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my favorite contemporary poets

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31 Dec 2009
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अभी बस चांद उगता है

समीर लाल 'समीर' अभी बस चांद उगता है, सामने रात बाकी है बड़े अरमान से अब तक, प्यार में उम्र काटी है पुष्प का खार में पलना, विरह की आग में जलना चमन में खुशबु महकी सी, प्रीत विश्वास पाती है. गगन के एक टुकडे़ को, हथेली में छिपाया है दीप तारों के चुन चुनकर
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विदा

मैं चल तो दूँ’) डॉ. कविता वाचक्नवी --------------------------------- आज दादी,चाचियों,बहना,बुआ ने चावलों से,धान से, भर थाल मेरे सामने ला कर दिया है, मुठ्ठियाँ भर कर जरा कुछ जोर से पीछे बिखेरो और पीछे मुड़, प्रिये पुत्री ! नहीं देखो, पिता बोले अलक्षित।
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स्मृतियों का चक्रव्यूह --

शकुन्तला बहादुर , कैलिफ़ोर्निया,यू.एस.ए. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जब भी मेरी दृष्टि खिड़की पर जाती है । मन की बगिया महक सी जाती है ।। अतीत का धुँधलापन,उजियारा बन जाता है। भूत-वर्तमान का भेद मिट जाता है ।। लाल और पीले ये, फूल हैं खिले। मुझको तो जैस
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शहीदों की स्मृति

शम्भू नाथ शहीदों की स्मृति पे आते रहेंगे सदा पुष्प माला चढाते रहेंगे, जिन्होंने दिया है अमन का बगीचा, उन्हीं के चमन को सजाते रहेंगे, दिया जान अपनी वतन के लिए जो, चढ़े फांसी पर इस रतन के लिए जो, वही धूल माथे लगाते रहेंगे, शहीदों की स्मृति पे आते रहेंगे
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वृक्ष का संदेश

नीलू गुप्ता मानव तू दानव है बना हुआ, भूल गया तू मानवपन, भय के घनीभूत कोहरे में लिपटा सिमटा तेरा मन, मदमत्त कुंजरे की भांति बेसुध हो रौंद रहा तू मानव को, आहत तो तू होता ही नहीं , राहत है बस मिलती है तुझको| लहू से प्यास बुझाने में लगा है तू, बस लहू से
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कल क्या होगा

लक्ष्मीनारायण गुप्त आज प्रिये मधु पी लो मन भर देर करो ना पी लो सत्वर आज बजा लो मन की वीणा आज प्यार तुम कर लो मन भर किसे पता है कल क्या होगा आज खेल लो जितना चाहो खेल खेल में मन बहला लो पुष्पों से तुम केश सजा लो प्रियतम को तुम गले लगा लो किसे पता है कल
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मेरी ज़िन्दगी

संजय माथुर ज़िन्दगी से हार के जो पूछा मैंने - तू तो कहती है तू है मेरी , फिर क्यों बनी है बैरन मेरी ? मैं चाहता हूँ हँसना , खुश रहना , फिर क्यों रुलाती है मुझे बैरी ? मेरी ज़िन्दगी हँसी और बोली , ज़िन्दगी हैं आपकी , बांदी नहीं हम ! हमसे रूठ के हँसेंग
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वेदना विरह की

प्रकाश यादव "निर्भीक", अधिकारी, बैँक ऑफ़ बड़ौदा, तिलहर शाखा, जिला-शाहजहाँपुर,उ0प्र0, मो. ०९९३५७३४७३३ पहला विरह है यह पहली मिलन की, लगता है यह विरह है धरती व गगन की; खुशबू अब जाती रही अपनी चमन की, जीवन मेँ न चमक रही अब कंचन की। अकेलापन का ही दर्द अब रह
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सजन से कैसे होगी प्रीत?

श्यामल सुमन ( 09955373288 ) www.manoramsuman.blogspot.com प्रेमी को मिलने नहीं देती, अजब है जग की रीत। सजन से कैसे होगी प्रीत? वह घटना होती अद्भूत-सी, प्यार जिसे कहते हैं। सच्चा प्यार हुआ हो उसके, साथ कहाँ रहते हैं? जीवन तो बस इक समझौता, हार कहूँ या
Dec 29 2009 11:55 AM
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"ज़िंदगी एक उत्सव"

लेफ्टिनेंट कर्नल गोपाल वर्मा ज़िंदगी एक उत्सव है, चलो ज़िंदगी का जशन मनाया जाए | सुबह किसी रोती आँख का आँसू पोंछ, शाम किसी भूखे को भरपेट खिलाया जाए| किसी मस्जिद में कोई भजन गाकर, किसी मंदिर से अज़ान लगाया जाए| कँही किसी गुरु के द्वारे पे गीता पढ़कर,
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माँ

विनय के जोशी जब धूप पसर जाती रसोईघर के बाहर मैं वहां बैठ ’अ’ से अम्मा लिखा करता माँ धुएँ के कोहरे में गुनगुनाती आटा गूंथती रोटियां बेलती और साथ ही बनाती आटे की छोटी-छोटी गोलियां फिर उन्हें आँगन में फैला देती एक-दो-तीन कई चिडियां आती चहचहाती गोलियां च
Dec 29 2009 11:55 AM
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कितना है दम चराग़ में तब ही पता चले

श्रद्धा जैन http://bheegigazal.blogspot.com कितना है दम चराग़ में तब ही पता चले फानू स की न आस हो , उस पर हवा चले फानू स = काँच का कवर लेता हैं इम्तिहान गर , तो सब्र दे मुझे कब तक किसी के साथ कोई रहनुमा चले नफ़रत की आँधियाँ कभी , बदले की आग में अब कौ
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तुम याद आये

अनु बंसल , मिलवाकी इतिहास तू पुनः जी उठा है, नूतन एक कहानी बनकर. उम्र के अंतिम चरण में, अल्लहड़, मस्त जवानी बनकर. सहसा फडफ़डाते है जीवन पुस्तक के कुछ पिछले पन्ने. जब देखे थे, तुमने हमने, अपने कल के सुंदर सपने. बह रहा है, आज सब कुछ यादों की रवानी बनकर
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आस

प्रताप नारायण सिंह http://anubhutiyan-pratap.blogspot.com/ http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/P/PratapNarayanSingh/PratapNarayanSingh_main.htm http://www.anubhuti-hindi.org/kavi/p/pratapnarayan_singh/index.htm बस इतना ही करना कि मेरे अचेतन मन में जब त
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बात सचमुच में निराली हो गईं

नीरज गोस्वामी http://ngoswami.blogspot.com बात सचमुच में निराली हो गईं झूट जब बोला तो ताली हो गई फेर ली जाती झुका कर थी कभी उस शरम से आंख खाली हो गई मिल गइ उनको इज़ाज़त जुल्म की अपनी तो फ़रियाद गाली हो गई इक नदी बहती कभी थी जो यहां बस गया इंसा तो नाली ह
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खुले आसमान के नीचे हूँ मैं

राशी चतुर्वेदी कविता - http://poetrika.blogspot.com my art - http://rashichaturvedi.blogspot.com खुले आसमान के नीचे हूँ मैं अपनी मर्जी का मालिक हूँ मैं दिल जो चाहे करता हूँ मैं खुश हूँ की आज़ाद हूँ मैं। सुबह से लेकर शाम तक काम के बोझ से घायल हूँ मैं व
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सोने का हिरन

प्रतिभा सक्सेना. काहे राम जी से माँग लिया सोने का हिरन, सोनेवाली लंका में अब रह ले सिया! वनवास लिया तो भी तो उदासी ना भया, कुछ माँगे बिना जीने का अभ्यासी ना भया! मृगछाला सोने की तो मृगतिषणा रही, तू भी जान दुखी हरिनी के मन की विथा! कहीं सोने की तू ही
Dec 29 2009 11:55 AM
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-:मेरी महबूबा:-

विवेक प्रकाश यादव "विभु" (उम्र ६ वर्ष ) (प्रकाश यादव निर्भीक जी के सुपुत्र हैं विवेक |) तेरी खुशबू से मुझे लगता है, कि मैं तुमसे शादी करुँगा, और मैं तेरा महबुबा बनुँगा, तुम भी मेरी महबुबा, तुम तो बहुत खुबसूरत हो, लोग देखेगें शादी करते हुए, फिर फूल फे
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यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है

मैत्रेयी अनुरूपा यूँ झुकना हमें भी गवारा नहीं है मगर हमने बोझा उतारा नहीं है कदम लड़खड़ाये जरा इसलिये भी कि बैसाखियों का सहा रा नहीं है नहीं तैरता कोई ताउम्र इसमें ये दरिया है जिसका किनारा नहीं है ये इक सुर्ख शै जिससे दामन बचाते ये दिल है हमारा अँगारा
Dec 29 2009 11:55 AM
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शायरी का सफर

एस एन शर्मा "कमल" है ये कैसी कशिश ताजगी की इधर किसकी खुशबू से महकी हुई है सहर । जिंदगी का ये कैसा अनोखा पहर जिसमें बहने लगी शायरी की लहर। इस चमन के कभी हम परिंदे न थे ख़ुद-ब-ख़ुद `पर` खींच लाये इधर। अपनी ऐसी कोई बेबसी भी न थी चल पड़े जो कदम इस नयी राह
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कविता

आर.सी.शर्मा ’आरसी’ सुबह का भूला घर आजाए शाम ढ़ले तो कविता है, मेहनतकश हाथों को फिर से काम मिले तो कविता है, मदिरालय को जाने वाला मुड़ जाए देवालय को, गंगाजल के साथ उसे हरिनाम मिले तो कविता है । आंख का खारा पानी मीठे बैन सुने तो कविता है, किसी दर्द को कि
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प्रणय निवेदन

दिनेश पारते हे छंद नज़्म हे चौपाई, सुन लो मेरा उद्‍गार प्रिये तुम गीत ग़ज़ल हो या कविता, तुम ही हो मेरा प्यार प्रिये मैं काव्यचंद्र का हूँ चकोर, मैं काव्यस्वाति का चातक हूँ यह प्रणय निवेदन तुम मेरा, अब तो कर लो स्वीकार प्रिये तुम मुक्तक हो उन्मुक्त कोई
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नववर्ष फिर आया है

डा. रमा द्विवेदी एक वर्ष भी बीत गया, नया वर्ष फिर आया है, कितना खोया,कितना पाया? गणित नहीं लग पाया है। कितने पल हमसे रूठ गए, कितनी विभूतियाँ खोई हैं, कितने शूल चुभे अन्तस में, कितनी मालाएँ पिरोई हैं, मंदिर में कुछ पल बीत गए, श्मशान से कभी बुलावा है।
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गीत: शब्द वही हैं ....

आनंदकृष्ण, जबलपुर शब्द वही हैं, बदल गई है केवल अर्थों की भाषा । छले हुए स्वप्नों में खोई सूनी आंखों की आशा । हवा चूमती थी पागल सी रेतीले नदिया तट को, जाने किसने झटका था चंदा की आवारा लट को । झूम-झूम नर्तन करते थे, नीलगिरि के उंचे पेड़- बगिया मुस्काई थी
Jul 29 2009 02:22 AM
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कवि की व्यथा

अविनाश अगरवाल, बोस्टन रविवार सुबह देखा , मौसम का रंग था सुहाना देख वसंत की मस्ती , हमारा भी दिल हुआ दीवाना लगा आज हमारी कविता का होगा श्रीगणेश कवियों की सूची में कहीं , हमारा भी होगा समावेश क़दमों ने था अभी , लेखनी की ओर मुख मोडा श्रीमती ने पकडाया ,