने घर से दूर किसी ताल या कुएं से पानी लाना पड़ता है । ऐसी ही एक स्त्री है जो पानी लाने के लिए गाँव से दूर किसी तालाब पर जा रही है । ) सिर पर लिए
 
Navnit Nirav
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सपने

इस हफ्ते मुझे भुबनेश्वर स्थित एक गैर सरकारी संस्था बकुल फौन्डेशन में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । यह संस्था बच्चों के लिए काम करती है तथा उनके पढ़ने की आदत बनाये रखने की खातिर बच्चों की एक लाइब्रेरी भी चलाती है । उस संस्था में एक हस्तलिखित पत्रिका र
 
Navnit Nirav
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तेरे इंतजार में

अक्सर खड़ा पाता हूँ ख़ुद को , कल्पनाओं की देहरी पर , अदृश्य रंगों की तलाश में , हर दिशा में उभरते - मिटते , अधूरे बिम्बों को निहारते , शायद कहीं मेरे प्यार सा , कोई रंग मिल जाए । धूप गुलाबी है , ख्वाब आसमानी हैं , स्वप्न रेतीले टीले हैं , सोच बहता पा
 
Navnit Nirav
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खरगोश के बच्चे (सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन का हाल.....)

मैं जनवरी और फरवरी महीनों में अपनी गाँव से सम्बंधित ट्रेनिंग के लिए झारखण्ड राज्य के पलामू जिले में रब्दि नामक गाँव में गया था । ११ सप्ताह तक वहां रुक कर मैंने, गाँव से सम्बंधित हर पहलू का अध्ययन किया । कई बार वहां के प्राथमिक विद्यालय पर भी गया । वह
 
Navnit Nirav