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संजीव गौतम

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02 Feb 2010
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गणतंत्र दिवस, 2010

फतेहपुरसीकरी से लगभग तीन किमी. आगे बायें हाथ पर हाईवे से लगा हुआ रसूलपुर गाँव है, अरावली श्रंखला की पहाडियों की तलहटी में. वहां के लोगों को नहीं मालूम कि किस धरोहर के साये में रहने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त है. दरअसल वे पहाडियां कभी हमारे पूर्वजों का घर
 
संजीव गौतम
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गीत

कल वसंत पंचमी है.हम कलमकारों के लिये सबसे बडा दिन.माता सरस्वती की पूजा और साथ हीमहाप्राण निराला का जन्म दिवस.सभी मित्रों और ब्लागर्स भाइयों कोवसंत पर्व की आत्मिक शुभकामनाओं के साथअपनी पूजा में ऍक गीत के साथआप सबको साझा करना चाहता हूँ॑.गीत उस समय का है जब
 
संजीव गौतम
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दोहाकार---अशोक अंज़ुम

अशोक अंजुम साहित्य जगत के बहुचर्चित व्यक्तित्वों में से एक हैं. हिन्दी की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के लगभग हर दूसरे-तीसरे अंक में उनकी उपस्थिति देखी जा सकती है. साहित्यिक मंचों के साथ-साथ रंगमंच के क्षेत्र में भी उनकी सक्रिय भागेदारी है. उनकी अब तक -
 
संजीव गौतम
Dec 29 2009 11:54 AM
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गीत

आज एक गीत और साथ में सूर्य ग्रहण की फोटो प्रस्तुत है. गीत धूप से संवाद करना आ गया है. उम्र भर सच को सराहा सच कहा. झूठ का हर वार सीने पर सहा. क्या डरायेंगे हिरनकश्यप हमें, स्वयं को प्रह्लाद करना आ गया है. धूल वाले रास्ते हक़ के सबब. राजमार्गों से करेंग
 
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संजीव गौतम

नवगीत की पाठशाला में मेरा नवगीत पढें-- http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2009/06/blog-post_05.html
 
संजीव गौतम
Dec 29 2009 11:54 AM
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संजीव गौतम

नवगीत की पाठशाला में मेरा नवगीत पढें http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2009/05/blog-post.html
 
संजीव गौतम
Dec 29 2009 11:54 AM
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कभी तो............ग़ज़ल

कभी तो दर्ज होगी जुर्म की तहरीर थानों में. कभी तो रौशनी होगी हमारे भी मकानों में. कभी तो नाप लेंगे दूरियाँ ये आसमानों की, परिन्दों का यकीं क़ायम तो रहने दो उड़ानों में. अजब हैं माइने इस दौर की गूँगी तरक्की के, मशीनी लोग ढाले जा रहे हैं कारख़ानों में.
 
संजीव गौतम
Dec 29 2009 11:54 AM
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ग़ज़ल

जाने कितने ख़तरे सर पर रहते हैं। हम अपने ही घर में डर कर रहते हैं। मेरे भीतर कोई मुझसे पूछे है, मेरे भीतर क्यों इतने डर रहते हैं। जिन हाथों में कल तक फूल अमन के थे, आज उन्हीं हाथों में पत्थर रहते हैं। बादल, बारिश, नदिया, तारे, जुगनू, गुल, सारे मंज़र
 
संजीव गौतम
Dec 29 2009 11:54 AM
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कश्मीर में तीन दिन-------आखिरी किश्त-

तमाम किंतु-परंतु के पश्चात इस यात्रा संस्मरण की आखिरी कडी प्रस्तुत है. इस संस्मरण के बहाने भाई नवनीत का लेखक के रूप में अवतरण हुआ है. उम्मीद है उनके इस रूप के दर्शन आगे भी होंगे---- ------जब हम शिकारा से भ्रमण कर रहे थे उस समय सूर्यास्त का समय था. इस
 
संजीव गौतम
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और आगे की

गतांक से आगे-- साहिल ने बताया कि सर ये गेस्ट हाऊस हैं.जहां पर्यटक रुकते हैं. खूबसूरत वातावरण के बीच बने उन गेस्ट हाऊस को देखकर मैंने अजय से कहा कि 'छोडो यार, लौटने की फ्लाइट रद्द करो' लेकिन यह व्यवहारिक तौर पर सम्भव नहीं था. गुलमर्ग की जिन सडकों पर ह
 
संजीव गौतम
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और अब आगे की-

गतांक से आगे---- सुबह उठते ही हाऊसबोट के बाहर जब मैंने आस-पास का जायज़ा लिया तो देखा कि चारों तरफ़ पहाडियों से घिरा डल झील का वह इलाका बेहद खूबसूरत था. प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में मेरे सामने थी. हल्का नाश्ता लेकर बाहर थोडा घूमने चले गये. डल झील के कि
 
संजीव गौतम
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पहले कुछ फोटो

इस पोस्ट में विलम्ब के लिये सभी से क्षमा प्रार्थना. कारण यह रहा कि लेख यहां और फोटो दिल्ली में उम्मीद थी कि समय से मिल जायेंगे लेकिन नवनीत भाई का अजय से सम्पर्क ही नहीं हो पा रहा है. जितने फोटो नेट पर अपलोड मिले उन्हीं से काम चलाते हुए आगे की बात करत
 
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कश्मीर में तीन दिन भाग-3

गतांक से आगे--- हमें बेसब्री से प्रसिद्ध जवाहर सुरंग का इंतज़ार था. एशिया की सबसे लंबी सडक सुरंग के बारे में बचपन से ही सुन रखा था. कई जगह बीच में सडक पर shed बने हुथे थे. मैंने उनके बारे में शाहजहां भाईजान से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये Avalanch zon
 
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कश्मीर में तीन दिन भाग-2

गतांक से आगे--- सफ़र की शुरूआत होने के साथ-साथ बातचीत का दौर भी शुरू हो गया. सडक पर लगे मील के पत्थर पर देखा तो कश्मीर अभी 300किमी0 दूर था. जम्मू शहर पार करते ही पहाडी रास्ता शुरू हो गया. मौसम बेहद खुशनुमा था. थोडी देर बाद ही चिनाब हमारे साथ-साथ चलने
 
संजीव गौतम
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यात्रा-1

अभी कुछ दिन पहले दीपावली के आस-पास मेरे एक मित्र डा. नवनीत, कश्मीर होकर आये. डा. नवनीत साहित्यकार नहीं हैं, पेशे से एक इंस्टीट्यूट के निदेशक हैं. वापस आने पर जब उनसे मुलाकात हुई तो उनकी यात्रा की जानकारी हुई. कश्मीर पर भी चर्चा हुई. उसी चर्चा से यह व
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल

ये ग़ज़ल भाई गौतम राजरिशी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना, उनकी जिजीविषा, उनके अदम्य हौसले, उनकी अटूट देशभक्ति, उनके निर्मल मन, उनके सच्चे साहित्यकार और प्यारी भतीजी तनया को समर्पित है- ग़ज़ल पांव के छाले या अपना रास्ता देखूं. मुश्किलें देखूं या अपना हौसला द
 
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संजीव गौतम

इधर कुछ दिनों से मन अच्छा नहीं रहा. कम्प्यूटर पर आवाजाही कम ही हुई उस पर गौतम भाई का समाचार मन को उदास किये रहा. कल सुबह जैसे ही हिन्दुस्तान अखबार पर निगाह पडी तो पहली खुशी मिली. सम्पादकीय पृष्ठ पर नई सडक वाले भाई रवीश जी के ब्लाग वार्ता कालम में गौत
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल-12

पूरे सात वर्ष अवसाद में रहने के पश्चात इस वर्ष इस ग़ज़ल से मेरे साहित्यकार / ग़ज़लकार की नयी पारी शुरू हुई. अपनी बुनावट में साधारण होने के बावज़ूद मेरे लिये इस ग़ज़ल के इस रूप में बहुत माइने हैं.- ग़ज़ल-12.पहले से बेहतर हूं मैं.सन्डे है घर पर हूं मैं..दुनिया से
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल-11

आज बहुत दिन के बाद ठीक से फुर्सत हुई है. एक अतिसाधारण (अतिसाधारण इसलिये क्योंकि इसे कभी किसी गोष्ठी में पढने की हिम्मत नहीं हुई) ग़ज़ल आप सबके स्नेह के लिये प्रस्तुत करता हूं-ग़ज़लअपनी कमज़ोरियां छिपाते हैं.और हैं और ही जताते हैं.कौन सा रोग ये है हमको
 
संजीव गौतम
Sep 06 2009 10:04 AM
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ग़ज़ल-10

सभी मित्रों को स्वतंत्रता दिवस की आत्मिक शुभकामनाओं के साथ एक ग़ज़ल प्रस्तुत है और साथ में फोटो है चर्चित ग़ज़लकार बडे भाई श्री अशोक अंजुम जी(बीच में) और आगरा के युवा कवि भाई पुष्पेन्द्र पुष्प के साथ-ग़ज़लप्रयासों मे कमी होने न पाये.विजय बेशक अभी होने न
 
संजीव गौतम
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शेयर बाज़ार मेरी नज़र में.......

चौंकिये मत मैं कवि ही हूं बस आज मन है कि इस पर भी अपने मन की बात आप सबसे शेयर कर ली जाय. मैं कोई इस बाज़ार का एक्सपर्ट तो नहीं लेकिन जो मैं इसके बारे मैं जानता और मानता हूं वही आप सबसे साझा करने की कोशिश करता हूं. बहुत सारे लोग सोचते हैं कि अरे अपने शेयर
 
संजीव गौतम
Aug 09 2009 03:24 PM
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संजीव गौतम

कल रात डिस्कवरी चैनल पर डिस्कवर इंडिया कार्यक्रम देख रहा था. उसमें लद्दाख के निवासियों पर कार्यक्रम था, जिसमें एक परिवार दिखाया गया है जो पश्मीना बेचने के बाद एक भेड की दावत देता है. परिवार चूंकि बौद्धिस्ट है, जहां किसी भी प्रकार की हत्या को पाप माना
 
संजीव गौतम
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दोहे

मित्रो कई दिन से उधेडबुन में हूं. दरअसल ब्लाग ग़ज़लों का है और मन बहुत कुछ कहने को करता है. सो निर्णय किया है कि आगे से ब्लाग का कायान्तरण करते हुए ब्लाग को सारे बन्धनों से मुक्त कर दिया जाये, यानि कि अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी. हालांकि विचारों के लिये ए
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल

कांटे चुनता रहता हूं. रिश्ते बुनता रहता हूं. मेरी कौन सुनेगा अब, मैं ही सुनता रहता हूं. इस आती पीढी को देख, सर को धुनता रहता हूं. जाने किन उम्मीदों में, सपने बुनता रहता हूं. ये दिन भी कट जायेंगे, सबसे सुनता रहता हूं.
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल

वही हालात हैं बदला हुआ कुछ भी नहीं है. वही चेहरे वही किस्से नया कुछ भी नहीं है. पुराने लोग हैं कुछ जो नज़र आते हैं वरना, नयी तहज़ीब में तहज़ीब सा कुछ भी नहीं है. बहुत बेचैन होता हूँ मैं जब भी सोचता हूँ, यहाँ इस मुल्क़ में अब मुल्क़ सा कुछ भी नहीं है.
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल

लकीरों को मिटाना चाहता हूँ। हदों के पार जाना चाहता हूँ। विरासत में मिले हैं चन्द सपने, उन्हें सूरज दिखाना चाहता हूँ। सुफल लगते हैं मेहनत के शजर पर, ये बच्चों को बताना चाहता हूँ। बहुत ख़ुश दीखती हो तुम कि जिसमें, वही किस्सा सुनाना चाहता हूँ। मेरी ग़ज़
 
संजीव गौतम
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ग़ज़ल

सज़ा मेरी ख़ताओं की मुझे दे दे। मेरे ईश्वर मेरे बच्चों को हँसने दे। इशारे पर चला आया यहाँ तक मैं, यहाँ से अब कहाँ जाऊँ इशारे दे। विरासत में मिलीं हैं ख़ुशबुऍ मुझको, ये दौलत तू मुझे यूँ ही लुटाने दे। मैं ख़ुश हूँ इस गरीबी मैं, फकीरी मैं, मैं जैसा हूँ,