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शब्‍द संसद

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09 Jun 2010
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भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं

कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है पर अंधेर नहीं। पर भारतीय अदालतों के बारे में ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता। देर और अंधेर उनकी बुनियादी और इनबिल्ट विशेषतायें हैं या कह सकते हैं कि मैैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं। वे फैसले करने में अन्याय की हद तक देर लगाती हैं
टैग: bhopal-genocide
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कुंभ के बहाने संतों का सच

कुंभ के बहाने संतों का सच कुंभ और उसके बाद यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जिन्हे भारतीय समाज सन्यासी,साधु और संत जैसे सम्मानपूर्ण पदवियों से नवाजता रहा है वे लोग क्या वाकई इन विशेषणों के योग्य हैं भी कि नहीं ।कहीं वे गृहस्थ जीवन की कठिनाईयों या दुखों से
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कुंभ के बहाने संतों का सच

कुंभ और उसके बाद यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जिन्हे भारतीय समाज सन्यासी,साधु और संत जैसे सम्मानपूर्ण पदवियों से नवाजता रहा है वे लोग क्या वाकई इन विशेषणों के योग्य हैं भी कि नहीं ।कहीं वे गृहस्थ जीवन की कठिनाईयों या दुखों से भागने वाले कुंठित और अतृप्त
May 25 2010 08:30 PM
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युद्ध है या गृहयुद्ध ?

दंतेवाड़ा में मारे गए सीआरपीएफ के जवानों के परिजनों का विलाप किसी भी आदमी के लिए एक विचलित करने वाला अनुभव है । कोई भी मौत हर उस आदमी की संवेदनशीलता को झकझोरती है जो मानता है कि हर परिजन को अपनों का न रहना एक ही तरह से दुख देता है। आदमी बुरा हो सकता है,
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जगह अब भी मौजूद है

‘‘लोग सेलेब्रेटीज और पेज थ्री की हस्तियों की रंगीनियों और उनके भव्य जीवन के बारे में पढ़ना चाहते हैं ’’ इस ऐलान के साथ जब नवभारत टाईम्स ने अपना चोला बदला था तब हिंदी अखबारों में ऐसे मालिकों और संपादकों की कमी नहीं थी जिन्होने इस पर नाक - भौंे सिकोड़ी थी ।
Feb 27 2010 07:07 PM
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छोटे राज्यों के बड़े सवाल

लगभग समूचा देश अलग राज्यों की आग और बहस से गुजर रहा है । इसे भारतीय राष्ट्र राज्य की सीमा भी मान सकते हैं और बिडंबना भी कि आजादी के 62 वर्षों बाद भी हम विकास का ऐसा रास्ता नहीं खोज पाए हैं जो विकास के नक्शे से बाहर कर दिए गए क्षेत्रों और लोगों को पिछड़ेपन
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उत्तराखंडः लूट और झूठ के नौ साल

आंदोलन के डेढ़ दशक और राज्य बनने के 9 साल के राजनीतिक सफरनामे की उलटबांसी यह है कि उत्तराखंड की राजनीति के खेवनहार वही दल बने हैं जिन्हे आंदोलन ने खारिज कर दिया था ,जिनके नेता लोगों के डर से भाग खड़े हुए थे ।एक राज्य के रुप में उत्तराखंड जब10वें वर्श म
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क्षेत्रीयताओं का द्वंद समझने का समय

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की फैक्टरियों में बिहारियों के बजाय मध्यप्रदेश के लोगों को नौकरियां दिये जाने का बयान क्या दिया कि एक बार फिर तूफान खड़ा कर दिया गया । माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जैसे कोई आसमान टूट पड़ा हो ।शी
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कठिन वक्त में भाजपा

दो दशकों की सबसे भीषण मंहगाई और दो बार सत्तारुढ़ रहने से उपजा सत्ताविरोधी रुझान फिर भी भाजपा को महाराष्ट्र में मुंह की खानी पड़ी । लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों मात खा चुकी भाजपा के लिए यह कोई मामूली झटका नहीं है बल्कि इसका संदेश दूरगामी है । हरिय
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चिदंबरम के भारत को चाहिए गुलाम आदिवासी

देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों एक बच्चे का रुदन है और उसका गुस्सा भी है, जिसमें वह बड़ा होकर पुलिस बनने की शपथ ले रहा है। आज से लगभग 10 साल बाद वह बच्चा जब पुलिस में भर्ती होने लायक होगा तब तक पुलिस कांस्टेबल के पद पर भर्ती होने की घूस कितनी होगी, य
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रिपोर्ताज ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’

मानव के आदिम इतिहास में महाद्वीपों के इस छोर से उस छोर को नंगे पैरों से नापने वाले कितने काफिलों, कितने लश्करों अपने डेरे पानी से लबालब नदियों किनारे डाले तो फिर हिले नहीं । दुनिया की महान सभ्यतायें इन नदियों के पानी में स्नान कर या वजू कर खुद को धन्य
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धधकता हिमालय और फारेस्ट के नीरो

हिमालय के जंगल धधक रहे हैं और उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत को फुर्सत नहीं है। वह सुबह से शाम तक जंगल की आग पर आए दिन राजधानी में होने वाली बैठकों में व्यस्त हैं। जंगल की आग से लड़ते हुए सात लोगों की मौत और १५ लोगों के घायल होने के बाद च
 
S Rajen Todariya
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बदल रही है युवा सपनों की तासीर

चकराता। बर्फ से ढ़के पहाड़ और हरे भरे जंगलों के ऐसे दृष्य कि आप अपनी सुध बुध खो बैठें। जिन्हें स्वर्ग बहुत लुभाता है, वे इसे स्वर्ग से सुंदर कह दें तो भी इंद्र की शान में गुस्ताखी नहीं होगी और न मेनका और रंभा जैसी वे अप्सरायें नाराज होंगी जो स्वर्ग क
 
S Rajen Todariya
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दलों की रेल-पेल से बिगड़ा खेल

जब से बाइपास सर्ज्ञरी हुई है तब से सुस्त और उदासीन से दिखने वाले मनमोहन सिंह पूरी फारम में लौट गए हैं। उनके दिल को खून की आपूर्ति क्या बहाल हुई कि वह ताबड़तोड़ हमले करने में जुट गए हैं। दिल जब आपका साथ देता है तो मनमोहन भी आडवाणी को ललकार सकते हैं। च
 
S Rajen Todariya
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भाजपा - फिर से उन्मादम् शरणम् गाच्छामि

भारतीय राजनीति को विकास, गरीबी, अमीरी,मंहगाई, बेरोजगारी के मुद्दों से भटकाकर उसे धार्मिक उन्माद के बीहड़ में धकेलने के लिए यदि किसी एक राजनीतिक दल ने सर्वाधिक योगदान दिया है तो वह भारतीय जनता पार्टी ही है। इसे आत्मविश्वास की कमी कहें या सुविधाजनक रास
 
S Rajen Todariya
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ऐसे समय में शब्द संसद

हम ऐसे समय मे हैं जब शब्दों के लिए परंपरागत माध्यम माने जाने वाले समाचार माध्यम छोटे पड़ रहे हैं शब्दों का स्थान शोर ने ले लिया है। शब्दों की सबसे बड़ी संसद कहे जाने वाले समाचार माध्यमों में बाजार का शोर है तो लोकतंत्र का मक्का कहे जाने वाली संसद में
 
S Rajen Todariya
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नमस्‍कार

माननीय साथियो, आज से मैं भी आपके साथ ब्‍लागजगत में दिखाई दूंगा। कोशिश होगी कि सीधी-सच्‍ची बात कहूं। कुछ आपके मन की, कुछ अपने मन की। संसद से सड़क तक उस आदमी की जो रोटी बेलता है और उसकी भी, जो रोटी से खेलता है। उस मां की जो अपनी पूरी जिंदगी अपने बच्‍चो
 
S Rajen Todariya