"एहसास के पन्ने..."

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08 Mar 2010
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तुलना क्योँ?

तुलना क्योँ करनीँ पडती है, इसकी आवश्यकता क्या है, क्या इसके परिणाम सदैव सकारात्मक ही होते हैँ और क्या यह सदैव अपने उद्देश्य मेँ सफल रहती है?यह वो मूलभूत प्रश्न हैँ जिन पर हम शायद ही कभी विचार करते हैँ लेकिन तुलना पल प्रति पल करते जाते हैँ। स्वयँ की किसी
 
सत्य प्रिय
Feb 11 2010 02:54 PM
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"शबनम की बूँदें..."

सपना था यूँ पलकों परजैसे शबनम की बूँदेहुआ सबेरा तो भ्रम टूटाजैसे शबनम की बूँदेदिन की घोर तपिश में पिघलेजैसे शबनम की बूँदेआंखों से वो झर-झर जाए जैसे शबनम की बूँदेमन को वो व्याकुल कर जाए जैसे शबनम की बूँदेशाम को आख़िर मिली ताजगीजैसे हों शबनम की बूँदेंआख़िर
 
सत्य प्रिय
Jul 30 2009 01:04 PM
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"अकेला चला था..."

अकेला चला थायूँ तनहा चला था मंजिल को आखिरवो पाने चला था,आँखों में सपने दिल में उमंगेंलेकर वो राही चलता चला था,चालों में मस्तीकदमों में थिरकनमतवाला आखिर वो बढ़ता चला था,मैंने न देखातुने न देखालेकिन चला चलचलता चला था,मंजिल को आख़िर वो पाने चला था,अकेला चला
 
सत्य प्रिय
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५० से ५२ तक...... लेकिन कोई फर्क नही...!

कुछ और कहने से पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मैं न तो क्षेत्रवादी हूँ और न ही पूर्वाग्रह की भावना से ग्रस्त ... । वस्तुतः बात ही कुछ ऐसी है की अपने जन्म स्थान और निवास स्थल की उपेछा से किसी भी सामान्य संवेदनशील व्यक्ति की भावनायें जाग सकती
 
सत्य प्रिय