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18 Jun 2010
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कविता :बंदरिया नाच दिखाती

बंदरिया नाच दिखातीएक बंदरिया नाच दिखावे ।बन्दर खड़े-खड़े पछतावे ॥ मदारी रोज पैसा कमावे । बंदरिया बन्दर को चिढावे ॥एक दिन बन्दर गुस्सा हो बैठा । बंदरिया बोले ले खाले भांटा ॥ बन्दर चिढ़कर गुस्से में बोला । चुप हो जा वरना जाग जायेगा मेरा शोला ॥ फिर भागेगी
 
BAL SAJAG
Jun 17 2010 02:47 PM
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कविता :बरसात का महीना

बरसात का महीनाबरसात का महीना बड़ा सुहाना ।जब देखो तब बारिश होती ॥ रिमझिम-२ बरसता पानी ।रात को रहता है गरम-गरम ॥ कपड़े पहनते तो और गरम ।दिन में देखो तो बारिश होती ॥जिधर भी देखो घास ही दिखती ।बरसात का महीना बड़ा सुहाना ॥लेखक :सोनू कुमारकक्षा :९अपना घर
 
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Jun 16 2010 09:21 AM
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कविता :शोर

शोरगाड़ियों एंव आदि वाहनों का ।कितना होता है शोर ॥ इस शोर से आधी जनता ।हो जाती है खूब सारा बोर ॥इस शोर को कैसे रोका जाए ।इस बात को पूरी दुनियाँ में बताया जाए ॥ गाड़ियों एवं आदि वाहनों का । कितना होता है शोर ॥लेखक :ज्ञान कुमारकक्षा :७अपना घर
 
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Jun 14 2010 09:50 AM
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कविता :एक मकान में चार दुकान

एक मकान में चार दुकानएक मकान में चार दुकान ।बनते थे सब में पकवान ॥ चारो दुकानों में थे मोटे हलवाई ।करते-रहते थे दिन-रात लड़ाई ॥लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे ।दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश ।उस दिन चारो हलवाई नहीं
 
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Jun 14 2010 09:19 AM
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कविता ; प्रदूषण

प्रदूषणप्रदूषण ने किया है परेशान ,खोले हैं ये फैक्ट्ररियों की खान....गर्मी से हैं अब सब बेहाल ,मत पूछो अब किसी का हाल......जब मार्च के महीने में है यह हाल ,तो मई-जून आदमी हो जायेगा लाल..आगे और पता नहीं क्या होगा ?आदमी का कुछ पता नहीं होगा....गाड़ी मोटर
 
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कविता : एक मकान में चार दुकान

एक मकान में चार दुकान।बनते थे सब में पकवान।।चारो दुकानों में मोटे हलवाई।करते रहते दिन रात लड़ाई॥लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे।दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश।उस दिन चारों हलवाई नहीं करते थे बकवास॥एक मकान में चार
 
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कविता : तापमान पर करो नियंत्रण

बढती जाती ये महगाई,घटती जाती पेड़ पौधों की संख्या भाई।बढती सूरज का तपन भाई,बढती गर्मी होती दिक्कत सारी।चलती लू जलती त्वचा हमारी,होती बीमारी न्यारी।जिसका इलाज न होता जल्दी भाई,सोते रहते घर में भाई।लोग देखे भाई करते रहते छि छि,क्या हो गयी बीमारी इसको।माता
 
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कविता :बर्बाद हो रही बिजली

बर्बाद हो रही बिजलीरोड़ों पर जल रही है बिजली ।देखो कितनी बर्बाद हो रही है बिजली , बिजली को पाने के लिए ।होते रहते शहर-गाँव में धरने तमाम ,फिर क्यों रोड़ों पर जला रहे दिन में । कितनी सारी बिजली ,बिजली से ही चल रहे कूलर येसी आदि । इसलिए हो रही बिजली की
 
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कविता :कवि सम्मेलन

कवि सम्मलेन मेंआज के कवि सम्मलेन में मजा आया ।सबने अपना कवी सम्मलेन में रंग जमाया ॥पैसा दिया हमको याद आया ।भागीरथ ने ही है गंगा बहाया ॥ जिसमें लोगों ने खूब नहाया ।पैसा मिला तो गाना गाया ॥आज कवि सम्मलेन में मजा आया । सबने अपना कवि सम्मलेन में रंग जमाया ॥
 
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कविता आइसर्कीम

आइसर्कीमआइसर्कीम हमें ला दो ,दो रूपया हमें दे दो.....दो रूपया मै ले जाउगा,बर्फ की सिली लउगा....बर्फ मै बनाऊगा,बाजार में बेचने जाऊगा.....पैसा कामऊगा,बर्फ की सिल्ली लाऊगा.....सबको आइसर्कीम खिलऊगा ,शरीर में ताजगी लाऊगा...आइसर्कीम मै खाऊगा.....लेखक मुकेश
 
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कविता :हवा चली

हवा चलीहवा चली भाई हवा चली ।दूर-दूर तक हवा चली ॥ठंडी गर्म है हवा चली ।हवा चली भाई हवा चली ॥गर्मी में तो आम गिरेगें ।आमों के हम स्वाद चाखेगें ॥आमों के हम पेड़ लगायेंगे ।हवा चली भाई हवा चली ॥लेखक :लवकुश कुमारकक्षा :७अपना घर
 
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कविता गर्मी

गर्मीदेखो कितनी हैं भीषण गर्मी भाई ,४० साल का रीकड़ तोडा हैं भाई....घर से बहार न निकालो भाई,नहीं तो लू लग जायेगी....पैसा रूपया खर्च होगा भाई,घर का बिल बन जायेगा....देखो कितनी हैं गर्मी भाई...लेखक चन्दन कुमार कक्षा ४ अपना घर कानपुर
 
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कविता :जल

जलनदियों कया पानी कल कल ।आवाज करे और बहता जल ॥ पानी को सभी बचाओ ।लोगों को इसका उपयोग बताओ ॥अगर न होता पानी धरती पर । जीवन भी न होता इस पर ॥पानी है सबका जीवन ।ये न हो तो मुश्किल सबका जीवन॥ लोग भी पानी बर्बाद कराएं ।पानी से पेप्सी ,कोक बनाएं ॥जल ही देता
 
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कविता हवा चली

हवा चली हवा चली भाई हवा चली,दूर दूर तक हवा चली....हवा चली भाई हवा चली,गर्मी में तो आग गिरे....आमो को तो हम खाये,अपने घरों के पास पेड़ लगाये....पेड़ पौधों को लगाने से प्रदुसन न होता,हवा चली भाई हवा चली.....लेखक लवकुश कक्षा ६ अपना घर कानपुर
 
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कविता :नरेगा और आर टी आई

नरेगा और आर टी आईआओ प्रजा सुनो प्रजा देखो प्रजा यह हाल ,नरेगा में मिलता है कार्य हर साल ।हर प्रजातंत्र का है ये नारा ,हर कार्य का दाम मिलेगा पूरा-पूरा ।नरेगा से है अब ये आशा,अब न होगी कोई प्रजा निराशा।प्रयोग करो रोजगार गारंटी ,नहीं तो प्रधान और नेता बजा
 
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कविता बिजली

बिजली क्यों नहीं देते सुनो सुनो देखो यारो ,हर गाँव में शहर शहर में ....रहते हैं हजारो गाँव अंधेरे में,क्यों रहते हैं अंधेरे में....अगर बिजली को हैं पाना ,यह बात बिजली कर्मचारी को बताना ....कि पैसा तो आप बहुत लेते हैं ,फिर आप बिजली क्यों नहीं देते
 
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कविता :बिजली

बिजलीसुनो यारो देखो यारो ।हर गाँव में हर शहर में ॥ रहते हैं हजारो गाँव अँधेरे में । अगर बिजली को पाना हैं ॥यह बात बिजली कर्मचारी को बताना हैं । की पैसा तो बहुत लेते हो ॥फिर बिजली क्यों नहीं देते हो । सुनो यारो देखो यारो ॥हर गाँव में हर शहर में ।रहते हैं
 
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कविता :परियों की रानी

परियों की रानीसपनों की कहानी ।जिसमें थी परियों की रानी ॥रानी के पास थी जादू की छड़ी ।चार दासी थीं उनके पास खड़ीं ॥हमको भूख लगी जोरों की ।रानी ने ढेर लगा दी बर्फी की ॥बर्फी इतनी खायी,मुँह से एक जम्हाई आयी ।जिससे प्रथ्वी पर रहने वालों की नींद भाग गयी ॥तभी
 
BAL SAJAG
May 20 2010 10:59 PM
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कविता सपना

सपनाएक दिन मैंने देखा था ,आसमान में कई रंग मिले थे....लाल गुलाबी पीले आसमानी,इन सब रंगों में से था....लाल रंग बड़ा अभिमानी,अपने को बड़ा दिलदार समझता....बाकी को फुट पात समझता,एक दिन जब बादल ने गरजा....सब रंगों में तब हो गयी लड़ाई,तब नहीं रहा कोई किसी का
 
BAL SAJAG
May 19 2010 09:53 PM
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BAL SAJAG

साबुन की बात निरालीसाबुन की हैं बात निराली ,कोई होती हैं काली तो कोई रंगीली ....बड़े -बड़े लोग साबुन को खूब लगते हैं,शरीर को साफ करते हैं....बहुत लोग एसे हैं जो साबुन,से कोसो दूर रहते हैं....साबुन का हैं दूसरा रूप,आम लोग जिसको कहते हैं मिट्टी....इसे
 
BAL SAJAG
May 18 2010 10:19 PM
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कविता पानी को बचाओ नहीं एक दिन हो जायेगा सबका मारन

पानी को बचाओ नहीं एक दिन हो जायेगा सबका मारनकितना पानी शेष बचा हैं,कोई नहीं इसे जनता हैं....भारत में बहुत से वासी हैं,उसमे आधी जनता अभी भी प्यासी हैं.... मानव का जीवन हैं पानी,हम सब बरबाद न करे एक भी पानी.....पानी आओं हम बचाये,व्यर्थ न करे इसको और
 
BAL SAJAG
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कविता -पानी को बचाओ

पानी को बचाओकितना पानी शेष बचा है ।कोई नहीं इसे जाँचता है ॥ भारत में बहुत भारत वासी हैं । उसमें आधी जनता अभी भी प्यासी है ॥ मानव का जीवन है पानी । हम सब बर्बाद न करें एक भी पानी॥ आओ हम सब मिलकर कर पानी को बचाएं। व्यर्थ न कर इसको और बढायें ॥इसे बचाएं हम
 
BAL SAJAG
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कविता दुनियां है बड़ी

दुनियाँ है बड़ीदेखों क्या है ए दुनियाँ ,सब कोई मनमानी करते दुनियाँ में....सब कोई रहते दुनियाँ में,दुनियाँ में से कोई चले जाते हैं....दुनियाँ का नाम लेकर रह जाते हैं,दुनियाँ हैं देखो कितनी बड़ी....आदिमानव ने नहीं पहनी कभी घड़ी,दोखो क्या हैं ए दुनियाँ
 
BAL SAJAG
May 15 2010 09:28 PM
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कविता - डाक्टर आये

डाक्टर आयेडाक्टर आये डाक्टर आये,साथ में अपने आला लाए।ह्रदय की तरफ आला लगते है,तब दर्द और बुखार का पता लगते है।रात को कुछ हो जाता है,डाक्टर सुई लगता है,साथ में दवा दे जाता है।नाम - जमुना कुमारकक्षा - पांच
 
BAL SAJAG
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कविता -पेड़ लगाओ

पेड़ लगाओपेड़ लगाओ पेड़ लगाओ ।सब बच्चों तुम पेड़ लगाओ ॥ पेड़ लगाकर पानी बरसाओ । पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ ॥ पेड़ हमें आँक्सीजन गैस देते हैं । और कार्बनडाई-आक्साइड लेते हैं ॥ बच्चों तुम सब पेड़ लगाओ ।पेड़ हमारे लिए हैं उपयोगी ॥ पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ । बच्चों तुम
 
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कविता -नया सवेरा

नया सवेराहुआ सवेरा निकला सूरज ,पक्षी खेतों में जाते हैं....खेतों में जाकर दाना खूब खाते हैं,जब दुपहर हो जटी हैं....पेड़ों में पक्षी बैठते हैं,शाम को सूरज ढलता हैं....सब पक्षी घर को जाते हैं,बच्चों के साथ रहते हैं.....चैन की नींद सोते हैं,हुआ सवेरा निकला
 
BAL SAJAG
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कविता; मूर्ख दिवस

मूर्ख दिवस हम सब मनाते...मूर्ख दिवस हम सब मनाते,एक अप्रैल को अपनी मूर्खता दिखाते। पढ़ाई में अपना मन नहीं लगाते,इसलिए कुछ बन नहीं पाते।माता पिता को दुःख देते,वो बेचारे चुपचाप सहते।बच्चे कहते इसमें दोष नहीं हमारा,ये तो वक्त है जिसके पीछे है जमाना।जमाना तो
 
BAL SAJAG
Apr 21 2010 11:51 AM
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कविता: सरकार बनाम सामाजिक कार्यकर्ता

सामाजिक कार्यकर्ताओ का हाल...समझ में न आए, इस देश की नीति। जो दिलाये गरीब को इंसाफ, उसकी बंद कर दी गई जुबान।करे जब वह कोई ऐसा काम,जिससे लोगो को हो लाभ।सरकार गुस्साए कर दे भन्डा,पुलिस आये जोर से मारे डंडा। ले जाये पकड़ के अपने साथ, फिर कर दे जेल के अन्दर।
 
BAL SAJAG
Apr 20 2010 11:16 PM
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सम्पादकीय : "दुश्मन बनी सरकार भगवान बने डकैत"

प्यारे दोस्तों, वर्त्तमान समय में अपने देश की जो स्थिति है उसके एक हिस्सा बुंदेलखंड की कहानी मै आपको सुनाने जा रहा हूँ जिस तरह से मैंने देखा और समझा है। चुकी मै भी बुंदेलखंड से जुड़ा हुआ हूँ और वहां की पीड़ा को महसूस करताहूँ। " सरकार दुश्मन, भगवान
 
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कविता: इस बार ऐसा तापमान बढ़ा है,

तापमान बढ़ा है....मौसम यह कैसा अदभुत है,न जाने कैसी सबकी सेहत है। इस बार ऐसा तापमान बढ़ा है, सूरज धूप लेकर सिर पर खड़ा है।ऐसी गर्मी मई जून माह में होती, गर्म हवायें उसके साथ में बहती। इस बार है देखो कैसा ये मौसम,इस गर्मी में कौन उठाये धूप का जोखम। जाने
 
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कविता: क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह

इसके बारे में तुम्हे पता है क्याबना बना कर तमाम फैक्टरिया,क्यों कर रहे हो जिंदगी तबाह।इस धरती को कर रहे हो ख़राब, इसके बारे में तुम्हे पता है क्या ?इन फैक्टरियों से निकलता धुआं,पर्यावरण को असंतुलित बना रहा। जल जमीन वायु प्रदूषित हो रहा,इसके बारे में
 
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कविता: घड़ी

घड़ीसमय हमें बतलाती है,नाम घडी कहलाती है। जब घडी गलत हो जाता है,तब समय गलत हो जाता है।आगे करो या पीछे घड़ी,असमंजस में पड़ता आदमी। जब भी जल्दी हो देता काम,ऐसे काम का यही है दाम।समय हमें बतलाती है,नाम घडी कहलाती है।लेखक: सोनू कुमार, कक्षा ८, अपना घर
 
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कविता: वतन

इस वतन से सबको प्यार है..........हम वतन के तुम वतन के,इस वतन से सबको प्यार है। हिन्दू लड़ते मुस्लिम लड़ते,क्यों इनके बीच भेद की दिवार है। दिवार ये है किसने बनाई,ये जानना हम सबका अधिकार है। जो न जाने जो न समझे,उसका जीवन बेकार है। हम जीते है हम मरते है,नहीं
 
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कविता: आदमी कहलाने लायक नहीं हूँ

मै एक आदमी हूँ ......मै एक आदमी हूँ,लेकिन आदमी कहलाने लायक नहीं हूँ ।मेरे पास दिमाग है,लेकिन वह बेकार है। उन्नति तो हमने बहुँत किया,मगर समाज को कुछ न दिया। इस हरी भरी दुनिया को,छिन्न - भिन्न कर गया। एक दिन ऐसा आएगा,दुनिया खत्म हो जायेगा। इसका कारण एक
 
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कविता: राजा ने किया रानी से मजाक

राजा ने किया रानी से मजाक एक दिन राजा बोले रानी से ,आलू लाओ जाकर खेतो से।रानी बोली मै नहीं जाउंगी खेतो में,चाहे मुझको रखो न तुम अपने घर में। सुनकर रानी की ऐसी बानी,राजा पीने लगे जल्दी से पानी ।राजा बोले मैंने तो मजाक किया,तुमने उसको सच मान लिया। तुम तो
 
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कविता :सुनो पर्यावरण की आवाजें

सुनो पर्यावरण की आवाजेंपर्यावरण और कल कल झरनों की आवाजमहसूस करो दोस्तो गंगा-यमुना की आवाजएक समय ऐसा भी थागंगा-यमुना समुन्दर जैसी थीगंगा-यमुना के पानी सेक्यों कर रहे हैं कोका-कोला तैयारक्या तुम्हें याद हैं एक बातपड़ गया था पानी का आकालउस समय येसा
 
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कविता सारे आम गिरे तोते के शोर से

सारे आम गिरे तोते के शोर सेहरी डाल पर बैठा तोता ,हमने देखा वह पका आम खता.....मै नीचे बैठा वह ऊपर बैठा,उस आम के लिए मै एठा......मै बैठा सोचू कि यह आम मुझे ही मिले, इसका रस मेरे पेट में जाकर टहले.....बार बार तोता मेरी ओर देखता ,मुझे देखकर ठाँव ठाँव कर
 
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