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गुलमोहर का फूल

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13 Jun 2010
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मेरे अतीत का आँगन

आह !!! कैसा है यह दुःसाहस, देखता हूँ मुड़कर मैं, अपने अतीत के उस खण्डहर को, अपने आँगन में, सर झुकाए मैं खड़ा था । टूट रहा था विश्वास, खत्म हो रहे थे सारे सम्बन्ध, मेरे मन के उस आँगन में । और मिट चुकी थी भविष्य की रेखाऐं मेरे छोटे-छोटे हाथों से । मुझे याद
 
चंदन कुमार झा
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क्यों…?

खाली रह जाता हूँ मैं, बार-बार । जितना भी तुम भरती हो, मैं खाली होता जाता हूँ । तरल होता जाता हूँ, पल-पल, हमेशा, मैं ठोस होने की कोशिश में ।
 
चंदन कुमार झा
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अगले जनम मोहे कौआ न कीजो

रोज शाम को यूनिवर्सिटी ग्राऊंड में दौड़ने के लिये जाता हूँ । मैदान के चारो तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़ लगे हुए है । आज कैम्पस में यूथ फ़ेस्टिवल का अंतिम दिन था तो कुछ छात्र पटाखे इत्यादि फ़ोड़ रहे थे । इन पटाखों की आवज से डरकर सैकड़ो नहीं हजारों कौवे पेड़ से उड़कर
 
चंदन कुमार झा
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कॉलेज के दिन…….याद आएँगे……

आज कॉलेज का अंतिम दिन था । कुछ दिनों में फाईनल परिक्षायें होंगी, उसके बाद हम सभी छात्र अपना बोरिया- बिस्तर बाँध यहाँ से निकल पड़ेगे । चार साल किस तरह बीत गये, कुछ पता हीं नहीं चला । मन दुःखी इसलिये है कि हम सभी दोस्त एक दूसरे से बिछड़ जायेंगे और ना जाने
 
चंदन कुमार झा
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सुबह तक

मुझे पसंद नहीं सूरज का डूबना । न जाने कौन सी एक आग अन्दर हीं अन्दर जलती रहती है । कण- कण पिघलता जाता हूँ सुबह तक कहाँ बच पता हूँ । 
 
चंदन कुमार झा
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क्योंकि मैं घबड़ा जाती हूँ तेरी नाराजगी से

दीदी समता की एक रचना-   बगैर आँसू के जो गुलशन हरा न हो, भला क्या वास्ता हो उस हरियाली से ।   वो आईना धुँधला ही पर जाये तो बेहतर हो जो खौफ़ का समां बना अपनी सफ़ेदगी से ।   बहुत चाहा, बहुत समझा अपना जिसे, कैसे नवाज दूँ उसे शब्द अजनबी से ।
 
चंदन कुमार झा
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जाल (Trapped)

कॉलेज के कुछ दोस्तों ने मिलकर ५ मिनट की एक छोटी सी फ़िल्म “TRAPPED” बनाई थी । यह उनका पहला प्रयास था ।  बिना संवाद वाले इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह एक छात्र गलत संगत में पड़कर, अपना जीवन बर्बाद कर लेता है ।     और हाँ लगे हाथ मैने
 
चंदन कुमार झा
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एक स्तब्ध पेड़

दीदी “समता” की एक रचना-   पतझड़ सी भंगिमा लिये एक स्तब्ध पेड़ । उसकी निस्तब्धता विच्छिन्न क्यों ? शायद देखता है, अपने साथियों को, सावन आने की खुशी में, खिलते हुऐ , हरियाली दिखाते हुऐ । मगर वह क्यों वंचित है, इन खुशियों से ? प्रकृति नहीं जानता, भेद भाव
 
चंदन कुमार झा
Mar 08 2010 01:00 AM
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पतझड़

इतने वर्षों के बाद, मिली तुम आज, इस तरह, सोचा, खेलूँगा तुम्हारे संग होली, लगा दूंगा, थोड़ा सा गुलाल, तुम्हारे गालों पर, कुछ रंग जा बसेंगे, तुम्हारी माँग में । ढ़ूंढ़ा अपनी पोटली में, पर रंग कहाँ बचे थे वहाँ । शायद पुराने बक्शे में हो, पर सबकुछ तो, साथ ले
 
चंदन कुमार झा
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Mar 03 2010 11:59 PM
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कुछ और सँवर गये होते

  दीदी “समता” की एक रचना-     बीते दिनों को याद करते है हम, वक्त कुछ कम न था, ओह !!!  कुछ और सँवर गये होते । हँसी जो ठहाको में बदल जाती थी, मगर थी सूखी और बेवजह की, कुछ वजह होती और मुस्करा लिये होते, कुछ और सँवर गये होते । राहें
 
चंदन कुमार झा
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Feb 20 2010 08:32 PM
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देखा मैंने

देखा उड़ते धूल को कि झूमते बबूल को छांव में जो पल रहे तृण, कर रहे अठकेलियां वह भी जले वह भी मिटे बच न सके ताप से । देखा जलते हुए तन को और घर्षण करते मन को बूँद-बूँद टपकते, और खत्म होते समय को, देखा पास आते प्रलय को । देखा सृजित होते , नष्ट होते तीव्र
 
चंदन कुमार झा
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Feb 18 2010 11:44 PM
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कुछ बाते इधर उधर की और “वह आदमी”

इस बार बहुत दिनों तक ब्लाग जगत से दूर रहा । पिछली पोस्ट डाले हुए करीब दो महिने हो चुके है । कारण ? कुछ तो इंटरनेट की समस्या, बीच में गांव भी गया था, और कुछ ब्लागजगत से दूर रहने की इच्छा । अगले महिने मार्च में, ब्लागजगत में आये हुए मुझे पूरे एक साल हो
 
चंदन कुमार झा
Feb 13 2010 02:46 PM
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किनारा

किनारे को लांघकर लकीर पर चढ़ता गया मैं । लकीर बढ़ती हीं गयी और रह गया मैं किनारे पर हीं । आखिर यह किनारा खत्म क्यों नहीं होता ?
 
चंदन कुमार झा
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यादों का पहाड़

पहाड़ से नीचे उतरते हुऐ दूर तक दिखते छोटे-छोटे घर जहाँ कैद है अभी भी कुछ भूली-बिसरी यादें । दूर तक फैला हुआ कुहासे में लिपटा गुमशुदा शहर जहाँ से बच निकला था मैं कभी । घुमावदार सड़कों पर फिसलती बस और इन सड़को से भी ज्यादा टेढ़ी-मेढ़ी यह जिन्दगी । जिन्दगी क
 
चंदन कुमार झा
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निर्माण

मैं कह देता हूँ अपनी बात । जब भी मन करता है कह देता हूँ ।   मैं नहीं जानता कि तुम तक पहुँच भी पाती है मेरी आवाज या नहीं  । फिर भी चुप नहीं रह पाता मैं ।   मुझे पता है कि मेरी आवाज बहुत धीमी है । मुझे पता है कि जब भी बोलता हूँ शब्द लड़खड़
 
चंदन कुमार झा
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तुम्हारी प्रतिक्षा में

मैं नहीं कहता कि तुम्हारे लिये ले आऊँगा तोड़कर चाँद तारे । मैं नहीं कहता कि तुम्हारे लिये बना दूँगा पहाड़ को धूल और झुका दूँगा आसमान को जमीन पर । मैं तो बस ला पाऊँगा तुम्हारे लिये ओस में लिपटे धूल से सने डाली से गिरे कुछ फूल जिनमें अभी भी बांकी है सुगं
 
चंदन कुमार झा
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न जाने क्यों

तुम्हारी गीली खुशबू भरती गयी अन्दर तक मेरे फेफड़ों में । विसरित होती गयी धमनियों में । न जाने क्यों बहुत हीं तकलीफ़ होती है आजकल सांस लेने में । आदमी इतनी आसानी से मरता भी क्यों नहीं ।
 
चंदन कुमार झा
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प्रेत

विक्षिप्त सा जीता हूँ एक ठण्डी सी जिन्दगी और मर जा हूँ चुपचाप । होता है इतना सघन अँधेरा कि भटकती रहती है मेरी आत्मा तुम्हारी तलाश में शुरू से अंत तक ।
 
चंदन कुमार झा
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आधुनिकता बनाम प्रकृति

आज एक पुरानी कविता प्रस्तुत कर रह हूँ । इस अनगढ़ सी कविता की रचना उस समय की थी जब मैं दसवीं की कक्षा में था । ************************************************** हाय विधाता !!!!! यह क्या ? अपनों-अपनों के बीच रण, दुर्भाग्य हीं है यह मनुष्य का, उसने हीं
 
चंदन कुमार झा
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एक प्याली चाय

चाय, एक प्याली चाय सिर्फ चाय नहीं यह देती है जीवन उस मरे हुए आदमी को जो बच निकलता है सुबह की खूबसूरत मौत से । और फिर तैयार होता है एक आनेवाली मौत के लिये । अगर आप कहेंगे कि चाय पीना, एक नशा है तो मंजूर है हमें यह नशा । एक प्याली चाय आप खरीद सकते है द
 
चंदन कुमार झा
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आम की बातें

आज कुछ बातें आम की हो जाये । गाँव में अब आम के ज्यादातर पौधे हर साल नहीं फलते है । इसका कारण पर्यावरण प्रदूषण है या फिर जलवायु परिवर्तन ? या यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ? इस बार जब मई-जून में गाँव गया था तो कुछ आम के पेड़ फले हुए थे अतः अगली गर्मियों
 
चंदन कुमार झा
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केरल में बरसात, आम और नारियल के पेड़

यहाँ कोचिन (केरल) में हमारे मकान मालिक ने घर के चारो तरफ विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे लगा रखे है । ज्यादातर पेड़-पौधे नारियल, सुपाड़ी, आम, कठहल, अमरूद, मेंहदी, तुलसी, अमलतास और  केले  के है । काली मिर्च की लतरे सुपारी और अन्य पेड़ों पर चढ़ी रहती
 
चंदन कुमार झा
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चुप हो जाओ

कि एक हवा चली है चुप हो जाओ बह जाओ  । कि एक फूल खिला है चुप हो जाओ खिल जाओ । कि एक दीप जला है चुप हो जाओ जल जाओ । कि एक बादल निकला है चुप हो जाओ बरस जाओ । कि एक पत्ता टूटा है चुप हो जाओ खो जाओ । कि एक सूरज निकला है चुप हो जाओ भर जाओ । कि एक प्रे
 
चंदन कुमार झा
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कि बन जाये आत्मा

बहना नदी की तरह निरंतर, निर्विरोध और तीव्र वेग लिये कि बन जाये आत्मा एक नदी चंचल और मिटा दे अपना अस्तित्व मिलकर अपने इष्ट से । खिलना पुष्प की तरह चटख रंग, महक और सौंदर्य लिये कि बन जाये आत्मा एक पुष्प गुच्छ और कर दे अपना जीवन समर्पित अपने प्रिय के आं
 
चंदन कुमार झा
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ख़्वाब, परिंदा और कहानी

केरल में पालघाट दर्रा जो केरल को तमिलनाड़ू तथा कर्नाटक से जोडता हैं और सुन्दर पहाड़ी का दृश्य)             आधे अधूरे ख़्वाब और यह सिमटता जहान अपने हीं अन्दर बार बार खुद को ढूँढता रहा हूँ मैं ।   **********************
 
चंदन कुमार झा
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दीपावली

मैं तम से भरा अज्ञानी मां एक दीप जला दो जीवन में मां मन के कपाट मेरे बन्द है मां मेरी राह प्रकाशित कर दो मां ।   एक ज्योति जला दो जीवन में फैला दो उजाला जीवन में है सघन अंधेरा जीवन में कुछ रंग भर दो इस जीवन में । खिले फूल कमल सा सबका जीवन महकें
 
चंदन कुमार झा
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ऐसा क्यों होता है ?

कम नहीं था वह प्रेम जो दिया मैंने तुमको । माना कि तुम्हारी कुछ मजबूरियाँ थी । पर चाहती थी मैं भी सबकुछ बांटना तुम्हारा दुःख- सुख और तुम्हारा द्वन्द । मानते हो  न तुम कि अधिकार था यह मेरा । पर तुम्हारा अहम और तुम्हारी मजबूरी । तुम्हारी मजबूरियों
 
चंदन कुमार झा
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मेरे होने का मतलब

जिन्दगी की प्रयोगशाला में  बहुत सारे प्रयोग चलते रहते हैं । कुछ मेरे अंदर  चल रहे है । कुछ आपके अंदर भी चल रहे होंगे । देखते है ये प्रयोग सफल होते है की नहीं । वैसे  इन प्रयोगों के बिना जीवन का बहुत अर्थ भी नहीं । सफलता और असफलता तो आन
 
चंदन कुमार झा
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तूफान के बाद !!!

देखा तो बरसात हुई थी, बाहर सबकुछ भींग चुका था, अन्दर अभी भी सूखा था, आँखे अभी भी गीली हैं ।
 
चंदन कुमार झा
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फूल का कहना सुनो

चित्र- भैया रावेंद्रकुमार रवि )           फूल का कहना सुनो यह कहता कुछ नहीं पर तुम सुन सकते हो सबकुछ । उल्लास, प्रेम, करुणा, दर्द सबकुछ । तुम सुन सकते हो जीवन के हर क्षण रंगों का कण-कण तुम सुन सकते हो सबकुछ । तुम देख सकते हो
 
चंदन कुमार झा
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प्रेम का यह गीत, केरल में बरसात और गाय

अभी अभी जैसे हीं घर के बरामदे की बत्ती जलाई कि एक गाय उठकर खड़ी हो गयी और उसके पीछे उसका बच्चा भी था । अभी यहाँ केरल में तीन दिनों से झमाझम बरसात हो रही है । यहां बैठा मैं पोस्ट लिख रहा हूँ और बाहर वर्षा में  नारियल, केले, कटहल और काली मिर्च के प
 
चंदन कुमार झा
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असमंजस

तुम हँसती हो और हजार – हजार फूल खिल जाते हैं मेरे जीवन में । तुम रोती हो और फैल जाता है  अँधेरा दूर -  दूर तक मेरे जीवन में । और जब तुम चुप रहती हो निर्वात से भर जाती है मेरी आत्मा । न जाने तुम क्या चाहती हो ?
 
चंदन कुमार झा
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टोपीयां

      बहुत हीं शांत, सौम्य और सज्जन पुरुष थे वे लोग । और पहने हुए थे सच से भी ज्यादा साफ़ और स्वच्छ कपड़े । लोगों को पहनाया करते थे अपनी सफ़ेद टोपीयां । लोग आज भी टोपीयां पहने हुए पाये जाते है ।      
 
चंदन कुमार झा
टैग: कविता
Sep 25 2009 03:18 AM
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बंद पानी की बोतल

                               (गांव में ली गयी तस्वीर)     उस साल जब सूखा पड़ा था मेरे गांव में ।
 
चंदन कुमार झा
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Sep 23 2009 01:41 AM
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विश्व सिनेमा – गाँधी(1982)

 पिछले तीन वर्षो में करीब 350 फ़िल्में देख चुका हूँ   । इनमें ज्यादातर अंग्रेजी और थोड़ी बहुत हिंन्दी और अन्य विदेशी भाषाओं में बनी फ़िल्में  हैं । हिन्दी में बहुत ही कम, गिनी चुनी फ़िल्में बन रही है आजकल जो देखने लायक है । बहुत दिनों से
 
चंदन कुमार झा
Sep 21 2009 03:43 PM
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दो मैथिली अगड़म-बगड़म !!!!!

               (फोर्ट कोच्चि में लिया गया फोटो) ------------------------------------------------------------------------------------- माछ- भात तीत भेल दही- चिन्नी मिठ्ठ भेल खाकऽऽ टर्रर
 
चंदन कुमार झा
टैग: कविता
Sep 19 2009 12:12 PM
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अपना हीं घर वह तो नहीं

  गमगीन है हर आदमी क्यों खो गया सुख चैन । क्यों रोकता कोई नहीं इस जंग को तूफान को । क्यों बह रहा है नालियों में खून मेरे अपनो का । शाख  पर जो स्वप्न थे क्यों झड़ गया वह पर्ण है । क्यों हो रहा नंगा यहाँ सब कैसी मची हुरदंग है । जो चले थे हम जलाने
 
चंदन कुमार झा
टैग: शहर
Sep 16 2009 06:21 PM
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तीन बन्दर

कल मेरे गांव में कुछ बन्दर आये थे । कुछ ने रंग बिरंगी टोपियां पहन रखी थी, कुछ ने चमकदार घड़िया, और कुछ पहने हुए थे काफी चुस्त पतलून । अपने स्वभाव के विपरीत वे बहुत शांत दिख रहे थे । मैंने उन तीन ऐतिहासिक बन्दरों को पहचानने की बहुत कोशिश की, क्योंकी भव
 
चंदन कुमार झा
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रेगिस्तान

न देखा हुआ सच , किनारे से किनारे तक , दूर तक फ़ैला हुआ । रेत की तरह , शुष्क । तपती धूप में जलता हुआ । किसे पता है यह सच , जो किसी को नही पता । मुझे पता है । मुझे मालूम है । दूर तक जाना है मुझे , इन प्रतिबिंबो पर पैर रखते हुए । क्या टिके रहेगे मेरे पां
 
चंदन कुमार झा
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कर्म का महत्व

रुको नहीं, थको नहीं, रुकना नहीं कर्म है, थकना नहीं धर्म है । चलते रहो चलते रहो, चलना हीं तो कर्म है । रवि रुक जाये अगर, प्रकृति में हो जाये प्रलय । चाहते हो अगर जीतना तो, समझो कर्म के महत्व को । कर्म हीं है जिन्दगी, मानवता कर्म है, मातृत्व हीं तो कर्
 
चंदन कुमार झा