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07 Apr 2009
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sameeksha

पेईंग गेस्ट डोंट पे फॉर इट कलाकार- श्रेयस तलपदे, जावेद जाफरी, आशीष चौधरी, वत्सल सेठ, नेहा धूपिया, सेलीना जेटली, रिया सेन, सयाली भगत, जानी लीवर, डेलनॉज पाल, असरानी, चंकी पांडे और इंद्र कुमार लेखक-निर्देशक- पारितोष पेंटर पटकथा-संवाद- लॉरेंस जॉन बैनर-नि
 
durgesh
Dec 29 2009 12:01 PM
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chakra

चाक पर टपका पसीना, माटी गीली हो गई. लाज का दीया गढ़ने में वो नीली-पीली हो गई. ख्वाब के गढ़हों में घुसी आँखें, पर नम नहीं, पेट कुछ भी कराए, वरना खूबसूरत कम नहीं. वक़्त क़ी गुल्लक में भरती थी लम्हों के चिल्लर दिन बिताती खुशियाँ खोज, रातें दर्द काटकर. फ
 
durgesh
Dec 29 2009 12:01 PM
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takaazaa

अर्र की आवाज़ आई घोंसला बिखर गया, तिनका-तिनका उड़ के जाने किस डगर गया. चूजे को संभाले गौरैया भी गिरी धम्म से आसमान के ख्वाब जमींदोज हुए झम्म से. फिर वक़्त की हवा चली तो धूल जख्म पाट गई, पर इंसानी आरी एक पेड़ काट गई.
 
durgesh
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prarambh

ब्लाग की दुनिया में मैं आज अपना स्वागत खुद कर रहा हूँ. स्पष्ट रूप से यह मेरी पहली पोस्ट है. यह मंच पिछ्ले काफ़ी समय से मुझे आसीन होनेके लिए प्रेरित करता रहा है. तकनीकी रूप से भयानक जदोज़्हद के बाद आख़िरकार रात के 10 बज मैने सफलता पा ली है. वजह भी बता
 
durgesh
Dec 29 2009 12:01 PM
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awaak

मैं सोया था इंतजार में कि नींद टूटे, अब जागा तो पाया सब अपने छूटे. नींद गहरी थी मैं भान ना पाया, परायों की शकल पहचान ना पाया. अवाक खड़ा चौराहे पर वह कौन है,मैं पूछता मन से- मन मौन हैं.
 
durgesh
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du:swapna

बड़ी सर्द हैं ये यादें ठिठुरने भी नहीं देती हैं, अक्सर चढ़ जाती हैं सवालों की सीढिय़ां तो जवाबों केपदचाप सुनकर भी उतरने नहीं देती हैं । फिर मैं औकात में आकर उनके दो हिस्से कर देता हूं, खुशनुमा को रजाई बना लेता हूं, स्याह को मफलर सा बांधता हूं करवटों क
 
durgesh
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prajatantra

गोदी में लिए बच्चा, आंचल मुंह में ठूंसकर वह मांगती चिल्लर, मरीन ड्राइव के पथ पर. हवा खाते चंद खुसट और चिपटे प्रेम पंक्षी ताके नाक-भौंह सिकोड़कर जब वह मांगती चिल्लर, मरीन ड्राइव के पथ पर. सिगरेट पीते मुम्बईया छोरे फिकरे कसे तानकर फिर भी वह मांगती चिल्
 
durgesh
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nagarnama

कभी न थमने वाला सफर हूं पसीजी रात के बाद का प्रहर हूं, हरे-भरे, घने-बने जंगलों पर इमारतें बोता कहर हूं मैं महानगर हूं, मैं महानगर हूं. सड़कों पर पड़ी है तहजीब ढूंढता अपने घर हूं, देश अब नहीं भाता तो विदेश की डगर हूं मैं महानगर हूं, मैं महानगर हूं. बी
 
durgesh
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aajkal

मेहमां को गिला है उसे रूखसत नहीं मिली मेजबां की जिरह है उसे फुर्सत नहीं मिली नींदों ने ढूंढा लाख पर करवट नहीं मिली भरसक वो दौड़ थी पर सरपट नहीं मिली
 
durgesh