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15 Jun 2010
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गुलामी के उत्सव का विकास

दिल्ली में खेल होने वाले हैं। इस खेल का नाम राष्ट्रमण्डल खेल है। इसे आमतौर पर भारतीय जनता काॅमनवेल्थ गेम के नाम से जानती है। मैं तो मानता हूॅं कि चूकिं खेल की विरासत ही अंग्रेजी परम्परा में है तो इसका हिन्दी में नाम ही नहीं होना चाहिए। भारतीय जनता में
 
विनय जायसवाल
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कब सोचा था जीवन एक धोखा है

है उदासी सी मन मेंखुश है सारा जहाँठहर सा गया हूँ मैं और चलता चला गया है कारवां।मंजिले पास आती रहीमैं खुद से दूर होता गयाचाहा था जो वो मिलता गयाख्वाहिशों का दम घुटता गयाइस शहर में मिला है काम बड़ामगर हुआ है छोटा नाम मेराहर काम की अपनी-अपनी तकलीफेंहर
 
विनय जायसवाल
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रियलटी शो की रियलटी

देश में एक नई तरह की क्रान्ति आयी है। यह रियलटी शो की क्रान्ति है। पहले की हर क्रान्तियों की तरह यह भी दुनिया के तथाकथित विकसित देशों में पुष्पित और पल्लवित हुई है। अब भारत में कुछ लोग इस मिशन में लग गये हैं कि भारत आखिर दुनिया से इस क्रान्ति में पीछे
 
विनय जायसवाल
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विकास और पहचान का संकट

सामाजिक संचार का राष्ट्रीय एकीकरण के सन्दर्भ में नृजातीय अध्ययनराष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में भारतीय विविधता और पहचान के संकट को विकास-विरोधी के तौर पर देखा जाता है, यह ठीक उसी तरह है जैसे क्षेत्रीय राजनीति को राष्ट्र निर्माण में बाधक समझा जाता है। लेकिन
 
विनय जायसवाल
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२०१० की सभी को शुभकामनायें

साथियों,नये वर्ष की शुभकामनायें। यह वर्ष हम सभी के लिए खुशियों और आशाओं से भरा हो। आगे बढ़ें, दूसरे को आगे बढ़ने में मदद करें तथा सिर्फ अपनी और अपनों की खुशी की जगह हर किसी की खुशी की कामना करें।
 
विनय जायसवाल
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तीन इडियट्स के काबिल बनने की कहानी

थ्री इडियट्स अक्सर फिल्मों में सच दिखाने की कोशिश की जाती है इसलिए सच दिखाने की कोशिश, कोशिश ही बनकर रह जाती है। बहुत कम ऐसा होता है कि सच को सिनेमा बनाने पर उतारू हुआ जाता है। जब भी ऐसा होता है तो सच परदे से होकर सीधे दिल में उतरता है और फिर चेहरे प
 
विनय जायसवाल
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मशीन ने हार मान ली

मशीनें जिंदगी बन गई हैं और जिंदगी मशीन हर मशीन की जा न होती है जिंदगी की हथेली पे मशीन ने भी सिखा जिंदगी से जान का सौदा करना और अब दोनों प्रतिस्पर्धा करते हैं जान लेने का कौन किसकी कितनी जल्दी जान ले सकता है मशीन ने हार मान ली जिंदगी को जिंदगी मारने
 
विनय जायसवाल
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घुटन, दर्द और चीख न पाने की पीडा ...

घुटन, दर्द और चीख न पाने की पीडा ... ये दर्द आज हिंदी भाषी के लिए कहीं से कम होता नजर नही आता, आज सुबह ही एक मित्र से बात हुई। वह एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से परास्नातक है और भारत एक प्रतिष्ठित जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता में परास्नातक उपाधि पत्र
 
विनय जायसवाल
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चलो किताब ही जलाएं

चलो चलें दुनिया को विकास समझाते हैं वापस लौटकर इतिहास का बाज़ार लगाते हैं बन गये हैं इन्सान इस पर सवाल उठाते हैं कोई हमें दिखाए सच का आइना उसे लात दो और चार लगाते हैं ... उठे अपने तरफ कोई उंगली तोड़ उंगली उसे ताकत का एहसास कराते हैं मिलते नहीं विचार तो
 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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सच का बाज़ार

सच का बाज़ार लगा लगा झूठ का दाम बिक गयी इंसानियत हो गया खून रिश्तों की लिहाज का ... हर रिश्ता खोजे अब सच्चाई अपने रिश्ते की नहीं रहा भरोसा खून का हर मांग में दिखने लगा अब धोखा ही धोखा आखिर बाज़ार ने फेंका ऐसा पांसा पैसे के आगे नंगा हुआ झूठ के लबादे में
 
विनय जायसवाल
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आजकल

देश का अपना रेत फिसले हाथ से खेत खेती छोड़ी घर छोड़ा नौकरी हो गई जीवन की रेख ... खुशियाँ गई आजादी खोयी पैसें के सपनों में बेचा सम्मान फिर भी अफसोस है आज पहली तारीख है खुश है जमाना कैडबरी खाकर अपना मन मारता है बच्चा एक तुकडे गुड के लिए ....
 
विनय जायसवाल
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निजीकरण की निजता

निजीकरण की आग ये ऐसी सम्बन्ध निजी हो गये इतने निजी की समलैंगिक बन गये ....
 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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अनुभव

अनुभव जीवन का अबूझ, अनजान, अनसुलझा नित नए एहसास खुशी, गम, असमंजस, दुविधा पशोपेश में मन हर पल क्‍या सही, क्‍या गलत सुलझा अनसुलझा। पहचान, प्रतिष्‍ठा, सम्‍मान, अपनापन दूरी, नजदीकी, पाना, खोना जीत, हार, वार, तकरार द्वेष, प्‍यार, इज्‍जत, बतमीजी याद सब, फि
 
अरुण कुमार वर्मा
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चेहरों के फेसियल में

नाचो अब चुनाव के ताल पे देश के ख्याल पे और अपने भविष्य के सवाल पे चिंता है आपकी सरकार अच्छी लाना है आप कर लो कुछ भी नेताओं को देश मिल-बाँटकर खाना है चुनें किसे अजीब ये कश्मकश है कह रहा है एक तरफ़ पूरा परिवार तेरे हाथ पर मेरा है अधिकार दूसरी तरफ़ नफ़रत
 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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आजकल

 
विनय जायसवाल
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निशान-ए-जुत्ता

निशाना लगे न लगे लेकिन ज़ख्म तो हो ही जाता है, चोट तो लग ही जाती है। क्या करें जूता तो चीज ही ऐसी है। मुंतज़ीर अल ज़ैदी का जूता भी कुछ अलग नहीं था। अफवाह तो ये भी है कि श्रीमान ज़ैदी पिछले कई दिनों से जूता निशाने पर मारने की प्रैक्टिस कर रहे थे। लेकि
 
Omprakash Das
Dec 29 2009 11:43 AM
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आजकल

 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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आजकल

 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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गुजरात ब्रांड के आँसू न मागियें ...

आसूओं का ब्यापार करता हूँ ब्रांड वाले आसूओं पर छूट प्रदान करता हूँ अगर है जान-पहचान तो बिना ब्रांड वालों पर भी कुछ इंतजाम करता हूँ मौसम है आतंकवाद के आसूओं का कीमत इनकी आसमान छू रही है सिंगुर और नंदीग्राम सस्ते हैं चाहिए तो ले जाईये लेकिन कृपा करके ग
 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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रास्ता समझकर

गुजर जाता हूँ रास्ते से रास्ता समझकर मुनासिब नहीं समझता रुकना कोई वास्ता समझकर दौड़ता हूँ ऐसे जैसे जिंदगी रौद रहा हूँ
 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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नयका कुर्ता वाले बाबा ...

चलिए भाई मेरी तो चिंता ही ख़त्म हो गई। अब मुझे भरोसा हो गया है कि करार देश हित में है। isako लेकर मुझे बेकरार होने की जरुरत नहीं है। आख़िर अपने राहुल बाबा ने कहा है कि करार देश हित में है। राहुल बाबा पर मुझे पूरा भरोसा है। वे कभी ग़लत नहीं कहते। हमेश
 
विनय जायसवाल
Dec 29 2009 11:43 AM
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आजकल

जमीन पूंछ रही है मैं किसकी हूँ इसकी हूँ या उसकी हूँ मैं हिंदू की हूँ या मुसलमान की हूँ आख़िर मैं किसकी पहचान हूँ मैं क्या हूँ किस धर्म की हूँ किस जाति की हूँ नहीं पता मुझे लेकिन लोग जानते हैं किस जगह किस समुदाय की हूँ मैं मेरा कुछ भी नहीं और मैं कोई
 
विनय जायसवाल
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जरूरतें ....

क्या कहें क्या न कहें जिंदगी को हाँ कहें या ना कहें बड़ी जालिम हैं जरूरतें इसे हम क्या कहें बनाती हैं पल में रिश्तों की डोर और गिराती हैं एकाएक जिंदगी भर की सोच ख़ुद पर पड़े तो धोखा है औरों को देना पड़े तो समझौता है
 
विनय जायसवाल
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आशाओं की आबादी खुशियों की दुनिया

नैना साहिनी, जेसिका लाल और अब आरूषि के दर्दनाक अंत से कौन नहीं दहल गया। जाहिरा शेख आज एक नजीर बन गयी है। इसके बावजूद भी महिलाओं के प्रति पुरुषोचित दमन खत्म होने का नाम नहीं लेता। यह हमारे ही समाज का एक पहलू है। आज महिलाओं को कदम-कदम पर अत्याचार, शोषण
 
विनय जायसवाल
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पूँजी माँ ऊँ चा

आशाओं की आबादी खुशियों की दुनिया नैना साहिनी, जेसिका लाल और अब आरूषि के दर्दनाक अंत से कौन नहीं दहल गया। जाहिरा शेख आज एक नजीर बन गयी है। इसके बावजूद भी महिलाओं के प्रति पुरुषोचित दमन खत्म होने का नाम नहीं लेता। यह हमारे ही समाज का एक पहलू है। आज महि
 
विनय जायसवाल
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शोषण के खिलाफ मदद करें

दिल्ली में एक आम नागरिक का जीना किस तरह मुहाल है, इसकी नजीर के। उमा मूर्ति हैं। उमा ने 1 लाख 85 हजार रूपये दिल्ली के एक बिल्डर को मुम्बई में प्लाट के लिए भुगतान किये थे। करीब तीन साल होने को हैं, बिल्डर ने न तो प्लाट ही दिया है और न ही भुगतान राशि वा
 
विनय जायसवाल
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जाना होगा धनतंत्र की इस शिक्षा को

कलम तोड़कर रख दी स्याही हाथ में कहते है अब तकदीर लिखोकल के हिंदुस्तान कीगवाह इतिहास हैदौलत की ताकत से हूकुमत नहीं चला करती दुनिया का रुख हो जाता है उस तरफ चल पड़ता है जिधर गरीब, किसान, नौजवान और छात्र देश है इनका शिक्षा है इनकीइसका व्यापार नहीं चलेगा
 
विनय जायसवाल
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सरकारी दुकान में तब्दील होते शिक्षा के मन्दिर

शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले देश के विश्वविद्यालयों को सरकारी दुकान में तब्दील करने की साजिश और गति पकड़ रही है ... छात्र आन्दोलन की जमीं कहे जाने इलाहाबाद के पत्रकारिता विभाग के विद्द्यार्थियों उठाई है इसके खिलाफ आवाज़ ... बहुत दिन बाद कुछ जिन्दा रहने
 
विनय जायसवाल
Sep 09 2009 11:04 AM
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खाद्य कीमतें और उर्वरक की साजिश

आज बात दूसरी हरित क्रान्ति की चल रही है। यह जरूरत ऐसे समय में मुखर हुई है, जब पूरा विश्व खाद्य कीमतों की बढ़ती समस्या से जूझ रहा है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व खाद्य संगठन ने बकायदा एक रिपोर्ट जारी कर बढ़ती खाद्य असुरक्षा और भूखमरी पर
 
विनय जायसवाल
Jul 29 2009 03:18 PM
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भाषा का अपराध और आपराधिक भाषाभाषी

वह लेख जो जनसत्ता में नहीं छपा अंग्रेजी क्यों जीती हिन्दी क्यों हारी, जनसत्ता, 5 जून 2008, राजकिशोर ने अपने लेख के जरिए बहुत उपकार किया है, हिन्दी समाज पर। आखिरकार उन्होंने हिन्दी समाज की आॅंखें खोल ही दीं। लेकिन बहुत देर कर दी उन्होंने। इतने गूढ़ ज्ञान
 
विनय जायसवाल
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आजकल

ये कहानी फिर चली धन्धेबांजों ने दुनिया की तकदीर लिखी धनवानों की दुनिया सजी गरीबों ने फिर से अपनी मौत लिखी ...
 
विनय जायसवाल
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मौन क्‍यों हैं हम

गरीबी, लाचारी बेबसी देखकर मौन क्‍यों हैं हम मजलूम पर हो रहे जुल्‍मों-सितम देखकर मौन क्‍यों हैं हम रिश्‍तों में कम होती मिठास देखकर मौन क्‍यों हैं हम घरों के दरम्‍यां उठती दिवारों को देखकर मौन क्‍यों हैं हम अपने में मरता इंसान देखकर मौन क्‍यों हैं हम
 
अरुण कुमार वर्मा