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Proud to be a कुमाउँनी चेली!

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14 Jun 2010
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क्या आपने कभी देखा है ऐसा सम्मलेन ?

कवि सम्मलेन और लोकतंत्र, हर बार लोगों को ठगने के बावजूद अपनी लोकप्रियता और आम जन की आस्था के कारण अस्तित्व में बने रहते हैं | शहर में विराट कवि सम्मलेन का आयोजन होने जा रहा है इसे कई दिनों से प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा था | संस्था के आयोजक इसे बार
 
शेफाली पाण्डे
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मिस हॉस्टल ....लघुकथा [एक बार फिर]

आज के अमर उजाला के रूपायन में प्रकशित मेरी लघुकथा मिस हॉस्टल ..... एक बार फिर से मिस हॉस्टल आज हॉस्टल में बहुत गहमागहमी का वातावरण था क्योंकि आज समस्त वरिष्ठ छात्राओं के मध्य में से कोई एक मिस हॉस्टल का बहुप्रतीक्षित ताज पहनने वाली थी. विश्वस्तरीय
 
शेफाली पाण्डे
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छठा वेतनमान, सेल्स वालों का आक्रमण और छठी का दूध

साथियों, वर्तमान भारत में तीन तरह के लोग हैं| एक वे जिन्हें छठा वेतनमान मिल चुका है, दूसरे वे जिन्हें अभी नहीं मिला है लेकिन निकट भविष्य में मिलने की संभावना है और तीसरे वे जिन्हें किसी भी प्रकार का वेतनमान न कभी मिला था और न ही कभी मिलेगा| छठा वेतनमान
 
शेफाली पाण्डे
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गणित, अंग्रेजी दोउ खड़े...

इस संसार से बहुत सी चीज़ें विलुप्त होने की कगार पर हैं, जिनमें हम साहित्य, संस्कृति, मूल्य, नैतिकता, भाईचारा, विश्वास का नाम बेधड़क होकर ले सकते हैं | इधर जिस एक भावना का तेजी से क्षरण हुआ है, वह है विश्वास| छात्र को अध्यापक पर, पत्नी को पति पर, प्रेमी को
 
शेफाली पाण्डे
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इन दिनों की बात | मेरे अंदाज़ में एक साथ ........

इन दिनों की बात | मेरे अंदाज़ में एक साथ ........ हवाएं गर्म हैं | मोदी शर्म है | सरकार नर्म है | आई.पी.एल.धर्म है | शशि अस्त है | थरूर पस्त है | सुनंदा त्रस्त है | मीडिया बेहद व्यस्त है | ट्विटर पर ट्वीट | चिड़िया ने कर दी बीट | खुल गयी बड़ी - बड़ी पोल |
 
शेफाली पाण्डे
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शून्य के साथ मेरे प्रयोग

आजकल मैं बहुत व्यस्त हूँ | ऐसा ना भी कहूं तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता | इसमें आश्चर्यजनक बात सिर्फ इतनी सी है कि सरकारी टीचर होते हुए भी व्यस्त हूँ | इससे यह तो साबित हो गया कि व्यस्त होने का अधिकार सिर्फ प्राइवेट नौकरी वालों को ही नहीं हुआ करता | हम भी
 
शेफाली पाण्डे
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फेसबुक और ऑरकुट के दीवानों, ज़रा इधर भी नज़र डालो

[पुराने पन्नों से] साथियों .....मास्टरों और उधार का चोली दमन का साथ है अतः आशा है कि आप लोग मुझे साहिर साहब की इस रचना को उधार लेकर, इसका दुरुपयोग करने के लिए माफी प्रदान करेंगे .... फेसबुक तेरे लिए एक टाइम पास ही सही तुझको ऑरकुट के रंगबिरंगे चेहरों से
 
शेफाली पाण्डे
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हो कहीं भी जूतियाँ, लेकिन पैर में ही रहनी चाहिए.

सीटियाँ प्रतीक हैं राष्ट्र की एकता का अखंडता का और साम्प्रदायिक सौहार्द का| सीटी बजाने वाले की जाति या मजहब नहीं पूछी जाती | यहाँ ना कोई छोटा होता है ना बड़ा| यहाँ आकर सारे भेद समाप्त हो जाते हैं| वर्तमान युग बेहद अनिश्चिन्तताओं से भरा है| ऐसे में सीटी
 
शेफाली पाण्डे
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फिर छिड़ी रात, बात नोटों की ......

पता नहीं सोने को आदिकाल से लोगों ने अपने सर पर क्यूँ चढ़ा रखा है. कभी-कभी टेलिविज़न पर आने वाले एक विज्ञापन को देखकर मन में अक्सर यही ख्याल आता है. उसमें दिखाया गया है कि सोना पीढ़ियों को जोड़ता है. जबकि हकीकत यह है कि सोना पीढ़ियों से लोगों को तोड़ने का काम
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एक नए अंदाज़ में...बहुत मुबारक नव संवत्सर .........

बहुत मुबारक नव संवत्सर ......... कुंवारी कन्याओं के लिए ...... हों मात-पिता कोई भी इस वर्ष ना टूटे कमर बिन छीछालेदर, बिन स्वयंवर कन्याओं को मिल जाएं वर. बहुत मुबारक नव संवत्सर ......... विद्यार्थियों के लिए इस वर्ष का है या मंजर ना होगा फ़ेल कोई, न होगा
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संस्मरण : किस्सा पहली बोर्ड ड्यूटी का

संस्मरण २५ अप्रैल सन् २००० को लिखा गया था , जब मैं नई - नई शिक्षा विभाग में आई थी. मेरी बरसों से एक इच्छा थी कि मैं टीचर बनूँ, किसी और व्यवसाय में जाने की मैंने कभी नहीं सोची क्यूंकि जब से आँखें खोलीं शिक्षक माता - पिता को बड़ी - बड़ी सिद्धांतवादी
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आने दो हमें संसद में, क्यूंकि ....

नेताओं और औरतों या के मध्य कई समानताएं पाई जाती हैं, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि एक नेता बनने के सारे ही गुण एक महिला में विद्यमान रहते हैं, अतः उन्हें संसद से दूर रखने की कोशिश किसी भी सूरत में नहीं करनी चाहिए| नेता और नारी दोनों पर जितना भी लिखा
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बंद करो घर के अन्दर यह ...

साथियों, बहुत समय बाद क्षणिका का मौसम आया है ....बंद करो ....... तोड़ फोड़मार पीट गली - गलौज चीख पुकार बार बार ,पत्नी को कहना ही पड़ा आखिरकार कृपया,घर में प्रयोग मत कीजिये संसदीय भाषा, और संसदीय व्यवहार ...
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महिला दिवस पर ...कुछ पुरानी, कुछ नई ,कुछ

महिला दिवस पर ......साथियों महिला दिवस पर सभी महिलाओं को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ ... एक बार फिर पुरानी डायरी से कुछ पन्नों को निकाल लाई हूँ ... रोना ........... रोज़ सुबह जब छः बजे की बस पकड़कर काम पर जाती हूँ तुम्हारा नन्हा सा मुँह अपनी छाती से और
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भए प्रकट कृपालु ......

भए प्रकट कृपालु ...... भक्तजनों, महाराज पुनः प्रकट हो गए हैं| वे कुछ समय के लिए अंतर्ध्यान क्या हुए, आप लोगों ने उनके देवत्व पर संदेह करना प्रारम्भ कर दिया! प्रजा जनों, महाराज लोग कभी कभी स्थूल शरीर को छोड़ कर सूक्ष्म संसार में विचरण करने चले जाते हैं| आप
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अगले जन्म मोहे ब्लोगर का पति ना कीजो .........

पुराने पन्नों से ......मंगलवार, २४ मार्च २००९ अगले जन्म मोहे ब्लोगर का पति ना कीजो ......... मैं कपड़े धोता छप छप छप तुम की बोर्ड पे करती खट खट खट मैं अपनी किस्मत फोडूं सूखी रोटी रोज़ तोडूं तुम लो बातों के चटखारे मैं देखूं दिन में तारे दाल में मेरी नमक
Mar 04 2010 04:48 PM
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क्यों चलें गाँव की ओर?

मान्यवरों, क्यों लौटना चाहते हैं गाँव की ओर? अच्छा! घास खिलाने या यूँ कहिये कि गाँव वालों को चारा डालने? शहरी जानवर आपका फेंका चारा नहीं खा रहे हैं इसीलिये ना! आपका इंतज़ाम तो पुख्ता है ना? आजकल मौसम ख़राब चल रहा है, तबीयत ख़राब हो गई तो कहाँ जाएंगे? वैसे
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आओ गरीब दिखें

ऑस्ट्रेलिया अमीर मुल्क है, भारत गरीब. ऐसा इसलिए कह सकते हैं क्यूंकि स्लमडॉग मिलेनियर भारत में बनी थी. वह हमसे उसी तरह कुछ भी कह सकता है, जिस तरह हर अमीर आदमी, गरीब आदमी से कभी भी कुछ भी कह सकता है. फुटपाथ पर सोये हुए लोगों को गाड़ी के नीचे कुचलने वाले
Feb 20 2010 08:05 PM
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वलेंटाइन पर विदाई

विदाई के दृश्य बड़े ही कारुणिक होते हैं, चाहे घर में लडकी की विदाई हो या स्कूल में बच्चों की. दोनों में ''बला अगले के मत्थे टली'' वाली भावना की समानता रहती है . ये और भी कारुणिक हो जाते हैं जब विदाई यानि फेयरवेल वेलेंटाइन डे से दो दिन
Feb 14 2010 08:54 AM
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एक ठो पद्मश्री इधर भी

मुझे विरोध करने की पुरानी आदत है| छात्रा-जीवन से ही हर वह पुरस्कार जो मुझे नहीं मिलता था, मैं उसका पुरजोर विरोध करती थी| मेरे द्वारा इतना हल्ला-गुल्ला मचाया जाता था कि पुरस्कार-समिति मजबूरन मेरा नाम अगले साल के लिए पुरस्कारों की लिस्ट में शामिल कर लेती
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शुक्रगुज़ार हूँ मैं

अरी जनवरी ! मैं जानती हूँ कि बड़े लोगों पर तेरा बस नहीं चलता है, इसीलिए तू हर बार की तरह इस बार भी मुझे कंपकंपाने के लिए आ ही गई. लेकिन इस बार तो तुम्हारा आना सबको वरी कर गया, तुम्हारे आगे बसंत की तक दाल नहीं गली . लेकिन जनवरी ! मैं तो बिना जाड़े के यूँ
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दिसंबर माह की महिमा

साथियों, दिसंबर का महीना बीत चुका है ,इस महीने की बीतने से मेरा मन उसी प्रकार दुखी है जिस तरह देश भर के शिक्षक अपने स्वर्णकाल के समाप्त होने से ज्यादा , सिब्बल युग के अविर्भाव के कारण दुखी हैं. मेरे पास इस माह का गुणगान करने के लिए उसी प्रकार शब्द नहीं
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मज़े का अर्थशास्त्र ....

जब भी वो मुझसे टकराती है मुझे याद दिलाना नहीं भूलती कि मैं कितने मज़े में हूँ. मैं ईश्वर के इस खेल को समझ नहीं पाती हूँ , मेरे लिए जो एक अमूर्त वस्तु है , उनके लिए वही मूर्त कैसे हो जाती है , ज़रूर ये सरकारी योजनाओं के सदृश्य हैं , जिनमें पैसा तो बहु
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इत्ती दूर से आये हैं, कुछ तो ख्याल कीजिए

निर्णायक बनना कभी भी मेरा प्रिय विषय नहीं रहा . मेरा बचपन से यही मानना है कि किसी के बारे में अच्छे - बुरे या प्रथम और द्वितीय का निर्णय देने वाले हम होते ही कौन हैं ? इसी अवधारणा के चलते कक्षा में प्रथम आने वाली छात्रा और उसे प्रथम स्थान देने वाली अ
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आजकल ज़रा बीमार हूँ

इधर बहुत दिनों बाद बाज़ार जाना हुआ| जब से लौट कर आई हूँ, सांस लेने में बहुत तकलीफ हो रही है| सीने में भारीपन सा महसूस होता है, हर समय किसी अनहोनी की आशंका से दिल धड़कता रहता है, माथे पर ठंडक के दिनों में भी पसीना चुहचुहा जाता है| सोच रही हूँ कुछ दिन अस
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समझदार होते अस्पताल ...

कभी कभी मन करता है कि इन अस्पतालों की समझदारी पर बलिहारी जाऊं , इनकी प्रशंसा में स्तुतियाँ लिखूं , आरती गाऊं. इनकी समझदारी तो देखिये, जैसे ही किसी शातिर ...प्रकार अपनी { सुविधानुसार या हिम्मातानुसार} जोड़ सकते हैं, के ऊपर कोई गंभीर आरोप लगने वाला होत
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परीक्षाओं का मौसम

आजकल परीक्षाओं का मौसम है| हमारे विद्यालय में गृह परीक्षाएं चल रही हैं| गृह परीक्षा में ड्यूटी करने पर पैसा नहीं मिलता इसलिए इसे कटवाने के लिए हम अपनी सारी ताकत झोंक दिया करते हैं, हाँ अगर पैसा मिलता होता तो स्थिति इसके बिलकुल उलट होती. गृह परीक्षा औ
Oct 31 2009 08:39 PM
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त्यौहार का दिन और गैस चोरी हो गई

साथियों , कैसा लगेगा आपको जब घर में दो - दो आयोजन हों और पता चले कि आपकी गैस चोरी हो गयी हो..कल जब इस नाचीज़ ने चिट्ठा - चर्चा पर नज़र डाली तो पाया कि किन्हीं आकांक्षा की कृपादृष्टि मेरे ब्लॉग पर पड़ चुकी है , और उन्होंने बिना मुझसे पूछे मेरी रसोई से
Oct 26 2009 08:33 PM
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सच कहते हैं बड़े - बुजुर्ग ज़माना बदल गया ...

ज़माना बहुत बदल गया है ,पहले यदि कोई विद्यार्थी दीवाली के दौरान स्कूल में गलती से भी फुलझडी या हैण्ड बम चलाता था तो फुलझडी से ज्यादा चिंगारियां मास्साबों की आँखों से बरसती थीं, और यह भेद करना मुश्किल हो जाता था कि किसकी आवाज़ ज्यादा तेज है ,पटाखे की य
Oct 24 2009 11:33 PM
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सिब्बल जी फॉर्म भरना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है ,और हम इसे लेकर रहेंगे .

जबसे मेरे स्कूल के कक्षा बारह के छात्र , लव गुरु जिसका असली नाम नाम अब किसी को याद नहीं है , ने यह सुना कि कपिल सिब्बल आई . आई . टी .की प्रवेश परीक्षा के लिए न्यूनतम अस्सी प्रतिशत अंक निर्धारित करने जा रहे हैं , वह अपने लव गेंग के साथ आन्दोलन में कूद
Oct 22 2009 07:33 AM
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''ये त्यौहार ही हमारी मुनसिपेलिटी हैं''

बचपन में हिन्दी की किताब में भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का एक पाठ हुआ करता था जिसमे एक बहुत ही बढ़िया पंच लाइन हुआ करती थी ''ये त्यौहार ही हमारी मुनसिपेलिटी हैं'' टीचर बताया करती थी कि इसका मतलब यह हुआ कि हमारे घरों में साफ़ - सफाई अक्सर त
Oct 20 2009 08:37 AM
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करवा चौथ ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकता है

वर्तमान भारतवर्ष में शायद ही कोई ऐसा त्यौहार बचा हो जो सम्पूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरो सके, ऐसे समय में करवाचौथ ही एकमात्र ऐसा त्यौहार बच गया है जिसमे थोड़ी बहुत सभी धर्मों की झलकियाँ मिल जाती हैं ...देखिये दीवाली : के रूप में महीनों पहले स
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करवा चौथ पर इन देवियों से मिलिए ...

उस घर में जब पहुँची मैं अजब वहां का हाल था वो बनी थी अंबे - दुर्गा झगड़ा ही जिनका काम था बिखरे हुए थे सारे बाल आँखों में जलते थे अंगार भभूत लपेटी थी तन पे सिर पे सुशोभित चूनर लाल आँखों को घुमाया गोल - गोल एक नज़र में लिया सबको तोल उछल - उछल कर लगी नाचन
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लो आया बचत का मौसम ....

मंत्रियों ने होटल छोडे , हर गली में बबुआ डोले लो आया बचत का मौसम नए अंदाज़ का मौसम .......बचत के इस सीजन में देखिये ऊपर वाले के यहाँ क्या चल रहा है ? ईश्वर - चित्रगुप्त से ..... बताओ चित्रगुप्त ! पृथ्वी पर क्या चल रहा है ? चित्रगुप्त .....महाराज ! पृथ
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अचार - ए - आडवानी के बहाने अचार बनाने का तरीका.....

अचार - ए - आडवानी के बहाने अचार बनाने का तरीका.....हमें कुछ साथियों ने बताया कि देश का सबसे टिकाऊ, मजबूत और सक्षम माना जाने वाला अचार -अचार-ए-अडवाणी सड़ गया। बहुत दुख की बात है। सड़े हुये को अब काम लायक नहीं बनाया जा सकता लेकिन आपको मैं अचार बनाने का तरीका
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यह मेरा स्वीट होम है ....

यह मेरी बेटी है जीती जागती सांस लेती नोटों की पेटी है इसने पिछले ही साल चलना सीखा है सुबह तीन बजे उठ जाती है चार बजे हैवी पांच बजे लाइट म्युज़िक सीखने जाती है बचे समय में कत्थक , भरतनाट्यम और डिस्को में पसीना बहाती है पिछले हफ्ते बुगी - बुगी में फर्स्ट आई
Sep 24 2009 08:30 PM
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शिक्षा मंत्री जी ....सी. बी.एस.सी.ये क्या कर रही है ?.

अब सी .बी .एस .सी .हमें यह बताएगी कि विज्ञान और गणित को खेल खेल में कैसे पढ़ाया जाता है .माननीय शिक्षा मंत्री जी ,हमने इतने साल घास नहीं खोदी है ,खेल - खेल में कैसे पढ़ाया जाता है यह हमें ना सिखलाएँ . हम सदियों से बच्चों को खेल खेल में ही पढाते आए हैं .
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हम कैटल होते हैं तभी तो आप वेल सेटेल होते हैं .

माननीय शशि थरूर जी , ,आप माननीय हैं , इसीलिए आपकी बात मान लेने में ही सबका भला है, आप बिलकुल सच कहते हैं ,कि हम भारतीय मवेशी हैं ,इसमें बुरा क्या मानना ? आपने संयुक्त राष्ट्र में हमारा मान बढ़ाया है ,आप इतने साल विदेश रहकर आए हैं ,आपसे बेहतर जानवर और
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हिन्दी - अंग्रेजी का वाक् युद्ध

हिन्दी - अंग्रेजी का वाक् युद्ध अंग्रेजी ................................ तू हो गयी है आउट ऑफ़ डेट मार्केट में नहीं तेरा कोई रेट तू जो मुँह से निकल जाए लडकी भी नहीं होती सेट तेरी डिग्री को गले से लगाए नौजवान रोते रहते हैं तुझे लिखने , बोलने वाले फटेहाल
Sep 13 2009 10:20 PM
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ज़रा अपने अन्दर भी तो झांकिए

आजकल वे लोग भी शिक्षा व्यवस्था को कोसने लगे हैं जिन्हें शिक्षा के असल मायने तक पता नहीं होते . जो स्वयं किसी नैतिकता का पालन नहीं करते , वे शिक्षकों के लिए आचार - संहिता का निर्धारण करने लग गए हैं ,शिक्षकों के लिए नैतिक मापदंडों का निर्धारण करने वाले ये
Sep 05 2009 06:21 PM