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मेरे अतीत का आँगन
आह !!! कैसा है यह दुःसाहस, देखता हूँ मुड़कर मैं, अपने अतीत के उस खण्डहर को, अपने आँगन में, सर झुकाए मैं खड़ा था । टूट रहा था विश्वास, खत्म हो रहे थे सारे सम्बन्ध, मेरे मन के उस आँगन में । और मिट चुकी थी भविष्य की रेखाऐं मेरे छोटे-छोटे हाथों से । मुझे याद
Jun 13 2010 11:50 PM


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