लाल तेरा कमाल है माई सुनके कितनी निहाल है माई जिनके सर का बवाल है माई उनपे कैसी निहाल है माई चैन से सो रहे हैं क्यूं बच्चे रोटियों का कमाल है माई भूख़ हो तो भजन नहीं होता इक पुरानी मिसाल है माई तेरी ख़िदमत करेंगे ये बच्चे सिर्फ़ तेरा ख़याल है माई नाम बेट
मिट गये हम उफ़ न की है देख ले किस कदर दीवानगी है देख ले ज़िन्दगी भर साथ देने की कसम यार पूरी ज़िन्दगी है देख ले ये हवेली कल शहर की शान थी आज ये सूनी पड़ी है देख ले इससे पहले मैक़दा हो जाये बन्द ख़त्म है या कुछ बची है देख ले
जान देते थे वो इस बीमार पर अब दुआओं के भी लाले पड़ गये एक मैख़ाना शहर मे क्या खुला मन्दिरो-मस्ज़िद मे तले पड़ गये ढूंढने निकला था सच्चा आदमी ये हुआ पैरों मे छाले पड़ गये
ये रहबर सारे के सारे, जाने क्यूं झूठे लगते हैं .................................................................................. मुझको आज़ादी के नारे, जाने क्यूं झूठे लगते हैं
सपने सच करने की धुन में, अपने सब खो जायेंगे अपनों से, अपनापन रखना, सपने सच हो जायेंगे हासिल तो क्या होना है बस, भरम तेरा रह जयेगा तेरे आगे, अपने दुखड़े, चल, हम भी रो जायेंगे तनख़्वाह दूर, खिलौनों की ज़िद, और बहाने बचे नहीं आज, देर से घर जाना है, बच्चे ज
या मेरा दुश्मन ही शातिर हो गया या कोई अपना ही मुख़बिर हो ग्या तू जुदा होना था आख़िर हो गया पर तेरा किरदार ज़ाहिर हो गया मैं जो इस महफ़िल मे हाज़िर हो गया क्या बताऊं किसकी ख़ातिर हो गया जो मकाँ मुझसे नहीं बन पाया “घर” माँ का आना था कि मन्दिर हो गया हर कोई क
उनसे अपनापन कब तक आख़िर ये उलझन कब तक इक दिन तो सच कहना था रखता उनका मन कब तक देखें इन दीवारों से बचता है आँगन कब तक अपना चेहरा पहचानो बदलोगे दरपन कब तक
ख़ुद को वो पारसा समझते हैं और हमको बुरा समझते हैं मानते हैं किसी ख़ुदा को वो हम किसी को ख़ुदा समझते हैं सामना कैसे करूं मैं उनका वो मुझे बा-वफ़ा समझते हैं आपकी बात का यक़ीन करूं क्या मुझे बावला समझते हैं
जब तक मेरी ज़रूरत थी घर में कितनी इज़्ज़त थी खपता रहा ज़िन्दगी भर जितनी मुझमे ताक़त थी बेटों के घर हफ़्ता भर बस रहने की मोहलत थी बहुओं का तो नाम था बस सब बेटों की हरकत थी सोच ले ऐ बच्चों की माँ यही हमारी क़िस्मत थी
ज़िद पर बाबूजी के चांटे याद आये फिर अम्मा के आटे-बाटे याद आये बाबूजी की बेंत देखते ही मुझको यारों के संग सैर-सपाटे याद आये इतने दिन मेरे घर, इतने भाई के दिन कैसे माँ-बाप के बाँटे याद आये
इक राज़ बताया हमे, आँखों के नीर ने पीरों को पीर कर दिया, दुनिया की पीर ने चिडियों को चुगते देखी रहा था, कि अचानक हँस कर कटोरा फेंक दिया इक फ़क़ीर ने मजबूरियों की आड़ मे, गिरता चला गया रोका तो था मुझे बहुत, मेरे ज़मीर ने उस बादशाह का कोई मोहरा नहीं पिटा दी