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अभिव्यक्ति

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05 Jun 2010
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जारी है एक सफ़र मेरा तीरगी के साथ

जारी है एक सफ़र मेरा तीरगी के साथ जंग चल रही है मेरी रौशनी के साथ मुझे मालूम नहीं कि क्या सोच कर मै खुद भी रो दिया बेबसी के साथ ताज़ा हुए है जख्म मेरे फिक्र कीजियेजब से मिला वो मुझे बेरुखी के साथ पैमाने मै तुझको यू उदास देखकर मैकदे से घर गया तिशनगी के साथ
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दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करके...

दुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करकेदेखिये सारे शिकवे-गिले को भुला करकेदुश्मने-जां से भी मिलिए मुस्कुरा करकेवफा के बदले अब नहीं मिलती वफा हमने तो देखा है ये भी तजुर्बा करकेखुशिया भी मिली तो अजनबी बनके जब से गया वो गम से आशना करके ख्यालो कि मंजिल कदम-२
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पल दो पल...

पल दो पल... चल साथ चले,फिर रह जाने... विराने है!!आज चलो... कुछ ऐसे मिल,लोग कहे... दिवान है!!तुम संग मिलके... ऐसे जले, लोग कहे... पर्वाने है!!मन में ऐसे... हूक उठे ,हाथ मिले... छूट जाने है !!रचना के बारे में अपनी मह्तबपूर्ण राय बताये ताकि अगली रचना और भी
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तुम नयन गगन से उतर रहे हो....

तुम नयन गगन से उतर रहे हो....इस मन के समतल पर....!! मैं धारा सी मचल रही हूँ .... सागर के हिर्दय पर ....!! मैं मयूर-सी नाच रही हूँ ....तेरी ही सरगम पर ....!! चंचल नयन पखुरु हो गये ....उठते है ,संग तुम को लिये गगन पर....!! तुम नयन गगन से उतर रहे हो....रचना
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पल पल बदल रही हूँ

पल पल बदल रही हूँ....तेरे साथ में ....!!खुद से ही मिल रही हूँ ....तेरे इंतज़ार में ....!!जाने क्या अदा है ....तेरे दुलार में ....!!परियो सी कहानी है ....ज़िन्दगी तेरे साथ में ....!!खुशबू सी घुल रही है ....हर एक रह में ....!!जोगन सी बन गई हूँ ....तेरे याद
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हम ही पागल हो गये.....

हम ही पागल हो गये ,परछाइयो के पीछे,खुशिया आ कर वह गई ,हम रहे आँख मीचे - मीचेज़िन्दगी चलती रही,एक पल भी न रूकीहम राह तेरी तकते रहेआंख भी पत्थरा गईज़िन्दगी चलती रहीहम होसला रखते रहेपल पल युही जलते रहेचाँदनी के नीचेभीग लेते हम बहुतबारिशे बरसी नहीआंख ही
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तेरे काँधे पर हम हो....

गुलिस्ता बने हमहर तरफ फैली हो महक तेरी जब तेरे काँधे पर सर हो....जिन्दगी लगती हैमिश्रि की डलीजब तेरे काँधे पर सर हो....सोचती हुँ मैं बसयही गुम सुमकि तेरे काँधे पर सर हो....बन जाती हुँ सब से संपन्नसुखी सारे जहाँ मेंजब तेरे काँधे पर सर हो....ये कोई सपना
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Mar 05 2010 09:18 AM
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आप

मन दर्पण है घर अगन मन का सच्चा प्रतीविम्ब हो आपसपना देखू हर पल में तो उन सपनो का साथ हो आप मन में अति भावनाओ है उन भावो का सर हो आप जिसे छुपाये फिरती सब से ऐसा हसी राज़ हो आप भाव विचरते है इस मन में उनकी की अभिव्यक्ति हो आप पल्को में तस्वीर सजी है अपलक
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Mar 02 2010 09:34 AM
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सुंदर सुबह ले कर आई

सुंदर सुबह ले कर आईपैगाम तुम्हारा तेरे आंखो में हैसपना हमारा अपना नहीफिर भी कितना हमारादुनिया में हम कोसब से दुलारा कितना मनोहरकितना प्यारा लगता है हमकोचेहरा तुम्हारा जब होंगे अकेलेतेरा साथ होगा पता है हमे हमारी खुशी मेंतेरा हाथ होगा .....रचना के बारे
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Feb 22 2010 09:11 AM
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एक प्यारी से सुबह से शुरू है

एक प्यारी से सुबह से शुरू हैज़िन्दगी नये साल की तरहजन्म जन्म पल रंग बदलती हैदिन और रात की तरहइसके भी मौसम चार हैसर्दी , गर्मी, मानसून और बरसात की तरहहर दिन एक पन्ना है ......धूप - छाव की तरहहर पल कुछ सीखता हैमाँ - बाप की तरहहर लम्हा गुज़र जाता हैशरीर से
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मगर तेरा ख्वाब कोई दूसरा है

क्या बताये हम कि क्या हुवा है सुलगता हुवा दिल का आशिया है कही दम घुट ना जाए सीने मे हर एक सिम्त धुवा ही धुवा है वादों -कसमो कि लाज रखनी है हम कैसे कह दे कि तू बेवफा है मुझको ना यादो पे यकी है अब ख्यालो से तो अपना सिलसिला है मेरे दिल मे तेरी चाहत है अ
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फिर नाम कैसे ले

रिश्ता कातिल से रहनुमा का। जैसे आजाब दोस्त की दुवा का॥ उम्र भर अब दर्दे-जुदाई सहना है। मिला है ये शिला मुझे वफ़ा का॥ इंसानियत से देखो तुम इन्सा को। मिल जायेगा रास्ता तुम्हे खुदा का॥ बच्चो मे तलाश कर उसे पा भी लो । देरो-हरम से नहीं वास्ता देवता का ॥ ख्
Dec 29 2009 11:41 AM
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रखा क्या है अहंकार में....!!

बदलने लगी हूँ ...... तेरे प्यार में!! खोने लगी हूँ ...... तेरी राह में!! सब से अलग हूँ ...... मैं संसार में!! जब से जुड़ी हूँ ...... तेरे साथ में!! संभालने लगी हूँ ...... मझधार में!! बस गया बस तू ही तू ...... मेरी हर सांस में!! आता मजा है ...... अब त
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वो तजुर्बा भी बेकार हुआ

बाद तेरे न किसी का भी ऐतबार हुआ एक जो था वो तजुर्बा भी बेकार हुआ तुझे थे ही नहीं पसंद इंसान यहाँ के खुदाया दिल कुरबां क्यूँ कई बार हुआ तुम्हे देखने की तमन्ना हर रात रही और तुझे भूलना भी हर सुबह यार हुआ तुम मिले नहीं और रही कई ख्वाहिश दिल में ऐसे ही अ
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उन्हें क्या मालूम

सुर्ख आँखों में अदा है , उन्हें क्या मालूम ये हसीनो की खता है , उन्हें क्या मालूम हम तो दीवाने हुए सर कलम करा बैठे ये राह-ऐ-वफ़ा है , उन्हें क्या मालूम वो आज आये हैं महफ़िल में अजाँ करते हुए कोई बतलाये खुदा है , उन्हें क्या मालूम उनकी ग़ज़लों में असर ह
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रुख्सर

मेरे जीने के लिये एक आसरा दर्करर था, दुनिया गम देती गयी मेरी गुज़र होती गयी । जल्वे मचल गये तो सेहर का गुमा हुआ , ज़ुल्फे बिखर गयी तो सैअह रात हो गयी । हमें आपनो के सितम याद आये, जब भी गरोन की इनायत देखी । तमस सी भरी ज़िन्दगी में , उमीद की रोशनी देखी।
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यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है

यहाँ से वहां तक कैसा इक सैलाब है मेरे तो चारों तरफ आग ही आग है!! कितनी अकुलाहट भरी है जिन्दगी हर तरफ चीख-पुकार भागमभाग है!! अब तो मैं अपने ही लहू को पीऊंगा इक दरिंदगी भरी अब मेरी प्यास है!! मेरे भीतर तो तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा मुझपर ऐ दोस्त अंधेरों का
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ये प्यास पीते,और भूख खाते है

यू ही नहीं किसान पूजे जाते है ये प्यास पीते,और भूख खाते है बेबसी के आसू मे आँचल भीगा उसे हमदर्दी की धूप मे सुखाते है जिस्म का बोझ नहीं उठता हमसे और ये खेतो मे गठ्ठर उठाते है करते है शाद्ध बड़ी श्रद्धा के साथ मरने के बाद भी रिश्ता निभाते है कवि: रोहित
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ये पत्थर की दुनिया है .....!!

ये पत्थर की दुनिया है । खव्बो को संभाले रखना ।। ले रक्खा है हाथो में नामक । अपने घवो को बचाकर रखना।। ठोकर पर सहारा भी तुम को न मिलेगा । अगर गिरो तो उठने का होसला रखना ।। रूठ जायगी खुशी एक दिन । इस लिये गम को अपना यार बना कर रखना ।। सलामत रहे हर रिश्त
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ये पत्थर की दुनिया है .....!!

ये पत्थर की दुनिया है । खव्बो को संभाले रखना ।। ले रक्खा है हाथो में नामक । अपने घवो को बचाकर रखना।। ठोकर पर सहारा भी तुम को न मिलेगा । अगर गिरो तो उठने का होसला रखना ।। रूठ जायगी खुशी एक दिन । इस लिये गम को अपना यार बना कर रखना ।। सलामत रहे हर रिश्त
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मन चंचल गगन पखेरू है,

मन चंचल गगन पखेरू है,मैं किससे बाँधता किसको.मैं क्यों इतना अधूरा हूँ,की किससे चाह है मुझको.वो बस हालात ऐसे थे, कि बुरा मैं बन नहीं पाया.मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली,कोई समझाए तो इसको.ज़माने की हवा है ये, ये रूहानी नहीं साया.मगर ताबीज़ ला दो तुम,तसल्ली गर
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हैं लुटे घरौंदे रोज वहीँ पर जहाँ पुलिस की गस्ती थी,,,,,,,

जो छूट गई है दुनिया में,, मेरी ही कुछ हस्ती थीसाहिल छोर के दरिया डूबी , मजबूत बड़ी वो कश्ती थीउनका घर तो रौशन था पर डर था सबके चेहरे परएक उनके घर में रौनक थी और जलती सारी बस्ती थीकुछ जिन्दा और मुर्दा लड़ते अल्लाह ईश के नाम पर खामोशी मजबूरी थी कुछ जान यहाँ
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सो जा ......

सो जा ......सो जा ......हो सो जाराजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......तेरी चंदा जैसी मातातेरे पिता है विधाताऔर तू है सब की आँखों का तारासो जा ......सो जा ......हो सो जाराजदुलारे .......सो जा .....हो सो जा .......तेरे नन्ही नन्ही आंखेइनमें सपने
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फिर कई मासूम बचपन, पल में जवां हो जायेंगे

लो यहाँ इक बार फिर, बादल कोई बरसा नहीं,तपती जमीं का दिल यहाँ, इसबार भी हरषा नहीं .उड़ते हुए बादल के टुकड़े, से मैंने पूछा यही,क्या हुआ क्यों फिर से तू, इस हाल पे पिघला नहीं.तेरी वजह से फिर कई, फांसी गले लगायेंगे, अनाथ बच्चे भूख से, फिर पेट को दबायेंगे.माँ
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शामिल है.

लहू पहाड़ के दिल का, नदी में शामिल है,तुम्हारा दर्द हमारी ख़ुशी में शामिल है.तुम अपना दर्द अलग से दिखा न पाओगे,तेरा जो दर्द है वो मुझी में शामिल है.गुजरे लम्हों को मैं अक्सर ढूँढती मिल जाऊँगी,जिस्म से भी मैं तुम्हे अक्सर जुदा मिल जाऊँगी.दूर कितनी भी
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Sep 11 2009 04:26 PM
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मैं तेरे साथ - साथ हूँ।।

देखो तो एक सवाल हूँ । समझो तो , मैं ही जवाब हूँ ।। उलझी हुई,इस ज़िन्दगी में। सुलझा हुआ-सा तार हूँ।। बैठे है दूर तुमसे , गम न करो । मैं ही तो बस, तेरे पास हूँ।। जज्वात के समन्दर में दुबे है। पर मैं ही , उगता हुआ आफ़ताब हूँ रोशनी से भर गया सारा समा । पर
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मन किया

आज न जाने क्यूँ रोने को मन किया।माँ के आंचल में सर छुपा के सोने को मन किया।दुनिया की इस भाग दौड़ में,खो चुका था रिश्तेय सब।आज फिर उन रिश्तो को इक सिरे से संजोने का मन किया।दिल तोद्ता हूँ सब का अपनी बातों से,लड़ने का मन भी तो आपनो के मन से किया।ता उमर
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Sep 08 2009 10:44 AM
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मेरी बेबसी देखिये

बना डाला खुदा उफ़ ये बंदगी देखियेअकीदते-बाज़ार मे खडा आदमी देखियेसमंदर भी लगने लगा है दरिया मुझेभड़की है एक कदर तिशनगी देखियेहर बार आईने मे शक्ल नयी सी दिखेकितने हिस्से मे बट गयी जिंदगी देखियेरो देते है तन्हाई मे खुद से बाते कर"मीत"गर मिले फ़ुर्सत तो मेरी
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आपको मेरा नमन है.....!!!

यह कविता में अपने गुरुओ के लिये लिख रही हूँ , आज में जो कुछ भी हूँ बस उनकी ही कॄपा है। ईश्वर से प्रार्थना है की उनका हाथ सदा मेरे सर पर रहे।मैं थी शिशुअज्ञान - अबोध - अचेतनसभी से अन्भिज्ञा थी मैंउसने अपनों से परिचित करायाजीवन की पाठशाला काउसी से पहला पाठ
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Sep 05 2009 05:00 PM
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कुछ दिलजलों को

उतरने लगा है नाकाम मोहब्बत का नशा जिन्दगी जीने की जद-ओ-जहद फिर आडे आ रही यादों का बोझ उठाने में बड़ा हूँ तो बोझ भी उठाना है घर का तो तुम्हे याद करने का एक नायब तरीका ढूंड निकाला है जिस से रोजी भी चलती रहती है बस यूँ करता हूँ की रोज कमाई की खातिर तुम्हारी
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है अब लगाता उन्हें काफिओं की तरह.

क्या खूब पायी थी उसने अदा। ख्वाब तोड़े कई आंधिओं की तरह॥ कतरे गए कई परिंदों के पर। सबको खेला था वो बाजियों की तरह॥ हौसला नाम से रब के देता रहा। औ फैसला कर गया काजिओं की तरह॥ ख़ास बनने के ख्वाब खूब बेंचे मगर। करके छोडा हमें हाशिओं की तरह॥ साहिलों को मिलाने
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मैंने वो सपना सहेज रखा है...

उनींदी स्याह रातों में...रिश्तों की उलझी डोर से,जिसे तुमने बुना था,वो सपना...मैंने सहेज रखा है...हाँ वही सपना...!!जो तुम्हें जान से प्यारा था..वही सपना...जो तुम्हारे मन का सहारा था...पलकों की चादर फैंक,आज ये कहीं उड़ जाना चाहता है...जब रोकता हूँ इसकोतो
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Sep 01 2009 12:13 PM
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रुलाकर मुझको वो भी तो रोया होगा

रुलाकर मुझको वो भी तो रोया होगा जगाकर मुझको वो भी न सोया होगा चलो उसे हमदर्दी की धूप मे सुखा ले जो तकिया उसने आसुवों से भिगोया होगा कवि: रोहित कुमार "मीत" जी की रचना रचना के बारे में अपनी मह्तबपूर्ण राय बताये ताकि अगली रचना और भी बहतर हो
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सैलाबे-जुनूँ-ए-इश्क, तुम ही सह नहीं पाए.....

कभी मैं चल नहीं पाया, कभी वो रुक नहीं पाए।मेरे जो हमसफ़र थे, साथ वो रह नहीं पाए।।मेरे घर में नहीं आई, कितने सालों से दीवाली।तू आ जाये तो आँगन में, अँधेरा रह नहीं पाए।।लगाते हैं सभी तोहमत, मैं तुझसे हार जाता हूँ।मेरी हस्ती ही ऐसी है, कि कोई टिक नहीं
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ये किसानो की है हकीक़त क्या बात

आदमी मे आदमीयत क्या बात हैहर-एक की नेक नीयत क्या बात हैसाकी ने शराब मे क्या शै मिला दीवाएज़ को भी दी नसीहत क्या बात हैबदमिजाज़ हुवा शहर नए दौर के नाम पेसंस्कृति की ये फजीहत क्या बात हैमाँ-बाप भगवान सामान यहाँ औरपत्थरों मे भी अकीदत क्या बात हैभूख खाते है
Sep 01 2009 12:10 PM
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पूछता रहता है क्या

ये परिंदा इन दरख्तों से, पूछता रहता है क्या,ये आसमां की सरहदों में, ढूंढता रहता है क्या.जो कभी खोया नहीं, उसको तलाश करना क्या,इन दरों को पत्थरों को, चूमता रहता है क्या.खोलकर तू देख आँखें, ले रंग ख़ुशी के तू खिला,गम को मुक़द्दर जान के, यूँ ऊंघता रहता है
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आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है......!!

ये बात है खुद से ही ....जिस के पास खुद के लिये कुछ नही है..., शायद! वो खुद भी नही... आज मेरे पास तुम्हारे लिये कुछ नही है , कल मैं पूरी थी तुम्हारी आज मन भी नही है। अब तो बस, खाली मकान-सा खण्ङर बचा है , इसके विराने भी, गूंजते शोर से काम नही है । आज म
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और कहीं अरमान धुल रहे थे

आदम कद दीवारों से घिरा आँगन दो अल्हड जवानियों को मिलाने लगा था,, की साथ दिया तुने भी खुदा हर बूँद के साथ मिलन को सुहावना बना दिया झमाझम करके बरसते बादलों से ,, होंठ थरथरा उठे थे ,, मिलन का नव विस्तार हो रहा था . उन्ही दीवारों के बाहर कोई और भी था एक
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अब हम यहाँ रहें कि वहाँ रहें........!!

अपने आप में सिमट कर रहें कि आपे से बाहर हो कर रहें !! बड़े दिनों से सोच रहे हैं कि हम अब यहाँ रहें या वहाँ रहें !! दुनिया कोई दुश्मन तो नहीं दुनिया को आख़िर क्या कहें !! कुछ चट्टान हैं कुछ खाईयां जीवन दरिया है बहते ही रहे !! कुछ कहने की हसरत तो है अब
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जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी-जिंदगी !!

कब यहाँ से वहाँ ..... कब कहाँ से कहाँ , कितनी आवारा है ये मेरी जिंदगी !! कभी बनती सबा कभी बन जाती हवा , कितने रंगों भरी है मेरी ये जिंदगी !! जिंदगी - जिंदगी - जिंदगी - जिंदगी !! नाचती कूदती - चिडियों सी फूदती , चहचहाती - खिलखिलाती मेरी जिंदगी !! जिंद