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14 Jan 2010
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रमता जोगी, बहता पानी

रमता जोगी, बहता पानीतेरी राम कहानी क्या...आहट-आहट, चौखट-चौखटबैरी नई पुरानी क्या...?रातों के लम्हे भी मुझकोबिल्कुल वैसे ताजे हैं...जैसे साखी, सबद, सवैयेकोई प्रेम कहानी क्या... ?सागर, पत्ते, हवा, पहाड़ीनदियां अभी रवानी हैं...लेकिन सारी बातों मुझकोतुझको
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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दिल में कारगिल

कारगिल विजय की दसवीं सालगिरह पर ख़ास कार्यक्रम के दौरान राकेश जी ने अपने कारगिल रिपोर्टिंग के अनुभव बांटे उस वक़्त टीवी जर्नलिज़म का वो बूम नहीं था जो आज देखने को मिलता है। इसके बावजूद कुछ चुनिंदा चैनल थे जिन्होंने अपनी टीमें कारगिल युध्द को कवर करने
 
Dr. Praveen Tiwari
Dec 29 2009 11:42 AM
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खबरी की पांच छहनिकाएं

दीवार पर गढ़ी कील, दिल-दीवार, बाकी तुम..! बांस सा ज्वार, फनकार, बंसी की धुन! ----- चुक गए सवाल, सांस, मोक्ष- रंगीन पानी... तेरा अक्स... होश! ----- आहट, अकेलापन, डर- न तू, न मां, न घर! ----- खारा सागर, टूटी बोतल, जिन्न- कारे आखर, कोरे कागज, तेरे बिन!
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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ये क्या बात हुई

मुद्दत बाद ऐसा हुआ तुम पास से निकल गए नि:शब्द... मैं सिर्फ उस हवा को छू पाया जो तुम्हें छू कर आई थी
 
राकेश त्रिपाठी
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ये क्या बात हुई

मुद्दत बाद ऐसा हुआ तुम पास से निकल गए नि:शब्द... मैं सिर्फ उस हवा को छू पाया जो तुम्हें छू कर आई थी
 
राकेश त्रिपाठी
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ख़बरी की एक गज़ल

हुनर भी सब चुक गया है, मुस्कुराने का अब जमाना लद गया है- दिल लगाने का छांव, बारिश, नीम, नदिया- सब पुरानी हो गयी जबसे चलन चला है- मेहमानखाने का फोन वाले प्यार की तासीर कम होती रही कब से वाकया नहीं हुआ- सपनों में आने का होली, दीवाली, ईद- सब दरिया में ज
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
Dec 29 2009 11:42 AM
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तीस साल बाद

मैं लेटा था अस्पताल के सफेद बिस्तर पर तुम्हें देख सकता था पर सुन नहीं झुर्रियों वाले हाथ की उंगलियां उठने को हुईं पर ताकत उम्र से मात खा गईं तुम स्तब्ध थीं तीस साल बाद देखा था शायद खोज रहीं थीं पुराने चेहरे की एक भी कतरन जो मिल जाये
 
राकेश त्रिपाठी
Dec 29 2009 11:42 AM
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इंशाजी उठो अब कूच करो

इंशाजी उठो अब कूच करो, इस शहर में जी का लगाना क्या वहशी को सुकूं से क्या मतलब, जोगी का नगर में ठिकाना क्या इस दिल के दरीदा दामन में देखो तो सही, सोचो तो सही जिस झोली में सौ छेद हुए उस झोली को फैलाना क्या शब बीती चाँद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े पे
 
राकेश त्रिपाठी
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26/11, मुंबई और असली आतंकवादी

समझ नहीं आता, तारीखों से क्या रिश्ता है... क्या 26/11 के ज़ख्मों से खून सिर्फ आज के हीं दिन रिसता है..... ??? "ये वो लाइनें हैं जो 26 नवंबर को लिख पाया बस... लेकिन जब से मुंबई का दौरा कर के लौटा था तब से हीं सोच रहा था कि इस बाबत कुछ लिखुंगा.... पर स
 
राकेश त्रिपाठी
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'लौ' रौशन हो रही थी...

एक लौ रौशन करना मक़सद था..। याद आ रहे थे पिछले साल के वो लम्हें जब आंखों से शहीद एनएसजी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पार्थिव शरीर पर उनकी मां को बदहवास, रोते-बिलखते देखा था... उन इमोशन्स को कैश करवाने के लिए मुझे दृश्यों को "लुका-छिपी बहुत हुई, सामने आ
 
राकेश त्रिपाठी
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मेरे जिस्म में सरहदें हैं... (कॉन्ट्राडिक्शन-2)

दो आंखें हैं... एक जोड़ी होंठ... दो बाहें... कुल मिलाकर एक पूरा जिस्म है... कुछ और हिस्से हैं उस जिस्म के... कुछ उभरे हुए तो कुछ गहरे... जिस्म गीला है... मैं शायराना हूं... मैं रूहानी हूं... मैं जिस्मानी हूं... एक जोड़ी बाहें एक और जोड़ी चाहती हैं...एक
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
Nov 08 2009 05:33 PM
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मैं मां बन गया हूं... (कॉन्ट्राडिक्शन-5)

उन दिनों में मां होना चाहता था और छत के पंखे के नीचे पसीने के तर तकिये को भूलकर घंटों दुनिया से बेहोश रहता था... दिमाग बाकी जिस्म से अलग होकर कहीं तैरने चला जाता था, या लगता था कि सिर्फ दिमाग सो गया है... बाकी बेहोश जिस्म देर तक जिंदा रहता था... और फ
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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मां देख रही है

मां नहीं है बस मां की पेंटिंग है, पर उसकी चश्मे से झाँकती आँखें देख रही हैं बेटे के दुख बेटा अपने ही घर में अजनबी हो गया है वह अल सुबह उठता है पत्नी के खर्राटों के बीच अपने दुखोंकी कविताएं लिखता है रसोई में जाकर चाय बनाता है तो मुन्डू आवाज सुनता है क
 
राकेश त्रिपाठी
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....और सियाराम मर गया

और सियाराम मर गया..उस चिट्ठी का इंतज़ार करते करते जो शायद उसके बेटे को नकली पैरों का एक जोड़ा दिलाती...अपनी बेचारगी से उपजने वाली शर्मिंदगी से निजात दिलाती..18 बरस का उसका जवान बेटा साल भर पहले ट्रेन से गिरकर रेल के पहियों के नीचे आ गया...उसका दुख हम
 
राकेश त्रिपाठी
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80 के बहाने

कपिल सिब्बल कहते हैं कि अब IIT का एंट्रेंस देने के लिए 12वीं क्लास में 80 परसेंट लाना होगा। यानी बाकी लोग बीए, एमए करें और अगले 5 सालों में दिल्ली –मुंबई के महानगरों में खो जाएं। मैं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर से हूं और मुझे पता है कि IIT में सिर्फ
 
राकेश त्रिपाठी
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खबर में कॉन्ट्राडिक्शन

मैं प्रतिभा कटियार को नहीं जानता... लेकिन वो जानती हैं... उन्होंने मुझे मेरे नजरिये से पढ़ा है... ये भी नया कॉन्ट्राडिक्शन है... मुझे अनुमान है कि प्रतिभा आईनेक्ट में पत्रकार हैं... खबर ये है कि 11 अक्टूबर, आईनेक्स्ट के ब्लॉग श्लॉग कॉलम में कॉन्ट्राड
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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कॉन्ट्राडिक्शन- 3

तुम्हें जुकाम हो गया है. -कल भीग गया था- -कब? -जब पहली हिचकी आई थी रात को- उसके बात सोने नहीं दिया तुमने- बहुत बारिश हुई- तकिया गीला हो गया था- -तो मैं नहीं आऊंगी आज तुमसे मिलने- पर तुम्हें तो बुखार हैं- तुम भी ना, जरा भी खयाल नहीं रखते अपना- -पर वो
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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कॉन्ट्राडिक्शन-4

मैं दुनिया के सबसे वाहियात जोक सुनकर हंसना चाहता था, सबसे गंदी गाली किसी को देना चाहता था, और सबसे बुरी लड़कियों से मोहब्बत करना चाहता था… अक्सर लोग कहा करते थे कि दुनिया बिगड़ रही है, बूढ़े अक्सर इस बात का मलाल करते थे, और मुझे उनकी बातों पर आश्चर्य
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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कॉन्ट्राडिक्शन-1

कई निगाहे हैं... उनमें में एक पुराने गुलदस्ते के सूखे गुलाब पर टिकी है... लेकिन एक वहां से हटकर किताबों की बेतरतीब अलमारी में कुछ ढूंढ रही है... इस निगाह को वो लावारिस खत नहीं मिल पा रहे हैं जो आवारगी के दौरान लिखे गए और वो बंजारे खत इन किताबों के हुजूम
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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मैं तेरा, तेरी दुनिया का

अंगडाई लेते मेरे मैले ख्वाबों को तूने छू लिया था हौले से...जैसे पहले चुंबन सा स्पर्श था वो...और मैं जी लिया था ज़िंदगी मेरी...ख्वाबों में हकीकत की दुनिया...वो मोतियों की दुनिया थी...आंखों से झरती थी...और गर्म पानी का फव्वारा बुझाता था उस शहर की प्यासमैं
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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एंकर का कोट

नमस्कार, मैं हूं राहुल शर्मा... और आप देख रहे हैं टेलीविजन इंडिया... इस वक्त की बड़ी खबर आ रही है आगरा के ताज महोत्सव से जहां भीषण आग लग गई है... आग में शिल्पियों के दो सौ से ज्यादा पांडाल जलकर खाक हो गए हैं... मौके पर दमकल की गाड़ियां पहुंच चुकी हैं...
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
Aug 25 2009 06:43 PM
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आख़िर क्यों ?

आख़िर क्यों क्यों क्यों ? ये 'क्यों' है... एक प्रवृत्ति के लिए। प्रवृत्ति दूसरों की ज़िंदगी में ताक-झांक करने की। कई बार हैरानी होती है कि क्यों हमारी दिलचस्पी अपने नंगे सचों को देखने के बजाए दूसरों की ज़िंदगी को नंगा करने में होती है? जहां चार लोगों
 
राकेश त्रिपाठी
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मेराज़ साहब और वो शाम

मेराज़ फ़ैज़ाबादी बहुत बड़े शायर हैं और मैं उनसे एक बार 1992 में लखनऊ में मिला हूं। अब शायद उन्हें याद भी न हो..लेकिन पिछले हफ्ते लखनऊ में ही एक शाम चाय पर उनके साथ बीती। अच्छी आवाज़ और सुंदर शब्दों का जो सेलेक्शन उनकी बातचीत में होता है,वो यकीनन किस
 
राकेश त्रिपाठी
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ये क्या बात हुई

मुद्दत बाद ऐसा हुआ तुम पास से निकल गए नि:शब्द... मैं सिर्फ उस हवा को छू पाया जो तुम्हें छू कर आई थी
 
राकेश त्रिपाठी
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दाग झूठे हैं... देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

सच सुंदर होता है... और दाग अच्छे... आज तक यही कहा है मैंने... यही पढ़ा है... मैंने इन दागों से सुंदर कविताएं लिखीं, और हर बार सुंदर धब्बों पर यकीन किया... मैं डूबा रहा रंगों में... गरारे करता रहा अपनी ही कविताओं के देर तक... मैंने इंद्रधनुष को सुंदर
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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हम भी तालिबान

कल फिर एक औरत को नंगा करके गांव में घुमाया गया। सजा के तौर पर। उसका अपराध ही इतना ' घिनौना ' था कि इससे कम तो सजा क्या मिलती ! लड़की को भागने में मदद की। पता नहीं लड़की को भगाया गया या वह ' प्यार के चक्कर ' में खुद ही चली गई , लेकिन औरत ने किया है ,
 
राकेश त्रिपाठी
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दुनिया खट्टी होगी सब

इश्क नहीं है कविता जैसा... तो? भाव नहीं है राधा जैसा... तो? तुम ढूंढो-फिरो... कन्हैया, राम, रसूल... मैं जानता हूं... मैं बना रहना! तुम खुदा बनो, तो बनो। मेरे पद डगमग हैं... तो? मेरी गति दुर्धर है... तो? तुम अपनी फिक्र करो, नसीहत मत दो... मैं जानता हू
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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राष्ट्रपति भवन में कूड़ा डालना और पेशाब करना मना है...

जी हां... बात कुछ अटपटी लग सकती है... पर यकीन जानिये ये बात मैंने बिल्कुल बिना मोड़े-तोड़े और बिना शब्दों से खेले लिखी है... राष्ट्रपति भवन में वास्तव में कूड़ा डालने पर प्रतिबंध लगा हुआ है... और तो और कोई भारतीय सज्जन वहां दीवार की ओट लेकर या कोई को
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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आकृति की मौत के बहाने

बरस की आकृति अब इस दुनिया में नहीं है। दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में पढ़ने वाली आकृति दमे की मरीज़ थी और सोमवार को जब उसे दौरी पड़ा तो देश के सबसे मंहगे स्कूलों में से एक मॉडर्न स्कूल ने हाथ खड़े कर दिए। मेडिकल फेसिलिटी के नाम पर सैकड़ों रुपये हर महीने
 
राकेश त्रिपाठी
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तुम खट्टी होगी...

तुम खट्टी होगी... पर सच्ची होगी... अभी छौंक रही होगी हरी चिरी मिर्चें... खट्टे करौंदों के साथ... या कच्ची आमी के... या नींबू के... या ना भी शायद... नाप रही होगी अपना कंधा... बाबू जी के कंधे से... या भाई से... और एड़ियों के बल खड़ी तुम्हारी बेईमानी बड
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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क्यों कर ली मोहब्बत

हथेली पे तेरा नाम उभारा क्योंकर तुझको नज़रों के समंदर में उतारा क्योंकर तेरा नाम मेरे नाम से मिलता ही नहीं इस तरह नाम तेरा लेके पुकारा क्योंकर मेरी बस्ती के उजाले भी खफ़ा हैं मुझसे चांद तारों को अंधेरों में उतारा क्योंकर इन निगाहों को निगाहों की कोई
 
राकेश त्रिपाठी
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मैं हूं श्रवण कुमार

अम्मां अपने कमरे की दीवार पर टांग ली है मैंने तुम्हारी 30 साल पुरानी तस्वीर और बन बैठा हूं श्रवण कुमार तस्वीर काफी पुरानी है अम्मां तब तुम हंसती थी घर के हर कोने पर अपनी मौजूदगी का अहसास कराती थीं रसोई के मुहाने से लेकर लॉन के आगे गेट तक हर जगह था तु
 
राकेश त्रिपाठी
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ज़ुबान की राजनीति

चुनावी मौसम में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ना तो लाज़िमी है। लेकिन वोट बैंक जुटाने के लिए जिस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं वो सिवाए लानत के मन में कोई और भाव पैदा नहीं करते। राजनीति में 'राज' से भी ज़्यादा 'अराजकता' का अस्तित्व फलता-फूलता दिखाई देने लग
 
राकेश त्रिपाठी
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नीली छांह...

नीली स्याही... नीला कागज... नीला बादल... नीला दु:ख... नीली आंखों वाली की हर याद बहुत नीली है... नीला सरगम... नीला पंचम... नीली बातें... नीला चुप... नीले-नीले जीवन की हर सांस बहुत नीली है... लिख-लिख कर कागज पर सपने, आग लगाए हाथों से... जलते नीले सपनों
 
देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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जरनैल का जूता

इराक के पत्रकर जैदी ने मानों दुनिया भर के लोगों को एक रास्ता दिखा दिया है। जब हद हो जाए-तो क्या करे कोई। 1984 में सैकड़ों सिख मारे गये थे और आज 25 साल बाद उन दंगों के सारे आरोपी बाहर हैं। जैदी के ज़हन में था इराक की बर्बादी का सवाल...उसने जूता मारने
 
राकेश त्रिपाठी
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स्लमडॉग के बहाने...

साल के विकास स्वरूप दक्षिण अफ्रीका में भारत के डिप्टी हाईकमिश्नर हैं। इलाहाबाद के हैं और मुझसे कुछ साल बड़े हैं , इसलिए उनकी ख्याति अच्छी भी लगती है। उन्होंने दो साल पहले एक उपन्यास लिखा-Q & A. अंग्रेज़ी में लिखी ये उपन्यास लेकर वो भारत के दो-चार
 
राकेश त्रिपाठी
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स्लमडॉग पर सवालों के जवाब

स्लमडॉग ने एक बार फिर दुनिया भर में धूम मचायी है। फिल्मों से जुड़े सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ऑस्कर की खेप की खेप पर कब्ज़ा कर लिया। दस में आठ ऑस्कर जीते और अकूत वाहवाही भी। लेकिन किसी अंग्रेज़ की बनाई फिल्म को मिली ये कामयाबी हममें से कई लोगों को हज़म
 
राकेश त्रिपाठी
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एक 'मुस्कान' की कहानी

अगर इस कहानी को दुनिया के किसी भी कोने में बैठा शख़्स सुन रहा हो.. तो वो इसका हिस्सा बन जाता है... ये उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में बसे एक गांव की कहानी है। सात साल की मासूम लड़की की कहानी है... कहानी को समझना है... उससे जुड़ी उम्मीदों को समझना है ल
 
राकेश त्रिपाठी
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रिशतों का पद्मश्री

सरकारी पुरस्कारों का कोई मतलब नहीं होता ...ये तो सबको पता है। लेकिन बांटने में अंधेरगर्दी होगी ..ये इस बार ही पता चला। सूरमा भुला दिए गए...और बड़े लोगों पर प्रतिभा लाद दी गई। अमिताभ बच्चन की बहू (अभी इन्हें ऐसे ही जाना जा सकता है)ऐश्वर्य को पद्मश्री
 
राकेश त्रिपाठी
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कौन है आज़ाद

आज़ाद होने की खुशी क्या होती है शायद ये हर वो इंसान जानता है जिसने किसी भी कैद की सांकले तोड़कर आज़ाद उड़ान भरी होगी। और उस उड़ान के बाद फिर किसी नई उड़ान की ख़्वाहिश की होगी। लेकिन आज़ादी की बात करते करते मैं कब आज़ादी की परिभाषा में उलझ गई, मुझे पत
 
राकेश त्रिपाठी