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कलम का सिपाही

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15 Jun 2010
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आखिर जनांदोलन ने तोड़ ही दी सत्ता की कुंभकर्णी निद्रा

भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए बढ़ी तत्परता-राजेश त्रिपाठीभोपाल गैस पीड़ितों को अब राहत की सांस लेनी चाहिए क्योंकि उनकी करुण पुकार सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गयी है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आनन- फानन फरमान जारी कर दिया है कि भोपाल गैस
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भोपाल हम शर्मिंदा हैं

यह देश तुम्हें न्याय नहीं दिला सका-राजेश त्रिपाठीभोपाल गैस त्रासदी पर न्यायालय के निर्णय पर कोई टिप्पणी करने का हमें अधिकार नहीं। हम गणतंत्र देश के वासी हैं, जहां हर तरह की आजादी है लेकिन सत्ता और न्याय के सर्वोच्च पद इतने ऊंचे हैं कि वहां आम भारतीय के
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बदलते सामाजिक संबंधों की त्रासदी

किस कदर आप्रासंगिक हो रही है बुजुर्ग पीढ़ी -राजेश त्रिपाठी परिवार यह चार अक्षरों का महज एक शब्द नहीं अपितु एक सुखद एहसास है। एहसास प्रेम का, विश्वास का और आश्रय का। परिवार समाज व्यवस्था का एक अभिन्न और अनिवार्य अंग। जिसे परिवार का सुख प्राप्त
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पत्रकारिता के नाम पर कलंक

(संदर्भ ‘अंबेडकर टुडे’ पत्रिका में ईश निंदा)-राजेश त्रिपाठीकुछ मंद बुद्धि (इसे दुष्ट बुद्धि या कुंठाग्रस्त कहना ज्यादा उचित होगा) लोग आगे बढते समाज को जबरन मध्ययुगीन बर्बरता और आदिम सोच की ओर खींच ले जाना चाहते हैं। यह काम कोई अनपढ़ जाहिल आदमी करता तो
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ये आग यों बुझेगी

संदर्भ नक्सल समस्या-राजेश त्रिपाठीछत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड, ओडिशा से लेकर आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल से लेकर बिहार और देश के अन्य राज्यों तक नक्सली हिंसा की आग फैल चुकी है। आयेदिन सुरक्षाकर्मी और निर्दोष लोग इसमें स्वाहा हो रहे हैं। नरसंहार का यह सिलसिला
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‘सम्मान के लिए हत्या’ या सम्मान की हत्या?

पंचयतों के प्रपंच से प्रताडित होता प्रेम-राजेश त्रिपाठीइनसान की प्रगति के कदमों ने चांद की सतह तक को छू लिया है। अब उसकी परवाज दूसरे अजाने ग्रहों के रहस्य भेदने की ओर है लेकिन उनका अपना खूबसूरत ग्रह धरती कुरीतियों, कुसंस्कारों और रूढ़ियों से दिन ब दिन
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वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनों में आती है

गजल-राजेश त्रिपाठीहवाएं गुनगुनाती हैं, वह जब जब मुसकराती है।घटाएं मुंह चुराती हैं, वो जब जुल्फें सजाती है।।फिजाएं झूम जाती हैं, वो जब जब गीत गाती है।वो इक भोली-सी लड़की जो मेरे सपनों में आती है।।किसी मंदिर की मूरत है, किसी की कल्पना है वो।किसी सुंदर से
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कहां गये वे गांव

राजेश त्रिपाठीगांव यानी भारत की आत्मा। न जाने कितनी खट्टी-मीठी यादों से जोड़ देता है हमें यह शब्द। यादें खिले कमलों औल पुरइन पात से भरे तालाब की। यादें आम के बोझ से झुकी अमराइयों और कोयल की मीठी कूक की। कजरी का त्योहार, जंगल में आग की लपटों का एहसास देते
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क्या वाकई विश्वास के काबिल नहीं पत्रकार!

रीडर डाइजेस्ट का सर्वे तो यही कह रहा है-राजेश त्रिपाठीइंडिया टुडे ग्रुप की पत्रिका ‘रीडर डाइजेस्ट’ की ओर से कराया यह गया सर्वे चौंकानेवाला है। यह सर्वे चीख-ची कर कह रहा है कि –ऐ पत्रकारो! अपनी औकात पहचानो, जानों की समाज की नजरों में तुम कहां खड़े हो।
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वो ललकार रहे हैं, हम घिघिया रहे हैं

-राजेश त्रिपाठीइसे हमारी केंद्र सरकार का दिमागी दिवालियापन और नासमझी नहीं तो और क्या कहा जाये कि वह उस पाकिस्तान से वार्ता शुरू करने के लिए घिघिया रही है, जो लगातार हुंकार भरता और भारत को ललकारता नजर रहा है। मुंबई के 26 /11 के हमलों के बाद से भारत लगातार
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छिन रहा है बच्चों का बचपन

इंटरनेट, वीडियो गेम में सिमट गयी है उनकी दुनिया-राजेश त्रिपाठी एक जमाना था जब बच्चे दादी-नानी की गोद में परी कथाओं की रंगीन दुनिया में खो जाते और नींद में ही रच लेते थे सपनों का एक सुनहरा संसार। बूढ़ी दादी-नानी उन्हें कभी परी की तो कभी राक्षस के चंगुल में
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एक पैगाम !

राजेश त्रिपाठी एक पैगाम नर्म बिस्तरों पर रातें गुजारनेवालों को नाम। वे जो मुफलिसों की तबाही पर घड़ियाली आंसू बहाते हैं वे जो आश्वासन देकर रह जाते हैं एक दिन ऐसा भी आयेगा जिस दिन उनकी अस्तिमता को पक्षाघात लग जायेगा छीज जायेंगी उनकी ताकतें होंगे निरस्त
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सार्थक पत्रकारिता के सारथी, प्रज्ञापुरुष हैं प्रभाष जी

राजेश त्रिपाठी जीवन के 72 वसंत पार कर चुके मनीषी, गांधीवादी विचारक और सार्थक पत्रकारिता के सारथी प्रभाष जोशी अनुपम और अतुलनीय हैं। जब सत्ता लोकतंत्र के चौथे पाये पत्रकारिता के कंठ रोध के प्रयास में लगी थी, उस वक्त उन्होंने एक्सप्रेस समूह के जनसत्ता ह
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आपने भी ईश्वर को देखा है!

अपने जीवन में इस यक्ष प्रश्न का सामना हर व्यक्ति को करना पड़ा है कि क्या वाकई ईश्वर हैं ? ब्रह्मज्ञानियों ने परम तत्व या परमात्मा अर्थात ईश्वर का विवेचन विविध भांति से किया है। कुछ के लिए वह अजन्मा, निराकार स्वरूप है तो कुछ के लिए साकार और मानव की भा
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आतंक के वे लमहे जब सारा देश दहल गया

राजेश त्रिपाठी आज से ठीक एक साल पहले समुद्र के रास्ते आये आतंकियों ने वह आफत बरपायी कि न सिर्फ मुंबई बल्कि सारा देश दहल गया। कई दिनों तक सारा देश जैसे सांसे थामे मौत का तांडव देख रहा था। पड़ोसी देश पाकिस्तान में प्रशिक्षणप्राप्त इन आंतकियों ने क्षत्र
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तुम गर जरा मुझे प्यार दो

गीत -राजेश त्रिपाठी मेरे गीतों को दे दो मधुर रागिनी, मेरे सपनों को होने साकार दो। सारी दुनिया की खुशियां मिल जायेंगी, तुम गर जरा मुझे प्यार दो।। कामनाएं तड़पती, सिसकती रहीं। जिंदगी इस कदर दांव चलती रही।। हम वफाओं का दामन थामे रहे। हर कदम जिंदगी हमको
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शर्म इनको मगर नहीं आती

बंद करो `बिग बॉस ' का नंगा नाच -राजेश त्रिपाठी आजकल टेलीविजन चैनलों में टीआरपी के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है। इसके चलते नया कुछ दिखाने और दूसरों से आगे बढ़ने के नाम पर चैनल किस तरह से मर्यादा और शालीनता की सीमा लांघ रहे हैं इसका ताजा उदाहरण है
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लिखूं गजल इक तेरे नाम

राजेश त्रिपाठी लिखूं गजल इक तेरे नाम -राजेश त्रिपाठी तेरी हंसी को सुबह लिखूं, और उदासी लिखूं शाम । आज बहुत मन करता है, लिखूं गजल इक तेरे नाम।। जुल्फें ज्यों सावन की घटा, चेहरे में पूनम सी छटा । नीलकंवल से तेरे नयन, मिसरी जैसे मीठे बचन।। गालिब की तुम्
 
Rajesh Tripathi राजेश त्रिपाठी
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सावधान! कहीं आप भी न बन जायें इंटरनेट से ठगी के शिकार

राजेश त्रिपाठी आपको अगर इंटरनेट से प्यार है तो यह अच्छी बात है। ज्ञान के इस सागर में आप जितना अवगाहन कर सकें. इससे ज्ञान के जितने मोती चुन सकें वह और भी उत्तम है। अगर आप इसकी गंदगी से बच कर इसके उपयोगी अंश को देखते-पढ़ते हैं तो आप अपने ज्ञान की वृद्ध
 
Rajesh Tripathi राजेश त्रिपाठी
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अश्कों के फूल चुन के संवारी है जिंदगी

राजेश त्रिपाठी पूछो न किस तरह से गुजारी है जिंदगी। अश्कों के फूल चुन के संवारी है जिंदगी।। आंखें खुलीं तो सामने अंधियारा था घना। असमानता अभाव का माहौल था तना।। मतलब भरे जहान में असहाय हो गये। दुख दर्द मुश्किलों का पर्याय हो गये।। दुनिया के दांव पेच स
 
Rajesh Tripathi राजेश त्रिपाठी
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मेरे देश को आज क्या हो रहा है

-राजेश त्रिपाठीमेरे देश को आज क्या हो रहा है।हंसते हंसते यहां आदमी रो रहा है।। न अमराइयों में पड़ें आज झूले। पनघट भी गांवों के अब गीत भूले।। न कजरी की तानें न बिरहा की बोली। चले बात ही बात में आज गोली ।।बारूदी गंधों में डूबी दिशाएं।गांधी का सपना दफन हो
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मां

-राजेश त्रिपाठीममता की छांव सीबेघर के ठांव सीजाड़े में धूप सीयानी अनूप सीमांगंगा की धार सीबाढ़ में कगार सीठंड़ी बयार सीनफरत में प्यास सीमांधूप में साया सीमोहमयी माया सीगहराई में सागर सीप्यार भरी गागर सीमांदुर्दिन अपार में निर्दयी संसार मेंकष्टों की मार
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हिंदी को सालाना सरकारी श्राद्ध की नहीं, श्रद्धा की जरूरत

राजेश त्रिपाठीभाषा न सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन अपितु किसी देश, किसी वर्ग का गौरव होती है। यही वह माध्यम है जिससे किसी से संपर्क साधा जा सकता है या किसी तक अपने विचारों को पहुंचाया जा सकता है। भारतवर्ष की प्रमुख भाषा हिंदी तो जैसे इस देश की पहचान ही बन गयी
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सच का सामना या निजता में सेंध!

-राजेश त्रिपाठीइन दिनों टीवी चैनलों में टीआरपी बढ़ाने के लिए जिस तरह से आपाधापी हो रही है, वह पहले कभी नहीं थी। इसके चलते ये टीवी चैनल इस तरह के फूहड़ और अश्लील कार्यक्रम परोस रहे हैं जिनका न कोई सिर होता है न पैर। बस अगर होता है तो दर्शकों को उत्तेजित
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गांव मर रहे हैं, इन्हें बचाइए!

-राजेश त्रिपाठी गांव इन दो शब्दों में ऐसी मिठास और आत्मीयता भरी है कि इन दो अक्षरों में जैसे खुशियों का संसार समाया है। आप जितने भी बड़े हो गये हों, देश में हों या विदेश में, छोटे कस्बे में हों या किसी महानगर में, अगर आपका जन्म गांव का है तो आपकी स्मृति
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रंजो गम मुफलिसी की गज़ल जिंदगी

- राजेश त्रिपाठीरंजो गम मुफलिसी की गज़ल जिंदगी।कैसे कह दें खुदा का फज़ल जिंदगी।। भूख की आग में तपता बचपन जहां है। नशे में गयी डूब जिसकी जवानी ।। फुटपाथ पर लोग करते बसर हैं। राज रावण का सीता की आंखों में पानी।।किस कदर हो भला फिर बसर जिंदगी।कैसे कह
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लो भाई, मैने चुका दिया एसपी का कर्जा

राजेश त्रिपाठी इस युग में हिंदी पत्रकारिता को एक सार्थक आयाम देने और उसे तथ्यपरक, सशक्त और बोधगम्य बनाने में सुरेंद्र प्रताप सिंह का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे हिंदी के प्रबल हिमायती थे और कभी भी उनको यह पसंद नहीं था कि उनकी सक्षम भाषा को अ
 
Rajesh Tripathi राजेश त्रिपाठी
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शरद यादव जी आपको हुआ क्या है?

बालिका वधू' जैसे अच्छे धारावाहिक को क्यों बंद कराना चाहते हैं आप! -राजेश त्रिपाठी अक्सर देखा यह गया है कि कुछ लोगों की प्रकृति या कहें प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अच्छाई में भी खोट नजर आने लगती है। किसी सही बात की तारीफ की उम्मीद तो इनसे करना बेक
 
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कृपया भाषा से खिलवाड़ तो मत कीजिए!

राजेश त्रिपाठी इन दिनों कुछ तो हिंदी में बुरी तरह से घुसपैठ कर रही अंग्रेजियत और कुछ भाषा के अज्ञान के चलते बड़ा अनर्थ हो रहा है। हमारी वह भाषा जो एक तरह से हमारी मां है, हमारी अभिव्यक्ति का जरिया है और जिसकी बांह थाम हम अपनी जीविका चलाते हैं आज उसका
 
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आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर आफत क्यों?

आज आस्ट्रेलिया में भारतीयों और भारतीय छात्रों पर जो जुल्म हो रहा है वह किसी भी सभ्य समाज के लिए लज्जा और धिक्कार की बात है। जो शिक्षा प्राप्त करने गये हैं उन्हें आज नस्ली हिंसा का शिकार होना पड़ा रहा है। कुछ छात्रों को तो इस अंधी हिंसा में अपनी जान भ
 
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धाकड़ पत्रकार, हंसमुख इनसान और मस्तमौला थे उदयन जी

एक दिन की बात है (सन और तारीख अब याद नहीं) कलकत्ता स्थित आनंद बाजार पत्रिका के भवन में हम आनंद बाजार प्रकाशन समूह के चर्चित हिंदी साप्ताहिक `रविवार' के कार्यालय में कार्य कर रहे थे कि तभी हमारे संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह (एसपी के नाम से परिचितों में
 
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प्रकृति के सामने हम कितने बौने हैं

इसका अहसास पश्चिम बंगाल को मई को स्पर्श कर गये आइला तूफान ने करा दिया। इसने राज्य में तकरीबन 86 लोगों की बलि लेने और हजारों घरों और पेड़ो को तहसृनहस करे के बाद यह बंगलादेश की ओर बढ़ा और वहां हवा के निम्न दबाव के रूप में बदल कर इसने अपना विकराल रूप दि
 
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ये तो होना ही था

लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं किस तरह से बढ़ गयी हैं इसका नजारा दिल्ली में मनमोहन सिंह सरकार के शपथ ग्रहण के पूर्व देखने को मिला। कांग्रेस ने उन दलों को तो मायूसी के दलदल में फेंक दिया जो चुनाव पूर्व उसके गठबंधन से छिटक गये थे जिसमें लालू, पासवान
 
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जय हो! जनता जनार्दन की

हां, यह जनता जनार्दन ही तो है जिसने बड़े-बड़े सूरमाओं को धराशायी कर दिया। उनके सपनों को मिट्टी में मिला दिया। जो कल तक इस बात पर ऐंठे फिरते थे कि उनका तीसरा, चौथा या न जाने कौन-सा मोर्चा गद्दी संभालने वाला है, अब गद्दी संभालने वाले उनसे कन्नी काट रहे
 
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अब देश पर `राज' के लिए जोड़तोड़ की बारी

भारतीय लोकतंत्र का महापर्व अब खत्म हो चला । यह आलेख लिखते वक्त इसका आखिरी और पांचवां चरण हालांकि बाकी है लेकिन इसे अब पूर्ण मान लेते हैं। धूप में तपते, गली-कूचों, गांव-मुहल्लों की धूल फांकते नेताओं को परिणाम और उसके बाद की परिस्थितियों का इंतजार है।
 
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शाबाश राहुल भैया ! सच कहने की हिम्मत तो की

आपके इस कथन कि शासक दल चाहे् वह भाजपा हो या कांग्रेस उसका दबाव सीबीआई पर रहता है से भले ही राजनीतिक हलकों में तूफान गया हो लेकिन इसने आपकी एक ईमानदार युवा नेता के रूप में छवि को और उजागर किया है। इससे आपने साबित कर दिया है कि आपका एक ही चेहरा है -ईमा
 
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आदर्शहीनता का पर्याय बन गयी है राजनीति

आजकल की राजनीति इतनी टुच्ची हो गयी है कि यह देख कर रोना आता है कि जिनका अपना कोई आदर्श नहीं, जिनके कोई मूल्य नहीं वे आज बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं और आदर्श बघार रहे हैं। आज राजनीति सुविधावादियों का गिरोह बन गया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो तकरीबन ह
 
Rajesh Tripathi राजेश त्रिपाठी
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खतरनाक संकेत हैं नेताओं पर बरसते जूते-चप्पल

पी. चिदंबरम पर एक पत्रकार सम्मेलन में फेंके गये जूते ने साफ तौर पर यह संकेत दे दिया है कि जनाक्रोश अब दबा नहीं रहनेवाला। यह कभी भी किसी भी रूप में फट सकता है। और उसका निशाना कोई भी दल हो सकता है। वैसे पत्रकार सम्मेलन में चिदंबरम की ओर चला जूता हो या
 
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लालू जी! आप एतना गुस्साये काहे हैं?

काहे बहकने लगी आपकी जबान? स्वनामधन्य लालू प्रसाद यादव जी इन दिनों बेहद खफा हैं।बहुतै गुस्साये और फनफनाये हुए हैं। गुस्सा उनके सिर चढ़ कर बोलने लगा है और उन पर इस कदर हावी हो गया है कि वे अपना बुद्धि विवेक भी खो बैठे हैं। न जाने क्या-क्या बके जा रहे ह
 
Rajesh Tripathi राजेश त्रिपाठी