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13 Jun 2010
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त्रिवेणी संगम

जालोर में मेरे दो साहित्यिक मित्र हैं. एक अचलेश्वर "आनंद" दूसरे परमानंद भट्ट. एक "आनंद" तो दूसरा "परमानंद" ! अब समझे आप मेरे सदा आनंदित रहने का रहस्य ? हम तीनों ग़ज़लों के रसिया. ग़ज़ल कहना, पढ़ना, सुनना और सुनाना हम तीनों को बहुत अच्छा लगता है. और एक रहस्य
 
jogeshwar garg
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सिर्फ कन्हैया सिर्फ कन्हैया

सामान्यतया एक ही ग़ज़ल के विभिन्न अशआर अपनेआप में स्वतंत्र इकाई होते हैं. रदीफ़/काफिया के बंधन की बात छोड़ दें तो कथ्य की दृष्टि से हर शेर एक स्वतंत्र एवं परिपूर्ण कविता होती है. रदीफ़, काफिया और बहर उन स्वतंत्र इकाइयों को एक बड़ी इकाई का स्वरुप प्रदान करते
 
jogeshwar garg
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Jogeshwar Garg

मित्रों !आप सब को सादर प्रणाम !इन्टरनेट की कृपा से चिट्ठा जगत का प्रादुर्भाव हुआ और देखते ही देखते सब को अपने जाल में लपेट लिया. जाने-अनजाने मैं भी इस जाल में आ टपका. आप सबने गर्म-जोशी से स्वागत किया तो मैं यहीं टिक गया. वर्ष २००९ के जून महीने की दूसरी
 
jogeshwar garg
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जो कभी की नहीं खता मैंने

जो कभी की नहीं खता मैंने खूब पायी वही सज़ा मैंने आपने सुन लिया वही सब कुछ जो कभी भी नहीं कहा मैंने क्या शिकायत करुँ ज़माने की आप भी हैं खफा सुना मैंने आप भी तो कभी सुनें मेरी आप को उम्र भर सुना मैंने आ गया मैं तभी निशाने पर आप को ज़िंदगी कहा मैंने आपको देख
 
jogeshwar garg
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जैसे ख्वाब दिखाए तूने

जैसे ख्वाब दिखाए तूने वैसी अब ताबीरें दे मेरी आँखों में बस जाए ऐसी कुछ तस्वीरें दे और मुझे कुछ दे या ना दे मौला तेरी मर्जी है दानिशमंदी की दौलत दे हिम्मत की जागीरें दे राम भरोसे मुल्क हमारा जो होगा अच्छा होगा नेता से उम्मीद यही बस अच्छी सी तक़रीरें दे जब
 
jogeshwar garg
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फूल मत तू

फूल मत तू सफलता की हाथ चाबी देख कर लोग तो जलते रहेंगे कामयाबी देख कर आपकी परछाइयों का है असर मत चोंकिये रंग मेरी शक्ल का इतना गुलाबी देख कर वो लगे अहसान गिनने तो हंसी आयी मुझे ज़ख्म गिनने में उन्हीं की बेहिसाबी देख कर नाम कितने हैं बड़े फैशन मनोरंजन
 
jogeshwar garg
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मिले मज़बूत को मज़बूतियाँ हर पल सहारे भी

मिले मज़बूत को मज़बूतियाँ हर पल सहारे भी उन्हें हासिल हमेशा ही निगाहें भी नज़ारे भी किसे दें दोष गर ये ज़िंदगी सैलाब बन जाए कभी मदहोश धाराएं कभी बेखुद किनारे भी न जाने ज़िंदगी क्या क्या दिखायेगी अभी आगे कभी कुहरा कभी पतझड़ कभी
 
jogeshwar garg
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ये पुरानी बात है

सब सही था ये पुरानी बात है आज बेकाबू बहुत हालात है ज़िंदगी आघात-दर-आघात है एक पल शह दूसरे पल मात है जातियां तो जिस्म की मज़बूरियाँ रूह की ना पांत है न जात है क्या अमावस पूर्णिमा को खा गयी क्यों भला इतनी अंधेरी रात हैहर कदम पर है सितारों का
 
jogeshwar garg
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कहूं शाम इसको कहूं या सवेरा

कहूं शाम इसको कहूं या सवेरा कभी है उजाला कभी फिर अन्धेरा कभी है खुशी तो कभी गम घनेरा अरे क्या हुआ क्या हुआ हाल मेरा मुझे पूछते सब बता ए मुसाफिर किधर है ठिकाना कहाँ है बसेरा मुझे मार कर कह दिया है शहादत मेरी राख को फिर
 
jogeshwar garg
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श्रद्धांजलि

भैरों सिंह जी आप थे जन-जन का विश्वास निज जीवन से आपने रचा नया इतिहास रचा नया इतिहास भूल कैसे हम जाएँ सीख सीख कर आपसे अपना फ़र्ज़ निभाएं पहले तो प्रत्यक्ष थे अब केवल आभास भैरों सिंह जी आप थे जन-जन का विश्वास (श्रद्धेय भैरों
 
jogeshwar garg
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जो बन्दा बिंदास रे जोगी

जो बन्दा बिंदास रे जोगी दुनिया उसकी दास रे जोगी इतना ध्यान हमेशा रखना कौन बना क्यों ख़ास रे जोगी ज्ञान-समंदर उतना गहरा जितनी जिसकी प्यास रे जोगी भौंचक अवध समझ नहीं पाया कौन गया वनवास रे जोगी दुनियादारी ढोते
 
jogeshwar garg
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किसी को बना दे किसी को मिटा दे

किसी को बना दे किसी को मिटा दे खुदा है कि क्या है मुझे तू बता दे अगर है मुहब्बत किसी दिन जता दे कभी देख मुझको ज़रा मुस्कुरा दे  मिटा दो रिवाजों को रस्मों को यारों मुहब्बत करे और फिर भी दगा दे  दिला दे हमें याद फिर वो
 
jogeshwar garg
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May 10 2010 02:07 PM
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रौशनी कर

रौशनी कर घर जला कर बोल हंस कर ग़म भुला कर जीतते ही मैं सिकंदर  हार मेरी शहर के सर  बूँद हूँ मैं तू समंदर  छोड़ कल की आज ही कर उम्र गुजरी राह चल करदोस्त सब खुश ज़ख्म दे कर  शिव बने शिव ज़हर पी
 
jogeshwar garg
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सब मुझको समझायेंगे

सब मुझको समझायेंगे फिर तुमको बहलाएँगे  उलझी खूब पहेली है कौन इसे सुलझाएंगे  होली पर भी कुछ पागल दीवाली के गायेंगे  समझेगा भी कौन यहाँ किस किस को समझायेंगे  जीती बाज़ी हारेंगे अहम् जहां टकरायेंगे  पढ़े नहीं
 
jogeshwar garg
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जल प्रदूषित और ज़हरीली हवाएं देखिये

जल प्रदूषित और ज़हरीली हवाएं देखिये और फिर उनके बयानों की अदाएं देखिये  मूक दर्शक बन खडा है आदमी जो आम है शोक की या शौक़ की सारी सभाएं देखिये  वस्त्र की जो ओट है तन पर उसे भी चीर कर  भेड़िये सी ताकती भूखी निगाहें
 
jogeshwar garg
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कुछ मेरी नादानी थी

कुछ मेरी नादानी थी कुछ उनकी मनमानी थी  अब ग़म हैं पगलाए से तब खुशियाँ दीवानी थी  विरह अगन सा था लेकिन तेरी यादें पानी थी  लगती थी कितनी प्यारी बातें जो बचकानी थी  कभी मिलो तन्हाई में कुछ बातें समझानी थी 
 
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Jogeshwar Garg

हुआ है क्या अजब हम पर मुहब्बत का असर देखो इधर मैं होश खो बैठा उधर तू बेखबर देखो  भटकते जंगलों में उम्र की हमने बसर देखो हमारा हाल कैसा है कभी तो पूछ कर देखो  तुम्हारी ये अदा मेरा कलेजा चीर ही देगी उचटती-सी नज़र हम पर पलट कर फिर
 
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Jogeshwar Garg

कुछ तो हम पागल दीवाने लगते हैं और उधर कुछ आप सयाने लगते हैं भूखी आंतें जब जब कहती रोटी दो नयन बावरे स्वप्न दिखाने लगते हैं सच की कीमत एक ज़रा सा साहस हो और झूंठ को रोज बहाने लगते हैं ताऊ को जब पूछो कल क्या करना है बीते कल की बात बताने लगते हैं जब जब मैं
 
jogeshwar garg
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पावन गंगा नीर ग़ज़ल

पावन गंगा नीर ग़ज़ल सागर-सी गंभीर ग़ज़ल कान्हा बन कर लाज रखे दौपदियों का चीर ग़ज़ल बुद्धिमान दरबारों में युद्ध-भूमि में वीर ग़ज़ल हिम्मत-सी दिल के अन्दर हाथों में शमशीर ग़ज़ल झरने जैसी बह निकली पर्वत जैसी पीर
 
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कभी देखे न ऐसा दौर तू भी

कभी देखे न ऐसा दौर तू भी हमारी बात पर कर गौर तू भी अगर तू चाहता है पैर फैले बना दे और लम्बी सौर तू भी नहीं मिलना मुझे कोई ठिकाना न पायेगा कहीं भी ठौर तू भी बदल दी ज़िंदगी मेरी सही है बदल अपना तरीका तौर तू भी मुझे
 
jogeshwar garg
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अवतारों के उपदेशों का

अवतारों के उपदेशों का सब ग्रंथों का सार यही है ढाई आखर पढ़ ले बन्दे कबीरा तूने खूब कही है सागर सूखा और हिमालय डूब गया गहराई में कैसे समझाऊँ मैं यारों कैसी उल्टी धार बही है धरती डोली अम्बर कांपा तूफां चारों ओर मचा है जब भी कोई दिल
 
jogeshwar garg
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नव-वर्ष की शुभ-कामना

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा [दिनांक १६ मार्च, २०१०] को विक्रम संवत २०६७ प्रारम्भ हुआ. प्रवास पर होने के कारण नव-वर्ष की शुभ-कामना पोस्ट नहीं कर पाया. क्षमा-प्रार्थी हूँ. देर से ही सही आप सब को नव-वर्ष की हार्दिक शुभ-कामनाएं !संवत २०६७ आपके लिए शुभ एवं लाभ का
 
jogeshwar garg
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कभी तोड़ा कभी छोड़ा

कभी तोड़ा कभी छोड़ा कभी छेड़ा बहाने से हमारा दिल कभी हटता नहीं उनके निशाने से इसी उम्मीद पर देता रहा हूँ हर परीक्षा मैं कभी तो बाज आयेगा मुझे तू आजमाने से खुशी के साथ सह लूंगा सितमगर मैं सितम तेरे अगर आनंद मिलता हो तुझे मुझको
 
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होली में

करे हैं रंग का बू का सभी व्यापार होली में मुहब्बत कम से कमतर हो रही हर बार होली में न थापें चंग पर ना गालियाँ ना गीत अब बाकी कभी गलियाँ मुहल्ले थे बहुत गुलजार होली में  हमारे जिस्म की मज़बूतियाँ बेकार हैं यारों हमारी सोच ही जब हो
 
jogeshwar garg
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Mar 01 2010 09:31 PM
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बुरा न मानो होली है

उन्हें सख्त परहेज है हम को भाये रंग वो भी हमसे तंग हैं हम भी उनसे तंग कैसे होली खेलिए सुंदरियों के संग हम हाथी की चाल हैं वो हिरनी के ढंग बालों में बेकार अब महँगा काला रंग सांस फूल चुगली करे कैसे लगिए यंग मनमोहन
 
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ईंट पत्थर ढूँढता है

ईंट पत्थर ढूँढता है फिर मेरा सर ढूँढता है एक कुनबा मुश्किलों का क्यों मेरा घर ढूँढता है हाथ में कैंची लिए वो फैलते पर ढूंढता है राम भी हनुमान जैसे और वानर ढूँढता है भक्त भूले देवता को और तस्कर ढूँढता है मरहमों से तंग आकर ज़ख्म खंज़र ढूँढता है प्यार की दो
 
jogeshwar garg
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Feb 16 2010 10:37 PM
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न सोचा था कभी

न सोचा था कभी दे जाएगा ऐसी सज़ा कोई कभी कह जाएगा यारों मुझे भी बेवफा कोई तुम्हारे प्रेम के दो  घूँट मैंने पी लिए जब से मुझे चढ़ता नहीं है दूसरा अब तो नशा कोई गिले सब दूर शिकवे भी शिकायत भी नहीं रहती दिलों के दरमियान रहता नहीं जब फासला कोई
 
jogeshwar garg
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Feb 14 2010 05:55 PM
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दुनिया आनी-जानी है

दुनिया आनी-जानी है चिपके तो नादानी है सारे पंडित ज्ञानी है इक तू ही अज्ञानी है कबीरा क्या समझाएगा यह दुनिया दीवानी है अमृत ज़हर ज़हर अमृत मीरा तो मस्तानी है हर चेहरे पर आँखें दो आँखें हैं तो पानी है कभी छाछ से काम चला रोज कहाँ गुड-धानी है इसकी उसकी बात अलग
 
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अर्ज़ भगवान से ये है

अर्ज़ भगवान से ये है किसी दिन गर सुने मेरी तुम्हारी आँख का पानी हथेली पर गिरे मेरी कभी मैं सोचता हूँ आपबीती लिख रखूँ अपनी बला से दास्ताँ दुनिया पढ़े या ना पढ़े मेरी सितमगर का कभी तो हाल ऐसा कर मेरे मौला कभी रोते बिलखते वो कहानी
 
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किस्से और कहानी भी

किस्से और कहानी भी दिल में और जुबानी भी गया बुढापा सुना कभी लौटी कभी जवानी भी कठमुल्ले समझेंगे क्या कबीरा तेरी वाणी भी बढ़ कर सौ सैलाबों से आँखों वाला पानी भी लगे हकीक़त जैसी क्यों दुनिया आनी जानी भी कुछ मेरा दीवानापन कुछ उनकी मनमानी भी "जोगेश्वर" को छोडो
 
jogeshwar garg
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लगते तो हैं प्यारे लोग

लगते तो हैं प्यारे लोग सच में कड़वे खारे लोग पूछ नहीं तू उनकी सोच हैं संकरे गलियारे लोग जब हो कुछ मतलब की बात मुझको खूब दुलारे लोग कहे पीठ पर मुख पर मौन वो ही सब को प्यारे लोग इसकी उसको करते बात जैसे हो हरकारे लोग एक ज़रा उंगली दब जाए चीखे और पुकारे
 
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अकड़ दिखा कर खडा रहा तो

अकड़ दिखा कर खडा रहा तो बहुत बहुत पछतायेगा लोट-पोट हो जा चरणों में आंखों में बस जायगा मैं तेजा-सा वीर बनूँ पर इसमें जोखिम भारी है जिसे बचाऊंगा लपटों से वही मुझे डंस जाएगा उसने तो झूंठे सच्चे इल्जाम लगा कर छोड़ दिए एक अकेला तू बेचारा किस किस को समझायेग
 
jogeshwar garg
Dec 29 2009 11:45 AM
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क्या क्या करना पड़ता है

क्या क्या करना पड़ता है इक फ़र्ज़ निभाने की खातिर  काँटों को सहना होगा कुछ फूल सजाने की खातिर  ऊंची सी दीवार खींच दो बंटवारा करने वालों  पतली गली छोड़ कर रखना आने जाने की खातिर  दाने दाने पर दाता ने नाम लिखा है फिर भी क्यों 
 
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छोटे से जीवन की खातिर

छोटे से जीवन की खातिर कितने ताम-झाम कर डाले  आफत-कष्ट-मुसीबत हमने अपनी झोली में भर डाले  छाई हैं घनघोर घटायें बादल अब बरसे तब बरसे  हम पागल दीवाने बैठे नदी किनारे छप्पर डाले  एक शब्द का उत्तर था तुम हाँ कहते या ना कहते  पग-पग
 
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आए अब तक सावन कितने

आए अब तक सावन कितनेसूखे फ़िर भी मधुबन कितने घर है कितने बिखरे बिखरेकटते बंटते आँगन कितने जाति क्षेत्र भाषाएँ मज़हबकर डाले सीमांकन कितने करी किसीने घोर तपस्याडोल उठे सिंहासन कितने चेहरे पर यदि मैल जमा होफ़िर हो उजले दर्पन कितने वर्षों से लिपटे हैं
 
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कतारें लगा कर खडा आदमी

कतारें लगा कर खडा आदमी मुझे भी बना दो बड़ा आदमी कभी तान सीना खडा आदमी कभी बुजदिलों सा पडा आदमी बड़ा ठोस चट्टान सा था मगर ज़रा छू लिया रो पडा आदमी लगे खूबसूरत मगर अर्थ क्या नगीने सरीखा जडा आदमी मिले चार पैसे कि पद मिल गया गया बिन पिए लड़खडा आदमी कभी हो
 
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कब सोचा था

कब सोचा था इतना सब कुछ कर जायेगी गाय विदेशी अक्ल हमारी चर जायेगी उम्मीदें नाकाम तमन्ना मर जायेगी इसकी जिम्मेदारी किसके सर जायेगी चट्टानी लहरें हद पार गुज़र जायेगी कश्ती मेरी फ़िर भी पार उतर जायेगी यूँ तो महफ़िल में हर ओर नज़र जायेगी उनको देखा तो फ़िर वही
 
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टिमटिमाता एक दीपक

टिमटिमाता एक दीपक खूब ताक़तवर हुआ यह समर तो सिर्फ़ उसके ही भरोसे सर हुआ इक समंदर के मुकाबिल मानता हूँ मैं उसे ओस की वह बूँद जिससे हलक़ मेरा तर हुआ मैं अचंभित तू अचंभित हैं अचंभित लोग सब कौन समझाये किसे ये क्या हुआ क्योंकर हुआ रास्ता उम्मीद का दिखला ग
 
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देखना ये है

ज़माना तो हुआ दुश्मन हमारा देखना ये है तुम्हारी आँख देती क्या इशारा देखना ये है सहे तूफ़ान भी मंझधार के तेवर बहुत देखे सुकूं दे पायेगा कितना किनारा देखना ये है तुम्हारी बज्म से उठ कर चले थे सूरमा कितने पलट कर आ सके कितने दुबारा देखना ये है हुआ है अस्त
 
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इसलिए वह

इसलिए वह देवताओं की तरह इतरा गया जो मिला उसके चरण तक झुक गया झुकता गया सूर्य उसके अहम् का छूने लगा ऊंचाइयां दीप मेरी आस्था का मंद हो बुझाता गयाकारवां तो चल रहा था ठीक थी उसकी दिशा रहनुमा को क्या हुआ जो खुद उसे भटका गयामैं निवेदन कर रहा था राह की मुश्किल
 
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