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सृजन और सरोकार

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07 Jun 2010
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सत्य की उपलब्धि के नाम पर – कविता – रवि कुमार

सत्य की उपलब्धि के नाम पर ( a poem by ravi kumar, rawatbhata) सत्य कहते हैं ख़ुद को स्वयं उद्‍घाटित नहीं करता सत्य हमेशा चुनौती पेश करता है अपने को ख़ोज कर पा लेने की और हमारी जिज्ञासा में अतृप्ति भर देता है कहते हैं सत्य बहुत ही विरल है उसे खोजना अपने आप
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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सत्य की उपलब्धि के नाम पर – कविता – रवि कुमार

सत्य की उपलब्धि के नाम पर ( a poem by ravi kumar, rawatbhata) सत्य कहते हैं ख़ुद को स्वयं उद्‍घाटित नहीं करता सत्य हमेशा चुनौती पेश करता है अपने को ख़ोज कर पा लेने की और हमारी जिज्ञासा में अतृप्ति भर देता है कहते हैं सत्य बहुत ही विरल है उसे खोजना अपने आप
 
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पूर्ण सहमति तो एक अपवाद पद है

( ‘इतिहास बोध’ में छपी ईश्वरचंद्र पाण्डे की यह महत्वपूर्ण कविता यहां प्रस्तुत की जा रही है। देखिए किस नायाब तरीके से उन्होंने अपनी निराली दृष्टि को अभिव्यक्त किया है। आज के समय की अपेक्षा को बख़ूबी शब्द दिये हैं….यह अभी जनपक्ष में भी दी गई थी, यहां
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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उन्हें सलाम – महेन्द्र नेह – कविता पोस्टर

उन्हें सलाम – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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ईश्वर एक बड़ी सुविधा है – हरीशचन्द्र पाण्डे की कविताएं

अभी ‘इतिहास बोध’ में हरिशचन्द्र पाण्ड़े की कविताओं से गुजरना हुआ। छोटे कलेवर की तीन बेहतरीन कविताओं को यहां साभार प्रस्तुत कर रहा हूं। शायद पसंद आएं। ईश्वर एक बड़ी सुविधा है देवता पहला पत्थर आदमी की उदरपूर्ति में उठा दूसरा पत्थर आदमी द्वारा आदमी के लिए उठा
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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ना सहाय कोई देवता, न कोई ईश-विमर्श : शिवराम

ना सहाय कोई देवता, न कोई ईश-विमर्श : शिवराम ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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हम कवि और हमारी कविताएं – रवि कुमार

हम कवि और हमारी कविताएं ( a poem by ravi kumar, rawatabhata ) हम सभी संवेदनशील हैं विचारशील भी हमारा सौन्दर्यबोध हर कुरूपता पर हमें द्रवित करता है हमारे पास शब्द हैं और कहने की बाजीगरी भी हम लिख लेते हैं कविता पर हमारी बदनसीबी हमारा समय क्रांतिकारी नहीं
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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शुभशक्ति – आयशा खातून की बाँग्ला लघुकथा

यहां-वहां जो अच्छा लगा… ( अभी नया आए ‘वागर्थ’ के अंक-१७७ में प्रकाशित आयशा खातून की बाँग्ला लघुकथा ‘शुभशक्ति’ जिसका कि हिंदी रूपांतर – सुशील क्रांति ने किया है. पर नज़र अटकी. पता नहीं क्यूं अच्छी लगी. लगा इसे यहां पेश किया जाना चाहिए…) (
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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सोसायटी की सुरक्षा खतरे में है – रवि कुमार

सोसायटी की सुरक्षा कितनी खतरे में है ( यह कविता तो शायद कतई नहीं है ) सब बढिया चल रहा है रसोई ठीक है संतुलित आहार प्रदान का कल्पवृक्ष पत्नी लगभग खुश है गहनों और साड़ियों के नये चलन आनंद के वायस बनकर उभरते हैं आपसी समझदारी की ज़िंदा मिसाल ठंड़ में गर्म और
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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बादलों की बस्ती में अलसाये से पहाड़ – छायाचित्र – रवि कुमार

बादलों की बस्ती में अलसाये से पहाड़ ( photographs by ravi kumar, rawatbhata ) अभी पहाड़ी इलाके की यात्रा के दौरान लिये गये कुछ छायाचित्र यहां प्रस्तुत हैं. कुछ चहरे भी………. और यह भी…… ००००० रवि कुमार
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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फिर भी हिस्से आएँ हमारे सिसकियाँ – शिवराम

फिर भी हिस्से आएँ हमारे सिसकियाँ – शिवराम ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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हुसैन की पेंटिंग भारतमाता और अदालत का फ़ैसला

हुसैन की पेंटिंग भारतमाता और अदालत का फ़ैसला हाल ही में कतर की नागरिकता के मद्देनज़र हुसैन पर और हुसैन के बहाने काफ़ी कुछ लिखा गया है। कलाक्षेत्र से जुडे होने के नाते मैं भी इसके कई पहलुओं में अपनी दिलचस्पी रखता हूं। फिलहाल इस पर अपना अभिमत रखने से ज़्यादा
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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रंग – कविता – रवि कुमार

रंग (a poem by ravi kumar, rawatabhata) रंग बहुत महत्वपूर्ण होते हैं इसलिए भी कि हम उनमें ज़्यादा फ़र्क कर पाते हैं कहते हैं पशुओं को रंग महसूस नहीं हो पाते गोया रंगों से सरोबार होना शायद ज़्यादा आदमी होना है यह समझ गहरे से पैबस्त है दिमाग़ों में तभी तो यह
 
रवि कुमार, रावतभाटा
Feb 28 2010 10:01 PM
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न हमारी आग का रंग बदलेगा – महेन्द्र नेह

न हमारी आग का रंग बदलेगा – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरहझिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली
 
रवि कुमार, रावतभाटा
Feb 20 2010 07:45 PM
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कब आओगे – कविता – रवि कुमार

कब आओगे ( a poem by ravi kumar, rawatbhata ) खुलता है ख़त और शब्द टपक पड़ते हैं कब आओगे पंछी चहचहाते हैं वृक्ष झूमते हैं गीत गाती है हवा कब आओगे मशीनों का थका देने वाला शोर लगने लगता है मधुर संगीत बोल फूट पड़ते हैं उसी ताल में कब आओगे वह सोचता है हथेलियों
 
रवि कुमार, रावतभाटा
Feb 13 2010 06:13 PM
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एक अच्छी नींद – नचिकेता

नचिकेता के गीत पत्रिका उदभावना के पन्ने पलटते हुए, बहुत समय के बाद नचिकेता के गीत पढ़ने को मिले. उनका हर गीत कई आयामों से बावस्ता होता है और पाठक से सीधे संवाद करता है. इनको गुनगुनाना इनके प्रभाव को कई गुना कर देता है. इस बार उनका एक गीत प्रस्तुत है. एक
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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देखना ख़ुद को दर्पण में, कैमरे की नज़र से…

देखना ख़ुद को दर्पण में, कैमरे की नज़र से ( self photographs by ravi kumar, rawatbhata ) अभी कुछ दिनों पहले जयपुर प्रवास के दौरान एक अलसुबह, जबरदस्ती कराए गये स्नान के बाद, खिडकी से आती धूप की एक लहर के साये में ख़ुद को दर्पण में देखा. हाथ में कैमरा था,
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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बच्चे और फूल – कविता

बच्चे और फूल ( a poem by ravi kumar, rawatbhata ) बच्चे और फूल – पूर्वार्ध बच्चों को फूल बहुत पसंद हैं वे उन्हें छू लेना चाहते हैं वे उनकी ख़ुशबू के आसपास तैरना चाहते हैं उन्हें तितलियां भी बहुत पसंद हैं बच्चों को उनके नाम-वाम में कोई ख़ास दिलचस्पी
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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ऐ लड़की – महेन्द्र नेह – कविता पोस्टर

ऐ लड़की – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछे होता यह
 
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शहंशाह, भेड़िये और आतंक – शिवराम

शहंशाह, भेड़िये और आतंक – शिवराम ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं क
 
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एक ऐसे समय में – कविता – रवि कुमार

एक ऐसे समय में (a poem by ravi kumar, rawatbhata) एक ऐसे समय में जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है एक ऐसे समय में जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं एक ऐसे समय में जब अ
 
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हमारी आंखों में ख़ून नहीं उतरता – महेन्द्र नेह

हमारी आंखों में ख़ून नहीं उतरता – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) पिछले दिनों मथुरा में कोटा के ख्यातिनाम गीतकार महेन्द्र नेह की कविता पुस्तक ‘थिरक उठेगी धरती’ का विमोचन संपन्न हुआ था। वहां कविता पोस्टर प्रदर्शनी भी लगा
 
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ये कैसी मंदी सजन – शिवराम के दोहे

ये कैसी मंदी सजन – शिवराम के दोहे ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) पिछली बार शिवराम की कविताओं से गुजरना हुआ था. इस बार शिवराम के ही कुछ दोहों पर बनाया गया एक कविता पोस्टर यहां प्रस्तुत है. यह अभी हाल ही में लोकसंघर्ष पत्रिका पर पृष
 
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शिवराम की कविताएं

शिवराम की कविताएं कोटा में शिवराम की तीन कविता पुस्तकों का विमोचन था। इस अवसर पर, उनकी कविताओं पर कुछ पोस्टर खींच-खांचकर मैं भी वहां उपस्थित था। कार्यक्रम की विस्तृत रपट की प्रस्तुति पर तो आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी का कॉपीराईट है। अभी वे बाहर हैं,
 
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असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स

असली इंसान की तरह जिएंगे – मार्क्स ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओ
 
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दीपावली फिर टल गई

दीपावली फिर टल गई (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आफ़ताब का दम भरने वाले दिए की लौ से खौफ़ खा गए आखिर ब्लैकआउट के वक्त उनके ही घर से रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम वे कैसे उठा सकते थे आफ़ताब के सपने संजोती उनकी ओर ताक रही निगाहें नागहां बौखला गईं और चूल्हों
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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रौशनी का महाविस्फोट – महेन्द्र नेह

रौशनी का महाविस्फोट – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओ
 
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यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म

यही है इस समय का सबसे बड़ा धर्म ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhta ) यहां-वहां कई जगह आजकल बरतनों की खनखनाहट का दौर जारी है. दादी जी कहा करती थी रसोईघर से आती ऐसी आवाज़े बताती हैं कि कौरानी का ध्यान आज और कहीं है, किसी और बात पर नाराज़ी है और कह
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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समन्दर कभी ख़ामोश नहीं होता

हरीश भादानी जी नहीं रहे. कल २ अक्टूबर को उनका निधन हुआ. जो उन्हें जानते हैं, वे सब जानते ही हैं. वे जन-आंदोलनों के प्रिय जनकवि रहे हैं. कई कला-विधाओं के जरिए जन-जन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने और जागॄति की अलख जगाने वाले, बीकानेर (राजस्थान) के भादानी जी
 
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भगतसिंह – हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली ( a poster on bhagatsingh by ravi kumar, rawatbhata) हवा में रहेगी मेरे ख़्याल की बिजली ये मुश्ते ख़ाक है फ़ानी रहे या ना रहे ००००००००० रवि कुमार
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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सूरज उगाया जाता फूलों में यदि – शमशेर बहादुर सिंह

सूरज उगाया जाता फूलों में यदि – शमशेर बहादुर सिंह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ ड
 
रवि कुमार, रावतभाटा
Jul 18 2009 07:37 PM
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मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं

मैं समन्दर के बिना कामिल नहीं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मेरी बुलन्दियों से हमेशा मुख़ालिफ़त रही और गहराइयों के प्रति मक़नातीसी खिंचाव इसी सबब मुझसे इक समन्दर दरयाफ़्त हो गया ज़मीं मुझे बुलन्दियों के सिम्त सफर पर देखना चाहती थी और समन्दर मुझे अपन
 
रवि कुमार, रावतभाटा
Jul 11 2009 05:36 PM
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विश्व गुरू होने का ढिंढ़ोरा पीटने वालों – सूरजपाल चौहान

विश्व गुरू होने का ढिंढ़ोरा पीटने वालों – सूरजपाल चौहान ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिं
 
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शोला हो चुकी निगाहों के जरिए

शोला हो चुकी निगाहों के जरिए (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैं नींद खोजता रहा नींद एक ख़्वाब बिल आखिर कंटीली झाड़ियों के इक सहरा में मुझे नींद मिली और वस्ल के ख़ामोश समन्दर की गहराई में नींद को ख़्वाब पर कंटीली झाड़ियों की नींद में वस्ल का ख़्वाब रेत
 
रवि कुमार, रावतभाटा
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मांझी, खोजो पंथ नवीन – शील

मांझी, खोजो पंथ नवीन – शील ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछ
 
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और शायद मैं फौरी नतीज़ों से खौफ़ज़दा हूं

मेरे पास कई ख़्वाब हैं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मेरे पास कई ख़्वाब हैं ख़्वाबों के पास कई ताबीरें पर लानतें भेजने वाली बात यह है मुझे मेरे ख़्वाबों की ताबीर नहीं मालूम मैंने उसे अपने ख़्वाब बताए और ताबीर जाननी चाही वह फ़िक्रज़दा हो गई और मकडियों क
 
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सबसे बडी फूट – रघुवीर सहाय

सबसे बडी फूट – रघुवीर सहाय ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पीछ
 
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हमारे पास और शामें नहीं

हमारे पास और शामें नहीं (a poem by ravi kumar, rawatbhata) मैंने उससे कहा मुझे तुमसे कुछ कहना है उसने मेरी नज़रों को पढा़ और खिलखिलाकर हँस पड़ी झडे़ हुए फूलों की महक से मेरी जीभ बिंध गई एक और शाम खा़मोश गुजर गई मैंने उससे कहा मुझे तुमसे कुछ कहना है उसन
 
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कहाँ जाई, का करि – तुलसीदास

कहाँ जाई, का करि – तुलसीदास ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़ डालने वाली उपमाओं के पी
 
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तोप के मुँह में तिनका रख रही है कविता – तैयब हुसैन

तोप के मुँह में तिनका रख रही है कविता – तैयब हुसैन ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ समूह हमारी चेतना पर अचानक एक हथौडे़ की तरह पड़ते हैं, और हमें बुरी तरह झिंझोड़ डालते हैं. दरअसल हथौडे़ की तरह पड़ने और बुरी तरह झिंझोड़
 
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