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एक नीड़ ख्वाबों, ख्यालों और ख्वाहिशों का

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06 Jun 2010
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आई ऑब्जेक्ट ऑनर किल्लिंग / I Oject Honour Killing

दिल दुखता है जब सुनते हैं कि मोहब्बत करने के जुर्म पर किसी लड़के को या लड़की को या फिर प्रेमी- युगल को परिवार या   फिर सामाजिक ठेकेदारों द्वारा सजा सुना दी जाती है. क्या हक बनता हैं उनका किसी क़ी जिंदगी के बारे में फैसला करने का? और खासकर तब जब
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याद बिल्कुल नहीं आते मुझे तुम

सोचते होगे केयाद आते हो मुझे तुमगलत हो तुमहमेशा की तरहमैं उनमें से नहींके यादों की गठरीसाथ बाँध  टहलू. गुज़रे को भूलवर्तमान को जीती हूईभविष्य का निर्माणआदत है मेरी.   कल एक कॉमन फ्रेंडसे मुलाकात हुईउसके साथ मिलतुम्हारी बुराई मेंपूरा दिन
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एक नीड़ ख्वाबों, ख्यालों और ख्वाहिशों का

अभी कुछ दिनों पहले मौसम की आशिकी का शिकार हुए हम। मतलब सूरज का कम्प्लीटली किडनैप हो गया। घुमड़ - घुमड़ बदल गरजे.....मस्तानी सी हवा बह चली .... बारिश जैसा माहौल बना लेकिन बूंदों को बादल ही गटक गया....दो-चार गिरी....और बावरी धरती को धोखा हो गया....धरती भीगी
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बड़ा गुरुर है गूगल को

बड़ा गुरुर है गूगल कोअपनी सोचअपनी तकनीक परनंबर वन सर्च इंजन बना फिरता हैंखोजी दस्तों कामै नज़्म लिखना छोड़ दूंगर तुमको ढूंढ के लाये वो । "प्रिया"
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सोचो ! जो हम परिंदे हो जाए

कभी - कभी यूँ हीउठ जाते हैं दिल मेंमासूम ख्यालतुम्हारे साथ।उड़ना चाहती हूँपरिंदों जैसे।सोचो !जो हम परिंदे हो जाए।किसी इलेक्ट्रिक वायर परबैठ चूँ-चूँ करें। किसी टेलेफ़ोन टॉवरपर बसेरा हो अपना।घरो के सामनेबहती नाली परदोनों मिलकर पानी पिए।फिर मैं फुर्र से उड़
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अब निर्णय तुम्हारा है

मेरी ये रचना भारत की उन स्त्रियों के लिए है जो बस बिटियाँ है, बांके की दुल्हन हैं, छुट्टन की अम्मा है। कहीं बडकी, मझली, छुटकी है उनके पास खुद का नाम नहीं, कोई पहचान ही नहीं, विरोध उसका स्वभाव ही नहीं, जो कुछ परिवार, समाज से मिला उसको भाग्य मान बैठी (मौन
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एहसास खोए जब

लिखने बैठे हैं कुछ आजबहुत दिनों बादसोचते थेरब्त-ए-ख्यालों के जहाँ सेआवाज़ देंगे एहसासों कोकोई गीत, ग़ज़ल, कविता, नज़्म या रुबाईदौड़ी चली आयगी...हमारे दामन में आ बेनक़ाब हो जाएगी।लेकिन ये क्या ?दिल-ए-गोशा में कोई जज़्बात ही नही ,एक सुनहरी तीरगी और बाआवाज़
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हौसला-ए-जिंदगी

जिंदगी का साथ जारी हैएक रहनुमा का इंतज़ार जारी हैंरास्ते लम्बे लगते हैमुसलसल तलाश जारी है।ठिठक सी गई हूँ वक़्त के तकाज़ों से,हर तजुर्बे से दोस्ती कर लीसाथ देगा मेरा ये ताउम्रये यकीन तो अब भी जारी हैं ।जिए जाना फितरत हमारी हैंकब , क्यों , कहाँ कैसे क्या
Feb 21 2010 05:41 AM
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जज़्बातों का रिसेशन

सोचा थाहाँ तबतू साथ था जबतू बाती औरमै मोमया फिर यूँमैं मोमतू बाती बनएक लौ जलाकरप्रेम कीरोशन करेंगेघरौंदा अपनालेकिन अबवक़्त बदला औरसोच भीतू तिजारत की दुनिया कीनामचीन हस्तीमैं ख्यालों की दुनिया मेंखोई हुई सीतू कतरा-कतराजल रहा हैजगमगा रहा हैतप कर कुंदन सा
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कुछ ग्लोबलाइज़ लहरें

(ये रचना मेरे लिए ख़ास है ...उलझे दिमाग की सुलझी उपज है। उलझन की स्थिति शायद मस्तिष्क की सबसे उपजाऊ अवस्था होती है। ये रचना व्यक्ति से शुरू होकर, सामाजिक ताने बाने से गुजरती हुई वैश्विक होती है तथा भविष्य की परिकल्पना पर विराम लेती है. सिर्फ इतना अनुरोध
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जिंदगी-रफ़्तार

ये तेज़ रफ़्तार जिंदगी गर ठहरी है तो और भी तेज़ रोजमर्रा का स्ट्रेस फेक्टर हो जैसे ऐसे कई अजनबी आते है करीब चलते है साथ हमख्याल हो न हो हमकदम हो जैसे सड़क किनारे बैठे तोते वाले ज्योतिषी ने बताया Short Time Relationship का योग है व्यक्ति का नहीं ग्रहों का
टैग: zindgi
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बस यूँ ही टेंस हो जाया करती हूँ

आदाब! खुशामदीद! खैरमकदम! आप सभी का ........उत्तर भारत में इस कड़ाके की सर्दी में अगर गर्मजोशी से स्वागत नहीं किया तो क्या किया । ब्लोवेर में हाथ गर्म कर, दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर और साथ में फूं -फूं कर हाथ इस लायक तो हो चुके है कि keyboard पर
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" एक तर्जुमा मेरा भी "

लखनऊ की तंग गलियों से गुज़रते हुए दो शोहदों को अदब से लड़ते देखा जब तो उनकी इस तकरार पर प्यार आ गया। उनका तर्जुमा कितना सच्चा रवाँ रवाँ सा था वरना इस जहाँ में सच तो सिर्फ़ एक लफ्ज़ है और झूठ कारोबार, एक खोखली बुनियाद के साथ। शायद ! इसी वजह से हर साल.
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रास्ता और वो

सोचा था .....खुद को दूर रखेगे ब्लॉग से....नहीं लिखेंगे कोई रचना ....ब्लॉग्गिंग से दूसरे जरूरी कार्यों पर असर होता है .....पर कविता कहाँ दूर रहती है आपसे ... वो तो हर पल साथ होती है कभी जिंदगी, कभी साया, कभी तजुर्बा तो कभी हमसफ़र बनकर .....नहीं रख पाए
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"और पत्ता हरा हो गया"

तू तसव्वुर में नहीं था लेकिन , सूखे पत्ते पे तेरा चेहरा दिखाई देता है हैरानगी और भी बढ़ जाती है ... जब वो पत्ता हरा दिखाई देता है । "
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बूँद

एक साहित्यिक वेबसाइट पर पूर्व प्रकाशित इस कविता का प्रकाशन आज हम अपने ब्लॉग पर कर रहे है । आप सभी का शुक्रिया जो हमेशा अपनी अमूल्य राय से हमारा मार्गदर्शन करते है और उत्साहवर्धन भी । हमको इस बात का दुःख भी है कि हम आप सभी के ब्लॉग पर आकर अपनी प्रतिक्
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लकीरें

लकीरों और तकदीरों में अजब मेल होता है हमारे हाथो में भी मुकम्मल खेल होता है एक पतली सी रेखा बदलती है जिंदगानी कर रुख क्या कोई सच भी इतना संगीन होता है अगर मै कहूं मैं लकीरों को बोलते देखा तकदीरों को तौलते देखा लोगों को हास- परिहास का मुद्दा मिल जायेग
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आओ जला ले एक लौ मोहब्बत की,

आओ जला ले एक लौ मोहब्बत की, बिना मलतब का प्यारा रिश्ता बना ले कोई , नफरत, शिकवे, कड़वाहटे जल जाये शायद, हादसे इस दिवाली टल जाये शायद " See you Soon, with warm regards, Priya
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मुक्तक

१. इस दिल ने जो भी चाहा वो कभी ये कह नहीं पाया, परिणामो से इतना कि ये जोखिम ले नहीं पाया, कमी खलती है जीवन में उन हसरतों की मुझको जो बीजो में तो है लेकिन अंकुरित हो नहीं पाया॥ २. बसंती रूप-रंग धर कर फिजा मेरे घर आई थी, मेरी चौखट पे आकर के जोर से आवाज़
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बस थोडा सा आर्शीवाद चाहिए

(स्टुडेंट लाइफ - कहते है कि जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफ़र होता है .... अब वो तो रहा नहीं सिर्फ यादें है ....एक पुरानी कविता प्रस्तुत कर रही हूँ शिक्षक दिवस के अवसर पर .....मेरी दो टीचर्स जो उस समय मेरी आदर्श हुआ करती थी ...खासा लगाव था उनसे ... सरोज दुबे
Sep 07 2009 10:27 PM
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उसको देखा तो

(आप सबको नमस्कार, प्यार, सलाम ! साथ ही शुक्रिया... जो आपने हमें प्रोत्साहित किया और ढेर सारा प्यार दिया...उम्मीद है कि आप हमेशा ही अपने बहुमूल्य विचारो से मुझे अवगत कराते रहेंगे और साथ ही अपना स्नेह यूहीं बनाए रखेंगे। )वो जीना चढ़ रहा थासर पर ईंटो की छाव
Aug 28 2009 12:35 AM
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"जिन्दगी के सुख चुराए जब "

(जीवन से कुछ पल निकाल फिर हाज़िर हुई हूँ आज। एक नई सोच के साथ.... सुना है कि ईश्वर के पास एक बहीखाता होता है ,जिसमें हमारे भूत, भविष्य और वर्तमान का लेखा- जोखा होता है, कब, क्या कहाँ, कैसे होगा ये सब पूर्व निर्धारित है..... सोचिये वो बहीखाता हाथ लग जाये
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"दिलनशी कुमुदनिया"

आज काफी दिनों बाद आना हुआ ब्लॉग पर । आगे भी लंबे अन्तराल के बाद मुलाकात होगी । कुछ व्यस्तता अधिक रहेगी । बरसात का मौसम है । प्रकृति से हमारा विशेष लगाव किसी से छुपा नही है । प्रकृति के प्रति मेरा गहन स्नेह मेरी पूर्व रचनाओ में भी देख चुके हैं आप! ये
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"आदमी का प्राइवेटाईजेसन"

जीवन की आपा-धापी में दौड़ता आदमी , लक्ष्य पर लक्ष्य साधता आदमी , सफलता पे सफलता चढ़ता आदमी , पर्वतों से ऊँचे ख्वाब बनाता आदमी , आसमाँ में सुराग करने को बेचैन आदमी , पर ईमान से महरूम आदमी , दुनिया की भीड़ को चीर कर आगे बढ़ता आदमी , एक आदमी तो शिकस्त द
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"पहली बारिश"

आज पहली बारिश ने मदहोश कर दिया, तपती रूह को तर कर सराबोर कर दिया , एक झोंका हौले से छूकर चूनर लहरा गया , फिज़ा ने कान से टकरा कर एक मद्धम गीत गा दिया , एक लट रुखसारों को छूती हुई ... कान की बाली से उलझ गई । मौका देख एक बूँद गाल को चूम गई, बूँद की बेहय
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"मन की गिरह"

जी चाहता है मन की गिरह खोल दें , जो कुछ अंदर छुपा हैं सब बोल दें , ज़माने के फेर में हम पड़ गए थे , उलझी से दुनिया में उलझ से गए थे। कोशिश की हवा के साथ बहने की , झूठी , मक्कार , बेईमान बनने की , इस दिशा में सारी जुगत लगाई , जो नहीं सीखी थी वो भी तरती
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आसमां के आगे एक जहाँ हो तो

कल्पना ... इंसान के जीवन का अविभाज्य अंग .... कोई माने या न माने ... कल्पना करते तो सभी हैं जिसकी उड़ान की कोई सीमा ही नहीं होती। भले ही ये ज़मीनी हकीकत से दूर हो और कुछ लोगो की जिन्दगी में पानी के बुलबुलों से ज्यादा कोई मायने न हो इनके ... पर कुछ के
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" वो लड़की "

आज जो कविता पोस्ट करी हैं, उसके सन्दर्भ में सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि यदि आप ब्लॉग पर आये हैं तो कृपया इसे पूरा पढ़े तत्पश्चात ही अपनी टिपण्णी व्यक्त करें। ) एक लड़की को देखा मैंने चौराहे पर , देखती गई - देखती गई , न जाने क्यों देखती गई ... वह मेरी अप
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क्षितिज का रहस्य

बहुत बार देखा हैं, आकाश का धरती पर झुकना ...सूरज का सागर में डूबना ... दूर खेतों में सूरज का फसलों में समाना .......कई बार दौड़ी हूँ ...दूर तक ...क्षितिज को पकड़ने के लिए........ फिर पता चला कि पृथ्वी और आकाश को जुदा करने वाली ये एक रेखा हैं ...... भ्
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कुछ बातें पेंचीदा सी

कल शेल्फ से किताबें निकालते वक़्त , चीटियों की लम्बी कतार देखी ............. चली जा रहीं थी ....... चौकन्नी , तेज़ रफ़्तार ... गंतव्य की ओर .... उनमें से कुछ ... लुढकी , गिर पड़ी ........ गिरने वाली को , किसी ने न देखा .. न सहारा दिया ... जो गिरी थी ..
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बादलों की नादाँ जिद

आकाश में बादलों ने तारों को ढक लिया, लोगो ने कहा, मौसम सुहावना हो गया, पर किसी ने न सोचा तारों कि घुटन को, तारे बेताब, वसुंधरा कि एक झलक के लिए, पहुचे शिकायत लिए सूरज के पास, सूरज ने समझाया, हे बादल! सिमेट ले खुद को, बादल बोला, इनका रूप, इनकी चमक मेर
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जिंदगी मैंने तुझे कुछ यू थाम रखा हैं

जिंदगी मैंने तुझे कुछ यू थाम रखा हैं , जैसे आँखों में काजल पाल रखा हैं। तूने जीने के नए मायने दिए , मैंने उन मायनो में खुद को बाँध रखा हैं। जरा हौले से बदलना वक़्त का रुख , मेरे हमसफ़र तेरा ख्याल अच्छा हैं। मौसम बदलते रहे तमाम उम्र , किसी ने न पुछा मि
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एक नीड़ ख्वाबों, ख्यालों और ख्वाहिशों का

बगीचे में एक अजीब इत्तफाक हुआ, फूलों के मध्य अदभुद संवाद हुआ, प्रकृति की विडम्बना देखिये..... उस अनोखी कथा कि मैं साक्षी बनी हूँ, भाग्यशाली हूँ शायद, जो बयां करने लायक बनी हूँ.............. एक फूल ने दूसरे फूल से कहा, जब तितलियाँ इठलाती हुई, पंख फड़फ
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बच्चन की मधुशाला

कविता अमूर्त से मूर्त का चेतन स्वरुप हैं। ये एक विचारक की संवेदना की उस पराकाष्ठा को चित्रित करती हैं जिस विचारूपी महासागर में वो गोता लगाकर, उन भावो को जी कर, कभी कविता, कभी कहानी, कभी ग़ज़ल, तो कभी किसी और रूप में बाहर निकल, लोगो के बीच पहुँच, उनका
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एक ख्वाब अधुरा सा

आसमां ने मुझको किया एक तोहफा, सपनो की थैली संग, एक जवाबी लिफाफा, गीतों की सरगम पे आंखों को मूंदा, सपनो की थैली को ख्वाबो में खोला देखा की आसमां ने मुझको, आसमानी बनाया, आसमानी वसन से बदन को सजाया, ओंस की बिदियाँ, गुलाब की लाली, घटाओ के केश और इन्द्रधन
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कवि, कविता और साहित्य

किसी ने मधुशाला का गान किया, किसी ने सोमरस का पान किया, मैं अलबेली क्या करती खाली, मैंने साहित्य की ओर रुझान किया। जिन्दगी ने करवट ली ऐसी, कि मैंने कवियों का सम्मान किया, ये दुनिया बहुत निराली हैं, कवियों कि हर अदा मतवाली हैं। यहाँ तो सुख का सागर हैं
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प्रीत की रीत

आँखों में चमक , बात - बात में दमक, यू हीं लचक - लचक, गोरी चाल चलने लगे। आईने के संग, देख अपने ही रंग, केशो की भंवर, गोरी आप गढ़ने लगे। करके श्रृंगार, होके सखियों के साथ, गोरी बात - बेबात, यू ही आहें भरने लगे। सखी के सवाल, उसे करे परेशान, गोरी आँख नीच
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एक परिंदे की कहानी

मेरे घर के आगन में, परिंदे रोज आते हैं, ची-ची करते, फुदकते, दाने चुगते , कटोरे का पानी पीते, और फिर उड़ जाते, वो कलरव, वो अठखेलिया, वो मनोरम द्रश्य, दिल को भाते ....... और मेरे तनाव उनकी परवाज़ में उड़ जाते , एक दिन, एक चिया ज्यादा हिम्मत दिखा गई, आँगन
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एक मुलाकात डॉ. कुमार विश्वास के साथ

कहते हैं कवि बनने की पहली शर्त इंसान होना हैं। कविता कवि के उन क्षणों के उपलब्धि होती हैं, जब वो अपने आप में नही होता। इसीलिए कवि के चेतनास्तर तक उठे बिना समझी भी नही जा सकती। आज जिनके बारे में बात करने जा रही हूँ, उन्होंने देश में ही नही वरन विदेश म
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