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अमृता प्रीतम, यादों के झरोंखों से...
लाखों लोगों की भीड़ में किसी को होश न था, सब अपनी अपनी जान बचा कर निकलना चाहते थे, कोई दबेकुचले या मर ही क्यों न जाए किसी को कोई परवाह नहीं। जाने कितने ही बच्चे यतीम हुए, कितनी ही मांगों का सिंदूर उजड़ गया और कितनी ही कोख सूनी हो गई... बात भारत पाक
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Apr 13 2010 03:04 PM


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