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17 Jun 2010
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शुद्ध लय शब्दों में खो गई

किसी भी गेय गीत मेंधुन, ताल और शब्दों की संगती हैजब भी शब्दों को धुन में सुना जाता हैया धुन को शब्दों में उभारा जाता है तो दोनोंएक दूसरे में इतने घुलमिल गये होते हैंकि लाख कोशिशों के बावजूद भीन तो शब्दों को धुन से और न तोधुन को शब्दों से अलग किया जा सकता
 
Arun Khadilkar
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सत्य- मंत्र,यन्त्र, तंत्र

सत्य का मंत्र यानी -सत्य की स्पष्ट समझसत्य का यन्त्र यानी -शरीर-मन और उसका सकल परिवेशसत्य का तंत्र यानी -सत्य की स्पष्ट समझ के साथसकल परिवेश को अवधान में उतारते हुएध्यानस्थ स्थिति मेंसत्य को तत्त्व से जानना................................ अरुण
 
Arun Khadilkar
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गुरु के बाबत

गुरु प्रकाश ही गुरु प्रसादगुरु वह नही जो हाँथ पकड़कररास्तों पे चलायेगुरु ऐसा प्रकाश हैजिस प्रकाश में शिष्य अपनारास्ता ढूंढ लेता है............................... अरुण जहाँ शिष्य वहाँ गुरुजगत में भांति भांति के गुरुउपलब्ध हैंजिसे जैसा चाहिए वैसा मिल जाता
 
Arun Khadilkar
Jun 15 2010 10:36 AM
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इधर से सुखकर तो उधर से दुखदायी

सुख की आकांक्षा में दुखः का भय हैदुखः की अनुभूति में सुख का चिंतनएक ही अनुभूति -इधर से सुखकर दिखे तोउधर से दुखदायीक्यों न ऐसी जगह से देखेंयह सारा तमाशाजहाँ न हो कोई आशा औरन कोई निराशा............................ अरुण
 
Arun Khadilkar
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यहाँ अपना तो कुछ भी नही..

बालक- मन की कोरी स्लेट परलिखा जाता है वही सबजो समाज के मन-पटल पर अंकित होबालक बड़ा होता जाता हैइस भावना के साथ किजो कुछ भी उसके मस्तिष्क में हैवह सब उसकी स्वयं की उपलब्धि हैसमाज के छोर से बह कर बालक केमस्तिष्क में संचित होंने वाले ज्ञान से बालकअपना
 
Arun Khadilkar
Jun 14 2010 07:34 AM
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केवल बुद्धि से नही ....तत्त्व से

बुद्धि को यह बात कि'हम सब डोरी को सांप समझकर जी रहे हैं'भले ही अच्छी तरह से समझ आ गयी होफिर भी मन अभी भी 'डोरी' सेयानी वास्तविकता सेदूर भागता हैबुद्धि से सत्य जानना काफी नहीसत्य तत्त्व से (तन-मन-ह्रदय एवं अवधान से)अनुभव में समाना जरूरी
 
Arun Khadilkar
Jun 13 2010 07:25 AM
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मन निर्मित समस्याएँ

जीवन की प्रायः सभी मन- निर्मित समस्याओं कादूसरा नाम है अहंकारयह अहंकार जिससे भी चिपक जाएवह समस्या- बन जाता हैअपने परिवार से चिपके तोअन्य परिवार दुश्मन बन जातें हैंहिन्दू बन जाए तोदूसरे धर्म डराने लगते हैं अपने देश से चिपके तोदूसरे देशों से खतरा लगने लगता
 
Arun Khadilkar
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द्वार पर ही अटके गये

सत्य का किलाजिसके कई द्वारहरेक द्वार है एक श्रद्धा स्थानजहाँ से गुजरकर अन्दरसत्य तक पहुँचना हैहम सब द्वार पर ही अटक गये हैंद्वार को ही सत्य मान बैठें हैंहम हिन्दू बने, मुस्लिम बने,आस्तिक बने, नास्तिक बने,पर धार्मिक न बन पाएद्वार पर ही अटक
 
Arun Khadilkar
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असीम बना ससीम

पैदा हुआ और इस धरती पर आयातब था असीमन था मेरा कोई नाम, कोई परिचयऔर न कोई पतासारी जमीन, सारा सागर, सारा आसमानमेरा अपना थापर आजएक छोटे से घर, नाम, और परिचय कामै मुहताज हूँ............................. अरुण
 
Arun Khadilkar
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विचारों की फलती लहरें

अबाध गति से बहती नदी की लहरेंअचानक फल उठती हैं और पौधे बन जाती हैं,ऐसा अगर संभव हो जाए तो नदी का प्रवाहटूट कर बिखर जाएगा,हमारी सारी मानसिक चेतना या उर्जाउसमें उगते फलते विचारों के कारणइसी तरह टूट कर बिखरती है, इन विचारों से तादात्म हटते हीतन-मन का उर्जा
 
Arun Khadilkar
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अस्तित्व यानी सकलता

धरती -आकाश- सागर अलग अलग सेलगतें हैं मस्तिष्क को,अस्तित्व को नही ,सदियों से सत्य की खोज चलीआ रही है पर सत्य बेबूझ हैक्योंकि मस्तिष्क हर चीज बाँट कर देखता हैएक का एक अस्तित्व हीसत्य के आधीन हैअस्तित्व की सकलता हीसत्य की समझ है...........................
 
Arun Khadilkar
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आदमी

पशुत्व और भगवत्व के बीचलटकी है आदमी की जातपशुत्व से हटकर आदमी बनने के प्रयास मेंकभी वह बना 'महापशु' तो कभी बना 'महाभगवान'पर आदमी न बन सका....................................... अरुण
 
Arun Khadilkar
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'जहाँ धुआं वहाँ आग निश्चित'

ऊपर लिखे अनुमान तंत्र का सहारा लेकरकई प्रश्नों के उत्तर ढूंढे जाते हैंपरन्तु अहंकार क़ी खोज में इस अनुमान से हमचूक जातें हैंहम अहंकार को आग समझतें हैंदरअसल अहंकार आग नही धुआं हैव्यक्तिगत देह और सामाजिक परिवेश क़ीअंतःक्रिया या अन्तःसम्पर्क से मन क़ीआग
 
Arun Khadilkar
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संस्कारित घोडा

मन के दरवाजे परउर्जा का बंधा घोडा,विचलित है दौड़ने के लिएअगर खोल दो उसे तो वह भागेगाकिसी कीले की ओर चढ़ाई के लिएया किसी मंदिर के सामने झुकने के लिए,किसी न किसी मकसद के लिये भागनाउसका संस्कार है,उसने कभी जाना ही नहीभागना बादल की तरहभागना हवा की
 
Arun Khadilkar
Jun 03 2010 07:02 AM
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दो बातें

नवीनतानयापन है दो तरह का- एक वह, जो पुराना नही दिखताऔर दूसरा वह -जिसके आते पुराने का स्मरण ही न हो......................अनंत दरवाजे, खिड़की और झरोखों सेआसमाँ देखने वाले अनंत, असीम, अपार, जैसी संकल्पनों सेमन बहलातें हैं----------------------- अरुण
 
Arun Khadilkar
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ध्यान- प्रकाश

केवल सुन-पढ़ लिया है किभीतर है स्वच्छ नीला असीम आकाशपर जब देखा भीतर दिखाघना कुहरा,इतना गहरा और सख्त किकुहरा ही कुहरे को देखे बस कुहरा ही कुहराभीतर के आकाश को छुपा देता कुहराबाहर के प्रकाश को ग्रस लेता कुहरामनुष्य के सारे विचार कुहरे जैसे ही हैंकुहरे जैसा
 
Arun Khadilkar
Jun 01 2010 06:25 AM
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द्वार ढूँढती रहती है .....

सत्य की खोज निराली हैयह सदा जारी है, बस जारी ही है किसी दिवार से टकरा भी जाएतो भी थमती नहीद्वार ढूँढती रहती है ,रास्ते ढूँढती रहती है ,दिवार पर लिखे निष्कर्षों को पढ़करलौटती नहीन ही दिवार पर नये निष्कर्षलिखते बैठती हैजिन्हें निष्कर्षों की जल्दी हैवे
 
Arun Khadilkar
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अहंकार का तमस

जलती मोमबत्ती पकड़कर चलोचारो ओर होगा प्रकाश औरठीक हाँथ के नीचें होगा अंधकारठीक इसीतरह अहंकार कितना हीसजग क्यों न होकितना ही ध्यान क्यों न फैलायेउसके केंद्र में होगा उसका अपना तमसअहंकार का एक भी तमस बिंदुजबतक बाकी होसारा प्रकाश अज्ञानमय ही हैभले ही उसे
 
Arun Khadilkar
May 30 2010 06:45 AM
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दो मुक्तक

यादयाद बीते कीयाद आते कीजिंदगी कैसे कटीये तो मुझे याद नही.........अँधेरा खुद जला ...... दिये की रोशनी से सबअँधेरे को भगाते हैंअँधेरा खुद जला और मिट गयादेखा किसी ने ?...................... अरुण
 
Arun Khadilkar
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घड़े का खालीपन

'मै' पनपानी बनकरघड़े में भरा हुआ हैपूरा का पूराऔर अब वह जानना चाहता हैकैसा होता हैघड़े का ख़ालीपनघड़े का ख़ालीपन तो जीवित ही हैकेवल 'मै' पन कोरिक्त होना होगा........................ अरुण
 
Arun Khadilkar
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स्मृति की आँखे अंधी

रास्तों को ढूँढने मेंस्मृति काम आती हैपर कदमों तले उभरनेवालीपगडंडियों को वह देख नही पातीउसपर से गुजर तो जाती हैपर उसे बिना देखे,उसके प्रति सोये हुए................................ अरुण
 
Arun Khadilkar
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परमात्मा ही परमात्मा को जाने

परमात्मा स्वयं को अनुभूत कर रहा हैप्रति पल प्रति स्थलइस सत्य को जानने के लियेपरमात्मा ही बन जाना होगाइसका मतलब कीअपनी व्यक्तिगत पहचान कोभुलाना होगाइस ऐसी पहचान की निरर्थकता कोपहचानना होगा................................ अरुण
 
Arun Khadilkar
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क्षण ही जीवन

मनुष्य 'समय' पर यात्रा करता हैजब की परमात्मा का'समय' पर है निवासमनुष्य का जीवन क्षण क्षण की कड़ी कोजोड़कर बनता हैपरमात्मा हर उस कड़ी कोएक सम्पूर्ण जीवन के तौर पर जी रहा हैमनुष्य का जीवन 'समय' का जुडाव हैऔर 'समय' हैपरमात्मा का पड़ाव..................... अरुण
 
Arun Khadilkar
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पुनर्जन्म

पानी में बुलबुले हैं -कहीं एक टूटा तो कहीं एक उभराएक आया तो एक लौटाआते और जाते बुलबुलों के बीच क्या कोई रिश्ता है ?परन्तु बुद्धि उन में रिश्ता देख लेती हैबुद्धि कहती है जो गया वही तो आयाजो आया, वह लौटने के बाद ही तो आयापुनर्जन्म की कल्पना क्या इससे अलग
 
Arun Khadilkar
May 23 2010 06:30 AM
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पाँच खिड़की वाला एक घर

शरीर पाँच खिड़की वाला एक घर हैइन्ही खिडकियों से दुनिया अन्दर प्रवेश करती हैबुद्धि से गुजरती है और इसीलिएसंकेतों में ही समझी जाती है,स्मृति में संगृहीत हो विचारों मेंअभिव्यक्त होती हैअव्यक्त से अभिव्यक्ति तक की यह यात्राअगर ध्यान प्रकाश में घटेतो क्या ही
 
Arun Khadilkar
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वेदना धरती की

अगर परछाईयाँ नोचने लगें, खरोचने लगेंधरती को तोधरती त्रस्त होगी, कराहती होगी,बेचैन होगीठीक उसी तरह जिस तरहयह मस्तिष्क तनाव ग्रस्त है, चिंतित है, व्यस्त है,व्यग्र है, विवंचित है, परेशान है -विचारों, स्मृतियों, सपनों, चिंताओं और ऐसी हीकई अंतर्छायाओं द्वारा
 
Arun Khadilkar
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धर्म और धर्म की परंपरा

धर्म आएंगे,धर्म जाएंगे,पीछे छोड़ एक लाश परंपरा कीजिस लाश की पूजा मेंरत हैं/ रहेंगी पीढीयाँसदियों तक......................... अरुण
 
Arun Khadilkar
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ओशो और कृष्णमूर्ति

ओशो काव्य में गणित समझातें हैं औरकृष्णमूर्ति गणित में काव्यगणित प्रेमी ओशो को नकारते हैं औरकाव्य प्रेमी कृष्णमूर्ति कोजिन्हें काव्य और गणित का नाता समझ आ जाता हैवे ओशो में कृष्णमूर्ति को देखतें हैं औरकृष्णमूर्ति में ओशो
 
Arun Khadilkar
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उपज मस्तिष्क की

बीज से वृक्ष फलाकेवल वृक्षपत्ते नही, फूल नही, फल नही, टहनियां नही,न शाखाएं और न जड़ेंकुछ भी नही बस वृक्षऔर कुछ फला है तो वह हमारे मस्तिष्क मेंमन में, ज्ञान या शब्द कोष मेंस्मृति में, भाषा में, उच्चार में, संवाद एवं परिसंवाद में,शास्त्र में, खंडन और मंडन
 
Arun Khadilkar
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अँधेरे में ही प्रकाश

अपने भीतर दबे अँधेरे कोदेखना होगातभी दिख पड़ेगा घना प्रकाशसारी कोशिश लगानी हैअँधेरा देखने के लियेप्रकाश तो दिखेगा बिना कोशिश अनायासक्योंकिअस्तित्व तो प्रकाशमय ही हैदेखने में हुई भूल का परिणाम है ये अँधेरा..................... अरुण
 
Arun Khadilkar
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क्रांति - बरगद बना गुलाब

बरगद का विराट वृक्षअपने विस्तार को समझ रहा हैहवा के टकराव से उभरते आन्दोलनों को देख रहा हैपत्ते पत्ते को देखता परखताअपनी ही शाखाओं और टहनियों से गुजरतालौट जाता है अपने ही बीज में जहाँ से चला थातो अचानक क्रांति घटी -बीज टूटातिनके तिनके बिखर गये औरइसी
 
Arun Khadilkar
May 16 2010 07:05 AM
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अहंकार नही मिटता अहंकार से

अहंकार को स्वयं से लगाव इतनामछली को पानी से जितनास्वयं को मिटाना स्वयं को गलानामुश्किल है सपने में भी सोच पानाअहंकार कहता है -मै जल जाऊंगा पर अपनी ही राख को सजोकरफिर उभर आऊंगास्वयं के मायातल पर मै मिट नही सकतामुझे मिटाने की कोई भी चेष्टा व्यर्थ
 
Arun Khadilkar
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भ्रम की चक्की

गीता बाइबल या कुरान जैसे सभी अध्यात्मिक ग्रन्थसमझने वालों के लिये हैं,समझाने वालों के लिये नहीजबतक भीतर समझ की संभावना नही फलतीइन ग्रंथों की कोई उपयोगिता नहीभ्रम की चक्की में कुछ भी डालोअसार ही बाहर आएगासमझ की चक्की में भ्रम भी डालो तो भीसार ही हासिल
 
Arun Khadilkar
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दर्शन भगवान का

(कुछ दिन के अन्तराल के बाद) कहते हैं कि पतिव्रताअपने पति में परमेश्वर देखती हैपति चरित्रवान हो या चरित्रहीनउसी तरहजिसे हर चीज में भगवान दिखाउसे चीज के भौतिक, सामजिक या वस्तुगत मूल्य सेउसे कोई सरोकार नहीक्योंकि उसकी दृष्टि उनसब बातों के परे देखने लगाती
 
Arun Khadilkar
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मन की तरंग

परिक्षा मन कीजो वस्तु आग के संपर्क में हो उसीकीज्वलनशीलता या तापधारकता को पहचाना जा सकता हैठीक इसीतरहसमाज संपर्क में रहकर ही हम जान सकते हैं किहम धार्मिक हैं कि प्रापंचिक'पानी' में डूबा क्या जाने कि वहज्वलनशील (प्रापंचिक) है या नहीभ्रमवश वह स्वयं को
 
Arun Khadilkar
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मन की तरंग

अन्दर की आँखेंबाहरी आँखें खुलते ही देखती हैंयहाँ से वहाँमुझसे तुझ कोइधर से उधरनीचे से ऊपरअन्दर की आँखें देख लेती हैं अचानकसबकुछ एक ही दृष्टि में एक ही पल में....................................................... अरुण
 
Arun Khadilkar
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मन की तरंग

रिश्ता - अभौतिक समस्या और उसके समाधान के बीचअभौतिक समस्या और उसके समाधान याउपाय के बीच कोई भी अंतर नहीन समय का और न ही अवकाश कासमय गवांकर उपाय जान भी लिया जाए तोकोई उपयोग नही क्योंकिसमय के बीतते समस्या भी अपना रूप बदल देती है समस्या की घनीभूत समझ ही उसका
 
Arun Khadilkar
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मन की तरंग

अखंड दृष्टि बनाम विश्लेषण किसी भी वस्तु, दृश्य या फेनोमेनों को आदमी कीया तो बुद्धि देखे या उसकी समग्र दृष्टिवह उसे टुकड़ों में बाँट कर देखे या पूर्ण की पूर्णटुकड़ों में बाँट कर और फिर उन टुकड़ों के ज्ञान को जोड़कर देखने सेपूर्ण को नही जाना जा सकतापूर्ण को
 
Arun Khadilkar
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मन की तरंग

शोषणदोषी कौन -शोषक या शोषित ?दोनों ही की अपनी अपनी मजबूरीयाँ हैंशोषित शिकार है अपनी भौतिक या/तथा मानसिक कमजोरी काशोषक मजबूर है शोषण करने की अपनी स्वाभाविक प्रवृति के कारणशोषित अभाव से पीड़ित है तो शोषक दुर्भाव सेदोनों ही आँखें मूंदे हुए हैं , अजग्रित
 
Arun Khadilkar