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हिमाल : अपना-पहाड़

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08 Mar 2010
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आज महिला दिवस है

मां कोजिसने मेरे लिएसहे न जाने कितने दर्द बहन कोजिसने बिना किसी शर्तमेरी सारी बात मानीऔर उन सबको जो बिन चाहे मिलेएक सपना भर गए मेरी अधजगी आंखो मेंदिल में धड़कनें जगाईऔर मेरी थमी थमी राहों को दे गए रफ्तारवो जो बहुत करीब आए बिन चाहेऔर बादल की तरह बरस कर
 
जितेंद्र भट्ट
Mar 07 2010 11:14 PM
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आएगी सुबह

जैसे आज सुबहघने अंधेरे से फूटी थी किरणेंजैसे नन्ही कली... ओस से दबीखिली थी धूप मेंजैसे रात की ठंड में सिकूड़ी नाजुक तितलीचहक रही थी... सुबह-सुबहजैसे अमावस के बादचांद फिर उभरा थावैसे ही उदासी का ये पल भी बीतेगादुख जाएगाखुशियां लौटेंगी ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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महिलाओं ने जीती जंग

नशा नहीं रोजगार दो ' ये नारा उत्तराखंड के लिए नया नहीं है। इस नारे को लेकर उत्तराखंड की महिलाओं ने एक लंबी लड़ाई लड़ी है। ये लड़ाई आज भी जारी है। वक्त बेवक्त जब जनता की चुनी हुई सरकार आधी दुनिया की भावनाओं का तिरष्कार करती है , तो ' नशा नहीं रोजगार द
 
जितेंद्र भट्ट
Dec 29 2009 11:44 AM
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जहां लिखना सीखा

मैं जैसा भी हूं, ऐसा क्यों हूं ? जब मैंने ये सवाल ख़ुद से पूछा, तो मैं मेरे अतीत में चला गया। अतीत के पन्नों पर पड़ी धूल को हाथों से साफ किया.... तो फिर कई पन्ने साफ-साफ चमकने लगे। इनमें से कुछ पन्ने बड़े चमकदार हैं। अतीत के एक पन्ने पर चमकीले अक्षरो
 
जितेंद्र भट्ट
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व्यवस्था के नाम पर

अगर, मैं लीक पर चलूं तो वो खुश होंगे मेरी पीठ थप थपाएंगे क्योंकि ? ये उनकी व्यवस्था है सड़ी गली ही सही ।। अगर, मैं लीक से उठा लूं कदम तो वो भला बुरा कहेंगे धक्का देकर गिरा देंगे क्योंकि ? वो हमेशा ऐसा ही करते रहे हैं ।।
 
जितेंद्र भट्ट
Dec 29 2009 11:44 AM
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प्यार क्या है ?

एक' ----- 'प्यार' देह का आकर्षण है खूबसूरत चेहरा देखती हैं आंखें और दिल धड़कता है दिमाग सोचता है कई तरकीबें नजदीक जाने की कई चालें होती हैं इसमें और फिर... ।। ----- 'दो' ----- 'प्यार' सच है सबकुछ है बहुत खूबसूरत होता है अगर वो खूबसूरत नहीं तो भी सबसे
 
जितेंद्र भट्ट
Dec 29 2009 11:44 AM
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ये जो लिख रहा हूं मैं

क्या? ये गहरा प्रेम मेरा सार्थक हो पाएगा या यूं ही सदा शब्दों के फूल खिलाने होंगे।। क्या? तुम समझोगे इनके अर्थ ये जो लिख रहा हूं मैं इसका कुछ तो मतलब होगा या यूं ही अनजाने से पड़े रहेंगे / कागज पर चुपचाप।। मेरे मन के भावों की सीमा को नाप सकोगे क्या?
 
जितेंद्र भट्ट
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कलावती को देखा है ?

तो कलावती भी चुनाव लड़ेगी। आप कहेंगे, कौन .... कलावती भाई? तो जवाब है... वो कलावती, जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं है। लेकिन आप इस कलावती को घर से बाहर आते-जाते कहीं भी पहचान सकते हैं। ये कलावती देश के उन करोड़ों भूखे लोगों में से ही एक है, जो एक वक्त भरपेट
 
जितेंद्र भट्ट
Sep 19 2009 09:00 PM
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बादल पूछते हैं / मन का हाल

वहां बादल पूछते हैं / मन का हालहवा सहलाती है गालबारिश की हल्की-हल्की बूंदेंगीला कर देती हैं मनकोहरा ढक लेता हैमन के सारे ग़मपहाड़ों से ढलकती हुईगाय, भैंस और बकरियांबजाती हैं टुन-टुन, टन-टनबच्चे दौड़ते हुएचिल्लाते हैं हंसी की धुनवहां.... दूर.... पहाड़ की
 
जितेंद्र भट्ट
Aug 20 2009 06:09 PM
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सब याद है

ज़िंदगी के उन पुराने पन्नों मेंतुम भी होतुम्हारी यादें भीसारे पल सिमटे हैंकविता की शक्ल मेंचंद शेरों मेंतुम्हारे होने का अहसास है।।कुछ हंसते पल हैंकुछ बिखरते आंसू खूशबू है तुम्हारे होने का अहसास दिलाती हैज़िंदगी के उन पुराने पन्नों में ।। तुम हंसी बनकर
 
जितेंद्र भट्ट
Jul 31 2009 08:40 PM
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चाहतें

वे कहते हैं कितनी छोटी-छोटी हैं उनकी चाहतें मानो वे कुछ नहीं चाहते वे पेड़ों को काटना नहीं चाहते उनका हरापन चूस लेना चाहते हैं वे पहाड़ों को रौंदना नहीं चाहते उनकी दृढ़ता निचोड़ लेना चाहते हैं वे नदियों को पाटना नहीं चाहते उनके प्रवाह को सोख लेना चाह
 
जितेंद्र भट्ट
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अनुभव

अनुभव से पूर्ण उसने कहा- बेटा अब तुम बड़े हो गए हो अब तुम सच बोलना छोड़ दो । तुम्हें आगे बढ़ना है और वो रास्ता जो पीछे की ओर खुलता है उस पर चलो सीधे चलते जाना रास्ते पर कोई खड़ा हो अगर तुमसे पहले उसके पीछे मत लगना गिरा देना उसको चाहे जैसे भी । बेटा,
 
जितेंद्र भट्ट
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कभी यूं करना !

एक' झूठी चादर से ढककर क्यों ? पाप छिपाते हो क्यों ? सच को अंदर कर झूठ दिखाते हो क्यों ? गम के चेहरे पर हंसी लगाई है क्यों ? हंसते हो दिल में तन्हाई है ।। 'दो' बदला, उन सभी से लूंगा एक दिन जिनके कारण मिली रात मिली तनहाई ।। उनको दूंगा प्यार और चमकीली स
 
जितेंद्र भट्ट
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सबसे बड़ी बहस !

सब हंस रहे थे। हंसी बेहया सी अपने आप मुंह पर तैर रही थी। पुरुषों की नज़र बेहयायी से उसे घूर रही थी। लेकिन महिलाएं भी भूल गयी थी, कि उन्हें ऐसा नहीं करना है। वो भी उसे इसी अंदाज़ में देख रही थी। वो भूल गयीं थी कि सड़क पर आते-जाते उन्हें भी ऐसी ही नज़र
 
जितेंद्र भट्ट
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हिमाल : अपना-पहाड़

सब हंस रहे थे। हंसी बेहया सी अपने आप मुंह पर तैर रही थी। पुरुषों की नज़र बेहयायी से उसे घूर रही थी। लेकिन महिलाएं भी भूल गयी थी, कि उन्हें ऐसा नहीं करना है। वो भी उसे इसी अंदाज़ में देख रही थी। वो भूल गयीं थी कि सड़क पर आते-जाते उन्हें भी ऐसी ही नज़र
 
जितेंद्र भट्ट
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सबसे बड़ी बहस !

सब हंस रहे थे। हंसी बेहया सी अपने आप मुंह पर तैर रही थी। पुरुषों की नज़र बेहयायी से उसे घूर रही थी। लेकिन महिलाएं भी भूल गयी थी , कि उन्हें ऐसा नहीं करना है। वो भी उसे इसी अंदाज़ में देख रही थी। वो भूल गयीं थी कि सड़क पर आते - जाते उन्हें भी ऐसी ही न
 
जितेंद्र भट्ट
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शब्द ऐसे हों

शब्दों, आडंबर छोड़ो अपने सच्चे-सरल-सीधे रुप में उतरो सरल अर्थ सादगी से भरे हों सीधे ह्रदय को छू लो।। शब्दों, घृणा त्यागो प्रेम रस बहाओ मधुरता भरकर कड़वाहट हर लो।।
 
जितेंद्र भट्ट
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ये भी सबको कहां मिलता है ?

चलो जीतने दो उसको आज नहीं दौड़ना मुझको उसे खुश होने दो आज मुझे हार जाने दो ।। चलो रंग भर दो उसके फलक पर मेरे हिस्से के भी सारे मुझे थोड़ा सा काला और सफेद दे दो ।। सुर उसके कानों में भर दो सारेगामापा सारे मुझे सुनने दो वक्त की कड़वी तान ।। उसकी सुबह क
 
जितेंद्र भट्ट
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क्या था ? कोई और रास्ता उनके पास

लालगढ़' हां ! वहीं लालगढ़ , जहां माओवादी रहते हैं ! सुना है !!! बहुत ख़तरनाक हैं ... वों हां ! अख़बार तो सारे यही कहते हैं ? और टीवी पर भी सारे दिन यही तो चलता है ? सुना है !!! उनके पास बहुत हथियार हैं ? और वो जान के दुश्मन बन गए हैं लोग तो ये भी कहत
 
जितेंद्र भट्ट
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इंतज़ार

वक्त है... चलने दो उसकी आज नहीं तो कल ही सही कर लूंगा इंतज़ार सदियों तक देखूंगा राह बस एक बार कह दो आओगी तुम... एक दिन सौ साल बाद मेरे लिए ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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चलो, सबसे प्यार करें

हम कितना कुछ रोज देखते हैं। लेकिन सबकुछ नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। छोटी-छोटी बातें बड़े अर्थ रखती हैं। लेकिन क्या हम समझ पाते हैं ? शायद नहीं। हम अपनी ही दुनिया में मस्त हैं। हमें अपने दुखों और मुश्किलों से फुरसत नहीं। हमें अपनी खुशियों की परवाह है...
 
जितेंद्र भट्ट
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अब सावन नहीं आता है, वहां

अब सावन नहीं आता है, वहां वो सालों पहले आया था, अंतिम बार तब वहां घने झुरमुट थे राह नहीं सूझती थी पक्षी चहचहाते थे वनराज गरजते थे वहां ।। ठंडी छांव में, नदी के किनारे हम भी बैठे थे कभी घंटो बाते की थी कई बार दुखी होकर इसी जगह पर मैं लेट गया था कई बार
 
जितेंद्र भट्ट
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पहाड़

पहाड़ों से ढलकती हुई ठंडी हवा मैदान में आ जाती है । खूब सारा ठंडा पानी भी ढलानों से नीचे की ओर सरक जाता है । सफेद-सफेद छक बर्फ भी अधिक दिनों तक नहीं रुकती पानी की शक्ल में तीखे गहरे नालों में बहती है । मीठे-मीठे सेब और दूसरे खूबसूरत फल ट्रकों पर लदकर
 
जितेंद्र भट्ट
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'मां'

मां के लिए... जिसने बचपन से आज तक हर दम जीने का अहसास दिया है। ) तुम शक्ति हो / शक्तिशाली तुममें उर्वरता है / अंकुरण क्षमता भी तुममें है / सह सकने की क्षमता तुममें लोचकता है आकर्षण भी / उच्च कोटि का बसता है तुममें ममता का रस / हरदम रिसता है तुम पा ले
 
जितेंद्र भट्ट
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क्या चुनोगे तुम ?

तुम गलत हो तुम सही नहीं क्या बात करते हो ? तुम्हें तमीज़ ही नहीं ! मेरी बात सुनो ध्यान से ऐसा करो, वैसा नहीं कान खोल कर सुन लो... तुम मैं जो कह रहा हूं। तुमसे कौन सा काम सही होगा ? इतने ढेर सारे शब्द हैं इससे भी अधिक हो सकते हैं लेकिन देते तो बस... द
 
जितेंद्र भट्ट
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'सफलता' / कैसे नापूंगा इसे ?

सफलता' कैसे नापूंगा इसे ? क्या गांव से शहर तक आना/ थी मेरी सफलता ? या शहर से गांव लौटना होगी ? क्या कार होगी, मेरे पास सफलता की निशानी ? या दक्षिण दिल्ली में एक घर होना ज़रुरी है ? या फिर थोड़ी खुशी और हंसी के दो पल काफी हैं ? क्या किसी के लिए कुछ कर
 
जितेंद्र भट्ट
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कितना मुश्किल है...

कितना मुश्किल होता है, ख़ुद को समझ पाना भी । पल में तोला, पल में माशा होता है आदमी ।। प्यार को प्यार, मिल ही जाए ये नहीं होता । देखो प्यार करके भी, वो तनहा रहता है ।। कौन कहता है ? कुछ नहीं मिला... दर्दे यार से । ये जो ज़िंदगी है, उसका इंतज़ार है ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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बहुत दिन हुए / तुमसे बात नहीं की

रात बड़ी ठंडी सी थी कोहरा छाया था / चारों ओर अपना हाथ ही पराया सा लगता था ज़रा सी आवाज़ शोर भरती थी सांस सांय सांय करती थी ।। सुनसान सा हो गया था / सबकुछ तुम्हारे जाने के बाद बहुत देर तक सोचता रहा मैं तुम्हारे बारे में घंटे / सर-सर निकल गए ।। पर तुम्
 
जितेंद्र भट्ट
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काफल, हिसालु और किलमोड़ी के बहाने

दो घंटा पहले काफल की एक लो ककथा लिखी थी। और फिर मैं सो गया। अचानक नींद में कुछ सूझने लगा। इस बार काफल के साथ हिसालु और किलमोड़ी आए थे। तीनों मेरी उंगली पकड़कर मुझे बच पन में खीं च ले गए। नींद खुल गयी है , अब क्या करुं ? सोचा क्यों ना उन पन्नों को पलट
 
जितेंद्र भट्ट
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'काफल पाको, मैल नि चाखो'

उत्तराखंड के कुमांऊ क्षेत्र में कई लोककथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक हैं, काफल और एक औरत की कहानी। लोग आज भी कुमांऊनी भाषा में अपने बच्चों को सीथ देते हुए कहते हैं, बच्चों.... कुछ भी करने से पहले कई बार सोचो। और फिर ये लोकोक्ति बोल दी जाती है, '
 
जितेंद्र भट्ट
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हिमाल : अपना-पहाड़

मैंने सबकुछ देखा है। मेरी बूढ़ी आंखों में... आज भी पुराने दृय साफ-साफ उभर आते हैं। फिरंगियों से जूझते आज़ादी के परवानों को देखा है... मैंने। शुरू में ये चिंगारी हल्की ही रही, पर जैसे-जैसे वक्त गुजरा.... चिंगारी ने ज्वाला का रुप ले लिया। लेकिन कुमांऊ
 
जितेंद्र भट्ट
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पहले था ढेर सारा अकेलापन (.)

पहले था ढेर सारा अकेलापन (.) जैसे एक बंद कमरा हो और मैं उसमें क़ैद हूं और मेरे होठों पर किसी ने रख दी है चुप की उंगली ।। ऐसा नहीं था कि मैं बोल नहीं सकता था पर वहां था ही नहीं कोई मेरे इर्द-गिर्द कोई अपना सा बार-बार कुछ शब्द गले से उतरकर होठों के दरव
 
जितेंद्र भट्ट
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सुनो, मैं नैनीताल बोल रहा हूं-2

इक शहर की आत्म-कथा (इसके पहले हिस्से में हमने नैनीताल शहर के जन्म और फिर यहां अंग्रेज़ों के आगमन की कहानी सुनी। हमने सुना कि कैसे एक शहर कई बार प्रकृति के झंझावातों से जूझा। टूटा, बिखरा और फिर से खड़ा हुआ और बस गया। फिर आगे ये भी सुना कि कैसे अंग्रेज
 
जितेंद्र भट्ट
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देखो कितने दूर चले आए हम

मैं चुप था तुमने नाराज़ समझा मैंने सोचा था तुम बुलाओगे मुझको ना तुमने पुकारा ना मैं पलटा देखो कितने दूर चले आए हम फासले बढ़ते ही जा रहे हैं अब मीलों से लगते हैं ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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एक दिन तो होगी/सुबह मेरी

बार-बार हार कर भी नहीं हारा इक बार अभी बाकी है आस जीत की । एक दिन तो होगी सुबह मेरी.... रोक लूंगा ढलते सूरज को/ दोपहर में यही एक बात मेरी हार नहीं होने देती है हर बार हार कर भी मेरी जीत होती है ।।
 
जितेंद्र भट्ट
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'अभिलाषाओं' तुम धीरे चलना

अभिलाषाओं' तुम थम जाओ अपने पंखों को सीमा दो इक जीवन पथ पर दौड़ाओ तुमको देखा है खुले गगन में ऊंचा-ऊंचा उड़ते हो कभी-कभी तो टूट बिखर तेज़ी से तुम गिरते हो ।। 'अभिलाषाओं' तुम रुक जाओ अपनी सांसों पर हाथ रहे इतना चल कि / वापस घर की याद रहे अक्सर होता है द
 
जितेंद्र भट्ट
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पहाड़

पहाड़ / जब भी धूसर से नज़र आते हैं सोचता हूं / किसने किया ये सब ? किसने काटे पेड़ ? किसने हिलाए पहाड़ ? किसने मोड़ दिए नदियों के रास्ते ? एक दिन में नहीं हुआ / ये सब सबने थोड़ा-थोड़ा कुरेदा है इनको फिर दरक गए पहाड़ जहां कभी हरियाली थी आज धूसर उदासी ह
 
जितेंद्र भट्ट
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वो 17 साल की लडकी

वो ज़मीन पर पड़ी / चीख रही थी सरेआम उसपर बरस रहे थे / कोड़े वो कौन थे ? वो पूछ नहीं सकती (?) उन्हें ये अधिकार किसने दिया ? ये सवाल वहां लाज़िमी नहीं !!! इसलिए कोई पूछता भी नहीं सब हुक्म बजाते हैं / बिना सोचे ।। ऐसा नहीं है / कि कोई नहीं था भीड़ बेहिस
 
जितेंद्र भट्ट
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एक गाली देने में क्या जाता है ?

वोट पाने के लिए आसान रास्ता लगा उन्हें (?) हिंदू को अपने पाले में कर लो मुसलमान को एक गाली देकर कितना आसान काम है एक गाली देने में क्या जाता है ? कितना वक्त लगता है ? पर एक गाली की टीस कई दिनों तक सहता है आम आदमी वो आम..... जिसे रोज खाना रोज कमाना हो
 
जितेंद्र भट्ट
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धर्म सत्ता या 1000 साल पीछे की ओर...

राजनीति में पहले तलवारें चलती थी। ख़ून से राजतिलक हुआ करता था। फिर वक्त बदला... लेकिन राजनीति में दगाबाज़ी ज़रा भी कम नहीं हुई है। मौकापरस्ती, कुर्सी हथियाने के हथकंडे वैसे ही पहले की तरह कायम हैं। हथियार बदल गए हैं, पर लड़ाई का मैदान अभी भी वही है..
 
जितेंद्र भट्ट