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एक आलसी का चिठ्ठा

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17 Jun 2010
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इंडीब्लॉगर पर प्रतियोगिता में भाग लें और मुझे वोट दें

इंडी ब्लॉगर http://www.indiblogger.in/ पर आज कलJiyo Life Moments Blogger Contestचल रहा है। सभी भाषाओं के लिए खुला है। आप अपने ब्लॉग की पोस्टों को वहाँ प्रतियोगिता के लिए रजिस्टर कर सकते हैं। लेख/कविता विषय से जुड़ा होना चाहिए। अबकी यह प्रतियोगिता
 
गिरिजेश राव
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नरक के रस्ते

…तकिया गीली है।आँखें सीली हैं?आँसू हैं या पसीना ?अजीब मौसमआँसू और पसीने में फर्क ही नहीं !...... कमरे में आग लग गई है।आग! खिड़कियों के किनारेचौखट के सहारे दीवारों पर पसरीछत पर दहकती सब तरफ आग ! बिस्तर से उठती लपटेंकमाल है एकदम ठंडी लेकिन शरीर
 
गिरिजेश राव
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वास्तविक अंतरराष्ट्रीय खेल का महाकुम्भ

11 जून से सॉकर या फुटबाल का महाकुम्भ दक्षिण अफ्रीका में प्रारम्भ हो रहा है। मुझे क्रिकेट एकदम पसन्द नहीं है जब कि इस खेल के लिए एक तरह की जुनूनियत रखता हूँ। मुझे हर चौथे साल की बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। ... आ रहे हैं वे दिन ... जाने क्यों मुझे लगता
 
गिरिजेश राव
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वह वनस्पति ढूँढ़ कर लाओ वत्स ...

"... मुझे गुरुदक्षिणा का आदेश दें। करबद्ध प्रार्थना है कि दीक्षांत समारोह में स्नातक दीक्षा के लिए मेरा नाम प्रस्तावित करें।" नालन्दा विश्वविद्यालय की एक कोठरी में शिष्य गुरु के चरणों में झुका निवेदन कर रहा था। गुरु के प्रशांत मुखमंडल पर स्मित
 
गिरिजेश राव
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अर्थकाम

कम टिप्पणियों का रोना रोने वाले, बात बेबात हो हल्ला मचाने वाले और हिन्दी ब्लॉगरी में गुणवत्ता की कमी की शिकायत करने वाले जरा इस साइट पर हो आएँ। अर्थकाम चुपचाप अपने काम में पूरे मनोयोग से लगे रहना यहाँ से सीखा जा सकता है। 
 
गिरिजेश राव
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पार्ट टाइम वेश्यावृत्ति

श्रीमती जी आजकल एक मुद्दे को लेकर परेशान सी हैं। इस इलाके में कॉलोनी अभी डेवलप हो रही है। मज़दूर हैं और उनके रहने की कोई व्यवस्था न होने से खाली पड़े प्लॉटों पर झोपड़ियाँ खड़ी कर वे लोग रहते हैं। परिणामत: कॉलोनी निवासियों के समांतर एक अलग संसार भी
 
गिरिजेश राव
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टुकड़ा टुकड़ा दुपहर

दुपहर फैल गई है - शुभ्र चादर। मौन। दुपहर लोगों और जीवन धारण किए सब की गतिविधियों के होते हुए भी कितनी शांत लगती है! क्रियाकलाप की शांति, एक निश्चित कार्यक्रम में सब डूबते जाते हैं। ध्यान सी अवस्था कि सम्मोहन सी? - बन्दरों की चिक चिक, दूर कहीं से आती गीत
 
गिरिजेश राव
Jun 01 2010 10:10 PM
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नमस्तस्यै

चित्राभार : इंडियन एक्सप्रेस
 
गिरिजेश राव
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अथ ब्लॉगर जनगणना

आज हमारे गाँव में जनगणना का प्रथम चक्र प्रारम्भ हुआ। नए प्रावधान के अनुसार हम 4 प्राणियों को फॉर्म 2 में प्रवेश दे सदा सदा के लिए हमारी जड़ काट दी गई। मुझे आज दुहरा दु:ख है - जड़ से कट जाने का कम और गाँव जवार में राजपूतों की संख्या में 4 की कमी का अधिक ।
 
गिरिजेश राव
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इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 2

पहले भाग से जारी [अपनी बात: पिछली कड़ी में अमरेन्द्र जी   ने अपनी टिप्पणी और बाद के व्यक्तिगत संवाद के दौरान अनुवाद में सरलता की आवश्यकता बताई। अंग्रेजी और हिन्दी के व्याकरण और अभिव्यक्ति विधि परम्पराओं में बहुत असमानताएँ हैं जिनके कारण
 
गिरिजेश राव
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पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब - टिकिर टिक्क टिक्क टिक्क

गरमी की दुपहर की अपनी सुन्दरता होती है। आज मुझे एक गुजरा दौर याद आ गया। गाँव में तब संयुक्त परिवार थे और लोग डट कर खेती करते कराते थे। सिंचाई के लिए धनिक पट्टिदारों ने पक्की नालियों का जाल बनवाया था जो जमीन से उपर थीं। जहाँ रास्ते क्रॉस होते थे वहाँ
 
गिरिजेश राव
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आलसी पोस्ट - 2

आलसी पोस्ट - 2 - - - - - - - -- -- - - -- - - - -क्या ऐसा कुछ लिखा जा सकता है जिस पर एक भी टिप्पणी न आए ?
 
गिरिजेश राव
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सबरन मंजूर मिसरा नामंजूर

मेरे ससुर जी करीब करीब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बेटे बेटियाँ सब अपनी अपनी जगह जीवनयापन में लगे हैं। घर में कुल जमा दो परानी। बड़े शौक से शहरी मॉडल पर आधुनिक घर बनवाए - बेटे , बहुएँ, बेटियाँ  आएँ तो कोई कष्ट न हो। पॉवर बैक अप की चौचक व्यवस्था - दो
 
गिरिजेश राव
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राग यमन को सुनते हुए

यह बंदिश राग यमन को सुनते हुए रची गई:जागो जागो देश महादेवकैसा ये ध्यान बन्द आँखजपते जो उद्दाम कामकामारि तुम भूले उदात्त भावखोलो त्रिनेत्र नंग भस्म, अनंगजागो जागो देश महादेव।जटाजूट सँभारो अधोमुख गंगापतित न हो पावनी ज्ञानगंगासँभारो हे देश तुम शंकरशमन करो
 
गिरिजेश राव
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भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 7

पहला भाग   दूसरा भाग   तीसरा भाग   चौथा भाग    पाँचवा भाग  छठा भाग स्मृतियों से भरा मन। एक के बाद एक कालखण्ड आ रहे हैं जा रहे हैं - नहीं एक दूसरे से मिल से गए हैं - स्याह
 
गिरिजेश राव
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बच्चों को बचाइए

मुझे नहीं पता कि नारीवादी क्या कहेंगे? वैचारिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के झण्डाबरदारों को कैसा लगेगा? बस हक़ीकत बयाँ कर रहा हूँ: घटना 1: समय : रात 11 बजे स्थान : पार्क सिर पर जेबकतरों की स्टाइल में रुमाल बाँधे पुरुष, टिपिकल टपोरी । जींस टी शर्ट
 
गिरिजेश राव
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इतिहास का मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांत - 1

- हम जिन अपराधों की पोल खोलेंगे उनका फैसला कम्युनिस्ट सत्ताओं के मानकों से नहीं बल्कि मानवता के अलिखित प्राकृतिक नियमों से होना चाहिए।स्टीफेन कोर्टवोइस [द ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म, क्राइम्स, टेरर, रिप्रेशन , निकोलस, जीन-जुइस पन्ने, अन्द्र्ज़ेज
 
गिरिजेश राव
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May 09 2010 05:50 PM
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....रोवें देवकी रनिया जेहल खनवा

पुनर्प्रस्तुति वाराणसी। अर्धरात्रि। छ: साल पहले की बात। सम्भवत: दिल्ली से वापस होते रेलवे स्टेशन पर उतर कर बाहर निकला ही था कि कानों में कीर्तन भजन गान के स्वर से पड़े:"....रोवें देवकी रनिया जेहल खनवा"इतनी करुणा और इतना उल्लास एक साथ। कदम ठिठक गए।
 
गिरिजेश राव
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असहमति - जाने किससे

-एक वयस्क सुशिक्षित लड़की एक वैसे ही लड़के से बिना किसी सावधानी के शारीरिक सम्बन्ध बनाती है, गर्भवती होती है और तीन महीने (मतलब कि शिशु को जन्म देने को मानसिक रूप से तैयार) तक मृत्युपर्यंत गर्भ धारण रखती है। क्या उसका अपने माँ बाप के प्रति, जो कि पुराने
 
गिरिजेश राव
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शिशु का परिच्छेदन (Circumcision)

इस लेख में दिए गए चित्र और सामग्री असामान्य हैं, जो कुछ सम्वेदनशील व्यक्तियों को विचलित कर सकते हैं। कृपया ऐसे लोग इसे न पढ़ें। इस लेख का उद्देश्य केवल और केवल ज्ञानप्रसार है, भावनाएँ आहत करना नहीं।  ...........एक शिशु के परिच्छेदन के
 
गिरिजेश राव
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कुरुक्षेत्र में ..क्या उखाड़ लोगे ?

जागरूक व्यक्तियों के अपने अपने कुरुक्षेत्र होते हैं । उनसे छुटकारा नहीं। चाहे कर्ण की तरह घुटते हुए लड़े, अर्जुन की तरह मोहनिवृत्त हो लड़े, अश्वत्थामा की तरह प्रतिशोध में लड़े, भीष्म की तरह सिकुड़ी मर्यादाओं के पालन के लिए लड़े .... लड़ना होता ही है। घर के
 
गिरिजेश राव
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भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 6

पहला भागदूसरा भागतीसरा भाग चौथा भाग  पाँचवा भाग आज होली है। हुड़दंग की प्रतीक्षा...। नौ बज चुके हैं और अचानक सन्नाटे को अनुभव करने लगता हूँ। बच्चे तो खेलने में लगे हुए हैं लेकिन बड़े ? क्या यह होली भी... ? दिन साफ है लेकिन मन के
 
गिरिजेश राव
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एक देहाती बोध कथा

घने डरावने जंगल से एक धुनिया (रुई धुनने वाला) जा रहा था। मारे डर के उसकी कँपकँपी छूट रही थी कि कहीं शेर न आ जाय ! धुनिए को एक सियार दिखा । पहले कभी नहीं देखा था इसलिए शेर समझ कर भागना चाहा लेकिन भागने से अब कोई लाभ नहीं था - खतरा एकदम सामने था। सियार को
 
गिरिजेश राव
Apr 22 2010 08:14 AM
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भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 5

पहला भागदूसरा भागतीसरा भाग चौथा भाग  ... मन में कचोट और वाणी पर उसे दबाती प्रगल्भता। भारी कदमों से मैं अपने जन्मस्थान से वापस होता हूँ। जाने फिर कब आना हो? जाने क्या रूप देखने को मिले? लेकिन यह स्थान तो चिर जीवित रहेगा... क्या बस मेरी साँसों के
 
गिरिजेश राव
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प्रसन्न होऊँ ? अपने केश नोचूँ ? निर्लज्जता जारी रखूँ ?

नौ महीनों की ज़िद्दी थेथरई के बाद जब मेरे पड़ोसी खुले सीवर मैनहोल पर चैम्बर बना कर ढक्कन लगाने के कार्य का श्रीगणेश हुआ तो मैं अति प्रसन्न हुआ। अब यह टेंसन खत्म होना था कि कोई भैंस सरीखा जानवर या बच्चा उसमें फिर से गिर जाएगा । लेकिन अब मुझे समझ में नहीं
 
गिरिजेश राव
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इतने निकट न आएँ कि आप के साँसों की दुर्गन्ध सताने लगे

कल मेरे एक अति प्रिय शिल्पी ब्लॉगर घोषित रूप से ब्लॉगरी छोड़ गए। इससे पहले एक ब्लॉगर जिन्हें मैं अन्ना कहता था, चुपचाप ब्लॉगरी छोड़ गए। कल रात खिन्न होकर मैंने भी एक कविता रच मारी। आज के दो तीन और लेख भी कहीं न कहीं इस समस्या से साक्षात्कार करते दिखते
 
गिरिजेश राव
Apr 10 2010 09:38 AM
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पुरानी डायरी से - 13: 'ईश्वर' नहीं

__________________________________________________________भठ्ठर मन, सर्व व्यर्थता बोध - कुछ लिखा नहीं जा रहा। पुरानी डायरी की शरण गया तो पंजाब आतंकवाद के चरम के समय की यह कविता दिख गई। यह वह दौर था जब ईश्वर से मोहभंग हो रहा था। मनुष्य की सारी समस्याओं की
 
गिरिजेश राव
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सम्मान

चित्राभार: अमर उजाला  (यदि अमर उजाला के व्यवस्थापक वर्ग को आपत्ति हो तो कृपया यहाँ बताएँ, पोस्ट हटा दी जाएगी। ) उस पत्रकार को सैल्यूट जिसने यह फोटो ली। ऑटो के फर्श पर ठूँसी गई घायल युवती और उसके उपर पैर रख कर सीट पर बैठे पुलिस वाले की
 
गिरिजेश राव
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झिरी से झाँक

तुम जो आए हो आज सुबह सुबह खिड़की की झिरी से झाँक रहे हो। मुझे सरसराहट सी लगी है। सुबह सुबह ऐसा होता है क्या कि दिन दुपहर सा लगे? सिल पर जमी धूल से गुजरती आँखें बोगेनबिलिया के गुलाबी फूलों पर टिकी हैं। सुना है कार्बन मोनो आक्साइड को ऑक्सीजन समझ रक्त सोख
 
गिरिजेश राव
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प्रात: से चुराए क्षणों में कुछ असहज बातें..

(1) वित्तीय वर्ष के अंत ने बहुत व्यस्त कर दिया है। कुछ लिखना नहीं हो पा रहा। कल एक पृष्ठ की फोटोकॉपी करने में तीन बार समझाने के बाद भी एक महिला प्रशिक्षु ने 10 पृष्ठ खराब किए। उन्हें फाड़ कर फेंकना पड़ा क्यों कि गोपनीय दस्तावेज था। मैं इस मामले में
 
गिरिजेश राव
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एक आलसी लेख

http://benamee.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html
 
गिरिजेश राव
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वे लोग किस खुशी की बात करते थे ?

भगत सिंह राजगुरु सुखदेव श्रद्धांजलि, सभी चित्र साभार: http://www.shahidbhagatsingh.org बलिदान दिवस: 23 मार्च 1931 खुश रहो अहले-वतन, अब हम तो सफर करते हैं। वे लोग किस खुशी की बात करते थे ? ऐसा क्या था उस 'खुशी' में जो  जीवन तक निछावर कर गए? .. आज
 
गिरिजेश राव
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भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 4

पहला भागदूसरा भागतीसरा भाग लौटते हुए सोचता हूँ - सढ़ुआन का यह रिश्ता अभी एक पीढ़ी पहले तक गौण सा रिश्ता माना जाता था। बहनापा बना रहता था लेकिन साढ़ुओं में कहीं भाइचारे का ईर्ष्यालु पक्ष ही प्रबल रहता था। बढ़ते शहरीकरण ने परिवारों को केन्द्रिक बनाया है तो
 
गिरिजेश राव
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कुछ लिखना है लेकिन मन नहीं बन रहा इसलिए यह लिख दिया :)

(1 ) पोस्ट छपने के बाद से लेकर पहली टिप्पणी आने तक ही लेखक को यह सुविधा मिलनी चाहिए कि वह पोस्ट में परिवर्तन कर सके। उसके बाद नहीं। आदर्श स्थिति तो यह हो कि छपने के बाद से ही यह सुविधा बन्द कर देनी चाहिए,  आखिर ऐसे भी पाठक हैं जो पढ़ते तो हैं लेकिन
 
गिरिजेश राव
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एक और कुकर्म की भूमिका

मेरे कुकर्मों की निन्दा न करोमेरे कुकर्म निम्नतर हैं मेरे कुकर्म तुम्हें स्वीकार्य होने चाहिए: उसने बलात्कार किया - तुम चुप रहे उसने घोटाला किया - तुम चुप रहे उसने देश को समझौते के नीचे दफन कर दिया - तुम चुप रहे आज मेरे निम्नतर
 
गिरिजेश राव
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नवसंवत्सर पर प्रार्थना

आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत:। संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनांसि जानताम देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते समानीव आकू पि: समाना हृदयानि व: समानमस्तु व मनो यथा व: सुसहासति।  
 
गिरिजेश राव
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यहाँ थूकते जाइए

चित्र साभार : http://www.daylife.com/topic/Mayawati/photos यह माला फूलों से नहीं हजार हजार के करेंसी नोटों से बनाई गई है। जरा अनुमान लगाइए कितना रुपया ! थूकते भी जाइए। मुझे आपत्ति नहीं होगी।  
 
गिरिजेश राव
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भाँग, भैया, भाटिन, भाभियाँ, गाजर घास ... तीन जोड़ी लबालब आँखें - 3

पहला भाग दूसरा भाग ... सरेह में दूर दिखते हैं - पोखरे के किनारे । नंगे हैं। वह घनापन गायब है जो कभी सिहरा देता था - पोखरा पर के बाबा अब नहीं रहे । गाजर घास को देखते हुए दीठ ठहर जाती है - कोलतार की सड़क पर दूब की पंक्ति उग आई है लम्बी - दूर तक । दूब - बचपन
 
गिरिजेश राव
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किस क़ुफ्र की सजा मुझे दी तुमने ज़िहादी !

लाहौर बम धमाकों में घायल 18 महीने का ज़ाहिद शाहिद चित्र साभार: इंडियन एक्सप्रेस  क़ाफिर नहीं, ईमान भी नहीं अल्लाताला पर - किस क़ुफ्र की सजा मुझे दी तुमने ज़िहादी !  अगली बार बम फोड़ो तो खयाल रखना ज़िहादीक़ाफिर मरें, ईमानदार मरें, घायल हों
 
गिरिजेश राव