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21 May 2010
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तेरा ख़त

एक वो भी दिन थाजब तेरे ख़त के आने किखबर से ही महक उठते थेदिन रात मेरेऔर एक यह दिन हैतेरा ख़त सामने मेज़ पे पड़ा हैऔर उसे खोलकर पड़ने की हिम्मत नहीं होती ...-तरुण
 
tarun
May 22 2010 04:05 AM
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एक मोड़

न जाने कितनी बारमुड़ मुड़ के रुक रुक केफिर उस मोड़ पे लौटकर गया हूँजिस मोड़ पे तुम मेरा हाथ छुड़ाकर चली गयी थीन जाने कितनी बारउस एक एक राह से गुजरा हूँजिन पर तुम और मैं साथ चली थेन कितनी ही बारउस मोड़ पे घंटो रुक कर तुम्हारा इंतज़ार किया
 
tarun
May 22 2010 03:46 AM
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रूह

मेरी रूह जो कबसे खामोश बैठी है एक बार बोली थी कुछ ख़ुशी में गुनगुनायी भी थी उस दिन जब तुम मेरे करीब आई थी मगर उस दिन के बाद अब तलक न कोई बोल उठा न कोई आवाज़ हुई बस एक उदास शाम के जैसे यह हर रोज़ मेरे घर
 
tarun
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ज़िन्दगी की रफ़्तार

ज़िन्दगी की रफ़्तार कुछ ऐसी होती हैकि कभी पल दो पल मेंसाल गुज़र जाते हैऔर कभीपल दो पल ही साल बन जाते हैकभी सालो को गिननाबहुत आसान हो जाता हैऔर कभीपलों को गिनते गिनते ज़माने गुज़र जाते हैज़िन्दगी कि रफ़्तार कुछ ऐसी होती हैकि कभी पल दो पल के
 
tarun
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बीत गए

तुमको देखे ज़माने बीत गएप्यार एक दिन सुनाने बीत गएजाम उठाकर कैसे भूलेंगे तुम्हेमय गयी महखाने बीत गएरोये भी तो अब कौन सुनेगा हमेरोने के सब बहाने बीत गएकहाँ जाकर मिलेंगे तुझे यह बताछिपने के सब ठीकाने बीत गएमैं भी चुप हूँ तू भी गुमसुम हैतेरे गीत मेरे
 
tarun
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किसी तरह

ये रात बिना नींद के गुजर जाये किसी तरहसुबह के साथ तू भी मेरे घर आये किसी तरहतडपते चाँद को रात ने बहलाया है बार बारमूझे बस तेरा एक ख्वाब मिल जाये किसी तरहमेरी हर आवाज़ तेरे दर से खाली लौट आती हैकभी एक पुकार पे तू भी आ जाये किसी तरहमैं लोगो कि भीड़ में
 
tarun
Feb 28 2010 01:46 PM
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रिश्ता

मैं जिससे भी मिलता हूँ उसके जैसा हो जाता हूँउसके ख्यालो को सोचता हूँ उसकी आहटो पे चलता हूँ उसकी आवाजो मैं बोलता हूँ कोई फिर भी  क्यूँ मेरी तरह नहीं सोचता है ...मैं उसके गीतों को सुनता हूँउसकी साँसों को जीता हूँ उसके
 
tarun
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अमन की आशा

Written in context of India and pakistan, for someone who was born in pakistan but migrated to india in 47, today he remember the days spent in pakistan, his original homeवही तो घर मेरा थावही पे पहली दफा मैंमाँ का हाथ पकड़कर कुछ कदम चला थावही पे पहली दफा
 
tarun
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सुबह

हजारों रातों को जलाकर लाखो ख्वाबो को बनाकर न कितने लम्हों के एक एक तागें को पिरोकर जिस सुबह को सजाया था वो आज मिली है आ मेरी उम्मीदों की दुल्हन ज़रा कुर्सी पे मेरे सामने बैठ कुछ देर मुझसे बात कर मैं भी देखूं जिसने इतना तरसाया है न जाने कितनी रातो को
 
tarun
Dec 29 2009 11:48 AM
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तलाश

अपने हाथ को दे दो मेरे हाथो में ऐसे कि रिश्ता सा एक जुड़ जाए तेरी साँसों का कतरा कतरा मेरी नस नस में घुल जाए इतना करीब मेरे आ जाओ जुड़ जाओ मुझसे ऐसे कि जब भी मैं खोलूं आंखे अपनी बस एक तेरा चेहरा ही नज़र आए मुझमे मिल जाओ तुम कुछ ऐसे कि मेरे इस जिस्म को
 
tarun
Dec 29 2009 11:48 AM
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तेरी हर बात मिलें

वो मुझको मिला दे तुझसे ऐसे कि जब तुम साँस लो तो मुझको जान मिले तुम नींद लो तो मुझको ख्वाब मिले गुज़रे हवा जब तुमको छूकर तो मुझको एक एहसास मिले उतरे चाँद जब तुम्हारे आँगन में मुझको हर वो रात मिले हर पल लौटकर गुज़रे जो मेरे मांजी से तेरी हर वो याद मिले क
 
tarun
Dec 29 2009 11:48 AM
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तेरा नाम लेकर

गिरती हुई शाम को कितनी बार संभाला है रात में डूब डूब कर न जाने कितनी बार सुबह को निकाला है अंधेरे से डरते हुए चाँद को कितनी बार फलक पे टिकाकर सुलगाया है थके हुए सूरज को बादलो की चादर उडाकर न जाने कितनी बार सुलाया है जब जब भी कांपी है ये कायनात जब जब
 
tarun
Dec 29 2009 11:48 AM
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फुर्सत नहीं मिलती

कभी ज़िन्दगी जीते जाने से फुर्सत  नहीं मिलती कभी इसके गम भुलाने से फुर्सत नहीं मिलती कभी तुम रूठी रहती हो तो एहसास नहीं होता कभी तुझको मनाने से फुर्सत नहीं मिलती कभी मेरी तरफ आ जाती है जन्नत की सदाएँ भी कभी एक आहट जगाने से फुर्सत नहीं मिलती कभी
 
tarun
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उम्मीद

न जाने कितनी बार गिरा था मैं मगर हर बार कभी पल दो पल मैं और कभी कुछ देर ठहरकर मैं उठ जाता था और चल निकलता था अपने रास्तो पे मगर उस दिन जब तुमने मेरा हाथ छोड़ा था मैं कुछ ऐसे गिरा था कि अब तक नहीं उठ पाया हूँ अब तक गिरा हुआ मैं बस एक हाथ मांगता हूँ एक
 
tarun
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I miss you India

सुबह यहाँ भी होती है  लेकिन सूरज चिड़ियों के संग जहाँ घर घर जाकर सबको जगाता है  वो मेरा भारत है दिन यहाँ भी चलता है  लेकिन जहाँ दिन का हर पल हमारे साथ मिलकर शोर मचाता है  वो मेरा भारत है  शाम यहाँ भी होती है  लेकिन सुकून
 
tarun
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त्रिवेणी

तेरे रिश्ते को कब का दफ़न कर आया हूँ फिर भी तेरा एहसास है कि जाता नहीं रिश्तो कि भी शायद कोई रूह होती होगी                 ***** तेरी हर एक याद को दरियां में बहा आया हूँ तेरी हर आहट को ख़ामोशी मे
 
tarun
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सड़के

हर रोज़ सुबह शाम जिन सडको पे मैं चलता हूँ दौड़ता हूँ और अक्सर अपनी कार में एक्सिलेरटर पे पैर लगाये मैं सब तरफ भागता हूँ उन सडको से कभी कभी पल दो पल में रुक कर पूछ लेता हूँ क्या वो गुजरी है इस तरफ से जानता तो हूँ और यह अच्छी तरह से मालूम भी है कि तुम&
 
tarun
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वरना ये दुनिया अधूरी है

तू मेरी है मैं तेरा हूँ फिर भी सनम क्यूँ ये दूरी है तू पास है मेरे, मेरे साथ है तू फिर भी क्या मजबूरी है तुम कहो जो भी कहना है लेकिन चुप रहना भी ज़रूरी है हम साथ है तो ये जहाँ है हँसी वरना ये दुनिया भी अधूरी है तू मेरी है मैं तेरा हूँ .... -तरुण
 
tarun
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एक बार

अपनी ज़िन्दगी को छोड़कर अपनी हर खुशी को छोड़कर जो बैठे है बस एक तेरा नाम लेकर एक बार उनकी तरफ़ भी आंखे उठाकर मुस्कुराकर देख लो देखना फिर न जाने कितनी आंखे जगमगाती है न जाने कितने चेहरे खिल जाते है और न जाने कितनी जिन्दगियाँ संवर जाती है -तरुण
 
tarun
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वो यहीं कहीं है

गर्मी की धूप से जलती धरती पर जब बारिश की ठंडी बूंदे गिरती है तब अह्सास होता है सर्दी की ठंडी सुबह को जब कोहरे को चीरकर कुछ नरम सूरज की किरने निकलती है तब अह्सास होता है बहार के मौसम में छोटे छोटे पौधों पर जब नन्ही नन्ही कलियाँ खिलती है तब अह्सास होता
 
tarun
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इंतज़ार

आधी ज़िन्दगी तो गुज़र गयी इसी इंतज़ार में कि तुम आओगी तुम्हारी उम्मीद पे कितनी ही राते जल गयी न जाने कितने चाँद तुम्हारे इंतज़ार में बुझ गए वो बरसो से सुबह जो आकर मेरे कानो में कहती थी कि आज तो वो आएगी वो भी बस अब थक गयी है ये सदियों से दिन काटते काट
 
tarun
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मुझसे पूछिये

होता है क्या हिज्र-ए-ग़म मुझसे पूछिये दिल में क्यूँ है ज़ोर-ए-सितम मुझसे पूछिये दरवाज़े पे खड़े हो मगर दस्तक न कीजिए इस घर में वो अब रहते है कम मुझसे पूछिये हाथ क्यूँ बढाता है यूँ अजनबियों की तरफ़ अपनों के लिए कब उठे कदम मुझसे पूछिये खुदा से क्या कहूँ
 
tarun
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दिन शराब के

तुम क्या गए फिर लौट आए दिन शराब के भीगती साँसे डूबती आँखे दिल-ऐ-बेताब के रातो को बरसते है बादल कुछ ऐसे टूटके छलक जाते है शब-ऐ-ग़म अश्क माहताब के मत जाना चमन में कि माहौल ठीक नही बहकी है कलियाँ बदले है मिजाज़ गुलाब के मयक़दे में भी गए मगर तेरा ज़िक्र न
 
tarun
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सालगिरह

आओ इस सालगिरह पे हम वक्त की मुठ्ठी को खोलकर उस हर लम्हे को निकाले जब हम साथ में मुस्कुराये थे उस हर एक लफ्ज़ को फिर से बोले फिर से उस हर एक वादे को दोहराएँ जो मैंने तुमसे और तुमने मुझसे किया था इस सालगिरह पे चलो हम अपनी कसमो की फिर गठडी खोले और अपनी
 
tarun
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मौसम बदल गए

हम इस कदर तेरी जुल्फ के सायें में ढल गए अपना ही पता ढूंढने हम घर से निकल गए तुमसे उठी है बात तो अब तुम ही जवाब दो क्यूँ ऐसे तुम्हे देखकर सब मौसम बदल गए यूँ तो बहुत करीब था तेरे घर का फासला अपने ही दरवाज़े पे लेकिन हम फिसल गए आँखों से न दो जवाब जब होठो
 
tarun
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खुदा तू भी इतना परेशाँ निकला

मेरे दर्द-ए-इश्क का इक निशाँ निकला ओ चाँद तू भी कितना बेईमाँ निकला मैं जिसकी रात भर राह देखता रहा वो तो मेरी मय्यत का कारवाँ निकला कल मैंने जिसको खंजर से कत्ल किया वो मेरा एक पुराना रहनुमाँ निकला मैं जिसकी आवाज़ के लिए तरसता था वो मेरा सनम बरसों का बे
 
tarun
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इक तेरा ग़म

इक तेरा ग़म सह सहकर हम कल रात भर रोते रहे आँखों की तरह शब को भी हम अश्को में डुबोते रहे तेरा जाना हमे मंज़ूर था तेरा जाना हम पी भी गए तेरी यादों का पर जो सुरूर है उसमे बस हम खोते रहे वादा किया भूल गए तुम ख्वाब में भी न हमसे मिले तेरे इक ख्वाब की उम्मी
 
tarun
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तेरे नाम से पी ले

मिलता नही है जाम चलो तेरे नाम से पी ले रात है बहुत दूर तो चलो अब शाम से पी ले साकी नही है कोई आज न मयखाना है मेरा शराब मिले कभी तो कभी ख्याल-ऐ-जाम से पी ले बाज़ार में है तो क्या ज़रूरी कोई खरीदार भी मिले मिलता है कभी दाम तो कभी बेदाम से पी ले उसका है
 
tarun
Feb 25 2009 08:03 AM
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मुश्किल है

हर बार तेरे दर से खाली लौट आना मुश्किल है तुझसे नज़रे मिलाकर फिर झुकाना मुश्किल है तेरी आँखों में न जाने कितने चाँद मैंने देखे है तेरे बिना अब यूँ तनहा राते बिताना मुश्किल है तुम कहो तो हर एक साँस अपनी छोड़ आऊं मैं तेरी यादो को लेकिन अब भूल पाना मुश्क
 
tarun
Feb 25 2009 08:03 AM
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वो लड़की बहुत याद आती है

हर शाम कुछ ऐसे मुस्कुराती है कि वो लड़की बहुत याद आती है चाँद छूपता है जब बादलो में कभी उसकी शरारते आँखों में छलक आती है मेरे दरवाज़े पे दस्तक देता है कोई पर आवाजे अपना रास्ता भूल जाती है तेरे वादों पे जिऊं कब तक ऐसे हर साँस ये कहकर लौट जाती है कुछ ऐस
 
tarun
Feb 25 2009 08:03 AM
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अब मुझको सो जाने दो

अपने पहलू में आज मुझे छुप जाने दो बहुत थक गया हूँ अब मुझे सो जाने दो तुम भी चले आओ मयखाने में आज की रात आज की रात को मयखाने में डूब जाने दो जब तेरे बारे में लिखता हूँ तो कुछ सूझता नही तुम अपने तस्वीर को कागज़ को उतर जाने दो तेरी आँखों से मैंने मोहब्बत
 
tarun
Feb 25 2009 08:03 AM
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कौन किसको माँगा करता है

वो मेरे अश्को पे बस मुस्कुराया करता है मैं वफ़ा करती हूँ वो दिल दुखाया करता है नही जानता वो की दर्द-ऐ-मोहब्बत क्या है जो अँधेरी रातो में वो चिराग जलाया करता है मुझसे पूछो अगर तो मैं नाम उसका बतलाऊँ कौन मेरी मजार पे अब तक फूल बिछाया करता है काश तुम होत
 
tarun
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अपने घर की दीवारों को आईना तेरा बनाया है

एक तेरे भरोसे पर अपनी सांसो को टिकाया है तेरी उम्मीदों की तपिश में हर पल को जलाया है तेरी यादो में आजकल मैं खोया हूँ कुछ ऐसे अपने घर की दीवारों को आईना तेरा बनाया है मैं तुझसे अपना हाल-ऐ-दिल कैसे कह दूँ तुमने मेरी बातो पे कब कोई आंसू बहाया है तुमने त
 
tarun