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गुल्लक

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03 Jun 2010
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नज़र साहब और उनकी शायरी को सलाम

तुम तो ठहरे ही रहे झील के पानी की तरहदरिया बनते तो बहुत दूर निकल सकते थे जी नहीं। यह कलाम मेरा नहीं है। पर फिर न जाने क्यों मुझे लगता है जैसे शायर ने मुझ पर लिखा है। मैं 27 साल तक बस एक ही जगह बैठा रहा, यानी काम यानी नौकरी करता रहा। आज जब वहां से
 
राजेश उत्‍साही
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अनुभव की गुल्लक में जो है उसे बांट रहा हूं

लिखने के दौरान मेरे जो अनुभव रहे हैं, मैंने जो सीखा है वह मैं औरों तक पहुंचाने की कोशिश करता रहा हूं। इस बात का जिक्र मैंने अपनी एक पोस्ट नसीम अख्तर की कविताओं के बहाने में भी किया है। पिछले दिनों किसी एक ब्लाग पर मैं अपनी आदत के मुताबिक टिप्पणी करके आ
 
राजेश उत्‍साही
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मंटो : एक जेबकतरा कहानीकार

बीती 11 मई को जानेमाने कथाकार सदाअत हसन मंटो का जन्म दिन था। उनका जन्म 1912 में हुआ था। 42 साल की चढ़ती उम्र में ही वे सबसे विदा ले गए। लेकिन इतने कम समय में ही उन्होंने जो लिखा उसका आकलन हम अभी तक कर रहे हैं और आने वाले न जाने कितने वर्षों तक करते
 
राजेश उत्‍साही
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शरद बिल्‍लौरे की तीन और कविताएं

मजदूर दिवस बीते अभी दो दिन ही हुए हैं। आज भाई शरद बिल्लौरे की पुण्य तिथि है। मजदूर दिवस को याद करते हुए उनकी बैल कविता पढ़ना नए अर्थ देता है। जब तुम शहर में नहीं हो कविता कवि की एक अलग ही दुनिया के बारे में बताती है। और तीसरी कविता तुम मुझे उगने तो दो
 
राजेश उत्‍साही
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देखूं कोई बच्चा तो उसकी ही झलक आए

कपड़ों से मुझे अपने बिटिया की महक आएघर भर के नशेमन से बिटिया की चहक आए मैं तो काम करती हूं चुपचाप रसोई में हर एक बर्तन से बिटिया की खनक आए जाने क्या हो गया है अब मेरी निगाहों कोदेखूं कोई बच्चा तो उसकी ही झलक आए लगता है यही दिल को जब दूर वो होती हैइक बार
 
राजेश उत्‍साही
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पहचानो तो जानें।

 
राजेश उत्‍साही
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फागुनी कामना