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अमीर धरती गरीब लोग

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10 Jun 2010
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क्या सच मे हमने बहुत तरक्की कर ली है?क्या सच मे हम पढे-लिखे कहलाने का हक है?

कहने को हमने बहुत तरक्की कर ली है मगर इक्कसवी सदी मे जब हम छुआछूत की बात करते हैं तो हमारी तरक्की की पोल खुल जाती है.इंसान होकर जब हम इंसान को सिर्फ़ एक बीमारी की वजह से अलग-थलग बस्ती बसाकर जीने पर मज़बूर कर देते हैं तो खुद हमारी इंसानियत पर सवाल खडे हो
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रक्तदान की इच्छा हो तो……………………………………

एक छोटी सी पोस्ट बहुत कुछ कहती हुई।सुबह-सुबह एक एसएमएस मिला अंजान नम्बर से।सीधे डीलिट कर रहा था कि उस छोटे से एसएमएस को पढे बिना रहा नही गया।एसएमएस भी बहुत ही छोटा सा था।अगर आपको रक्तदान की इच्छा हो तो, यंहा सड़क पर मत करिये,कृपया ब्लड बैंक मे करिये।रोज़
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ढोकला सिर्फ़ आपको ही नही हमे भी अच्छा लगता है!

ढोकला!सुनते ही मुंह मे पानी आ जाता है।नर्म और ताज़े ढोकले हो और दोस्तो का साथ हो तो फ़िर कहना ही क्या है!ढोकला अब गुजरात की डिश नही रह गया है और इसकी डिमांड हर जगह होने लगी है।ढोकले की दावत उड़ाने मे कोई पीछे नही रहता।ढोकला अब एक कामन और पाप्यूलर डिश बन गया
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हर कोई स्वागत के लिये तैयार है बरखा रानी के मगर …।

हम जिस बात पर खुश हों ,ज़रुरी नही हर कोई खुश हो जाये!अब बरखा रानी को ही ले लिजिये,किसानो की तो वो जान है!वैसे भी तीन माह की तपा देने वाली गरमी से राहत केवल वही दिला सकती है और इसिलिये उसका सभी बेसब्री से इंतज़ार भी कर रहे हैं।केरल मे तो उसने कदम रख भी दिये
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ज़िंदगी के लिये मौत की छलांग!

ज़िंदगी के लिये मौत की छलांग!जी हां ये सच है और उस छलांग की कीमत भी कितनी?आप कल्पना भी नही कर सकते कि इंसान की ज़िंदगी इतनी सस्ती है।महज़ कुछ सौ रूपये,बस।एक छ्लांग के लिये इतना और छलांग सही हुई तो दूसरी छलांग की तैयारी और अगर एक बार भी चूक हुई तो फ़िर भगवान
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मंच पर पंहुच कर बगले क्यों झांकने लगे जनाब!

शब्द नही चित्र!पिछ्ले दिनों यंहा एक सरकारी कार्यक्रम हुआ जिसमे सरकारी लोगों को आना था।कार्यक्रम की तैयारी पूरी हो चुकी थी और मंच भी सज-धज कर तैयार था,बस इंतज़ार था तो उद्घाट्न की औपचारिकताओं के बाद कार्यक्र्म की शुरूआत का,तभी सरकारी से भी ज्यादा एक
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‘बुलेट’ वाले ‘बैलेट’ से क्यों लड़ेंगे दिग्गी राजा?

हरा - भरा बस्तर निर्दोष लोगों के खून से लाल हो रहा है और नेताओं में वाक्युद्ध चल रहा है। और इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं दिग्विजय सिंह उर्फ दिग्गी राजा! वही दिग्विजय सिंह, जो सालों बस्तर समेत पूरे छत्तीसगढ़ के भी मुख्यमंत्री थे। क्या तब हमले नहीं किया
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चिदंबरम जी नक्सली यात्री बस उडाने लगे हैं,तीस लोग मरे हैं,क्या अब भी आप कहेंगे कि सेना नही भेजेंगे!

बस्तर के लिये आज काला दिन है!बस्तर क्या सारे छत्तीसगढ के लिये काला दिन है.नक्सलियों ने पहली बार यात्री बस यात्री बस को बारुदी सुरंग से उडा दिया.बस मे यात्रियों के साथ कुछ जवान भी सवार थे.अभी कल ही नक्सलियों ने आधा दर्जन नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया
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फ़ैमिली का मतलब सिर्फ़ मियां-बीबी और बच्चे,बस!

एक छोटी सी पोस्ट और उसके जरिये छोटे-छोटे कुछ सवाल भी।आज वर्ल्ड फ़ैमिली डे है।फ़ैमिली!इस शब्द ने आज मुझे चौंका दिया!बहुत दिनों बाद इस शब्द का अर्थ ढूंढने की कोशिश की।बहुत सोचा तो बहुत सारे जवाबों के साथ-साथ बहुत से सवाल भी सामने आने लगे।फ़ैमिली का मतलब क्या
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सेना नही भेजना है,मत भेजो मगर दुनिया को बताओ तो मत चिदंबरम जी

नक्सलियों से निपटने के मामले मे सेना का उपयोग करेंगे,ऐसा कहना है हमारे विद्वान गृहमंत्री चिदंबरम साहब का।उन्होने ऐसा करना नैतिकता के खिलाफ़ माना है।तो चिदंबरम जी नक्सली कौन सा नैतिक काम कर रहे हैं ये भी बता दिजिये।क्या घात लगाकर पुलिस या सीआरपीएफ़ के
May 12 2010 10:58 AM
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बढते वृद्धाश्रमों और उसमे बढती माताओं की संख्या!क्या हमे मदर्स डे मनाने का हक़ है!

बढते वृद्धाश्रमों और उसमे बढती माताओं की संख्या!क्या हमे मदर्स डे मनाने का हक़ है!ये सवाल मुझे कल से बेचैन कर रहा है।मदर्स डे पर स्पेशल स्टोरी के लिये कुछ ने पुछा तो मुझे कुछ सुझा भी नही।मुझे यंहा के बाल आश्रम मे रहने वाले बच्चे भी याद आये जिन्होने मुझे
May 09 2010 01:29 PM
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आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?

एक बहुत छोटी सी पोस्ट मे एक सवाल सामने रख रहा हूं,जो टीवी वाले के लिये तो बहुत छोटा सा हो सकता है मगर हम दर्शकों के लिये वो बहुत ज़रूरी है।आखिर समझ क्या रखा है अपने दर्शकों को,इन न्यूज़ चैनल वालों ने?जी हां,यही सवाल,मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा गया,आज सुबह
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इतना लम्बा सफ़र तय कर लिया और पता भी नही चला!

बात होती है प्रवृति की और ये मेरी प्रवृत्ति भी दोस्तों से लेकर मामूली जान-पहचान वाले को पता है कि मैंने अपने नाम को हमेशा सार्थक किया।अभी यंहा तो अभी वंहा अपना फ़ेवरेट स्टाईल रहा है और शायद इसिलिये लोग मेरे टिकाऊ होने पर शर्त भी लगा लेते थे।ज्यादा से
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शादी-शुदा नही होने का असली नुकसान आज समझ में आया.

शादी-शुदा नही होने का असली नुकसान आज समझ में आया.लम्बा-चौडा नुकसान झेलने के बाद ये पता चला कि इसका कोई विकल्प भी नही है.छोट-मोटा नही ज्वेलरी सेट का नुकसान हो गया मेरा.सच कह रहा हूं.आई शप्पथ.मतलब मां-कसम झूठ नही बोल रहा हूं.हुआ यूं कि दोपहर को फ़ोन की
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शरद कोकास का भेजा हुआ संदेश सोचने पर मज़बूर करता है!

आज पृथ्वी दिवस है।कुछ लोग इसे अपने-अपने तरीके से मना लेंगे और फ़िर अगले साल तक़ के लिये शायद भूल भी जायेंगे।बहुत से तो शायद, इस बारे मे सोचें भी ना।मुझे भी इसे मनाने की औपचारिकता पूरी करना है।पृथ्वी दिवस पर आयोजित एक प्रदर्शनी का फ़ीता काटकर उद्घाटन कर देना
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जंहा दिल खुशी से झुका मेरा वंही सर भी मैने झुका दिया!

जंहा दिल खुशी से झुका मेरा वंही सर भी मैने झुका दिया!ये बात सौ प्रतिशत सही उतरती है बस्तर के भोले-भाले आदिवासियों पर।जिस पर विश्वास किया उस पर सब कुछ निछावर करते आ रहे हैं और मान्य्ताओं का तो फ़िर क्या कहना।उनकी एक अनोखी मान्यता की खबर मुझे भी मिली जो आप
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हिंसा से दुःखी बापू की पोती मिलना चाहती है नक्सलियों से!

बापू की पोती तारा देवी भट्टाचार्य छत्तीसगढ आई।वे यंहा बा के जीवन पर कस्तुरबा आश्रम मे लगी प्रदर्शनी का उद्घाटन करने आई थी।वे प्रेस क्लब भी आई और उन्होने समाज मे हो रहे बदलाव पर बेबाक राय व्यक्त की।उन्होने नक्सली हिंसा पर दुःख जताया और कहा कि वे उनसे
Apr 20 2010 10:51 AM
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नज़र नही आते लोग अब कटोरियों मे प्यार बांटते!

आज बात बहुत छोटी सी।पता नही क्यों घरों के बीच की दीवारों में अंतर रखने का नियम बना दिया गया है।इससे दीवारों के बीच अंतर तो बढा है शायद उसके साथ-साथ दिलों के बीच दूरियां भी बढती जा रही है।ऐसा मैने महसूस किया है।कल की ही बात है आई ने शाम को आम का नया अचार
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सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा!

सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा!मुहावरा आजकल सुनाई नही पड़ता,कभी स्कूल मे पढाया जाता था।ये याद ललित-अनिल प्रकरण के संदर्भ में।इस मामले में सिर्फ़ दो लोग खामोश रहे एक ललित और दूसरा मैं यानी अनिल।ललित तो अभी भी कुछ कहना नही चाहता और मैं भी,लेकिन जिस तरह
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सभी शादी-शुदा भाईयों और बहनों से क्षमा सहित एक सवाल।विवाह और मताधिकार की उम्र में अंतर क्यों?

फ़िर एक छोटी सी पोस्ट पूरि तरह निर्मल आनंद के लिये।कल मैने सवाल उठाया था विवाह के समय पत्नी दायीं ओर पति बायीं ओर क्यों बैठते हैं?बहुत पसंद किया आप लोगों ने उसे और कुछ भाईयों-बहनों और ताऊ जी ने तो मुझे भी लपेट दिया था उस सवाल में।तो भाईयों और बहनों कल की
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विवाह के समय पत्नी बायीं तरफ़ और पति दायीं तरफ़ क्यों बैठते हैं?

आज छोटी सी पोस्ट।हल्कि-फ़ुल्की,निर्मल आनंद के लिये।सभी से निवेदन है कि इसे उसी रूप मे ले।एक सवाल उठाया गया था दोस्तों के सत्संग में।सवाल ऐसा था जिससे मेरा दूर-दूर तक़ कोई वास्ता नही था,लेकिन बाकी सब उस सवाल से परिचित थे।काफ़ी देर तक़ जब सवाल का जवाब सामने
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अरूंधति आओ,देखो 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया है?अच्छा लग रहा है ना सुनकर?पड़ गई ना कलेजे में ठंडक?हो गया ना तुम्हारा बस्तर आना सफ़ल?

अरूंधति आओ,देखो 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया है?अच्छा लग रहा है ना सुनकर?पड़ गई ना कलेजे में ठंडक?हो गया ना तुम्हारा बस्तर आना सफ़ल?तुम तो सात दिन रहीं थी नक्सलियों के साथ,है ना?उनकी दलाली मे एक बड़ा सा लेख भी लिख मारा था,है ना?बड़ी तारीफ़ हुई
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कितना चूसोगे अपनी ही मां को?दूध खतम हो चुका और अब तो खून भी खतम हो रहा है!

कितना चूसोगे अपनी ही मां को?उस मां को जो हमारे खाने पीने का आदिकाल से खयाल रखती आ रही है।उस मां की हालत हम लोगों ने अपने लालच से बदतर कर दी है।अब वो बेज़ार हो चुकी है।सड़क पर पड़े कमज़ोर जानवर की तरह जिसके जिस्म मे खुद के लिये कुछ नही और उसके शरीर से लिपटे
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क्या ये रेड कारीडोर बन जाने का ठोस सबूत नही है!

रेड कारीडोर पर बहुत समय से बात चल रही है।इसके अस्तीत्व पर सवाल उठते रहें है और रेड कारीदोर के इस्तेमाल पर अभी तक़ शंकाओ की धुंध छाई हुई थी।लेकिन यंहा जो छत्तीसगढ मे हुआ उससे तो लगता है कि रेड कारीडोर का बाकायदा इस्तेमाल शुरू हो गया है और इसे ट्रेफ़िक के
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इससे अच्छी तो पुरानी कारें होती साब!

कौन सी गाड़ी है?सफ़ारी! अरे वो तो हाथी है साब क्यों पाल लिया?गुस्सा तो भरपुर आया मगर उसे अपने साथ ले जाना था इसलिए मन मार कर कहा अरे नही बहुत बढिया गाड़ी है।होगी साब मगर उससे अच्छी तो पुरानी कारें होती साब!मेरे पड़ोस के इलाके मे गैरेज चलाने वाले मैकेनिक ने
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आमीर खान को तो हमारे शहर के कुली तक़ टक्कर दे रहे हैं!

आमीर खान को तो हमारे शहर के कुली तक़ टक्कर दे रहे हैं!जी हां बिल्कुल सच कह रहा हूं।क्या?कल की पोस्ट है ये।नही भई अप्रेल फ़ूल वाली पोस्ट नही है ये।मैं श्त-प्रतिशत सच कह रहा हूं।आमीर खान को मेरे शहर मे न केवल कुली बल्कि कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा टक्कर दे
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क्या मिनी स्कर्ट या टांगो की नुमाईश ही नौकरी की फ़ुल गारंटी है?

बड़ा सवाल उठाती हुई एक छोटी सी पोस्ट लिख रहा हूं।क्या नौकरी की फ़ुल गारंटी मिनी स्कर्ट या टांगो की नुमाईश से ही मिलती है?ये सवाल मुझे कचोट रहा है।क्या लड़कियों की सबसे बड़ी योग्यता उसका खुलापन या शरीर ही है?क्या उनके पास और कोई योग्यता नही होती?क्या
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क्लोज़िंग,क्लोज़िंग,क्लोज़िंग!क्लोज़िंग का मतलब बंद नही शुरू!टैक्स चोरी रि-ओपनिंग!

क्लोज़िंग,क्लोज़िंग,क्लोज़िंग!जिससे बात करो वो बिज़ी।उधार मांगो तो क्लोज़िंग के बाद।मदद मांगो तो भी क्लोज़िंग के बाद।जिसे देखो वो क्लोज़िंग को लेकर परेशान है।बस यार एक दिन की तो बात है एड्जेस्ट कर ले।कल फ़्री हो जाऊंगा।फ़्री हो जाऊंगा?याने अभी फ़ंसा हुआ है?जब इस
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चलिये दर्शन करवाता हूं मां बम्लेश्वरी के!

नवरात्र में मां बम्लेश्वरी के दर्शन का सौभाग्य फ़िर से मिला।सालों से हमारी मित्रमण्डली मैया के दर्शन के लिये जाती है।ये सिलसिला शुरू हुआ था कालेज के दिनों से तब सुबह हावडा मुम्बई एक्स्प्रेस से जाते थे और मुम्बई-हावड़ा मेल से लौट आते थे।वक़्त गुज़रता गया और
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जो दवा के नाम पे ज़हर दे?

इस देश मे नियम बनने के पहले ही उसके तोड़ ढूंढ लिये जाते हैं।और उसी तोड़ की आड़ मे बड़े-बड़े खेल किये जाते हैं मगर ये सब बड़े लोगों के लिये ही है,छोटे-मोटे लोग अगर वैसा कुछ ट्राई करते हैं तो तोड़ गायब और नियम सख्त हो जाते हैं।इसमे कोई शक़ नही जितना मज़ाक नियमों का
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यार आईपीएल मे छत्तीसगढ की टीम कब खेलेगी?अबे सब क्रिकेट खेलने लग जायेंगे तो ………………

एक बहुत बड़ी बात कहने के लिये एक बहुत ही छोटी सी पोस्ट।आईपीएल का बुखार सारे देश मे सिर चढ कर बोल रहा है।पुणे और कोच्ची की टीमें भी बिक गई और वे भी खेलती नज़र आयेंगी आईपीएल में।अभी तक़ छत्तीसगढ की क्रिकेट टीम इसमे नज़र नही आई है और निकट भविष्य मे इसके नज़र आने
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ये डीज़ल लगा-लगा कर थक़ गया आज तक़ किसी ने पलट कर देखा तक़ नही,सोचता हूं अब पर्फ़्यूम बदल ही लूं,ऐक्स इफ़ेक्ट कैसा रहेगा?

बड़ी-बड़ी बात करने के लिये ज़रूरी नही है बड़ी पोस्ट लिखना सो एक छोटी सी पोस्ट आप लोगों के विचारार्थ सामने रख रहा हूं।वैसे तो मेरी खुद की नाक बहुत खराब है मगर पर्फ़्यूम लगाने का बड़ा शौक है मुझे।फ़िलहाल डीज़ल यूज़ कर रहा हूं और इससे पहले भी बढिया से बढिया पर्फ़्यूम
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क्या आत्महत्या ही सारी समस्याओं का हल है?

क्या आत्महत्या ही सारी समस्याओं का हल है?ये सवाल मेरे अकेले का नही है और ये अचानक़ ही मेरे दिल-दिमाग में उथल-पुथल नही मचा रहा है।पिछले कुछ दिनों से इस सवाल ने मुझे बैचैन कर दिया है।आखिर आत्महत्या से सारी समस्यायें खत्म कैसे हो सकती है?मेरे हिसाब से तो
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भले ही रोमेंटिक मूड़ की ऐसी की तैसी हो गई पर मेरी छाती पर कोई बोझ नही बढा!

दो दिनों से अच्छा-खासा रोमेंटिक मूड़ मे चल रहा था कि आज अचानक़ एक एमरजेंसी मीटिंग आ गई।पुराने दिनो की खूबसूरत यादों के नख्लिस्तान मे चैन की बंसी बजाता देख शायद किसी को अच्छा नही लगा और उसकी नज़र क्या लगी एक बेहद कठीन परीक्षा से गुज़रना पड़ गया।मुझे आज मेडिकल
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सीज़न परीक्षा का,गैस पेपर और खूबसूरत यादें-2

दूसरे दिन तो दोपहर शायद कुछ और ज्यादा अलाली दिखा रही थी और शाम कुछ ज्यादा ही शर्मा रही थी।नही शर्मा रहे थे बस हम सभी भाई(दोस्त)जो समय से पहले अपने अड्डे पे हाज़िर हो गये थे।लग रहा था कि आज कुछ खास बात है।मैं,चून्नू और दिलीप दढियल थे और बाकी सब खुरदुरे
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सीज़न परीक्षा का,गैस पेपर और खूबसूरत यादें!

एक दिन अचानक़ एक स्कूटर आकर रुका और उसपर सवार दो युवतियों मे से एक ने पूछा कि दिलीप जी से मिलना है?जो स्कूटर चला रही थी वो तो बेहद साधारण थी लेकिन पीछे जो बैठी थी वो बला कि खूबसुरत थी।उस सूखे-तपते रेगिस्तान मे दोनो का आ जाना अमृत की बूंदो के समान सुखदायी
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लड़कियां मोबाईल का प्लान नही है टाटा सेठ जो चाहे रोज़ बदल लो!

टीवी पर आजकल एक विज्ञापन खूब दिखाया जा रहा है वो है एक मोबाईल कंपनी का।इस विज्ञापन में एक जोड़ा रेस्त्रां मे बैठा रहता है और अचानक़ लड़का प्रेम पर सवाल खड़ा करता है जिस पर लड़की भी सहमती जताती देती है और लड़का लड़की से कहता है कि आज से वे दोस्त हैं और लड़का ऊठ
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थानेदारों को भ्रष्ट कहना आपकी ईमानदारी नही बेबसी का सबूत है गृहमंत्री जी!

छत्तीसगढ के ग़ृहमंत्री ने विधानसभा में ये कह कर सब को चौंका दिया कि थानेदारों को दस हज़ार रूपया महिना बंधा है।वे अवैध शराब की बिक्री को संरक्षण दे रहे हैं।अब बताईये भला ये बयान क्या काफ़ी है।बात तो होती जब गृह मंत्री भ्रष्ट थानेदारों की सूची या एकाध नाम
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समय मूल्यवान है किन्तु जीवन उससे अधिक!

बचपन से हाईवे पे लिखे एक सरकारी नारे को पढता आ रहा हूं।समय मूल्यवान है किन्तु जीवन उससे अधिक!पता नही किसे समझाने के लिये लिखे जाते हैं ऐसे नारे और उनका कितना असर उन लोगों पर पड़ता है।रोज़ दुर्घटनायें!रोज़ दर्दनाक मौत!खौफ़नाक मंज़र!दिल दहला देने वाली खबर!मगर
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इश्क़ मे ज़ालिम तेरे हमे रिक्शा तक़ चलाना पड़ा मगर तू है के फ़िर भी ………………

कह्ते है इश्क़ निकम्मा बना देता है लेकिन हमने इसे झूठलाते हुये रिक्शा तक़ खींच डाला।मगर हाय रे किस्मत!सालों साल से सिंगल होने का ताना सहते-सहते परेशान होने के बाद एक रोज़ अंदर से हूक उठी और हमने भी एलान कर दिया कि बहुत हो गया ये सिंगल होने का नया शब्दार्थ
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Mar 05 2010 10:01 AM