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मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने

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09 Jun 2010
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चोरबजारी,इतना ज़्यादा,मारामारी,इतना ज़्यादा-----(विनोद कुमार पांडेय)

चोरबजारी,इतना ज़्यादामारामारी,इतना ज़्यादाउन्नत देश हो रहा यारोपर बेकारी,इतना ज़्यादामँहगाई बढ़-चढ़ कर बोलेमालगुजारी,इतना ज़्यादानिर्धन की नैनों में देखोहै लाचारी,इतना ज़्यादाचारो तरफ फँसी हैं पब्लिकहाहाकारी,इतना ज़्यादासत्ता-कुर्सी लोभी नेतामें मक्कारी
 
विनोद कुमार पांडेय
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अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-6-----(विनोद कुमार पांडेय)

कहूँ बड़ों को क्यों भला,छोटे भी है तेज|संस्कार से वो सभी,हैं करते परहेज||बाबू माँ की बात का,तनिक नही सम्मान|उल्टे कामों में सदा,रहता उनका ध्यान||लाल कलर टी- शर्ट पर,काला-नीला शूज|जींस छोड़ कर देह पर,बाकी सब कुछ लूज|गाँव-मोहल्ला तंग है,ऐसे सुंदर
 
विनोद कुमार पांडेय
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फेंको अपनी झोला-झंडी,हो जाओ बिंदास रे जोगी-----(विनोद कुमार पांडेय)

अभी कुछ दिन पहले आज की ग़ज़ल पर एक संपन्न तरही मुशायरा में प्रस्तुत मेरी एक ग़ज़ल जिसमें मैं कुछ लाइन और जोड़ कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ..बैठ मेरे तू पास रे जोगी,बात कहूँ कुछ खास रे जोगीगेरुआ कपड़ा,चंदन,टीका,सब कुछ है,बकवास रे जोगीतुझे पता
 
विनोद कुमार पांडेय
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इम्तिहान ज्यों ख़तम हुआ,कल्लू नें बाँधी आस----(विनोद कुमार पांडेय)

इम्तिहान ज्यों ख़तम हुआ,कल्लू नें बाँधी आस,हे भगवान चढ़ाइब लड्डू,बस करवा द पास,बारहवीं के इम्तिहान का,टेंसन बहुत लिया,गुलछर्रों के साथ साथ में,मेहनत खूब किया,नकल कराने को चाचा ने पूरा ज़ोर लगाया,पर किस्मत का मारा बुद्धू,वो भी ना कर पाया,टीचर से लेकर चाचा
 
विनोद कुमार पांडेय
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राष्ट्रीय कहिए या अंतरराष्ट्रीय पर एक हिट दिल्ली ब्लॉगर्स सम्मेलन की रिपोर्टिंग का काव्य रूपांतरण पढ़िए...मेरे अपने अंदाज में----(विनोद कुमार पांडेय)

एक बार फिर ब्लॉगर्स ने इतिहास रच डाला,२३ मई२०१०,स्थान था नांगलोई,छोटूराम धर्मशाला,छोटू था धर्मशाला,पर बड़े बड़े लोग आए थे,आकर महफ़िल को खुशमिजाज बनाएँ थे,संगीता पूरी जी,और ललित शर्मा जी बड़े दूर से आएँ थे,शेष मनुष्य यही दिल्ली के मैदानी इलाक़ों से आकर
 
विनोद कुमार पांडेय
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बारह लाख लिए शादी में,दुलहिन देखें सन्न हो गये(एक हास्य ग़ज़ल)-----(विनोद कुमार पांडेय)

नोट गिने प्रसन्न हो गयेचीरकुट थे, संपन्न हो गयेबारह लाख लिए शादी मेंदुलहिन देखें सन्न हो गयेमाथा पकड़ लिए पगला करअलग दृश्य उत्पन्न हो गयेदेख तमाशा लड़की वालेलाठी लेकर ठन्न हो गयेताऊ,चाचा,मौसा,मामाभँवरा जैसे भन्न हो गयेउधर बराती अलग मौज मेंखा-पी कर सब
 
विनोद कुमार पांडेय
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हम तुम्हारे लिए जाल बुनने लगे,तुम हमारे लिए फंदे कसने लगे-----(विनोद कुमार पांडेय)

हम तुम्हारे लिए जाल बुनने लगे,तुम हमारे लिए फंदे कसने लगे,आज फ़ितरत यहीं आदमी की हुई,आदमी आदमी को ही डसने लगे.ना दुआएँ रही याद माँ-बाप की,हर तरक्की पे अपने हरषने लगे.जिस पिता ने गले से लगा कर रखा,अब वहीं इक झलक को तरसने लगे.स्नेह आदर में ऐसी मिलावट
 
विनोद कुमार पांडेय
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एक सुंदर सी कविता के साथ सभी ब्लॉगर्स साथियों को मातृ दिवस की अग्रिम बधाई-----(विनोद कुमार पांडेय)

मातृ दिवस के उपलक्ष्य में इस कवि ने अपने शब्द माँ के नाम अर्पित किया है,जीवन मे एक ऐसा नाम जिससे हम कभी भी अलग नही हो सकते,और वो शब्द है "माँ".आज एक बार फिर आपके सामने प्रस्तुत है मेरी यह कविता... माँ,ममता का असीम श्रोत हैं,माँ,इस नश्वर जीवन की,अखंड
 
विनोद कुमार पांडेय
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अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-5-----(विनोद कुमार पांडेय)

ग्रह,नक्षत्र अनुकूल हो,मंदिर जाते रोज|घर में माँ भूखी रहे,बाँट रहे वो भोज||सब अपने में लीन है,अजब -गजब हालात|ऐसे तैसे काटते,बाबू जी दिन रात||बस रोटी दो जून की, हिस्से दादी के |कंप्यूटर ने छीन ली,किस्से दादी के||नाती पोते समझते,हैं उनको अब भार| | अंधे
 
विनोद कुमार पांडेय
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सरकारी सारे प्रयास कितने सक्षम है,क्या बोलूँ,उन्नतशील हो रहा भारत,मगर उन्नति जै श्री राम----(विनोद कुमार पांडेय)

सरकारी सारे प्रयास कितने सक्षम है,क्या बोलूँ,उन्नतशील हो रहा भारत,मगर उन्नति जै श्री राम,गाँव-शहर सब चीख रहा है,मँहगाई है,चारो ओर,पेट पालना भी मुश्किल है,आया है, कैसा यह दौर,जनता आख़िर किससे बोले,कौन सुने इनकी फरियाद,मौन पड़े बैठे हैं सारे,संसद में जाने
 
विनोद कुमार पांडेय
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टीका,चंदन,माला,दाढ़ी,साधु बाबा बड़े खिलाड़ी----------(विनोद कुमार पांडेय)

टीका,चंदन,माला,दाढ़ी,साधु बाबा बड़े खिलाड़ी|उजला-उजला तन पर कपड़ा,अंदर से मन काला,रंग-भरी दुनिया के रंगों में,खुद को रंग डाला,५२ रूप धरे बाबाजी,पब्लिक समझ न पाए,भारी झटका लगता उसको,जो झाँसे में आए,पर दिखते है भोले-भाले,तित पर निर्मल
 
विनोद कुमार पांडेय
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जंगल के राजाओं की एक गुहार- एक व्यंग रचना(विनोद कुमार पांडेय)

कल हरिभूमि में प्रकाशित में प्रकाशित मेरी एक व्यंग रचना...
 
विनोद कुमार पांडेय
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कई रंग हमने जमाने के देखें,कहीं भूखमरी है,कहीं धन भरा है-----(विनोद कुमार पांडेय)

समझ में न आए,कि क्या माजरा है,ये इंसान है,या कोई सिरफिरा है,ये पैसा,ये रुपया,ये दौलत,ये शोहरत,समझता है सब कुछ इसी में धरा है,ग़रीबों की आहों पे महलें उठाता,लगे जैसे आँखों का पानी मरा है,वहीं आज बनता है,सबसे बड़ा,हज़ारों दफ़ा जो नज़र से गिरा है,कई रंग
 
विनोद कुमार पांडेय
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अलबेला खत्री जी की दिल्ली यात्रा पर आयोजित ब्लॉगर्स मिलन समारोह का आँखो देखा हाल वहीं मेरे अपने पुराने अंदाज में----(विनोद कुमार पांडेय)

आपसी प्रेम और सौहार्द के फूल खिले,दिल्ली में आज एक बार फिर कुछ ब्लॉगर्स मिलें,कुछ ब्लॉगर्स,कुछ कवि,कुछ व्यंगकार हैंपर एक बात सच्ची है,सभी के सभी बहुत बड़े कलाकार हैं. हमें भी एक दिन पहले से जानकारी थी,तो हम भी पहुँच गये थे,अब थोड़े डीटेल में आता हूँ,और
 
विनोद कुमार पांडेय
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रिश्ते भी चलचित्र बनें हैं दुनिया में--------(विनोद कुमार पांडेय)

जिनके चरण,आचरण दोनों दूषित हैं,देखो वहीं पवित्र बनें हैं दुनिया में,जिस मूरत पर श्रद्धा से सर झुक जाता है,उनके भद्दे चित्र बनें हैं दुनिया में,मेरी आँखों में आँसू वो हँसते है,ऐसे ऐसे मित्र बनें हैं दुनिया में,एक दिखावा,एक छिपा कर रखते हैं,सबके अलग चरित्र
 
विनोद कुमार पांडेय
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उतर गया था बुखार सारा,पड़े जो जूते तेरी गली में-------(विनोद कुमार पांडेय)

आदरणीय पंकज सुबीर जी द्वारा होली के तरही मुशायरे के लिए दिए गये मिसरे पर आधारित एक मजेदार रचना.सुबह सवेरे जो घर से निकले, खुमारी होली थी सर पे छाई,हज़ार रंगों से रंग चेहरा, तुम्हारे घर को कदम बढ़ाई,यूँ झूमते हम निकल पड़े थे, इब्न-बतूता का गीत गाकर,नज़र न
 
विनोद कुमार पांडेय
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अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-4(विनोद कुमार पांडेय)

वृक्षों के मन-भाव को,कौन करे महसूस,नेता,पुलिस,बिचौलिए,बाँट रहें सब घूस.सबसे रो कर कह रहें,पीपल,बरगद,नीम,सिर्फ़ प्रदर्शन ही बना,हरियाली का थीम.वृक्ष लगाओ,धरा बचाओ,गावत फिरे समाज,पर करनी ना कछु दिखे,कहत न आवे लाज.हरियाली हरि सी भई,दुर्लभ हुई दरश,शाख मचलना
 
विनोद कुमार पांडेय
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जाड़े के दिन से जुड़ा मेरा एक अनुभव-२(विनोद कुमार पांडेय)

कोहरे से घिरे आदमियों के,भीड़ में,मैने एक और अजीब दृश्य देखा, यूँ कहें इक्कीसवीं शताब्दी के,विकसित भारत का एक सूक्ष्म उदाहरण,भारत की भावी पीढ़ी,एवम् उसका भविष्य देखा, बदन पर मात्र एक सूती वस्त्र डाले, नंगे पैर,और आँखों में भूख लिए हुए, मूँगफली के छिलकों
 
विनोद कुमार पांडेय
Mar 06 2010 05:55 PM
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जाड़े के एक दिन से जुड़ा मेरा एक अनुभव-१( विनोद कुमार पांडेय)

दिन का तीसरा पहर,जब ठंड अपनी परिसीमा पर था,सरसराती हवा के झोंके,मंद गति से बह रहे थे,जल की ठंडी-ठंडी बूँदे,कानों में बादलों का, फरमान पढ़ रहे थे, समस्त वातावरण जब ठंड के, आगोश में ढल रहा था, जैसे रात्रि के आगमन का,पूर्वाभ्यास चल रहा था,जब सूरज की किरणें
 
विनोद कुमार पांडेय
Mar 02 2010 09:01 PM
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जमाने के कुछ रंग,होली के संग...बुरा न मानों होली हैं.(विनोद कुमार पांडेय)

आप सभी भाइयों,बहनों और माता जी लोगों को होली की हार्दिक शुभकामना..प्रस्तुत है होली के संदेश के साथ साथ भोजपुरी में एक गुदगुदाती हुई रचना .रंग लगायअ,भंग जमायअ,गुझिया,पापड़ जम के खायअ,होली क मस्ती हौ छाईल,नाचअ,गायअ,धूम मचायअ,कारोबार क चिंता छोड़अ,मनवा के
 
विनोद कुमार पांडेय
Feb 25 2010 10:15 PM
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बाबू जी सेवानिवृत्त हो गये हैं.

हाथों में सब्जी का थैला,अंतर्मन में सवालों का झमेला, उलझते, रीझते,खीझते, और कभी मुस्‍काते , गोलमटोल आँखों में, एक उम्मीद लिए, कभी इस कभी उस दुकान जाते, इधर-उधर,भागते,मोल भाव करते, बहू -बेटे की कमाई के चार पैसे, बचाने की जद्दोजहद में कितनी तल्लीनता से
 
विनोद कुमार पांडेय
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खास कर युवा दिलों के लिए फ़रवरी महीना स्पेशल-3,जब वैलेंटाइन आता है, दिल बाग-बाग हो जाता है.

दोस्तों,मेरे ऐसे भाव से यह मतलब नही कि यह सब ग़लत है..मैने बस नज़रिए को सामने रखा और जैसा कि आप सभी अवगत होंगे कि मनोरंजन कराना भी मेरी कविताओं का एक खास एक उद्देश्य होता है तो कृपया इसे दूसरे अर्थ में ना लें. वैलेंटाइन डे एक प्रेम और स्नेह का दिन
 
विनोद कुमार पांडेय
Feb 13 2010 07:37 PM
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खास कर युवा दिलों के लिए फ़रवरी महीना स्पेशल-2,तीन किस्तों में वैलेंटाइन का दिखावा आपके सामने हैं.

ये कविता है कुछ उन लोगों के लिए जिनका प्यार बस बातों की झूठी बुनियाद पर टिका रहता है और अंत में सारा तथ्य सामने आ जाता है..पूरा पढ़िए खुद समझ जाएँगे.वैलेंटाइन स्पेशल पार्ट-१(प्रेम के शुरुआती दौर में निकले जज़्बात)सुना था दोस्त बनते है,नये ख्वाबों में
 
विनोद कुमार पांडेय
Feb 12 2010 03:15 PM
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७ फ़रवरी को आयोजित दिल्ली ब्लॉगर्स सम्मेलन में मेरे पहुँचने की कहानी सुनिए मेरे ज़ुबानी

दिल्ली ब्लॉगर्स सम्मेलन,सुनते ही उछलने लगा मन,जैसे ही हमने सुबह छोड़ी चारपाई,अविनाश चाचा जी को फ़ोन मिलायी,पर ये क्या उधर से, नॉट रिचेबल की मधुर आवाज़ आई,दूसरी बार फिर मैने घंटी मारी,उस वक्त इन्होनें ने कोई रेस्पॉन्स नही दिया,बाद में उल्टा १ रूपिया काल
 
विनोद कुमार पांडेय
Feb 10 2010 09:45 PM
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राज भाटिया जी और कविता वाचक्‍नवी जी के आगमन पर आयोजित आज दिल्ली ब्लॉगर्स सम्मेलन की एक छोटी सी रिपोर्ट एक अलग अंदाज में

दिल्ली ब्लॉगर्स सम्मेलन आज था,हुआ भी और बेहतरीन,आए थे बड़े बड़े नामचीन,ज़्यादातर दिल्ली की सरज़मीं से आए थे,पर कविता वाचक्‍नवी जी यू. के., और राज भाटिया जी जर्मनी से आए थे,दिल्ली के ब्लॉगर्स में डॉ. टी. एस, दराल जी थे,सतीश जी के साथ ग़ज़ल की महान हस्ती
 
विनोद कुमार पांडेय
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खास कर युवा दिलों के लिए फ़रवरी महीना स्पेशल-१

बढ़ गई कुछ लोगों की धड़कन,कुछ की धड़कन बंद,जब से चालू हुआ फ़रवरी,बाकी बातें बंद,बाकी बातें बंद इस कदर,रहा न कुछ भी याद,हुए फ़रवरी के चक्कर में,लाखों जन बर्बाद, लाखों जन बर्बाद,मगर कोई फ़र्क नहीं,प्यार बन गया है श्रद्धा,कोई तर्क नहीं, कोई तर्क नहीं,बस रेस
 
विनोद कुमार पांडेय
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प्रतिष्ठित समाचार पत्र हरिभूमि के दिल्ली संस्करण में प्रकाशित मेरी एक और नई व्यंग- नेताओं का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान.

मेरी यह दूसरी व्यंग जिसे हरिभूमि में स्थान मिला जिसके लिए मैं चाचा अविनाश वाचस्पति जी का भी बहुत आभारी हूँ, जिनके आशीर्वाद से आज यह कवि एक व्यंग रचनाकार के रूप में दिखाई दे रहा है. साथ ही साथ आप सभी का भी बहुत बहुत धन्यवाद जो निरंतर अपने आशीर्वाद से इस
 
विनोद कुमार पांडेय
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अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-3

कुछ ऐसे भी वीर हैं,भारतवर्ष में आज,जिनकी अम्मा रो रहीं,देख पूत के काज. मलमल का कुर्ता पहिन,घूम रहें हैं गाँव,खबर नही क्या चल रहा,आटा-दाल का भाव.आलस में डूबे हुए,इतने हैं उस्ताद,घर में आते हैं मियाँ,दिन ढलने के बाद. बीड़ी व सिगरेट में,फूँक दिए कुल देह,बेच
 
विनोद कुमार पांडेय
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जब आप सुधर गये, तो एक दिन वो भी सुधर जाएगा.

पिछले कुछ दिनों से गंभीर सामयिक रचनाओं के बाद आज फिर से अपने पुराने मजाकिया अंदाज में एक हास्य से भरी मजेदार घटना प्रस्तुत कर रहा हूँ और साथ ही साथ उम्मीद करता हूँ कि आपको पसंद भी आएगी..धन्यवाद..फर्स्ट स्टैंडर्ड के एक बालक को,आधुनिकता के सर्वोच्च सुचालक
 
विनोद कुमार पांडेय
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पावनता गंगाजल की, अपने अस्तित्व को जूझ रही.

मकर संक्रांति की अग्रिम शुभकामना के साथ एक चिंतनीय प्रकरण आप सब के समक्ष रखना चाहता हूँ.साथ ही साथ इस प्रक्रिया में सभी से सहयोग की भी अपील करता हूँ..पावनता गंगाजल की, अपने अस्तित्व को जूझ रही, बूँदों से स्पर्शित होकर, पापी मन पवित्र कहलाता,तरो ताज़गी
 
विनोद कुमार पांडेय
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आधी रात का चाँद और मैं---मेरी पचासवीं कविता

नवंबर माह के यूनिकविता प्रतियोगिता में हिन्दयुग्म द्वारा सम्मानित मेरी एक कविता..रात के आगोश में, सितारों को छेड़ता,चाँद, और ज़मीं पर मैं, अपने मानवीय अस्तित्व का वहन करता हुआ, दोनों उलझ पड़े,बातों की गहमा-गहमी में, बादलों की परतों से, आँखमिचौली खेलता
 
विनोद कुमार पांडेय
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इस साल का पहली कविता जैसे एक पैगाम, अपने ही देश के कुछ लोगों के नाम,कृपया बुरा ना मानें क्योंकि कही कुछ तो ऐसा है ही.

हम जनता है, हमको तो बस शोर मचाना आता है,मुट्ठी में है लोकतंत्र,लेकिन हम अज्ञान पड़े,बस रोज़ी-रोटी मिल जाए,यही हमारे लिए बड़े,सोच यही पर सिमट गयी है,इसीलिए कुछ नही चली,जिधर घूमाओ घूमेंगे हम,बने हुए बस कठपुतली, जनता होने का हमको, बस फर्ज़ निभाना आता है.
 
विनोद कुमार पांडेय
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बस यही कामना है मेरी,नववर्ष हो मंगलमय सब को, सुख-दुख तो चलता रहता है,इसको ऐसे ही चलना है.

आज नववर्ष के उपलक्ष्य में कुछ बहुत बढ़िया नही लिख पाया तो यहीं चंद लाइनों का एक गीत भेंट कर रहा हूँ जिसका सार यही है की बीते दिनों के सभी उतार-चढ़ाव के बावजूद भी आने वाले नये साल का दिल से स्वागत करें और एक दुआ करें की यह साल हम सभी लिए सुखमय हो...नववर्ष
 
विनोद कुमार पांडेय
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अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-2

दौर आज का उल्टा-पुल्टा , उल्टा बहे समीर | रांझा आवारा फिरे , हुई बेवफा हीर || रक्षक ही भक्षक बनें , किसे सुनाएँ पीर | कुछ घर में भूखे मरे , गटक रहे कुछ खीर || खा लो जितना भी मिलें , राखो मन में धीर | उतना ही मिलता यहाँ , जितना है तकदीर || मँहगी रोटी
 
विनोद कुमार पांडेय
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अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-1

पल्स पोलियो की तरह,खूब चला अभियान, घर घर चन्दा माँगने, चल देते श्रीमान, मंदिर के निर्माण में,लगा दिए जी-जान, त्याग के गुलछर्रे देखो,वो माँग रहे हैं दान, भारत की भावी पीढ़ी,खुद से है अंजान, चौराहे पर हा-हा,ही-ही, यही बनी पहचान, घर में बीवी लतियाए,बाहर
 
विनोद कुमार पांडेय
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राखी के स्वयंबर में सलामत दूबे जी..एक हास्य भरी काल्पनिक प्रस्तुति

दोस्तो. हँसने-हँसाने का दौर जारी रखते हुए आज एक और रचना आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ कविता का आधार महज कल्पना है और मनोरंजन के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ इस उम्मीद के साथ की इस कहानी के पात्र यदि कहीं होंगे भी तो अन्यथा नही लेंगे...धन्यवाद राखी का स्वयं
 
विनोद कुमार पांडेय
Dec 15 2009 08:12 PM
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मेरी पहली हास्य भोजपुरी कविता:-आइए आप सब का मुलाकात कराते हैं, सुबह के भूले एक तिवारी जी से

अउर तिवारी कईसन हो, बहुत दिनों के बाद मिले हो, लागत हो दूबराय गये हो, अब का करने को आए हो, धरम-करम सब खाय गये हो, अम्मा बाबू जब बीमार थे, खबर नही तब लेने आए, गुजर गये जब उ दूनो तब, अब किसको का देने आए, नेचर तनिको ना बदला है, एकदम पहिले ज़ईसन हो, अउर
 
विनोद कुमार पांडेय
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इतना भी आसान नहीं

व्यस्तता के दौर से निकली सरल और सहज शब्दों में साकार, ग़ज़ल की कुछ लाइनें आप सब के नज़र करता हूँ..आशीर्वाद दीजिएगा. सोच रहा था तुमसे मिलता,पर आना आसान नहीं, फुरसत के कितने पल है,यह समझाना आसान नहीं, हैरत में हूँ,मैं यह सुनकर,की मैं बदल गया हूँ अब, मज
 
विनोद कुमार पांडेय
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पप्पू जी का एक सवाल और पापा जी भी हैरान हो गये

कुछ दिनों की व्यस्तता के बाद आज थोड़े फुरसत के पल मिलें और बस फिर एक और कविता. आज एक नटखट बच्चे के शरारत भरे प्रसंग को हास्य कविता बना कर प्रस्तुत कर रहा हूँ...आशीर्वाद दीजिएगा!!! पप्पू,पापा जी से बोला, पापा एक सवाल बताओ, इतना उपर उड़ जाता है, कैसे ग
 
विनोद कुमार पांडेय
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मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने

आप लोगो के प्यार और आशीर्वाद के वजह मैं खुद को रोक नही पाता बहुत व्यस्तता से घिरे होने के बावजूद भी आज यह मन नही माना और और बस कुछ लाइनें लेकर फिर से आ गया. परंतु अब शायद कुछ दिन बाद ही यहाँ आना संभव हो तो बस आप सभी से आग्रह है की ऐसे स्नेह बनाएँ रखे
 
विनोद कुमार पांडेय