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अखिलं मधुरम्

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10 Mar 2010
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हे देव तेरा गुणगान मेरे..

दिनचर्या तेरी मेरी सेवा होकुछ ऐसी कमाई हो जाये।हे देव तेरा गुणगान मेरेजीवन की पढ़ाई हो जाये।।यह जग छलनामय क्षण भंगुरखिल कर झड़ जाते फूल यहाँ।अनूकूल स्वजन भी दुर्दिन मेंहो जाते हैं प्रतिकूल यहाँ।मेरे जीवन का सब कर्ता-धर्तासच्चा साँई हो जाये-हे देव तेरा
 
हिमांशु । Himanshu
टैग: भजन
Mar 10 2010 05:30 PM
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मुरली तेरा मुरलीधर 46

सहनशील रजकण प्रशान्त बन प्रभुपथ में बिछ जा मधुकरकिसी भाँति उसके पदतल मे ललक लिपट लटपट निर्झरप्राणकुंज के सुमन में सुन उसकी मनहर बोलीटेर रहा अर्पणानुभावा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२४६॥हो न रही मारुत सिहरन की क्या अनुभूति तुम्हें मधुकरक्या न सुन रहे दूर तरंगित
 
हिमांशु । Himanshu
Mar 07 2010 06:13 PM
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मुरली तेरा मुरलीधर 45

निज प्रियतम के विशद विश्व में और न कुछ करना मधुकरनिरुद्देश्य उसके गीतों को झंकृत कर देना निर्झरपंकिल भर देना निज कोना बहा गीतधारा प्रभुमयटेर रहा अर्चनोद्वेलिता मुरली तेरा मुरलीधर।२४१।जग उत्सव मे प्राणनाथ का मिला निमन्त्रण है मधुकरआशीर्वादित हुये प्राण
 
हिमांशु । Himanshu
Feb 19 2010 07:01 AM
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मुरली तेरा मुरलीधर 44

गाने आया जो अनगाया गीत अभी तक वह मधुकरवीण खोलते कसते ही सब बासर बीत गये निर्झरसही समय आया न सज सके उचित शब्दसंभार कभीटेर रहा समयानुकूलिनी मुरली तेरा मुरलीधर।२३६।मारुत रोता रहा खिले पर गहगह फूल नहीं मधुकरइच्छाओं की पीडा का ही था उरभार गहन निर्झरगृह
 
हिमांशु । Himanshu
Feb 19 2010 07:01 AM
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मुरली तेरा मुरलीधर - 43

भू लुण्ठित हो धूलिस्नात हो जाय न जब तक तन मधुकर।वह निज कर में ले दुलराये तेरा लघुप्रसून निर्झरविलख भले सुरभित न किन्तु वह पदसेवा से करे न च्युतटेर रहा सेवासुखोदग्मा मुरली तेरा मुरलीधर।२३१।आभूषण क्या प्रिय संगम रोधक प्राचीर नहीं मधुकरहो सकती है एकमेव फिर
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर - 42

वह इच्छुक है सुनने को तेरे गीतों का स्वर मधुकरआ आ मुख निहार जाता है नीर नयन में भर निर्झरसरस तरंगित उर कर अपना बाँट रहा आनन्द विभवटेर रहा सुख गीत गुंजिता मुरली तेरा मुरलीधर ॥२२६॥सुन वह कैसे गाता तूँ विस्मय विमुग्ध सुन-सुन मधुकरइस नभ से उस नभ तक करता
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 41

तुम गुरु स्वयं शिष्य मन तेरा प्रथम सुधारो मन मधुकरजग सुधार कामना मत्त मत जग में करो गमन निर्झर ।करता विरत कृष्ण-चिन्तन से जगत राग द्वेषादि ग्रसितटेर रहा है मनसंयमिनी मुरली तेरा मुरलीधर ॥ २२१॥स्वयं कृपालु बनो मन पर दो उसे प्रबोधन स्वर मधुकरप्यारे अब बनना
 
हिमांशु । Himanshu
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सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह ...

सुधि उमड़ती रहे बदलियों की तरह    । तुम झलकते रहो बिजलियों की तरह ॥ प्रभु हृदय में मेरे तुमको होगी घुटन मैने गंदा किया सारा वातावरण  ऐसे हिय में बिरह की सलाई लगा प्राण सुलगें अगरबत्तियों की तरह     ||1|| दृष्टि बस फे
 
हिमांशु । Himanshu
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मुझे पाती लिखना सिखला दो...

मुझे पाती लिखना सिखला दो हे प्रभु नयनों के पानी से । बतला दो कैसे शुरू करुंगा किसकी राम कहानी से ।। घोलूँगा कौन रंग की स्याही, किस टहनी की बने कलम है कौन कला जिससे पिघला, करते हो लीलामय प्रियतम, हे प्रभु तुम प्रकट हुआ करते हो, किस मनभावनि वाणी से- मु
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 40

तिल तिल तरणी गली नहीं दिन केवट के बहुरे मधुकर वरदानों के भ्रम में ढोया शापों का पाहन निर्झर सेमर सुमन बीच अटके शुक ने खोयी ऋतु वासंती टेर रहा मानसप्रबोधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।216।। देह गेह कोई न तुम्हारा नश्वर संयोगी मध
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 39

तरुण तिमिर देहाभिमान का तुमने रचा घना मधुकर सुख दुख की छीना झपटी में चैन हुआ सपना निर्झर धूल जमी युग से मन दर्पण पर हतभागी जाग मलिन टेर रहा तनतुष्टिनिरस्ता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।211।। पलकें खुलीं रहीं दिन दिन भर पर तू जगा
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 38

वह विराम जानता न क्षण क्षण झाँक झाँक जाता मधुकर दुग्ध धवल फूटती अधर से मधुर हास्य राका निर्झर प्रीति हंसिनी उसकी तेरे मानस से चुगती मोती टेर रहा है अविरामछंदिनी  मुरली  तेरा  मुरलीधर।।206।। अंगारों पर भी प्रिय से अभिसार रचाता चल मधुकर
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 37

उसके संग संग मिट जाते सभी उदासी स्वर मधुकर फूल हॅंसी के नभ से भू पर झरते हैं झर झर निर्झर उसके नयन जलद कर देते प्राण दुपहरी को पावस टेर रहा है हृदयाह्लादिनि मुरली   तेरा    मुरलीधर।।201।। कौन तुला जिस पर तौलेगा उसका अपनापन मध
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 36

कोना कोना प्रियतम का जाना पहचाना है मधुकर इठलाता अटपटा विविध विधि आ दुलरा जाता निर्झर शब्द रूप रस स्पर्श गन्ध की मृदुला बाँहों में कस कस टेर रहा है अनन्तआस्वादा मुरली तेरा मुरलीधर।।196।। हिला हिला दूर्वादल अंगुलि बुला रहा तुमको मधुकर पर्वत पर्वत शिखर
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 35

चिर विछोह की अंतहीन तिमिरावृत रजनी में मधुकर, फिरा बहुत बावरे अभीं भी अंतर्मंथन कर निर्झर सुन रुनझुन जागृति का नूपुर खनकाता वह महापुरुष टेर रहा है अनहदनादा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।191।। पी उसकी स्मिति सुधा प्रफुल्लित द
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 34

सुन अनजान प्राणतट का मोहाकुल आवाहन मधुकर रस सागर की तड़प भरी सब चाहें ममतायें निर्झर स्मरण कराता जन्म जन्म के लिये दिये अनगिन चुम्बन टेर रहा है प्रीतिमादिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।186।। मृदु गलबहियाँ दे बन जाता हार तुम्हारा
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 33

बिक जा बिन माँगे मन चाहा मोल चुका देता मधुकर जगत छोड़ देता वह आ जीवन नैया खेता निर्झर कठिन कुसमय शमित कर तेरा आ खटकाता दरवाजा टेर रहा है प्रीतिपीठिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।176।। रहे न तुम वह था न रहोगे तब भी वह होगा मधुकर ट
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 32

अपने ही लय में तेरा लय मिला मिला गाता मधुकर अक्षत जागृति कवच पिन्हा कर गुरु अभियान चयन निर्झर तुमको निज अनन्त वैभव की सर्वस्वामिनी बना बना टेर रहा है भूतिभूषणा मुरली  तेरा   मुरलीधर।।171।। दृग खुलते झलकता पलक झंपते ही आ जाता मधुकर बुला
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 31

बार बार पथ घेर घेर वह टेर टेर तुमको मधुकर तेरे रंग महल का कोना कोना कर रसमय निर्झर सारा संयम शील हटाकर सटा वक्ष से वक्षस्थल टेर रहा है हृदयवल्लभा मुरली  तेरा  मुरलीधर।।166।। हृदय सिंधु के द्युतिमय मोती पलकों में भर भर मधुकर सच्चा सरसिज मृदु
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 30

ज्यों तारक जल जल करते हैं धरती को शीतल मधुकर नीर स्वयं जल जल रखता है यथा सुरक्षित पय निर्झर वैसे ही मिट मिट प्रियतम को सत्व समर्पण कर पंकिल टेर रहा है सत्वसंधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।161।। प्राणों की मादक प्याली में प्रेम
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 29

मन सागर पर मनमोहन की उतरे मधु राका मधुकर प्राण अमा का सिहर उठे तम छू श्रीकृष्ण किरण निर्झर प्रियतम छवि की अमल विभा से हो तेरा तन मन बेसुध टेर रहा है भुवनसुन्दरी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।156।। प्राणेश्वर अभ्यंग सलिल की स
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 28

उसका ही विस्तार विषद ढो रहा अनन्त गगन मधुकर मन्दाकिनी सलिल में प्रवहित उसकी ही शुचिता निर्झर उस प्रिय का अरविन्द चरण रस सकल ताप अभिशाप शमन टेर रहा पीयूशवर्षिणी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।151।। मिलन स्वप्न कर पूर्ण जाग मनम
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 27

खड़े दर्शनार्थी अपार दरबार सजा उसका मधुकर उपहारों की राशि चरण पर उसके रही बिछल निर्झर मुखरित गृह मुँह जोह रहे सब किन्तु न जाने क्यों आकुल टेर रहा है प्रियाविरहिता मुरली   तेरा    मुरलीधर।।146।। प्रथम रश्मि की स्मिति में मधुरिम
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 26

देख शरद वासंती कितने हुए व्यतीत दिवस मधुकर काल श्रृंखलाबद्ध अस्त हो जाता भास्वर रवि निर्झर भग्न पतित कमलों की परिमल सुरभि उड़ा ले गया पवन टेर रहा है कालविजयिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।141।। मूढ़ जुटाता रहा मनोरथ के निर्गंध सुम
 
हिमांशु । Himanshu
Oct 14 2009 08:44 PM
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मुरली तेरा मुरलीधर 25

भेंट सच्चिदानन्द ईश को मुक्त प्रभंजन में मधुकर सत निर्मल आकाश पवन चित नित तेजानन्द सतत निर्झर विविध वर्णमयि विश्व वस्तुयें प्रियतम का रंगालेखन टेर रहा है चित्रमालिनी  मुरली  तेरा    मुरलीधर।।136।। सच्चा संस्तुत अपरिग्रह ही श्
 
हिमांशु । Himanshu
Oct 14 2009 08:44 PM
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मुरली तेरा मुरलीधर 24

भूत मात्र में व्याप्त ईश का सूत्र न छोड़ कभीं मधुकर कर्म त्याग संभव न त्याग भी तो है एक कर्म निर्झर रज्जु सर्प ताड़न या उससे सभय पलायन व्यर्थ युगल टेर रहा है तत्वदर्शिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।131।। आत्मा शिव शव देंह तुम्हारा
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 23

मुख मन अन्तर श्वाँस श्वाँस सब सच्चामय कर दे मधुकर सच्चा प्रेम सार जग में कुछ और न सार कहीं निर्झर जागृति स्वप्न शयन में तेरे बजे अखण्ड वेणु उसकी टेर रहा अनवरतगुंजिता  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।126।। जो कर रहा प्राणधन तेरा
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 22

दुख का मुकुट पहन कर तेरे सम्मुख सुख आता मधुकर सुख का स्वागत करता तो दुख का भी स्वागत कर निर्झर सुख न रहा तो दुख भी तेरे साथ नहीं रहने वाला टेर रहा क्रीड़ाविशारदा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।121।। प्रेम भिखारी न उससे कुछ भी
 
हिमांशु । Himanshu
Oct 03 2009 07:40 AM
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मुरली तेरा मुरलीधर 21

स्वाद सुधा में है पदार्थ में स्वाद न पायेगा मधुकर सुख तो सब उसे सच्चे प्रिय में कहाँ खोजता रस निर्झर मन गृह में जम गयी धूल को पोंछ डाल आनन्द पथी टेर रहा संसारनाशिनी  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।116।। यदि संस्कार वासनाओं से
 
हिमांशु । Himanshu
Sep 28 2009 09:58 AM
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मुरली तेरा मुरलीधर 20

इन्द्रिय घट में भक्ति रसायन भर भर चखता रह मधुकर तन्मय चिन्तन सच्चा रस में देता तुम्हें बोर निर्झर कर त्रिकाल उस महाकाल के चरणामृत का आस्वादन टेर रहा नैवेद्यतुलसिका मुरली   तेरा    मुरलीधर।।111।। मन तो नित गिरता रहता है सलिल सदृश
 
हिमांशु । Himanshu
Sep 26 2009 12:00 PM
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मुरली तेरा मुरलीधर 19

अहं रहित मह मह महकेंगे तेरे प्राण सुमन मधुकर स्निग्ध चाँदनी नहला देगी चूमेगा मारुत निर्झर तुम्हें अंक में ले हृदयेश्वर हलरायेगा मधुर मधुर टेर रहा है मूलाधारा  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।106।। उर वल्लभ के पद शतदल में मरना मिट
 
हिमांशु । Himanshu
Sep 22 2009 11:21 AM
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मुरली तेरा मुरलीधर 18

अपनी ही विरचित कारा में बंधा तड़पता तू मधुकर अपनी ही वासना लहर से पंकिल किया प्राण निर्झर उस प्रिय की कर पीड़ा हरणी चरण कमल की सुखद शरण टेर रहा है प्रीतिपंकिला  मुरली   तेरा    मुरलीधर।।101।।गीत वही तेरे अधरों पर स्वर उसका ही
 
हिमांशु । Himanshu
Sep 20 2009 06:21 PM
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मुरली तेरा मुरलीधर 11

अगणित जन्मों की ले दारुण कर्मश्रृंखलायें मधुकर जब जो भी दीखता उसी से व्याकुल पूछ रहा निर्झर उसका कौन पता बतलाये नाम रुप गति अकथ कथा टेर रहा करुणासाध्या मुरली तेरा मुरलीधर।।66।। क्या कण कण वासी अनन्त का अन्वेषण संभव मधुकर स्वयं भावना समझ करुण वह पास उ
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 8

संश्लेशित जीवन मधुवन को खंड खंड मत कर मधुकर मधुप दृष्टि ही सृष्टि तुम्हारी वह मरुभूमि वही निर्झर तुम्हें निहार रहा स्नेहिल दृग सर्व सर्वगत नट नागर टेर रहा आनन्दतरंगा मुरली तेरा मुरलीधर।।51।। साध न कुछ बस साध यही साधना साध्य सच्चा मधुकर यह सच्ची चेतना
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 7

जाग न जाने कब वह आकर खटका देगा पट मधुकर सतत सजगता से ही निर्जल होता अहमिति का निर्झर मूढ़ विस्मरण में निद्रा में मिलन यामिनी दे न बिता टेर रहा विस्मरणविनाशा मुरली तेरा मुरलीधर।।46।। क्या स्वाधीन कभीं रह सकता क्षुद्र भोग भोगी मधुकर क्षणभंगुर वासना बीच
 
हिमांशु । Himanshu
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मुरली तेरा मुरलीधर 6

सोच अरे बावरे कर्म से ही तो बना जगत मधुकर चल उसके संग रच एकाकी एक प्रीति पंकिल निर्झर प्राण कदंब छाँव में कोमल भाव सुमन की सेज बिछा टेर रहा सुखसृष्टिविधाना मुरली तेरा मुरलीधर।।41।। रख निश्शब्द स्नेह से उसके आनन पर आनन मधुकर भर ले रिक्त हृदय की गागर उ
 
हिमांशु । Himanshu
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सुलतान

नृप बनने के बाद जनों ने पूछा यही हसन से बात      । पास न सेना विभव बहुत, कैसे सुलतान हुए तुम तात    । बोला अरि पर भी उदारता सच्चा स्नेह सुहृद हित प्राप्त   । जन-जन प्रति सदभाव न क्या सुलतान हेतु इतना
 
हिमांशु । Himanshu