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13 May 2010
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कौन कहता है कि ,तू मुर्दा नहीं है॥

मुल्क पर उन जैसा हक़, मेरा नहीं है ।नागरिक तो हूँ मगर ,पैसा नहीं है॥पहले भी रोज़ो-शब् , न थे अच्छे मगर।अब हमारे हाल पर , पर्दा नहीं है॥तुम ऐसे वक़्त मेरी, छाँव की तलाश।तपी है पीठ उस पर कपडा नहीं है॥हुई तसल्ली शहर की , बदहवाशी से।दिले बर्बाद हाल तू ,तनहा
 
Deepak Tiruwa
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तेरा चूल्हा चाँद पका कर रखता मेरी थाली पर ।

सिर रख के तुम्हारी गोद में आज अगर रो पाते माँ।तुम हाथ फेरती बालों पर तो शायद सो पाते माँ॥तेरा चूल्हा चाँद पका कर रखता मेरी थाली पर ।रात तवे सी अब काली है नहीं चाँद को पाते माँ॥दुनियां की इस लूट-मार में अपना हिस्सा हार गए।क़तरा भर की प्यास हमें थी हम भी
 
Deepak Tiruwa
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May 10 2010 09:34 AM
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त्रिवेणी ग़ज़ल

फिर कोई खलिश मुझे, जागती है रात भर ।तीरगी* में रास्ता, ढ़ूंढ़ती है रात भर ।तमन्ना दीवारो - दर , पीटती है रात भर॥ज़ख्म से बहता हुआ , खून क्यों खामोश हो ।आरज़ू दिल की बहुत , बोलती है रात भर ।हर तरफ खला में पर तौलती है रात ॥ये फितूर है मेरे , तालि - ए - बेदार**
 
Deepak Tiruwa
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नहीं चाँद को पाते माँ ...

तेरा चूल्हा चाँद पका कर रखता मेरी थाली पर । रात तवे सी अब काली है नहीं चाँद को पाते माँ॥जन्मदिन...! यानी आज दुनिया में अपनी आमद को और दुनिया की इस आफत को ३० साल हो गए... ये ग़ज़ल आज माँ के लिए कही है...सिर रख के तुम्हारी गोद में आज अगर रो पाते माँ।तुम
 
Deepak Tiruwa
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रोटियां कपड़े मुहब्बत, घर सलामत चाहिए

बुलबुलें हम हैं गुलिश्तां है हमारा पर हमें ।अपने ही माहौल में अब हिफाज़त चाहिए॥कुछ नए रंग की ये ग़ज़ल है , पेश कर रहा हूँ ....रोटियां कपड़े मुहब्बत घर सलामत चाहिए।ज़िन्दगी यानी हमें भी पुर शिक़ायत चाहिए ॥दिले खाना ख़राब को यार जम्हूरियत न दे ।इस पे
 
Deepak Tiruwa
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लिव इन / वेश्यालय : दीवार में खिड़की तो हो ...

नदी अपना रास्ता तलाश लेती है , पतीले का उबाल ढक्कन लगाने से दबता नहीं बढ़ता है...'लिव-इन रिलेशनशिप ' या फिर 'लीगलाइज्ड पेड सेक्स'...? इनसे बेहतर विकल्प भी मौजूदहैं ...!यकीनन गलाकाट प्रतियोगिता के इस युग में जहाँ एक ओर आबादी के अनुपात में रोज़गार के अवसर ना
 
Deepak Tiruwa
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रंजिश ही सही..(नए शेरों के साथ)

मुआफी ...माज़रत ... जनाब अहमद 'फ़राज़' साहब...और जनाब 'मेहदी हसन साहब' नए शेरों के साथ सुनाइएगा ज़रूर ... आपकी सेहत और लम्बी उम्र की दुआ के साथ...!रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ । आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ॥कुछ सर्प मेरे ग़म के हो बैठे हैं
 
Deepak Tiruwa
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सारे गुलाब:ग़ज़ल

उन लम्हों में तू कहाँ था,सच बता ऐ ग़मे दहर। मैं नयन से चुन रहा था , नयन के सारे गुलाब॥ ग़ज़ल पेशे खिदमत है .... तवज्जो चाहूँगा मुआमला ज़रा नाज़ुक है..... हसरतों में खिल रहे थे , मिलन के सारे गुलाब।और तुमको ढूंढ़ते थे , चमन के सरे गुलाब॥मेरे जवान होने का ,
 
Deepak Tiruwa
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उस मोड़ पर ...

»।ये नज़्म 'उस मोड़ पर' पेश कर रहा .... सुन कर बताइयेगा कैसी लगी...
 
Deepak Tiruwa
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Mar 31 2010 09:31 AM
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Shortest fairy tale , एवर...!

Once upon a time,a guy asked a girl,"Will You marry me ?"The girl said , "No !"And the guy livedhappily ever after .Rode motorcycles,went fishing...hunting ...,played golf a lotand traveled everywhere ....and still had money in bank.
 
Deepak Tiruwa
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दौर - ए - बाज़ार, न देखा जाए

बदल डालेंगे साथ आ, अगर तुझसे भी। सूरत-ए- हाल को बीमार, न देखा जाए॥ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद लौट रहा हूँ ....उम्मीद है सभी साथी बाखैरियत होंगे .... नयी ग़ज़ल है आप की नज़र कर रहा हूँ...हुस्न के हाथ में इश्तिहार, न देखा जाए।और ये दौर - ए - बाज़ार , न देखा जाए
 
Deepak Tiruwa
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जम्हूरियत चुनाव की बातें करें/मनोज 'दुर्बी'

जम्हूरियत चुनाव की बातें करें जातिगत बिखराव की बातें करें भूख और अभाव की बातें करें संघर्ष और बदलाव की बातें करें तोड़ कर दुनिया की सारी सरहदें इश्क के फैलाव की बातें करें इस मशीनी जिंदगी में दो घड़ी छाँव और ठहराव की बातें करें हर जिस्म हर इक रूह है ज
 
Deepak Tiruwa
Dec 29 2009 11:52 AM
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कालिदास लौट जाएगा ...

आँख खुलती है सुबह तो देखता हूँ सिर के दर्द की तरह पूरब से उगता , आग का गोला। रात की बहस - दिन के काम याद आते हैं , चौबीस घंटे के संकरे से थैले में क्या - क्या ठूंसना पड़ता है ? यही सोचता हुआ उठ पडूंगा , सिगरेट सुल्गाऊंगा , पैर में उलझती चप्पल को लात म
 
Deepak Tiruwa
Dec 29 2009 11:52 AM
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ग़ज़ल

 
Deepak Tiruwa
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इक उम्मीद की तीली,साथ में रखना...

भुला दो सब अज़ाबो-ग़म ,नयी दुनिया बसाने को। जड़ें पिछली हटाते हैं , नये दरख्त लगाने को ॥ वहीं हम दिल लगाते हैं ,जहाँ अपना सुकूं देखें। फिर इसको इश्क कहते हैं,ज़माने में दिखाने को॥ तुम इक उम्मीद की तीली , हमेशा साथ में रखना । अँधेरा एक मौका है , कोई दिय
 
Deepak Tiruwa
Dec 29 2009 11:52 AM
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सुनो ...! बन्दर से बने हुए 'डार्विन'...

सुनो कान खोल कर बन्दर से बने हुए डार्विन...! तुमने ये 'जंगल का कानून' लिखा है। सभ्य समाज में तुम्हारा 'सर्वाइवल ऑफ़ दि फिटेस्ट ' कुछ नहीं होता। 'सब बराबर होते हैं ', 'मिलकर जीते हैं ' कोई कमज़ोर का हक़ नहीं मारता..... सभ्य समाज में 'शॉपिंग मॉल' नहीं ह
 
Deepak Tiruwa
Dec 29 2009 11:52 AM
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ज़िन्दगी-ज़िन्दगी !(अखंड)

मैं मरना चाहता था , मैंने देखे मौत , दुःख , निराशा पस्त हिम्मत , मतलब परस्त लोग ज़िन्दगी समझौतों में जीते लोग , बिखरी ज़िन्दगी , सबकुछ जीवन विहीन ..... मैं अब जीना चाहता हूँ अनंत समय तक मैंने देखे जीने को कुलबुलाते लोग ज़िन्दगी के पहलू , दुनिया की सु
 
Deepak Tiruwa
Dec 29 2009 11:52 AM
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भूख...!/दुर्बी

फ़ाकों के क्या हाल सुनाऊँ ...? मेरे घर का सूना चूल्हा कब से मुझको ताक रहा है । घर के सारे टीन -कनस्तर दाना -दाना तरस रहे हैं । सुख-दुःख के साथी थे चूहे , वे भी तनहा छोड़ चुके हैं । गलियों का आवारा कुत्ता तक उम्मीदें छोड़ चुका है । सुबह शाम का उसका आना,
 
Deepak Tiruwa
Dec 29 2009 11:52 AM
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ग्लोबल - ग़ज़ल

अरहर का दाना भी गोया , सोना लगता है। आदमी बाज़ार में अब तो , बौना लगता है॥ आजमा कर देख कोई , ब्रांड वाली क्रीम। यार उम्मीद ! चेहरा तेरा , रोना लगता है॥ खूब हुए ग्लोबल क्या कहना ,ग्लोबल दुनिया में। चौराहे पर पहुँचा घर का , कोना लगता है॥ हरेक ज़रूरत सच्च
 
Deepak Tiruwa
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दूसरा वनवास

को मिला दूसरा वनवास मुझे...nazm कैफ़ी आज़मी
 
Deepak Tiruwa
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फेमिनिस्ट

इस कविता पर बहस की गुंजाइश है ...पहले 'कविता' पेशे-नज़र है...अनुभव अगर कहूँ ,तुम छीन लोगे मुझसे'फेमिनिस्ट'कहलाने की खुराक !चलो मैं इसेशोध कहता हूँ।मैंने तमाम साहित्य खंगाला है,इतिहास की कब्र खोदी है।और यकीननमैं नहीं कहता,आंकडे बोलते हैं।औरत में आदमी क
 
Deepak Tiruwa
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उठो !

साथियों उठो!तुम नहीं जानतेक्या हुआ है?तुम पथरीले खेतों मेंसोना उगाने कीकोशिश करते हो..।और लोहा समझ करसरहद पर भेजते होअपने बच्चे....तुम नहीं जानतेबच्चे लोहे के नहीं होते...वे सरहद पर लोहा खाएँगे।वे शहीद नहींसियासत के हाथों पिटे हुएमोहरे होंगे...और कल
 
naturica
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शैतान की सीख

उत्तर जानते हुए भी चुप रहोगे तो शैतान तुम्हारा सर फोड़ देगा ...और अगर नहीं जानते तो अपना सर फोड़ेगा ... भला और बुरा दो भाई थे (एक समय की बात है)। वे बिना माँ- बाप के ही पैदा हुए और दुनिया में मौजूद रहे (ऐसाकैसे सम्भव हुआ कोई नहीं जनता)। खैर जो होता आय
 
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orkut ब्लॉग की sidebar में

को इस widget के ज़रिये आप अपने blog की sidebar में लगा सकते हैं ,आपको सिर्फ़ ये code copy - paste करना है ....
 
naturica
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कविता -mix

ये कुछ -कुछ remix जैसा काम है...audio effect के साथ मेरी कविता /नज़्म 'उस मोड़ पर' पेशे नज़र है
 
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उस मोड़ पर ...

एक अदद बड़ी उम्र काआइना मुझको।कि मैं, सफर में दूरनिकल तो आया हूँलेकिन....इक चेहरा मेराजिद कर केकहीं ठहर गया है,गुजश्ता उम्र केकिसी पडाव परबस एक बार मुझे उस कमबख्त केपास जाना है ,कहूँ उसे कि"चल यार बहुत हुआ...उधर मैं भी तनहा हूँ इधर तू..."मगर इसउम्रे न
 
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औरत की निगाह में राजेंद्र यादव...!

आप कोई भी जीवन पाते कुंठा के शिकार ही रहते....." /यानी 'अ' चूँकि राजेंद्र यादव है इसीलिए वह कुंठित है। राजेन्द्र यादव की आत्मकथा 'मुड़ -मुड़ के देखता हूँ की कंचन जी ने अपने ब्लॉग 'ह्रदय गवाक्ष' पर Normal 0 false false false MicrosoftInternetExplorer4 <
 
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हम अहले तमन्ना हैं यारो...

हम अहले - तमन्ना हैं यारो आदाब हमारे क्या कहना ।उनसे है हमें उम्मीदे -करम कभी बात नहीं होती जिनसे॥
 
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तेरे मुज़रिम

बड़े साहब से साडी नफ़रत ,अपनी असुरक्षा ,भय .....प्रतिशोध .....सब 'मथ' कर मैंने उसके शरीर में उडेल दिए. ..दीवार की छिपकली सी वह मुझसे चिपकी थी ....
 
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गाँधी , संविधान और माओ...

हम क्या करेंगेइसे तय करने वालेगाँधी ,संविधान या माओ...कौन होते हैं ?ये हमारे सूखे हुए पेटऔर आप केभरे हुए बाजुओं का किस्सा है ....आप सोचते हैंहम क्या खा कर करेंगे 'मोहब्बत' ?हम जानते हैं'संघर्ष' आप के बस की बात नहीं....मोहब्बत बाजुओं-बाँहों कालहलहाना
 
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अब उसी दरिया को पानी चाहिए

सुर्ख सुबह शाम सुहानी चाहिए ।जिंदगी भर खींचा-तानी चाहिए॥काट कर पर्वत भगीरथ की तरहकाम की गंगा बहानी चाहिए ॥कल जहाँ रुकते थे प्यासे काफिलेअब उसी दरिया को पानी चाहिए॥सींच डाले जो ज़मीं को खून से ,इस धरा को वो जवानी चाहिए ॥मंदिरों में क़ैद ईश्वर को 'मनोज'ख
 
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गहरे-हल्के,कितने सदमे

अपने सबसे अच्छे नगमे, तेरे लिए मैंने लिखे ।आँख के पानी पे सपने, तेरे लिए मैंने लिखे ।रात दिन मेरे साथ चलने की ना जिद कर जिंदगीराहे -वफ़ा के आईने , तेरे लिए मैंने लिखे ।उसे फ़िक्र हो मेरी यूँ न था,लेकिन मुझे कहता रहागहरे-हल्के,कितने सदमे तेरे लिए मैंने
 
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'शैतान की सीख' से

भला और बुरा दो भाई थे (एक समय की बात है)। वे बिना माँ- बाप के ही पैदा हुए और दुनिया में मौजूद रहे (ऐसा कैसे सम्भव हुआ कोई नहीं जनता)। खैर जो होता आया है हुआ ,समय गुजरा और वे दोनों किशोरावस्था को प्राप्त हुए । बात चूँकि पुरानी है इसलिए धोखे में मत आइय
 
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अजनबी ...!

फिर उसके बाद किसी बंजर रिश्ते के हमदो सिरे रह गए....तुम ले चलेमुझमें से हर मुमकिन शै ,और मैं साये को उठा लायाएक आदमी वहीँ छोड़ कर ।आज लेकिन शबे तन्हाई मेंदौड़ा आया है वही आदमीदूर कहीं से ....उसी रिश्ते का रेज़ा-रेज़ा,मरते ताल्लुक के आखरी लम्हे लेकर ।अबके
 
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मैं, तुम और शायरी...!

मैं, तुम और शायरी...तसव्वुर की सैरगाहों में ,धुंध पर चलते रहे।सोया किए ओढ़ कर ,जुल्फों की सियाह रातें ।देखा किए साझा ,मुस्तक़्बिल के हसीन ख़्वाब।ग़मे-हस्ती,ग़मे-सामां अशआर में ढलते रहे ।मैं,तुम और शायरी...इक दूसरे के ज़ेहन की रानाइयों में डूबे थे ...कि
 
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मुशायरा- उठ मेरी जान...!

आज हमारे साथ हैं तसलीमा नसरीन, कैफी आज़मी और...तो ख़वातीनो-हज़रात ये नज़्म बेहिचक आज स्त्री-विमर्श का एंथम कही जा सकती है ,बकौल शायर इसे जंगे-आज़ादी में महिलाओं को मर्दों के साथ बढ़ कर शिरक़त कराने के लिए लिखा गया।जनाब कैफी आज़मी से विशेष आग्रह के साथ स
 
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मुशायरा -सारा क़ुरान रट गई दुनिया..!

जनाब इब्राहीम 'अश्क' का मुशायरा (साइबर) में मैं स्वागत करता हूँ जनाब 'अश्क'अपने हाथों से कट गई दुनिया कितने हिस्सों में बंट गई दुनिया अस्ल मानी कभी नहीं समझी सारा क़ुरान रट गई दुनिया ...हमारे दौर की शायरी को रूमानियत से लबरेज़ रखने वाले जनाब क़तील शिफ
 
naturica
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कोई अफ़सोस न पाला करिये...! /दीपक तिरुवा

कोई अफ़सोस न पाला करिये ।सारे अरमान निकाला करिये॥दिल ने क्यों शोर किया है इतना,घर के बच्चे को सम्हाला करिये॥कच्ची दीवारें ,सूख जाने दो ।याद पे ज़ोर न डाला करिये॥फिर कोई ख्वाब चला आयेगा ,स्याह रातों में उजाला करिये॥एक सैलाब लिये बैठा हूँ ।मुझ पे कंकर न
 
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मुशायरा -ले मशालें चल पड़े हैं...!

मुशायरा (cyber) में स्वागत है जनाब फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' ,बल्ली सिंह 'चीमा' ,मनोज 'दुर्बी', कैफी आज़मी साहबऔर .....तो हाज़रीन शाम की इब्तिदा करते हैं जनाब कैफी आज़मी के स्वागत के साथ...कैफी:-नज़्म का उन्वान है 'मकान', पेशे-नज़र हैआज की रात बहुत गरम हवा चलती है
 
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