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रचना का स्वप्निल सृजन

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31 Dec 2009
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शुभाशुभ की कसौटी पर छींक (जयपुर की पत्रिका ज्योतिष सागर दिसम्बर 2002 में प्रकाशित लेख )

भारतीय प्रष्ठभूमि में कुछ मान्यताएं व धारणाएं इस कद़र रची बसी हैं,कि समय असमय हमें प्रभावित करती हैं ।पहले लोग इन्हें स्वभावतः स्वीकारते थे, हमारे रामायण जैसे महाग्रंथ में भी छींक का उल्लेख किया गया है कि - दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू
 
रचना गौड़ ’भारती’
Dec 29 2009 11:58 AM
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रचना का स्वप्निल सृजन

मदर्स डे माँ को त्याग व ममता की मूर्ती कहा जाता है। उसे सम्मान देने के लिए आज सम्पूर्ण विश्व १० मई को मदर्स डे की ११० वीं वर्ष गाँठ मनाने जा रहा है। कहते हैं न कि पूत कपूत हो सकता है मगर माता कभी कुमाता नही होती। वह जीवनदायिनी है, माँ है, शिक्षिका है
 
रचना गौड़ ’भारती’
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उधार का मातृत्व - अखिल भारतीय साहित्य परिषद ,राजस्थान द्वारा हिन्दी कहानी प्रतियोगिता २००८ मे पुरुष्कृत कहानी

अखिल भारतीय साहित्य परिषद द्वारा आभूतपूर्व मुख्यमंत्री हिमाचल श्री शांता कुमार एंव भूतपूर्व शिक्षा मंत्री राजस्थान श्री घनश्याम तिवाड़ी से पुरुष्कार प्राप्त करते श्रीमती रचना गौड़ ‍‍’ भारती ( दिनांक 22.02.2009) कहानी शालिनी बगीचे में टहल पौधों की पीली
 
रचना गौड़ ’भारती’
Dec 29 2009 11:58 AM
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"सारे जहां से अच्छा हिन्दोसितां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके, ये गुलसितां हमारा"

आज हमारे गुलसितां को कीड़ा लग गया है । कीड़े लगे पौधे कभी स्वस्थ वृक्ष नहीं बन सकते, न हीं स्वस्थ पर्यावरण दे सकते । यही बात हमारे उन नन्हे बेकसूर बाल मज़दूरों के लिए भी लागू होती है । कहते हैं किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों पर निर्भर करता है
 
रचना गौड़ ’भारती’
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दीपावली पर लक्ष्मी व सरस्वती का संग-संग पूजन का महत्व

शुभ लक्षणों का सांकेतिक त्यौहार है दीपावली । यूं तो यह त्यौहार पांच दिन तक मनाया जाता है, कार्तिक कृष्णन त्रयोदशी ( धनतेरस ) से कार्तिक शुक्ल द्धतिया ( भाई दूज ) तक चलने वाले इस पंचमहोत्सव पर्व में दीपावली ही मुख्य त्यौहार है । पंचमहोत्सव पर्व के मध्
 
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यज्ञों से होती है वर्षा (जयपुर की ज्योतिष सागर पत्रिका में प्राकाशित)

वर्तमान में हमें अकाल जैसी विषम परिस्थतियों का सामना करना पड़ रहा है । आज हम वर्षा ऋतु के पानी पर ही निर्भर हैं, जबकि पूर्वोत्तर काल में ऋषि मुनियों द्धारा यज्ञादि शक्तियों का सहारा लेकर भी वर्षा करायी जाती थी । प्राचीन समय में प्रत्येक धर में नियमानुसार
 
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Sep 13 2009 02:09 PM
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भारतीय नारी (राजस्थान साहित्य अकादमी की मधुमती पत्रिका मई 2009 में प्रकाशित)

एक सब्ज़ीवाली नित दोपहर मालती के घर की कालबैल बजाती। ‘‘बीवीजी! कुछ सब्ज़ी लेंगीं ?’’मालती-‘‘नहीं! अभी नहीं चाहिए।’’सब्ज़ीवाली-‘‘कुछ तो ले लो, हम दो कोस चलकर यहां आतीं हैं सब्ज़ी बेचने के वास्ते। अच्छा न लेयो तो पानी ही पिलाय देओ।’’मालती पानी देते
 
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अपने -पराये

नदी में डूबते हुए एक युवक को मल्लाहों ने खींच कर बाहर निकाल लिया । किनारे पर बैठा एक साधु यह देख रहा था । बाहर आकर युवक दुखी स्वर में बोला - ‘ आपने मुझे क्यों बचा लिया , जिनके साथ मैंने अच्छा किया था , उन्होने मेरे साथ बुरा किया । आपके साथ न मैंने अच
 
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पानी और बुलबुला

आपको पता है प्रकृति बोलती है । ये चांद सितारे,हवा,पानी,फूल,पत्थर सभी आपस में बातें करते हैं । ऐसी बातें जिनकी न तो कोई भाषा होती है,और ना ही शब्द । हमें सुनायी देती है तो एक हल्की गूंज जिसे हम इनका शोर समझते है । यक़ीन नहीे होता तो सुनिये पानी और बुल
 
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शुभाशुभ की कसौटी पर छींक (जयपुर की पत्रिका ज्योतिष सागर दिसम्बर 2002 में प्रकाशित लेख )

भारतीय प्रष्ठभूमि में कुछ मान्यताएं व धारणाएं इस कद़र रची बसी हैं,कि समय असमय हमें प्रभावित करती हैं ।पहले लोग इन्हें स्वभावतः स्वीकारते थे, हमारे रामायण जैसे महाग्रंथ में भी छींक का उल्लेख किया गया है कि - दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू
 
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कर्म महान है (लघु कथा)

सुबह-सुबह अतिप्रसन्नता से मयंक का दिल नाच उठा जब कम्प्यूटर की सूखी कार्टरेज़ जिसे उसने रात भर पानी में डुबोए रखा था इसी उम्मीद से कि शायद चल जाए। वही कार्टरेज़ धकाधक सुन्दर शब्दों को कागज़ पर फर्राटे से छाप रही थी। यकायक उसकी निगाह उसकी पत्नी पर पड़ी
 
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बुद्ध, महावीर, कृष्ण व राम को मूंछें क्यों नहीं ?

यह लेख जयपुर की ज्योतिष सागर पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है ) मूंछें पुरूषत्व की निशानी मानी जाती हैं । प्रारम्भिक काल में जिस पुरूष के मूंछें होती थी वह उन्हें बल दे देकर अपने बल का अभिमान किया करते थे । लेकिन यह जरूरी नहीं है कि सभी पुरूषों के मूं
 
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क्या है - यह होली का त्यौहार

होली बड़ा पुराना त्यौहार है । यह फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । कई पुराणें और साहित्य ग्रंथों में भी इसके मनाये जाने के विस्तृत वर्णन मिलते हैं । इस त्यौहार के आगमन से मनुष्य, जीव-जन्तु यहां तक कि प्रकृति भी राग-रंग से हर्षोल्लासित हुए बिन
 
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उधार का मातृत्व

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् (राजस्थान) द्वारा आयोजित हिन्दी कहानी प्रतियोगिता 2008 मे पुरुष्कृत कहानी शालिनी बगीचे में टहल पौधों की पीली पत्तियांे को हटा मिट्टी की सफाई कर रही थी। सुबह - सुबह ये उसकी दिनचर्या में शामिल था। वैसे भी इतने बड़े घर में उसके
 
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भूख और मौत

भरा हो पेट तो संसार जगमगाता है लगी हो भूख तो इमान डगमगाता है’’ संसार में कौन बड़ा इसका द्वन्द तो देवताओं में भी चला है और आखिर में गणेशजी को सर्वप्रथम याद करने का आशिर्वाद मिला । एक बार इसी तरह भूख और मौत भी अपना दम्भ भरने लगी। मौत ने भूख से इतरा कर क
 
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