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18 Jun 2010
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लो क सं घ र्ष !: हिंसा और उपभोक्तावाद के दौर में सूफियों की प्रासंगिकता

मौजूदा दौर में सहिष्णुता, उदारता और आपसी सौहार्द के ऊपर असहिष्णुता, कट्टरता और बदले की भावना का ज्यादा बोलबाला है। केवल कट्टरतावादी शक्तियों का ही वैसा बर्ताव नहीं है, उनके मुकाबले में उभरी प्रतिरोध की शक्तियाँ भी अक्सर असहिष्णुता, कट्टरता और वैमनस्य से
Jun 17 2010 12:56 PM
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मन करता है मैं मर जाउं..

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!मन करता है मैं मर जाउं...इन सब झमेलों से तर जाउंमन करने से क्या होगाहोगा वही जो भी होगामन तो बडा सोचा करता हैरत्ती-भर को ताड सा कर देता हैआदमी तो हरदम वैसा-का-वैसा हैइक-दूसरे को काटता रहता हैहर आदमी का अहंकार है गहराऔर
 
भूतनाथ
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चंद मुक्तक -संजीव 'सलिल'

चंद मुक्तकसंजीव 'सलिल'**कलम तलवार से ज्यादा, कहा सच वार करती है.जुबां नारी की लेकिन सबसे ज्यादा धार धरती है.महाभारत कराया द्रौपदी के व्यंग बाणों ने-नयन के तीर छेदें तो न दिल की हार खलती है..*कलम नीलाम होती रोज ही अखबार में देखो.खबर बेची-खरीदी जा रही
 
दिव्य नर्मदा divya narmada
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लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-4

वहीं मँहगाई के सन्दर्भ में हवा पानी पर प्रकाशित एक कविता पर निगाहें जाकर टिक जाती हैं जिसमें कहा गया है कि हमनें इस जग में बहुतों से जीतने का दावा किया पर बहुत कोशिशों के बाद भी हम मँहगाई से जीत नहीं पाए। वहीं कानपुर के सर्वेश दुबे अपने ब्लॉग ‘मन की
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लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-3

वर्ष -2008 में 26/11 की घटना को लेकर हिन्दी ब्लॉग जगत काफी गंभीर रहा। आतंकवादी घटना की घोर भत्र्सना हुई और यह उस वर्ष का सबसे बड़ा मुद्दा बना, मगर इस वर्ष यानी 2009 में जिस घटना को लेकर सबसे ज्यादा बवाल हुआ वह है समलैंगिकता के पक्ष में दिल्ली हाई कोर्ट का
Jun 13 2010 09:29 AM
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लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-2

वर्ष-2009 में जो कुछ भी हुआ उसे हिंदी चिट्ठाजगत ने किसी भी माध्यम की तुलना में बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने की पूरी कोशिश की है। चाहे बाढ़ हो या सूखा या फिर मुम्बई के आतंकवादी हमलों के बाद की परिस्थितियाँ, चाहे नक्सलवाद हो या अन्य आपराधिक घटनाएँ, चाहे पिछला
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लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-1

आज जिस प्रकार हिंदी ब्लागर साधन और सूचना की न्यूनता के बावजूद समाज और देश के हित में एक व्यापक जन चेतना को विकसित करने में सफल हो रहे हैं वह कम संतोष की बात नही है। हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने में हर उस ब्लाॅगर की महत्वपूर्ण भूमिका है जो बेहतर
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लो क सं घ र्ष !: एंडरसन की चाकरी- भोपाल गैस काण्ड

(मेरा क्या कर लोगे)यूनियन कार्बाईड के प्रमुख वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी के बाद शासक दल ने और सरकार के अधिकारियों ने जिस तरह से उसकी मदद की है वह अपने में एक महत्वपूर्ण उदहारण है । वैचारिक स्तिथि में हम लोग यूरोपीय और अमेरिकन भक्त हैं हमारे वहां का
टैग: bhopal-genocide
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लो क सं घ र्ष !: आर्थिक जीवन और अहिंसा -3

मानवीय प्रगति का लम्बा इतिहास काफी अंशों तक और कई अर्थों में स्वैच्छिक एवं स्वतंत्र वरण-चयन के प्रयासों का इतिहास हैं। फलतः ऐसे सहज स्वतंत्र सामाजिक जीवन को सर्व-संगत, सर्व-सुलभ, जन-जन का अमिट और अक्षुण्य अधिकार माना जा सकता है। अधिकार के रूप में
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लो क सं घ र्ष !: रात गंवाई जाग कर, दिवस गवायों सोय

सुख, दुख, हर्ष, विषाद को व्यक्त करने का अधिकार सभी को है, परन्तु इनके लिये कुछ शर्तें हैं, कुछ शिष्टाचार हैं। आजकल शादी विवाह एँव अन्य अवसरों पर ‘हर्ष-फायरिंग‘ का बड़ा प्रचलन हैं। यह स्टेटस- सिंबल बन गया है। परन्तु ऐसा क्या हर्ष जो दूसरों के दुख का कारण
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लो क सं घ र्ष !: आर्थिक जीवन और अहिंसा -2

पिछली तीन चार शताब्दियों से धीरे-धीरे सारी विश्व आर्थिक व्यवस्था इस स्वतः चालित तथाकथित ‘आदर्श,‘ व्यवस्था के तहत संचालित हो रही है। कहा जा सकता है कि यदि ये दावे सचमुच सही हैं तो यह व्यवस्था अहिंसक समाज के मूल्यों पर भी सटीक बैठती नजर आती है। सिद्धांतों
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लो क सं घ र्ष !: आर्थिक जीवन और अहिंसा -1

मानव समाज को और उसके अभिन्न अंग मानव मात्र को अपनी जिन्दगी को जीने की प्रक्रिया में अनेक प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं की जरूरत होती है। आधुनिक विनिमय अर्थव्यस्थाओं में इन वस्तुओं को पाने के लिए नियमित रूप से और आमतौर पर बढ़ती हुई मात्रा में मौद्रिक आय की
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लो क सं घ र्ष !: तमसो मा ज्योर्तिगमय

बिजली न होने से जो समस्यायें होती हैं, उनकी सूची हम आप बैठकर किसी भी समय बना सकते हैं, परन्तु एक समस्या मेरे संज्ञान में अभी तक नहीं थी, वह यह कि कुछ ऐसे कुआंरे हैं जिनके घर में भी अंधेरा है और जीवन में भी बिजली न होने के कारण इन बेचारों की शादी भी नहीं
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लो क सं घ र्ष !: नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा- अंतिम भाग

भीतर और बाहरः चैकस और मजबूतजो चीज हमने 20वीं सदी के इतिहास में देखी और जिससे हम कुछ सीख सकते हैं वे शोषण और अत्याचारों के खिलाफ हुईं क्रान्तियाँ तो थीं ही, पर साथ ही ये भी कि क्रान्ति कर लेने के बाद उसे सँभालना, उसे वक्त के कीचड़ में धँसने से रोकना और भी
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इस कोढ़ में कितनी खाज है!!

मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!दोस्तों,जब से झारखण्ड बना....इसे लेकर ना जाने कितने स्वप्न आँखों में जले और देखते ही देखते बुझ भी गए....लेकिन आखों के सपने ऐसे हैं कि कभी ख़त्म ही नहीं होते...और मुश्किल यह है कि कभी पूरे भी नहीं होने को आते....झारखण्ड का
 
भूतनाथ
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लो क सं घ र्ष !: न उनकी दोस्ती अच्छी, न उनकी दुश्मनी अच्छी

(हतोयामा)आप नें देखा अभी जापान में क्या हुआ ? आम तौर पर लोग यही समझते हैं कि अमेरिका व जापान के बीम गाढ़ी- छनती है। अब यह राज़ खुलता नज़र आता है कि सरकारी स्तर पर चाहे यह सत्य हो परन्तु जनता के स्तर पर ऐसा विचार सही नही है।आप जानते हैं कि द्वितीय विश्व
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लो क सं घ र्ष !: नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा-5

साम्राज्यवाद का दुःस्वप्नः क्यूबा और फिदेलआइजनहावर, कैनेडी, निक्सन, जिमी कार्टर, जानसन, फोर्ड, रीगन, बड़े बुश और छोटे बुश, बिल क्लिंटन और अब ओबामा-भूलचूक लेनी-देनी भी मान ली जाए तो अमेरिका के 10 राष्ट्रपतियों की अनिद्रा की एक वजह लगातार एक ही मुल्क बना
Jun 06 2010 05:43 PM
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लो क सं घ र्ष !: नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा-4

क्यूबा का इंकलाबः एक अलग मामलाक्यूबा की क्रान्ति न रूस जैसी थी न चीन जैसी। वहाँ क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ पहले से क्रान्ति के लिए प्रयासरत थीं और उन्होंने निर्णायक क्षणों में विवेक सम्मत निर्णय लेकर इतिहास गढ़ा। उनसे अलग, क्यूबा में जो क्रान्ति
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लो क सं घ र्ष !: सपने देखना और सपने बुनना.......

सपने देखना और सपने बुनना , हमे भी आता है प्रजापति ..सिर्फ तुम्हे नहीं .फूटपाथ परहोने का अर्थये नहीं है न्याय कई देवता ,की हमे सपने नही आते .सपने देखना सिर्फ तुम्हारी मिलकियत नहीं .तिजोरियो के स्वामी .हमे भी हासिल है हक़ .की सपने देखूबेहतर दुनिया और बेहतर
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लो क सं घ र्ष !: पत्नी बचाना मुश्किल है

(आरोप यदि सही हैं तो शर्मनाक है)ईजराइल के सरकारी दौरे पर गए लेफ्टिनेंट जनरल ए.के नंदा ने साथ में गए कर्नल रैंक के अधिकारी की पत्नी से छेड़-छाड़ की। यह आरोप कर्नल रैंक के अधिकारी की पत्नी ने सेना प्रमुख की पत्नी व आर्मी वाईव्स से मिलकर लगाया। इसके पूर्व भी
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लो क सं घ र्ष !: नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा-3

हम कम्युनिस्ट नहीं हैं: फिदेल (1959)1 जनवरी 1959 को क्यूबा में बटिस्टा के शोषण को हमेशा के लिए समाप्त करने के बाद अप्रैल, 1959 में फिदेल एसोसिएशन आॅफ न्यूजपेपर एडिटर्स के आमंत्रण पर अमेरिका गये जहाँ उन्होंने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा कि ’मैं जानता हूँ
Jun 04 2010 12:02 PM
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लो क सं घ र्ष !: नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा -2

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हालात और खराब हुए। बटिस्टा ने क्यूबा को अमेरिका से निकाले गए अपराधियों की पनाहगाह बना दिया। बदले में अमेरिकी माफिया ने बटिस्टा को अपने मुनाफों में हिस्सेदारी और भरपूर ऐय्याशियाँ मुहैया कराईं। उस दौर में क्यूबा का नाम वेश्यावृत्ति,
Jun 03 2010 05:00 PM
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गांव ने पूछा है- फिर कब आओगे?

सपना सच तो होता है मगर अपनी कीमत भी वसूलता है। अपने गांव तक भी पक्की सड़क हो यह करीब पैंतीस साल पुराना सपना था, इस सच हुए भी पच्चीस साल से ज्यादा होने को आए। पुराने सपने में एक दृश्य था कि गांव तक सड़क आएगी तो खुशहाली लाएगी...for detail please
 
सुधीर
Jun 02 2010 09:16 PM
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लो क सं घ र्ष !: नये मनुष्य, नये समाज के निर्माण की कार्यशाला: क्यूबा -1

1959 में जब क्यूबा में सशस्त्र संघर्ष द्वारा बटिस्टा की सरकार को अपदस्थ करके फिदेल कास्त्रो, चे ग्वेवारा और उनके क्रान्तिकारी साथियों ने क्यूबा की जनता को पूँजीवादी गुलामी और शोषण से आजाद कराया तो उसके बाद मार्च 1960 में माक्र्सवाद के दो महान विचारक और
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नवगीत: सबकी साँसें...... --संजीव 'सलिल'

नवगीत:सबकी साँसें...संजीव 'सलिल' * क़ैद हुईं बुद्धू-बक्से में सबकी साँसें.....*नहीं धूप से अब है नाता.नहीं धूल का साथ सुहाता.नहीं हवा के संग झूमता-नहीं 'सलिल' में डूब तैरता.समय-पूर्व ही बच्चा भरताबड़ी उसाँसें.क़ैद हुईं बुद्धू-बक्से में सबकी साँसें.....*नहीं
 
दिव्य नर्मदा divya narmada
Jun 01 2010 08:52 PM
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लो क सं घ र्ष !: बुलबुल-ए-बे-बाल व पर - अंतिम भाग

बुलबुल-ए-बे-बाल व पर -1बुलबुल-ए-बे-बाल व पर -2(पंखहीन बुलबुल)फिर सिराजुद्दीन बहादुर शाह जफ़र को एक मामूली मुल्ज़िम की हैसियत से ज़िला वतन कर दिया। वह 1862ई0 में (रंगून में) अपने वतन से दूर इस आलम-ए-फ़ानी को तर्क कर गए। सच तो यह है कि दिल्ली के आखि़री ताजदार
Jun 01 2010 04:57 PM
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लो क सं घ र्ष !: बुलबुल-ए-बे-बाल व पर -1

(पंखहीन बुलबुल)20 जनवरी 1858ई0 को बवक़्ते सुबह दीवाने ख़ास क़िला देहली। यह हिन्दुस्तान की तारीख़ के लिए एक अहम मोड़ है। हिन्दुस्तान को गु़लामी की ज़जीरों में जकड़ने के लिए एक आख़िरी चाल चली जा रही है। आज हिन्दुस्तान की आज़ादी की आख़िरी किरन तारीकी के हाथों
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मुक्तिका: थोड़ा ज्यादा....... --संजीव 'सलिल'

मुक्तिकाथोड़ा ज्यादा... संजीव 'सलिल'**थोड़ा ज्यादा, ज्यादा कम.चाहा सुख तो पाया गम.अधरों पर मुस्कान मिलीलेकिन आँखें पायीं नम.दूर करो हाथों से बम.मिलो गले कह बम-बम-बम.'मैं'-'तू' भूलें काश सभीकहें साथ मिल सारे 'हम'.सात जन्म का वादा करठोंक रहे आपस में ख़म.मन
 
दिव्य नर्मदा divya narmada
May 30 2010 05:14 PM
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विडम्बना

बिहार के पत्रकारों और सरकार को गरियाते एक संपादक
 
उसका सच
May 29 2010 09:12 PM
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ओ......बाबा कृष्ण....!!संभाल लेना यार मुझको....हम सबको.....!!

ओ......बाबा कृष्ण....!!संभाल लेना यार मुझको....हम सबको.....!! इन दिनों कई बार यूँ लगता है कि हम लिखते क्यूँ हैं.....हजारों वर्षों से ना जाने क्या-क्या कुछ और कितना-कितना कुछ लिखा जा चूका है....लिखा जा रहा है...और लिखा जाएगा....मगर उनका कुछ अर्थ....क्या
 
भूतनाथ
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लो क सं घ र्ष !: ब्लॉग उत्सव 2010

सम्मानीय चिट्ठाकार बन्धुओं,सादर प्रणाम,आज दिनांक 26.05.2010 को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-2010 के अंतर्गत अठारहवें दिन प्रकाशित पोस्ट का लिंक- एक सीमा तक करें शैतानियाँ, ना किसी का दिल दुखाना चाहिए। http://www.parikalpnaa.com/2010/05/blog-post_1497.html अजित
May 27 2010 08:37 AM
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लो क सं घ र्ष !: पुलिस में सुधार की ज़रूरत

पुलिस के ज़ुल्म के किस्से सबने ही सुने हैं। उनकी कार्यप्रणाली पर भी अक्सर सवाल उठते रहते हैं। पुलिस का काम क़ानून व्यवस्था को बनाए रखना है। वो ऐसा करती भी है पर फिर भी उसकी छवि कोई खास अच्छी नहीं है। इसके दरअसल कई कारण है। पहले हम आपको पुलिस की पृष्ठभूमि
May 26 2010 06:18 PM
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अभीकालित्रा.....

Wednesday, May 26, 2010 "अभी कालित्रा -यहशब्द आप ने कभी सुना था क्या. .हिन्दी में .. ....... ..... .......... .......... ................... ........... चित्र १......... चित्र २.....> हिन्दी हिन्दुस्तान पत्र हिन्दी का या अंग्रेज़ी का..।.--- क्या आपने इस
 
Dr. shyam gupta
May 26 2010 05:50 PM
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लो क सं घ र्ष !: देश हित में ....

भारतीय जनता पार्टी अपनी नीति और कार्यक्रम के अनुसार सब कुछ तय करती है राष्ट्र हित में क्योंकि वह एक राष्ट्रवादी पार्टी है और उसकी अपनी राष्ट्र की परिभाषा है भारतीय जनता पार्टी की परिभाषा के अनुसार राष्ट्र किसी भूभाग में बसने वाले लोगों का वह समूह है जो
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लो क सं घ र्ष !: ब्लॉग उत्सव 2010

सम्मानीय चिट्ठाकार बन्धुओं,सादर प्रणाम,आज दिनांक 24.05.2010 को परिकल्पना ब्लोगोत्सव-2010 के अंतर्गत सत्रहवें दिन प्रकाशित पोस्ट का लिंक- ब्लोगोत्सव-२०१० : ..मॉल , यानी.....शोखियों में घोला जाये,फूलों का शबाब
May 25 2010 11:43 AM
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लो क सं घ र्ष !: जाति न पूछो जज की

कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीण्डी दिनाकरन पर जो भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं वो किसी से छुपे नहीं है। इस बाबत महाभियोग कि प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी हैद्यउन पर 400 एकड़ ज़मीन ग़ैरक़ानूनी ढंग से हथियाने का आरोप है। न तो उन्होंने ही त्यागपत्र दिया है
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लो क सं घ र्ष !: शिक्षा का व्यापारीकरण

पढ़ता रहा हूं कल्याणकारी राज्य के बारे में और उस कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए आन्दोलनों में हिस्सेदार भी रहा हूं। दवा और पढ़ाई मुफ्त में मुहैया कराना और रोज़गार की गारन्टी देना एक काल्याणकारी राज्य का कर्तव्य होता है। सिर्फ मुफ्त पढ़ाई ही नहीं बल्कि
May 22 2010 05:51 PM
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लो क सं घ र्ष !: कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक........

राजनैतिक पार्टियाँ भी वोट लेने के लिये क्या-क्या हथकंडे अपनाती है, कभी नारे गढ़ती हैं, कभी बड़े-बड़े वादे करती हैं, कभी पिछली प्रगति के झूठे प्रचार करती है, कभी लुभावने घोषण पत्र छपवाती हैं, और कभी व्यक्ति-विशेष को प्रधानमंत्री बनाने का सपना दिखाती हैं। कुछ
May 21 2010 04:41 PM
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आदमी साला बोर क्यूँ होता है यार.....??

आदमी साला बोर क्यूँ होता है यार.....?? ऐय क्या बोलती तू...क्या मैं बोलूं....सुन...सुना....आती क्या खंडाला...क्या करुं...आके मैं खंडाला...अरे घुमेंगे..फिरेंगे...नाचेंगे..गायेंगे...ऐश करेंगे...मौज करेंगे..बोरिंग को तोडेंगे...और क्या....ऐय क्या बोलती
 
भूतनाथ
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लो क सं घ र्ष !: बुद्धि जहाँ खत्म होती है, वहीँ पर हाथ चलने लगता है

आज बाराबंकी में बिजली की समस्या को लेकर उत्तेजित अधिवक्ताओं के एक समूह ने जिला मजिस्टे्ट श्री विकास गोठलवाल के कार्यालय में घुसकर जमकर तोड़ फोड़ की। कई वर्षों से बुद्धिजीवी तबके का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्तागण हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं जिससे