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परिचर्चा

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31 Dec 2009
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स्वतंत्र वेबसाईट पर स्थांतरित

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दरभंगिया
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मानसून हो कि बज़ट

कितना अच्छा होगा जब एक ही किताब पढ़ायी जायेगी दिल्ली से सुदूर गाँव तक. बिजली का क्या है दिल्ली में भी कायम नही रहती. रास्ते में गड्ढे के लिये भी जरूरी नहीं है किसी गाँव मे होना. हस्पताल के दरवाजे पर मरने के लिये कहीं और जाने की जरूरत नहीं. राख़ आँखों
 
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वह कविता कैसे बनाऊँ मैं

लगे आपको “अप्रतिम” वह शब्द कहाँ से लाऊँ मैं. स्वरचित अज्ञान शिविर में जब तड़प रहा हूँ हर दिन मैं. अतुल्य लगे जो पाठक को और जलाये दीप तिमिर में वह कविता कैसे बनाऊँ मैं. शब्द नहीं हैं पास मेरे भाव गये कब के संग छोड़. लिखना नहीं चाहता हूँ मैं
 
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क्योंकि ऐसे गिनकर थक जाओगे

एक लड़की पर तेज़ाब डाला गया. दूसरी जींस पहन कर घूम रही थी. तीसरी ने अपनी माँ की हत्या कर दी. चौथी को ससुराल में जला दिया गया. पाँचवीं को सेना मे भरती किया गया है. छठी ने अपने पति को मार दिया. सातवीं ने पति के साथ जान दे दी. आठवीं मेरे साथ ही जी रही है.
 
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आगन्तुकों से एक अपील

हे आगंतुक गण! तनिक सुनो! सीढ़ी के कोनों पर थूके हुए पान, समंदरी रेत पर पाँव के निशान, धरोहरों की दीवारों पर जोड़ों के नाम, मौके बेमौके भेजे हुए टेलीग्राम, शादी के कार्डों पर छपे हुए नाम, की छपाई की तरह ही होती हैं ये हमारी और आपकी टिप्पणियोँ. इसीलिये,
 
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रीमेक ऑफ़ एक पुरानी कहानी

बेटों ने फिर कहा "पिता जी यूँ तो इस विषय पर बात करने की जरूरत ही नहीं है, पर आप चाहते हैं तो हम सुबह बात करेंगे, हम बहुत थके हुए हैं".
 
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जो छूट गये अब हाथ से मेरे

कुछ दिनों से सोच रहा था क्या क्या नहीं किया कितने सालों से. कि हल्के से यह दिल भींचा आंख मली कि समझ ना ले कोई कि वह कचरा नहीं था, दो बूँदें थीं. अब यह बूँदें यूँ ही आती हैं. वैसे नही, जैसे आते थे गिरने पर आंखों में सरसों के कीड़े. अब नही दिखते वो गन्न
 
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कब इतनी शामत आयी है

लंका, पाक और नेपाल तिब्बत, बर्मा और बंगाल. हाय रे भारत का भाग्य मिले पड़ोसी सब जंजाल. भये आजादी को साल साठ गये पढ़े पढ़ाये कितने पाठ. फिर भी ना जब आयें बाज कैसे करें यह इनका इलाज. अनचाहे रहते उलझते इससे चीन, अमेरिका, इंग्लिस्तान. परेशान है देश हर ओर से
 
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बिहार और बिहारी: एक गाली है?

शायद! तभी तो कर्नाटक में अपराध और अराजकता बढ़ती है तो एक पढ़ा लिखा लोग कहते हैं कर्नाटक बिहार बन रहा है. मध्यप्रदेश में कुछ ढंग का नहीं हुआ तो बिहार मत बनाओ. किसी भी और राज्य में रहिये किसी को नीचा दिखाना हो तो बिहारी कह दो. नहीं ऐसा नहीं है!!! यह उनकी
 
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एक अदद बकवास

इधर कुछ बकवास कवितायें पढ़ने को मिली, तो सोचा पोपुलारिटी बढ़ाने के लिए हम भी एक बकवास लिखें. हो सकता है पहले भी लिखा हो जिसके बारे में शायद मुझे भान न हो. यदि आपको हुआ हो तो कृपया न बताएं. आदमी खुशफ़हमी में जिए तो ज्यादा जीता है. तो लीजिये पेश है̷
 
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अब चढ़ी इसको

बहुत दिनों बाद यह किस्सा याद आया, तो सोचा आप लोगों से भी बाँट लूं. हो सकता है आप ने पहले भी सुना हो. एक बार की बात है. नारद मुनि भगवान शिव को प्रणाम करने पहुंचे, देवी पार्वती मायके गयीं हुई थी. महादेव के पास ध्यान योग के पश्चात् भी समय ही समय था. नार
 
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ईश्वर की रचना

बेकार की लफ्फाजी ही करनी है ना! तो कर देंगे. और बन जायेगी एक कविता. बिन अर्थ, बेकार. ऐसा नहीं है. हर लिखे हुए शब्द का एक अर्थ होता है. ठीक उसी तरह, जैसे कि विश्व में हर जीव का. विश्वास नहीं होता, कि कुछ मनुष्य सिर्फ मिटाने के लिए बनाये जाते होंगे, स्
 
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स्वछन्द

तेरा हाथ मेरा हाथ मेरे तुम तेरे हम मैं और तू तू ही तू स्याह रात तेरा साथ तेरे आस मेरे सांस घर द्वार आँगन बाड़ ये झोंका तेरे केश कुछ बूँदें दो आँखें पायल छम्म बूंदे झम्म यह विवाह आह और वाह Posted in कविता Tagged: कविता, Kavita
 
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आप कहाँ हैं?

बहुत इच्छा हुई कि पता करें कौन से ब्लॉगर कहाँ से लिखते हैं. खास कर जो नियमित हैं. आप कहेंगे जानकर क्या करोगे? कुछ नहीं, अगर पता चल गया कि आप मेरे पडोसी हैं या कभी आपके शहर से गुजरा तो एक कप चाय तो खर्च करवा ही दूंगा. अनूप जी पूरा मिठाई का डिब्बा [...
 
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सीधे सवाल के उल्टे जवाब

प्रश्न: बेटे और गधे में क्या फर्क है? उत्तर: कमाने वाला बेटा कहलाता है और दूसरा गधा. प्रश्न: लड़कियां खुशी के मौकों पर रोती क्यों हैं? उत्तर: ताकि आस पास के पुरुष खुश न रहें. प्रश्न: वाक्य “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम” इसमें अजगर और
 
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अगर बंगलोर बिहार में होता

अगर बंगलोर बिहार में होता तो सड़क पर विचरने वाली गायों को देखकर फिकरे कसे जाते “मंत्री जी हटिये”. और गौड़ा के नित नए चोंचलों पर बनता हंसी का पात्र एक पूरा राज्य और वहां जन्म लेने वाले तमाम अश्पृश्य और आभिजात्य. पर यह तो बंगलोर है जिस पर मीड
 
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ख़त्म तो नहीं होंगे ना, वही बहुत है

बंगलोर से गाँव जाने का रास्ता ५४ घंटे का है (यदि भारतीय रेल के समय सारणी पर विश्वास करें तो) पर मुझे कुल ६२ घंटे लगे. इसका पूर्वानुमान होने की वजह से मैं दो किताबें ले कर चला था. पर गर्मी, ट्रेन में पैंट्री कार का न होने की वजह से खाद्य पदार्थ व चाय
 
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पागल हूँ, बेवकूफ नहीं

एक बार पागलों को ले कर जाने वाली एक गाड़ी के ड्राईवर को रास्ते में ही दीर्घ शंका की तत्काल आवश्यकता जरूरत महसूस हुई. वह गाड़ी खड़ी कर निपटने चला गया. लौट कर जब आया तो उसके होश उड़ गए, देखता है कि किसी ने एक चक्का निकाल लिया. अब ड्राईवर बेचारा सर पकड़ [...
 
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ऐना कियै छैक

भोर भेल, ओ तैयार भेलाह. दुपहरिया भेल, ओ बिदा भेलाह. सांझ भेल, ओ पहुँच गेलाह. राति भेल, वो भेंट भेलाह. भोर भेल, ओ हेरा गेलाह. सुनालियैक, हमर बियाह भय गेल. हमारा देखलक. हमहूँ देखलियैक अस्त-व्यस्त घर, आओर ऐँठल लोक. जेना तेना, सामंजस भेल. साउस रुस्लीह, ख
 
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अश्लील

एक पुरुष का चॉकलेट बन जाना एक लड़की का उसके नितम्ब का टुकडा खाना कहलाता है अश्लील उसी बदबू छुपाने वाली तरल के प्रचार में जब गोते लगाती है एक स्त्री मन ही मन अभिसार में तो वह नहीं कहलाता अश्लील फिर लगाता है वही तरल एक पुरुष समंदर किनारे लड़कियाँ अन्तर
 
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सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है

अपने आप ही छप जाता है जब खटर-पटर करती उँगलियों से तुम्हारा नाम, और मोबाइल पर नंबर लगते हुए जब ऑफिस से डायल हो जाया करती है तुम्हारा ही नंबर, तो सोचता हूँ जरूर मुझे तुमसे प्यार है. कालेज के दिनों की बात होती तो शायद दोस्तों को दिखाया करता तुम्हारा नाम
 
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बोरियत

बोरियत आज कल मैं बोर हूँ. मतलब? कंफ्यूज्ड, निरर्थक और अकर्मण्य भी हूँ. यही बात कोई और मुझे कहे तो? शायद एक गाली सा लगेगा. पर यदि मैं नेता होता. और कोई मुझे कुछ ऐसा कहता. तो मुझे शायद ढूँढने होते कुछ इनसे भी भारी शब्द जो छेद जाती एक आम इंसान के मन को
 
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शुभ प्रभात

सुबह हो गयी है. अर्धांगी कल निकल गयी आधी जान को वापस पाने के लिए अभी तक अचेत लेटी है. पुत्र जागते हुए लेट कर ऊर्जा बचा रहा है ताकि आज कल से ज्यादा साईकिल चला पाए. बेटी अपने पौनबोली (यह अधबोली से थोड़ा ज्यादा हुआ) में यह सोच कर कि सब सो रहे [...]
 
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तरक्की

अरसा हो गया जुगनू नहीं दिखा ना ही गोरैया दिखी सालों से जंगलों पर. हमने ऐ सी लगवा लिया है घरों में और बुन दिए दरवाजे और खिड़कियाँ. काली रात में हमसे खेलने करौंदे के जंगलों से आया करते थे पर उन्हें कटवाना जरूरी था क्योंकि मच्छरों का खतरा बहुत है. नींद
 
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दुनिया का दुःख

अपनी खुशी पर हम खुश हुए कम औरों के ग़मों ने जी बहला दिया. दुःख तो अपने दामन में थे बहुत कम औरों के सुख ने ही जी जला दिया. Posted in चलते चलते, हिन्दी Tagged: कविता
 
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हैप्पी बग्गिंग..आउच..हैप्पी ब्लॉग्गिंग

कुछ दिनों के लिए अवकाश पर हूँ. बिटिया का मुंडन है. लौटने पर कुछ नया लिखने की कोशिश करूंगा. तब तक के लिए सभी ब्लॉग साथियों को नमस्कार. तीन दिन की यात्रा जाने की, तीन दिन की यात्रा आने की. दो दिन देवघर आने-जाने के लिए, एक दिन सिमरिया जाना होगा. समय लगा
 
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केवा-दात्शी: भूटानी व्यंजन-०१

अभी अभी रचना जी ने शिकायत और तगादा की, तो सोचा उन्हें निराश करना ठीक न होगा. तो आइए आज आपको एक भूटानी व्यंजन, केवा-दात्शी, के बारे मे बताऊँ. भूटान मे चीज को दात्शी कह्ते हैं. वहाँ आपको तरह तरह के व्यंजन मिलेंगें जो चीज के साथ बनती हैं. आलू को केवा, म
 
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पुकार

त्याग कर अभिमान अपना रख धरा का मान ले तू पाया बहुत कुछ अभी तक अब दान की भी ठान ले तू जी चुका बहुत अभी तक निज, सखा, संतान खातिर. मान ले तू, धर्म तेरा है निज नहीं, संसार-सेवा. जो जिया है व्यर्थ अभी तक हो गयी हो क्षीण शक्ति. माना यह अंतिम प्रहर है फिर भ
 
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और अब लीजिये बिकनी जींस

आज ही पता चला जापानियों ने जींस का एक नया स्टील तैयार किया है. वैसे मेरे विदेश में रहने वाले मित्रों को शायद अब तक इसका पता चल गया हो. पहली नजर में तो मैं कुछ और ही समझ गया था. मैं ऐसी तस्वीरें अपने ब्लॉग पर नहीं डालना चाहता इसलिए स्वयं देखिये बिकनी
 
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जानकी! कतए छी? आउ नैहर

जानकी! कतए छी? आउ नैहर. देखू ने धिया पुता सब पैघ भय गेल. किछ तऽ नेतो बनल अछि. पैघ कुर्सी पर चढ़ल अछि. वचन दऽ कय जाए कोना दृग आ मुंह मोरि लेने अछि. जानकी! कतए छी? आउ नैहर. आउ बुझबियौक ओकरो कने कोना राम राज्य चलै छल. एक टा तऽ वैद्य भय गेल नाम ओकर देश व
 
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जिज्ञासा: एक मनुज धर्म

भूल हो जाती है ललक पड़ता है ये मन जब उत्सुकता खींच लाती चेतना से बचपन में. क्या करुँ मैं अज्ञान. रहता नहीं परिपक्व चिंतन जो हुआ प्रसन्न कभी. छूट जाते होश मेरे है फिर वही एक चूक होता. एक चूक! डरा देती चित्त चपल को. जैसे साईकिल से नवयुवक को गिरा देती स
 
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मेरी पीं पीं करने वाली गुड़िया

बिटिया बड़ी हो रही है. अब वो पीं पीं करने वाले खिलौनों से नहीं खेलती. अब उसे चाहिए नए कपडे, गहने और गुडिया. कल ही की बात है कि हथेलियों में समा जाती थी. शायद कल गोद में भी न समायेगी. रह जायेगी यही यादें मेरे साथ. जब कभी दूर वो चली जायेगी. उन्ही यादों
 
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जूते को रहने दो, जूता न उठाओ (तर्ज: परदे में रहने दो)

जूते को रहने दो, जूता न उठाओ जूते को रहने दो, जूता न उठाओ जूता जो उठ गया तो फिर मच जायेगा हल्ला मेरी तौबा, हल्ला मेरी तौबा हल्ला मेरी तौबा, हल्ला मेरी तौबा जूते को रहने दो, जूता न उठाओ जूते को रहने दो, जूता न उठाओ जूता जो उठ गया तो फिर मच जायेगा हल्ल
 
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कविता प्रतियोगिता चालू है

कविता प्रतियोगिता चालू है यहाँ आपको अपनी कविता गा कर सबमिट करनी है. अवश्य भाग लीजिये. http://p4poetry.com/ Posted in सूचना Tagged: Poetry Competition
 
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हमें नहीं चाहिए सम्मान, क्या कल्लोगे?

हाँ सुना था हमने भी. चिल्ला रहे थे मीडिया वाले - “सुनो सुनो सुनो! दो सिंह को सरकारी तमगे के लिए बुलाया गया”. किसी ने हमारे मन की बात सुनी? आपकी मर्जी हुई और आप हमारे पैसे कमाने वाले रोजी रोटी पर फ़िदा हो गए. कर दिया घोषणा कि “भई आओ ए
 
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आपको आपकी रचना कैसी लगी?

हम अक्सर जब भी कुछ लिख कर उठते हैं तो सोचते हैं कि आज हमने बहुत ही धाँसू रचना की है. क्या कहें इतना बड़ा तीर मारा है कि आज तो साहित्य के स्तम्भ उखड़े ही उखड़े. लोग तो बस, क्या कहने हैं. पढ़ते ही झूम उठेंगे. सामने होता तो कहीं हाथ ही न [...]
 
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पुरुषों के लिए सुखी जीवन के १० उपाय

१) पत्नी बहुत बोलती हो तो? पढ़ने की आदत डालें. २) पत्नी यदि सुबह की चाय नियमित नहीं बनाती हो तो? चाय बनाना सीख लें. ३) रोज रोज की मगजमारी न कर के पुरी तनख्वाह पत्नी के हाथ में दे देनी चाहिए. हाँ अपना खर्चा काट के ४) बच्चों के स्कूल की डायरी बच्चों की
 
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मेरा भारत महान?

मेरा बाप मर गया उसी के नाम पर दे दो भाई उसकी माँ भी मर गयी साहब उस के नाम पर तो दे दो भाई मेरे बाप का नाना बड़ा सयाना उसके तो नाम पर दे दो भाई अल्लाह के नाम पर दे दो भाई राम के नाम पर दे दो भाई ईशा के नाम पर ही दे दे भाई वाहे गुरु दा खालसा, [...]
 
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कल चुनाव है

है आज मुझे नहीं, कुछ सूझ रहा. और ना ही यह मन, कुछ बूझ रहा. मुझको है चुनना, मेरा नेता, पर हा! चाल-चलन उनका, अब भी अनबूझ रहा. कब तक यूँ अन्धकार में देगा शब्दभेदी वोट तू. खोले आँखें, देख बाहर है कितना प्रकाश पड़ा. Posted in कविता, हिन्दी Tagged: चुनाव
 
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