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09 May 2010
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एक युग का अंत

कवि समाज हो या आध्यात्मिक जगत्… आज का दिन समस्त संवेदी समाज के लिए विषाद का दिन है। जैन समाज के आचार्य महाप्रज्ञ आज भौतिक देह को त्याग गए हैं…! वे जितने बड़े संत थे उतने ही बड़े कवि भी थे। दर्शन और विज्ञान के बीच निष्पक्ष रहते हुए समाज को दिशा-निर्देश देना
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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ब्लॉग से वेबसाइट तक

प्रिय पाठकों!"काव्यांचल", जो कि अब तक आपको सिर्फ़ मेरी रचनाओं से वाक़िफ़ कराता था, अब अपना दायरा बड़ा कर रहा है और ब्लॉग की बगिया से निकल कर वेबसाइट के बाग़ तक पहुँच गया है। इस बाग़ में आपको अनेक जाने-अनजाने रचनाकारों की रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगीं।यहाँ से आप अपने
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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सहारे की तरह

दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह लोग आते-जाते हैं पानी के धारे की तरह जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह दिल के रिश्तों को फरेबी उ
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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नमक

यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक है ज़माने से अलग, माँ की मुरादों का नमक तू परिन्दा है तेरी परवाज़ ना दम तोड़ दे लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक आँसुओं की शक्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक दावतें
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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वरुण गांधी

वरुण गांधी प्रकरण को सुनने के बाद मुझे मेनका गांधी की ग़लती बहुत साल रही थी क्योंकि जब वरुण को बोलने की तमीज़ सिखानी थी तब मेनका जी कुत्ते-बिल्ली पाल रही थी अब उनके पाले हुए जंतु तो राजनीति कि गलियों में मस्ती से डोल रहे हैं औए बेचारे वरुण संस्कारों
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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गुमनामी

कुछ ज़र्द से पत्ते थे जो सज कर सँवर गए कुछ फूल जंगलों में ही खिल कर बिखर गए कुछ छाछ की छछिया लिए दुनिया पे छा गए कुछ खीर हाथ में लिए घुट-घुट के मर गए
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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माँ मैंने अक्सर देखा है

माँ मैंने अक्सर देखा है तुमको कोरें गीलीं करते चौके में ही खड़ी-खड़ी तुम चुपके-चुपके रो लेती हो जब चकले पर एक चपाती बेलन से बिलने लगती है ऑंसू की दो बूंदें टप-टप छलक-छलक कर गिर पड़ती हैं चकले वाली गोल चपाती गरम तवे पर चढ़ जाती है फिर थोड़ा सा आटा लेक
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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नव वर्ष

इक और नया अवसर आया ख़ुशियों के पुष्प खिलाने का अंतस् की सब कटुता तजकर अपनों को गले लगाने का मन में जागे उल्लास नया जीवन में हो मधुमास नया उलझे-सुलझे संबंधों में फिर से पनपे विश्वास नया मुस्कानों की कलियाँ चटकें हर दिल में निस्पृह प्रीत उठे पावनता नयन
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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मेरी राहों पे चलकर देख लेना

मेरी आँखों का मंज़र देख लेना फिर इक पल को समंदर देख लेना सफ़र की मुश्क़िलें रोकेंगी लेकिन पलटकर इक दफ़ा घर देख लेना किसी को बेवफ़ा कहने से पहले ज़रा मेरा मुक़द्दर देख लेना बहुत तेज़ी से बदलेगा ज़माना कभी दो पल ठहरकर देख लेना हमेशा को ज़ुदा होने के पल
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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उम्मीद

तुम हमेशा मुझे दोषी ठहराती हो कि मैं अपने रिश्तों में उम्मीदें बहुत रखता हूँ लेकिन समझ नहीं पाता हूँ मैं कि उम्मीद के बिना निभ ही कैसे सकता है कोई संबंध? ...उम्मीद के बिना तो दान दिया जाता है!
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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जीवंत हो उठी है माँ!

गाँव का पुराना मकान कच्चा-पक्का फ़र्श दीमक लगी जर्जर चौखट और देहरी के दोनों ओर चिकनाई के दो गोल निशान! .....मुद्दत हुई हर साल दीपावली पर दीपक जलाते थे दो हाथ। फिर अपने पल्लू की ओट में छिपाकर हवा के झोंके से बचाते हुए दीवार की आड़ में हौले से देहरी पर
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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रिक्शावाला : एक संत्रास

डरी-सहमी पत्नी और तीन बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता है रिक्शावाला। बच्चे रोज़ शाम खेलते हैं एक खेल जिसमें सीटी नहीं बजाती है रेल नहीं होती उसमें पकड़म-पकड़ाई की भागदौड़ न किसी से आगे निकलने की होड़ न ऊँच-नीच का भेद-भाव और न ही छुपम्-छुपाई का र
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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महावीर जैन नहीं थे

महावीर मुसलमान थे। क्योंकि उनके पास मुकम्मल ईमान थे। महावीर सिख थे। क्योंकि वे सि तम करने से ख़ बरदार करते थे। महावीर हिन्दू थे। क्योंकि वे हिं सा से दू र थे और सब जीवों से प्यार करते थे। महावीर पारसी थे। क्योंकि उनमें संसार के पार देखने की क्षमता थी
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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जैन धर्म

राष्ट्र के निमित्त बलिदान कैसे करते हैं भामाशाह वाली वो कहानी मत भूलना आस्था के बल पे जो कर्मों से जीत गई महासती मैना जैसी रानी मत भूलना सत्य के लिए जिन्होंने प्राण तक त्याग दिए अकलंक जैसे महादानी मत भूलना राजुल ने जहाँ धोई मेहंदी सुहाग वाली गिरनार क
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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महावीर वन्दना

त्रिशला के लाल तेरा कैसा है कमाल नहीं तन पे रुमाल फिर भी तू महाराज है जीत लिया काल काट कर्मों का जाल नोच दिए सब बाल तेरे वीरता के काज हैं तप का धमाल तेरे त्याग का धमाल तेरी सधी हुई चाल तेरा दुनिया पे राज है धरती निहाल, तो पे आसमां निहाल सारी जगती निह
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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महावीर वाणी

क्षमा को भुलाओ नहीं, मति भरमाओ नहीं घाव को कुरेदोगे तो खून बह जाएगा जो हुआ सो भूल जाओ, आज में सुधार लाओ निज को सँवारे वही वीर कहलाएगा अम्बर को छोड़ के दिगम्बर को ओढ़ ले तो धन्य तेरी जननी का क्षीर कहलाएगा समता का भाव धरे, काऊ से न राग करे तब ही 'चिराग
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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अहिंसा

बारुदों के ढेर पर दुनिया खड़ी है देखो ज़ख्मों का एक ही इलाज है अहिंसा धाँय-धाँय, धड़-धड़, धूम-धूम की ध्वनि में वीणा के सुरों-सा एक साज है अहिंसा तोप-टैंक-बम-परमाणुओं की कुंडली में साढ़ेसाती जैसी एक गाज है अहिंसा ऐरों-गैरों-नत्थूखैरों कायरों का काम नह
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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अगर-मगर से बचा

चलो किसी तरह मैं मुश्क़िले-सफ़र से बचा ख़ुदा मुझे तू अब गुमान के असर से बचा इन आइनों के सामने से ज़रा बच के निकल तू अपने आप को ख़ुद अपनी भी नज़र से बचा अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे तो अपने मुल्क को इस आग की ख़बर से बचा ये दुनिया हर किसी पे उंगलिय
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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मर गईं

चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं नेकियाँ ख़ुदगर्जियों के पास आकर मर गईं जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मात-ओ-शिक़स्त जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं मीरो-ग़ालिब
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल कुछ हसीं, कुछ शोख, कुछ रंगीन पल हर तरह की वासना से हीन पल अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल कब, किसे दे पाए हैं तस्कीन पल आपका आना, ठहरना, लौटना इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल साथ हो तुम तो मुझे लगत
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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वरुण गांधी बनाम मेनका गांधी

जेल से जब वरुण गांधी का बयान आया तो उन्होंने बताया कि पुलिस का रवैया देख कर उनका मन धीरज खो रहा है जेल में उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव हो रहा है! ये पढ़कर मेरा चेहरा टिकट प्राप्त प्रत्याशी की तरह खिल गया इस बयान के बाद मेनका जी को वरुण के समर्थन में
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
Dec 29 2009 11:53 AM
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एक युग का अंत

ये चित्र सन् 2004 में मैंने तब खिंचवाया था जब पहली बार 'आदित्य जी' के साथ यात्रा करने और रहने का अवसर मिला। उससे पहले जब भी उनसे मुलाक़ात हुई, मंच पर ही हुई और साथ रहने या बातचीत करने आ अवसर नहीं मिल सका। हास्य को गा कर पढ़ने वाले चंद रचनाकारों में स
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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आदित्य जी का अंतिम संस्कार

छंद सम्राट ओम प्रकाश आदित्य आज अपराह्न 3:00 बजे पंचतत्व में विलीन हो जाएंगे। राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर स्थित उनके निवास स्थान से उनकी अंतिम यात्रा मालवीय नगर श्मशान भूमि पहुँचेगी जहाँ उन्हें मुखाग्नि दी जाएगी।
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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ओम प्रकाश आदित्य नहीं रहे

जून 2009 की रात हिंदी कविता की वाचिक परंपरा के लिए संताप की रात थी। वरिष्ठ कवि ओम् प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी, लाड सिंह गुर्जर, ओम् व्यास और ज्ञानी बैरागी जब विदिशा का कवि-सम्मेलन कर के वापस चले तो कोई नहीं जानता था कि ये विनाश की यात्रा होगी। स्कॉरपिओ
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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एक प्यादे से मात पलटेगी

हर नई रुत के साथ पलटेगी ख़ुश्बू-ए-क़ायनात पलटेगी ये सियासत है इस सियासत में एक प्यादे से मात पलटेगी किसकी बातों का क्या यकीन करें पीठ पलटेगी बात पलटेगी रंग परछाई तक का बदलेगा सुब्ह होगी तो रात पलटेगी तुम संभल कर बस अपनी चाल चलो इक न इक दिन बिसात पलटे
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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अहसास का होना अच्छा

उनको लगता है ये चांदी औ' ये सोना अच्छा मैं समझता हूँ कि अहसास का होना अच्छा मैंने ये देख के मेले में लुटा दी दौलत मुर्दा दौलत से तो बच्चों का खिलोना अच्छा जिसके आगोश में घुट-घुट के मर गए रिश्ते ऐसी चुप्पी है बुरी; टूट के रोना अच्छा जिसके खो जाने से र
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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पाप

सिर्फ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है शायरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है दौर इक ऐसा भी था, जब झू
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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शायद

बाक़ी नहीं है दिल में कोई कराह शायद मुद्दत हुई, हुए थे हम भी तबाह शायद फिर से जहान वाले बदनाम कर रहे हैं फिर से हुई है हम पर उनकी निगाह शायद किस बात पर तू सबसे इतना ख़फ़ा-ख़फ़ा है तुझको कचोटता है तेरा गुनाह शायद फिर रेत पर लहू की बूंदें दिखाई दी हैं
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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कोई सरापा ग़ज़ल

कहाँ अचानक मिले हैं हम तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है महकती रुत उनके सुर्ख नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN
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किसी ईश को प्रणाम मत कीजिये

नानक, कबीर, महावीर, पीर गौतम को पंथ, देश जातियों का नाम मत दीजिये जिसने समाज की तमाम बेड़ियाँ मिटाईं उसे किसी बेड़ी का ग़ुलाम मत कीजिये मन के फ़क़ीर, अलमस्त महामानवों को रुढ़ियों से जोड़ बदनाम मत कीजिये मानव के प्रति प्रेम ही प्रभु की अर्चना है भले क
 
चिराग जैन CHIRAG JAIN