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बातें जो छूट गईं

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13 Apr 2010
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अमृता प्रीतम, यादों के झरोंखों से...

लाखों लोगों की भीड़ में किसी को होश न था, सब अपनी अपनी जान बचा कर निकलना चाहते थे, कोई दबेकुचले या मर ही क्यों न जाए किसी को कोई परवाह नहीं। जाने कितने ही बच्चे यतीम हुए, कितनी ही मांगों का सिंदूर उजड़ गया और कितनी ही कोख सूनी हो गई... बात भारत पाक
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हंसो हंसो जल्दी हंसो

हाय, ये क्या हुआ, ये अप्रैल फूल का दिन एक बार फिर आ पहुंचा है. मेरे पल्ले से तो यह बात दूर है कि कोई आपको पागल कह कर हंसे और आप भी उस के साथ ही हंस दें। साल का एक ऐसा दिन जब आप भी मुर्ख हैं और दूसरे भी सुनने में कुछ अटपटा सा लगात है... चलो मान लिया ज
Dec 29 2009 11:58 AM
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हर कवि मेरा दुश्मन सा क्यों है...

अगर आप इस ब्लाग पर इस उम्मीद के साथ आए हैं कि यहां आप को कुछ अच्छा पढऩे को मिलेगा, तो मैं आप से माफी चाहूंगी। क्योंकि इस ब्लाग के कर्ताधर्ता आजकल मानसिक विक्लांग्ता के शिकार हो गई हैं। वे किसी तुच्छ प्राणी के मोहपाश में फंस कर सब कुछ भुला चुकी हैं. इ
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मेरा अनोखा सपना

नागार्जुन की कविता आज सुबह से खूब याद आ रही है, चंदू मैंने सपना देखा. पहली बार में इस कविता का मतलब समझ नहीं पाई थी. बस तुकबंदी देखकर यह लगा था कि एनसीआरटी की किसी किताब की कोई कविता है. खैर हुआ यह कि रात को एक अजब सा सपना मुझे आया, जो इस कविता की तर
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शारीरिक व मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे लोगों पर अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम

संभव 2009 शारीरिक व मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे लोगों पर अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम शारीरिक व मानसिक चुनौतियां झेल रहे बच्चों व उन के लिए काम कर रही संस्थाओं व लोगों के लिए नवंबर 2009 की 14 व 15 तारीखें खास हैं। सालों से ऐसे लोगों के बीच काम कर रही संस
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यह पीड़ामयी बयार

बह चली है कैसी, पीड़ामयी यह बयार, जो बुनती रहती है, विपुल क्रन्दन अपार, अनायास ही दे जाती है अनचाहे मुझको अश्रु उत्स उधार, प्रणय का तुम्हारा चुंबन मेरी स्मृति बराए जूं आहार, हाय, नेस्ती छाई है बन जीवन विहास. उसकी वाय में घुलना तुम्हारा ए मेरे अवरुद्ध
Oct 14 2009 07:59 PM
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बातें जो छूट गईं...: मेरी कुछ फालतु बातें...

बातें जो छूट गईं...: मेरी कुछ फालतु बातें...
Oct 14 2009 07:59 PM
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बातें जो छूट गईं...: मेरी कुछ फालतु बातें...

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Oct 14 2009 07:59 PM
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मेरी कुछ फालतु बातें...

कई बार भावनाओं का तेज प्रवाह शब्दों का कंगलापन बन कर सामने आता है और उसमें अगर वक्त ऊब की काई भी लगा दे, तो यह कंगलापन और भी बढ़ जाता है, इसलिए ही शायद समझ नहीं पा रही कि क्या लिखूं. फिर भी जो बन पड़ा ऊटपटांग लिख रही हूं, क्योंकि अगर मन में भरे इस दर्द
Oct 14 2009 07:59 PM
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बगैर शीर्षक

रोज सुबह नहाधोकर पूजा करना, माथे के साथ ही थोड़ा सा सिंदूर अपनी मांग में बालों की ओट में ही कहीं लगा लेना. कुछ ऐसी ही चोरों जैसी शुरूआत होती है दिन की. यह सोचकर बहुत सकूं आता है कि जिसे समय से न छीन सकी कल्पना लोक में उस निर्मोही पर मेरा वश चलता है. फ
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शायद शीला दिल्ली को अपना नहीं मानती

सीधे शब्दों में एक छोटी सी बात रखना चाहूंगी। गर्मी लगातार बढ़ रही है, सूरज अपनी रोषनी से लोगों को जला रहा है, लगातार बिजली की कमी के चलते कटौती हो रही है, लेकिन देखने वाली बात यह है कि कितनी बिजली हम स्ट्रीट लाइट या रोड साइड एड पर खर्च कर देते हैं। स्
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‘बित्ति बांधै डोरडी ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘

एक दौर हुआ करता था कि मां अपने बच्चों को घर में ठूंठती रह जाती थी, पर बच्चे चिलचिलाती धूप या कड़ाके की ठंड की परवाह किए बगैर यहां से वहां मारे मारे फिरते थे. वजह थी खेल. बच्चे खेल खेल में एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंच जाते या फिर सुबह से शाम होने तक
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एक पत्रकार की कहानी

हाल ही में हमारे एक और पत्रकार भाई की संदिग्ध हालातों में हत्या की खबर मिली. इन दिनों इस तरह की हत्याओं के मामले कुछ ज्यादा ही सामने आ रहे हैं. शायद इसी के चलते हमारे बास ने हमें हाल ही में एक दमदार स्टोरी करने से मना कर दिया. हमारी तैयारी पूरी थी कु
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त्रासदी भरी एक रात...

ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं- ओह ! मैने फिर से सिर पकड़ लिया और बड़े बेमन से फोन उठाया। ''क्‍या है'' ? सामने से किसी एक चाहने वाले के वही चिंता भरे शब्‍द जो पिछले आधे घंटे से सुन रही थी, ''कहां पहुंची,
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बहकही न इहीं बहिनापूरी

हाय राम ये क्या हुआ! एक और बलात्कार। न जाने ये आदमी इतने भूखे क्युं होते जा रहे हैं कि अपनी औलाद तक को नहीं बक्षते। कई बार तो इनकी निक्कर से टपकती दर्जनों-लिटर लार को देखकर मैं भी घबरा जाती हूं कि कहीं मैं ही तो इनका अगला षिकार नहीं और मैं हूं भी तो
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सफीक का हुनर मानों उधार का पैसो

क्या आप ने कभी दीवार से हार्न बजाने की आवाज सुनी है या फिर कभी आप के कांवकांव करने पर आसमान में कौवे इकट्ठे हुए हैं. आप सोच रहे होंगे कि यह सिर्फ फिल्मों में होता है, पर यकीन मानिए एक ऐसा शख्स है, जो यह सब कर सकता है. पर किसी हिन्दी फिल्म का हीरो नही
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मेरे गुन-ओगुन गिनों न गोपीनाथ

बस के बारे में मै तो बस इतना ही कहता हूं किजे चित सोई रहे निज पतितन के साथ मेरे गुनओगुन गिनों न गोपीनाथ (ब्लू-घोस्ट) मै तो नित यही प्राथना करता हुं किः- हे! संहारक मेरी रक्षा करना। बचपन से हमें पढाया और समझाया गया कि जीवन का स्वामी उपरवाला है और आज म
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कंप्यूटर से मुझे बचाओ

कंप्यूटर... ओह, यह शब्द सुनते ही मैं झल्ला जाती हूं। एक ऐसा नाम, जो मेरी जिंदगी में खासी अहमियम रखता है, लेकिन फिर भी मैं इस नाम से चिढ़ती हूं. जनाब, अब ये न पूछ बैठिएगा कि इतनी अच्छी चीज से मैं भला क्यों चिढ़ती हूं ? क्योंकि मैं इस का कोई कारगर जवाब न