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28 May 2010
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कारगिल युद्ध : इतिहास बदलना होगा

रिटायर्ड ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह को मिले इन्साफ से ये जाहिर हो गया है कि १९९९ में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युध्ह का इतिहास फिर से लिखना पड़ेगा क्योंकि पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल किशन पाल ने अपनी वर्दी पर चंद मेडल टांगने की मंशा से पुरे देश को भ्रम में
 
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तेरे पास क्या है भाई - "मदरइंडिया" की नर्गिस या "शूटआउट" की अमृता सिंह?

आज मेरे पास है बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है, तेरे पास क्या है भाई?? हंई??भाई, मेरे पास “माँ” है!!फिल्म "दीवार" केलिए ये संवाद लिखते वक़्त शायद खुद जावेद अख्तर ने भी इनकी गहराई, असर और लोकप्रियता का अनुमान नहीं लगाया होगा।आज अगर कभी ये डायलाग सुनो
 
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२६/११ - कुछ फैसले अभी बाकी हैं..

२६/११ का काला अतीत इतिहास के पन्नो में दर्ज हो चुका है। ६/०४ का दिन उसी काले अतीत को रचने वाले के भविष्य का फैसला करने केलिए इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जा चुका है। कसाब जोकि सरहद पार से भेजा गया पार्सल था उसकी मौत तो निश्चित हो चुकी है लेकिन सरहद
 
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वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..

आजकल दो प्राइम चेनल्स पर बच्चो का डांस मुकाबला चल रहा है और तीसरा इस चूहा दौड़ में शामिल होने की तैयारी कर रहा है या यूँ कहें कि तीसरे की नक़ल करके पहले दो चैनल्स ने बच्चो को अपनी उँगलियों पर नचा के टीआरपी के खेल का मज़ा उठाने की तैयारी की है। खैर पहले,
 
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खो गया सुर हमारा-तुम्हारा..

पिछले दिनों एक बहुत ही लोकप्रिय देश भक्ति गीत का रीमेक किया गया। जिसे बनाने और उसके प्रचार में पैसे की धारा को बेरोक-टोक बहाया गया। वो गीत था “मिले सुर मेरा तुम्हारा”। इस बार इस गीत में फ्यूज़न संगीत, खेल और फिल्म जगत के बेहतरीन सितारे और एक से एक
 
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खेल ब्रेकिंग न्यूज़ का..

एक दौर था जब स्वर्गीय एस पी सिंह द्वारा संचालित कार्यक्रम "आजतक" आजकल के डेली सोप कि तरह ही लोगों कि ज़िन्दगी का हिस्सा था। उस आधे घंटे के कार्यक्रम कि ख़बरों में एक जोश, एक सच्चाई, एक निर्भयता का एहसास होता था। वो एक एस पी सिंह और "आजतक" मिल कर न सिर्फ
 
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ऐतिहासिक फ़िल्मी गीतों के पीछे का इतिहास..

परदे पर दिखने फिल्म में परदे के पीछे भी बहुत कुछ ऐसा घटित होता जो उस फिल्म के इतिहास का हिस्सा बन जाता है। हालाँकि परदे के पीछे के इस इतिहास की खबर आम लोगों तक कम ही पहुँच पाती है। चलिए ऐसे ही कुछ दिलचस्प किस्सों केसाथ आज इस ब्लॉग पोस्ट का सफ़र पूरा करते
 
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आई पी एल से टक्कर तौबा तौबा..

यूँ तो हर साल फरवरी और मार्च महीना फिल्म निर्माताओं की परेशानी का सबब होते हैं। क्योंकि इन महीनो में बच्चो को परीक्षाओं के चलते बोक्स आफिस पर नई फिल्मों का आगमन शुभ नहीं माना जाता। इस समय फिल्म निर्माताओं के साथ साथ सिनेमा घरों की खिड़कियाँ भी दर्शकों के
 
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आई पी एल से टक्कर तौबा तौबा..

यूँ तोह हर साल फरवरी और मार्च महीना फिल्म निर्माताओं की परेशानी का सबब होते हैं। क्योंकि इन महीनो में बच्चो को परीक्षाओं के चलते बोक्स आफिस पर नई फिल्मों का आगमन शुभ नहीं माना जाता। इस समय फिल्म निर्माताओं के साथ साथ सिनेमा घरों की खिड़कियाँ भी दर्शकों
 
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दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा : मीना कुमारी

कहते हैं कि कोई भी इंसान मुजरिम या गुनेहगार पैदा बही होता। वक़्त और हालत उससे गुनेहगार बना देते हैं। लेकिन औरत की ज़िन्दगी का सच इसके बिलकुल विपरीत है क्योंकि औरत को हालत या वक़्त गुनेहगार बनाये या न बनाये लेकिन औरत का होना ही अपनेआप में एक बड़ा गुनाह बन
 
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फिल्मों का बदलता स्वरुप यानि बदलते भारत की तस्वीर..

अंग्रेजी में एक कहावत है “चैज इज़ द ओनली कांस्टेंट यानि "परिवर्तन संसार का नियम है" और ये बात बदलते भारत पर इस वक़्त बिलकुल सटीक बैठती है । राजनीती में बाबा रामदेव जी का पदार्पण, स्वास्थ्य जगत में अचानक होमियोपथी, आयुर्वेदि चिकित्सा पद्दति को बढावा देने
 
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फ़िल्मी सितारे : उनकी आस्था और विश्वास..

कलियुग में भगवान होने कि परिभाषा बदल गयी है। राजा होने के मायने बदल चुके हैं। आज भगवान वो है जिसके भाषण से राशन मिले न मिले लेकिन सोसाइटी में सत्संगी होने कि इमेज से ही लोग खुद को धन्य समझते हैं। राजा होने का अर्थ सही मायने में सरकारी गाड़ियों का काफिला,
 
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है कोई इनका वारिस ??

चारों तरफ़ मंदी की मार का शोर है॥ हर कोई परेशान है कि आखिर नौकरियां गई कहाँ॥ मगर मुझे ये सोच के ताज्जुब हो रहा है कि हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में आज भी कई पोस्ट सालों से खाली हैं जिनका कोई भी उम्मीदवार नहीं हैं॥ सोच के देखिये कि हर दूसरी फ़िल्म में पु
 
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ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोये..

आज १ अप्रैल है॥ यानि "अप्रैल फ़ूल डे" ये त्यौहार भारतीय सभ्यता की देन नही है॥ और हैरत कि बात है कि अपने विशाल ह्रदय के लिए प्रसिद्द हिन्दुस्तानी सभ्यता में कभी अपने बेगाने का भेदभाव नही समां सका॥ यही वजह है कि भारत में कई ऐसे त्यौहार हैं जोकि हैं तो व
 
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Dec 29 2009 11:55 AM
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अपने बच्चों का भी नाम रोशन किया इन्होने..

बधाई हो कुल का चिरा ग पैदा हुआ है".... "अरे आपका बच्चा तो बड़ा समझदार है ये ज़रूर माँ-बाप का नाम रोशन करेगा"..... ऐसे जुमले और बधाइयाँ अपने भी सुनी और दी होंगी॥ मगर क्या ये बातें हमेशा सच होती हैं॥ क्या सिर्फ़ बच्चे ही माँ-बाप का नाम रोशन करते हैं??
 
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Dec 29 2009 11:55 AM
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सफलता का मूल मंत्र : मेहनत या विवाद??

राखी सावंत, संभावना सेठ, राहुल महाजन, मोनिका बेदी, अर्जुन सिंह, ऐ.आर. अन्तुले और अब वरुण गांधी ये उन् लोगों के नाम हैं जिन्होंने नई पीढ़ी को एक ऐसी दिशा दिखाई है जिस पर चल के सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना फायदा हो सकता है समाज का नही॥ हालाँकि ये सभी लोग यदा-क
 
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Dec 29 2009 11:55 AM
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सुरेखा सिकरी : इस चिराग तले अँधेरा कहाँ..

बहुत प्रसिद्ध कहावत है की चिराग तले अँधेरा होता है॥ मगर इस कहावत के भावार्थ को बदल के दिखाया है ६४ साल की दादीसा यानि सुरेखा सिकरी ने॥ सुरेखा और अभिनय मानो एक ही सिक्के के दो पहलु हैं॥ यही कारण है की सुरेखा को जब जहाँ जिस किरदार में भी देखा तो लगा की
 
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माई कॉफी विद करण..

टेलिविज़न के लिए शो बनाते हुए कई बार ऐसी घटनाएँ घटित हो जाती हैं जो ज़िन्दगी भर के लिए एक सबक बन जाती हैं॥ कुछ ऐसा ही हुआ जब मैं ""ज़ूम टीवी" के एक शो "मैं हूँ" पर बतौर सह-निर्माता काम कर रही थी॥ "मैं हूँ" एक अलग तरह का शो था॥ खास तौर पर तब जबकि इस शो
 
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Dec 29 2009 11:55 AM
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संतों की धरती पर संतों का अपमान-कब तक??

इधर काफी समय से कुछ असामाजिक तत्वों ने मिल कर पूज्य बापू आसाराम जी के कुप्रचार में एक लोक भड़काऊ अभियान छेड़ रखा है जिसके तहत सनातन संस्कृति और सभ्यता को मज़बूत बनाने और सुख दुःख में सम रहने की सहज प्रवृति जगाने वाले पूज्य बापू पर कई तरह के झूठे, बेबुन
 
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सत्तर के उस पार क्या है??

कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की मिसाल या उदाहरण दे कर ज़िन्दगी जीते हैं और कुछ लोग वो होते हैं जो जीते जी औरों के लिए एक मिसाल बन जाते हैं। ज़िन्दगी के हर मोड़ पार कुछ न कुछ नया, प्रगतिशील और जीवंत उदाहरण बनने का मनो इन लोगों में एक जूनून सा होता है। इन्
 
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जम्मू कश्मीर पुलिस-कौन सुने फरियाद??

कहते है की कुरुक्षेत्र में श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश देते हुए भगवन श्री क्रिशन ने कहा था की कलियुग में गाय, ब्राह्मण और देवताओं का सम्मान और इनपर लोगों की आस्था ख़तम हो जायेगी। पर लगता है कलियुग की काली छाया अब पुलिस महकमें पर भी पड़ने लगी है। जिसका
 
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कारगिल युद्घ और दोराहे पर खड़ी ज़िन्दगी..

पत्रकारिता एक ऐसा जगत है जहाँ जितना भी अच्छा काम कर किया जाए मगर समाज के हरेक एक तबके को आप संतुष्ट और खुश कर सको ये सम्भव नहीं है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारिता का सबसे बड़ा उसूल और मकसद सिर्फ़ सामाजिक बुराइयों से पर्दाफाश करना ही नहीं होता बल्
 
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शोपियां, अब्दुल्ला और काश्मीर..

शोपियां और उमर अब्दुल्लाह के बारे में बहुत कुछ कहा सुना गया है। हालाँकि लिखने का कहने से भुक्तभोगी का दर्द कम नहीं किया जा सकता फिर भी सच का सामना करना ज़रूरी है। सच क्या है ? क्या ये सच है जो लेखक ने ख़ुद कश्मीर के हर गली नुक्कड़ में जा कर खोजने की
 
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अभिनेता-क्रिकेटर या सेल्समैन..

हर सेल्समैन अभिनेता या क्रिकेटर को ये ज़रूरी नहीं मगर हर अभिनेता और क्रिकेटर एक सेल्समैन हो ये अब बहुत ज़रूरी हो गया है। और ये सेल्समैन का खिताब उन्हें दिया जा रहा है उनकी सफल फिल्मों और शतकों कि गिनती से भी ज़्यादा लम्बी उनके विज्ञापनों कि सूची के ल
 
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नाम में क्या रखा है??

फ़िल्म और टेलीविजन की दुनिया में कुछ नियम ऐसे हैं जो वर्षौ से निभाए जा रहे हैं और आने वाली कई सदियों तक बिना किसी फेर बदल के निभाए जाते रहेंगे। पत्थर पर खिंची लकीर की तरह इन नियमों में एक अहम् नियम है किसी फ़िल्म या धारावाहिक के किरदारों का सरनेम यान
 
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राज ठाकरे जी, ये क्या हो रहा है??

जब से राज ठाकरे ने "मराठा वाद" का राग छेड़ा है तब से मैं मुंबई में चलने वाली हवाओं में एक अजीब सा परिवर्तन देख रही हूँ। चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी का जिस तरह सुपडा साफ हुआ वो तो खैर होना ही था लेकिन उसके पहले ही टेलिविज़न जगत ने जैसे कसम खा ली थी
 
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जब बड़े ईमाम साहब ने की छोटी बात..

बात तब की है जब मैं आतंकवाद पर आधारित एक कार्यक्रम बना रही थी। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इस कार्यकर्म में मुझे आतंकवाद से सम्बंधित हर घटना में वो सबूत दर्शकों के सामने रखने होते थे जो ये साबित कर सकें की पड़ोसी मुल्क ही भारत में आंतकवाद को समर्थ
 
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देखी कवियों की बनियागिरी..

टेलीविजन केलिए काम करते हुए कई बार अजीबोगरीब किस्से देखने को मिलते हैं। जो हैरान भी करते हैं और कभी कभी परेशान भी। ऐसा ही हैरान-परेशान करने वाला एक वाक्या मुझे देखने को मिला जब मैं एक रियैलिटी शो के लिए काम कर रही थी। इस शो पर खेलने वाले के सामने जीत
 
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टीआरपी बढ़ रही है तो कृष्ण जी कैसे बढ़ेंगे??

मुरली मनोहर, कृष्ण कन्हैया, नन्द किशोर, रणछोर, गोविन्द, गोपाल, माखनचोर और भी न जाने कितने नाम हैं माँ यशोदा के लाडले कृष्ण कन्हैया के। उस बंसीधर को आज एक नाम मैं भी दे रही हूँ और उनका ये नया नाम है "टीआर पी चोर"। जी हाँ जब से इस नन्हे नटखट का अवतरण क
 
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रीति-रिवाज़ ही नहीं संविधान भी बदलना होगा..

आज़ादी, लोकतंत्र और मौलिक अधिकार मिलने के बाद क्या आपको नही लगता की हमलोगों ने अपनी सोचने समझने की ताकत खो दी है?? देश, समाज, यहाँ तक कि हमारी अपनी जिन्दगी कौन सी दिशा की और जा रही है, किसी के पास वक्त नहीं है ये सब सोचने का॥ त्रिशंकु सरकारें देखते-दे
 
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भीड़ में भी "तन्हा"..

पल पल बड़ते कदम, कुछ तेज़ तेज़ कुछ मधम मधम वो चीख वो अंदाज़, क्या मौत इसी को कहते हैं ?? आसमानों में टिमटिमाते दिये जैसे तारे, जो इस तूफान में कुछ धुंधले हो रहे हैं ये बरफ सी ठंडी आह, मासूम बियाबान रात, क्या मौत इसी को कहते हैं ?? याद है ज़िन्दगी भी है
 
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जनता "राग" नेताओं केलिए..

चुनावी मौसम में हर पार्टी अपनी पसंद का गीत संगीत रच कर जनता के कान, आँख, दिल सब को मोह लेना चाहती है॥ अब हमारे नेताओं में इतनी सृजनात्मकता यानि क्रिएटीवीटि भरी है तो जनता का भी कुछ फ़र्ज़ बनता है की उन्ही के अंदाज़ में उन तक अपनी बात पहुँचाने का बंदो
 
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प्रजातंत्र, चुनाव और जूता..

सुना है की कल असम में कोई बम्ब ब्लास्ट वगैरह हुआ था॥ और कोई ८-९ लोग मारे भी गए थे॥ टीवी तो मैंने कल भी देखा था मगर शायद मीडिया उस ख़बर से ज़यादा प्रभावित नही हुआ इसलिए मीडिया की भट्टी असम ब्लास्ट के अंगारे ज़्यादा गरम नही हुए॥ ये भी मुझे आज पता चला॥
 
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फ़िल्म इंडस्ट्री, प्रोफ़ेशनलिज़्म और आशुतोष गोवारिकर..

फ़िल्म इंडस्ट्री में ख़ुद को "प्रोफ़ेशनलिज़्म" के इकलौते जन्मदाता माननेवाले लोगों की कमी नही है॥ इन लोगो को अपने किसी खास रवैये की वजह से यह ग़लतफ़हमी होती है या यूँही "ज़रा हटके" जुमले का इस्तेमाल करने को लालायित ये लोग अपनेआप ही अपने माथे पर "प्रोफ़ेश
 
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मुंबई : मायानगरी की माया..

भारत की वाव्सयिक नगरी " मुंबई" जिसके बारे में कहा जाता है की ये शहर कभी सोता नही है॥ और ये बात वाकई सच है॥ इसी शहर को कुछ लोग मायानगरी भी कहते हैं॥ क्योंकि ये वो नगर है जहाँ आसमान के तारे ज़मीन पे नज़र आते हैं॥ हालाँकि शूटिंग वगरह के सिलसिले में ये सि
 
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हिन्दी में ब्लॉग : आख़िर क्यों ??

ये नया हिन्दी ब्लॉग शुरू करते वक्त ही मेरे दिमाग में ये बात उठी थी की मुझे इस सवाल का जवाब कई बार देना होगा॥ हिन्दी में एक ब्लॉग क्या शुरू कर दिया मानो ये एक सवाल जी का जंजाल बन गया है॥ कुछ टिपण्णयों पर ग़ौर फरमाइए--क्या फायदा ऐसी भाषा में ब्लॉग लिखने
 
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मायावती का ब्राहमण प्रेम..

बात तब की है जब मीडिया में मेरा जन्म हुए कुछ महीने ही हुए थे॥ मौका मिला सुश्री मायावती से नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर उनसे रु-ब-रु होने का॥ खुदको दलित और गरीबों की मसीहा कहने वाली, ५० करोड़ से ज़्यादा की सम्पति की मालकिन, पेशे से एक अध्यापिका
 
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