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31 Dec 2009
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...लेकिन शर्म उनको आती नहीं.

मुझे शिकायत है उनलोगों से जो बसों में आम तौर पर वरिष्ठ नागरिक की सीट पर कब्ज़ा जमा कर बैठ जाते हैं और बुजुर्ग खड़े होकर यात्रा करने पर मजबूर होते हैं। अगर कभी अपने वरिष्ठ होने की बात कहकर वे उन्हें उठाने की कोशिश करते हैं तो ये लोग बेशर्मों की तरह हंस
 
प्रियम्बरा
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आज और कल

देखते ही देखते सरक गया एक और पल और आज बन गया कल। नव वर्ष की सभी को बहुत बहुत बधाई।
 
प्रियम्बरा
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मुंबई मेरी जान

चमचमाती रोशनी से नहाई मुंबई की रात और नगर की पहचान भव्य ताज कई ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह लेकिन, बुधवार की काली रात देखते ही देखते छा गया तबाही का मंज़र मुठी भर दहशतगर्दों के हाथों में थी सैकडों लोगों की जान ग्रेनेड के धमाकों और गोलियों की आवाजों ने त ो
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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डायरी के पन्नो से

चंदा बादलों के पीछे से छिपकर आता है चंदा, किसी सुन्दरी के माथे पर लगी गोल बिंदिया सा चमचमाता है चंदा। कभी यहाँ और कभी वहां जगह बदलता जाता है चंदा। कभी कभी इस विशाल आसमान में घर भी भटक जाता है चन्दा । कभी मंदिरों के पीछे, तो कभी दरख्तों के ऊपर कभी बाद
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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खामोशी और अँधेरा, फ़िर भी एक नया सवेरा

ईश्वर ने हम सबको सामान्य बनाया तब भी हम हमेशा किसी न किसी परेशानी को लेकर दुखी रहते हैं। हमें ऐसा लगता है की हमारी परेशानी से बढ़कर कोई परेशानी नही है। ईश्वर ने सारे दुःख हमारी झोली में डाल दिए हैं। पर उन लोगों का क्या जिसे प्रकृति ने असामान्यता दे दी
 
प्रियम्बरा
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वेल बिहाव्ड वूमेन ररली मेक हिस्ट्री

लक्ष्मीनगर से पार्लियामेन्ट तक आना और वो भी ऑफिस टाइम यानी सुबह ९ बजे से एग्यारह बजे के बिच, कोई आसान काम नही है । ट्रैफिक की बाढ़ होती है... ऐसा लगता है की जाने कहाँ बहा ले जायेगी। उस समय कोई भी निकलना नही चाहता, यहाँ तक की ऑटो वाले भी ऑफिस का नाम ल
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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एड्स: जारी है संघर्ष

पिछले दिनों अपने कार्यक्रम के सिलसिले में मैंने एड्स रोगियों से मुलाक़ात की कोशिश की । ये काम इतना आसान भी नहीं था। काफ़ी नेट सर्फिंग के बाद कुछ एनजीओ का पता मिला जो इनलोगों के लिए काम करते हैं। पता लेकर आनन फानन में मैं उनसे मुलाक़ात तय कर मिलने के लि
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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मेरी बातें

बहुत दिनों से कुछ नहीं लिख सकी ऐसा नहीं था की लिखने की चाहत नहीं थी , वास्तव में कुछ समय की कमी और थोड़े से आलस ने मुझे ब्लॉग लेखन से दूर कर दिया था। हर दिन सोचती थी की आज ये लिखूंगी आज वो लिखूंगी, लेकिन जब ऑफिस पहुँचती तो काम के सिवा कुछ याद नहीं हो
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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(२)

एक तरफ़ पुर्णवासी का चाँद तुम चांदनी
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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(१)

पलकों से गिरे आँसू, बन गए मोती बेशकीमती रत्न ।
 
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नम हुई आंखें

अभी कुछ दिन पहले ही एक अखबार के छोटे से कॉलम में पढ़ी की बिहार के किशनगंज की रहने वाली एक महिला को उसके पति ने ही दिल्ली में बेच दिया । वो तो उस महिला की बहादुरी थी और एक संस्था की दिलेरी जिससे वो महिला अपनी अस्मत बचाने में कामयाब रही। हालाँकि अन्य अख
 
प्रियम्बरा
Dec 29 2009 11:50 AM
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कामयाबी की कहानी

अब तक किस्से कहानियो में ही सुना करती थी की कैसे एक गाँव की अनपढ़ महिला संघर्ष कर लोगों के लिए एक मिसाल बन गई। लेकिन पहली बार अपनी आँखों से देख सकी उस महिला को जिसने आज से करीब अस्सी साल पहले भोजपुर जैसे इलाके में व्यापार में योगदान देकर एक नई शुरुआत
 
प्रियम्बरा
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कम उम्र में शादी और मातृत्व

स्त्री और पुरूष इश्वर की अनुपम रचना हैं। संसार को चलाने के लिए दोनों की ही बराबर की हिस्सेदारी ज़रूरी है। सिंधु सभ्यता की बात हो या फ़िर वेदिक सभ्यता की, स्त्रियों की पूजा इस देश की सभ्यता और संस्कृति में सदियों से निहित है। लेकिन धीरे धीरे जब बाहर से
 
प्रियम्बरा
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हमारे घर भी गिल्लू...

दिल्ली का घर... बिल्कुल छोटा सा... तीन कमरे का फ्लैट । कहते हैं की दिल्ली के फ्लेट्स में अगर सूरज की रोशनी पहुँच जाए तो ये बड़े सौभाग्य की बात है। कुछ ऐसा ही सौभाग्य हमें प्राप्त है। जी हाँ वैसे तो हम तीन कमरे और एक बड़े से हॉल वाले फ्लैट में रहते है
 
प्रियम्बरा
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शिक्षक दिवस पर मिली अच्छी सीख

सुबह १० बजे ऑफिस के लिए निकली... देर हो चुकी थी....सामने भीड़ से भरी हुई लो फ्लोर बस दिखी । दिल्ली में तीन साल बिताने के बाद अब मुझे आदत हो चुकी है भीड़ वाली बसों में चढ़ने की .... आगे खड़े होने के बाद भी किसी भी अजनबी या यूँ कहें सहयात्रियों से कह कर पैसे
 
प्रियम्बरा
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ये क्या जगह है दोस्तों.....?

दिनांक : १६.०७.०९ स्थान : जी बी रोड समय : शाम के तीन बजे मैं अपनी टीम के साथ पहुँची । पहले से एक एन जी ओ से बातें हो चुकी थी जिसनें उन्हें लाइन अप किया था । हालाँकि उन्होनें हमसे कैमरा छिपा लेने के लिए कहा। हमने उनकी बात मान ली। गाड़ी हमने वही पुलिस
 
प्रियम्बरा
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यादें भूल जाती हैं, बातें याद आती हैं...

बहुत दिनों से कुछ लिख नही पाई । कारण बहुत से है ... पर सबसे आसान जवाब है समय की कमी। व्यस्तता थोडी बढ़ गई थी । ऑफिस में काम से फुर्सत नही मिलता था ... घर पर थकावट कुछ लिखने नही देती थी। आज सारे काम निपट चुके हैं , कार्यक्रम का आउट चल रहा है। सोचा लगे
 
प्रियम्बरा
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ग़रीबी का मज़ाक

स्लम डॉग मिलिनेअर' फ़िल्म में काम कर के प्रसिद्धि पा चुकी रुबीना अचानक से कल फ़िर टीवी चैनेल्स पर छाई हुई थी ... कारण बताने की ज़रूरत नही... जिसने भी चैनेल्स को देखा होगा या आज सुबह का अखबार पढ़ा होगा उसे पता होगा। उस नन्ही सी कलाकार के माता पिता पर अप
 
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... एक युग का अंत

प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी अब हमारे बीच नही रहे... दुखद समाचार । 12 दिसम्बर २००८ को मैं अपनी पुरी टीम के साथ उनके घर पर थी ... एक नए कार्यक्रम की शुरुआत के लिए उनका प्रोफाइल शूट करना था। प्रभाकर जी बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनसे जब बातें शुरू
 
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बीत गयी होली

होली बीत गयी। घर गई थी वापस आ गई, वो भी बड़े ही बेमन से। छुट्टी से वापस आने के बाद अक्सर ये महसूस होता है कि ये छुट्टियाँ इतनी छोटी क्यों होती हैं। जो नहीं होता उसकी चाहत होती है और जो होता है वो हमेशा कम क्यों लगता है? आरा से आते समय ट्रेन में काफ़ी
 
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भीख मांगने की मजबूरी

दिल्ली में जहाँ देखो एक चीज़ बड़ी ही कोमोन नज़र आती है वो है हर गली, नुक्कड़, चौक- चौराहों, रेड लाइट्स पर भीख मांगने वालों की अच्छी खासी तादाद। अगर मंगलवार हो तो हनुमान मन्दिर, गुरुवार हो तो साईं मन्दिर, शुक्रवार हो तो मस्जिद और शनिवार को शनि मन्दिर के
 
प्रियम्बरा
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गाँधी और कमांडो

इन दिनों आईडिया का एक विज्ञापन टीवी चैनेल्स पर छाया हुआ है। विज्ञापन में एक लड़की होती है जिसे बस स्टैंड पर एक युवक छेड़ रहा होता है। वो अपने मोबाइल फ़ोन से सबसे सुझाव मांगती है... दो ऑप्शन्स होते हैं ... गाँधी या कमांडो ? जनता का मेस्सज आता है, जिनमे
 
प्रियम्बरा
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प्रेम पर्व और प्रिये तुम

प्रेम.... प्यार ... इश्क.... मोहब्बत... कितने अच्छे शब्द हैं । किसी ज़माने में प्रेम में पड़े लोगों के लिए इनका गहरा मतलब हुआ करता था। एक प्यार से भरा दिल अपनी चाहत का इज़हार अक्सर पत्रों के माध्यम से किया करता था। फ़िर वो पत्र या तो 'मुग़ल ऐ आज़म ' फ़
 
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...जो छुट गया वह कहाँ मिले.

सरस्वती पूजा के साथ ही शुरू हो जाता है पावन बसंत। बचपन से ही मुझे बसंत का मौसम बेहद पसंद है । इस मौसम में न तो ज़्यादा ठण्ड होती है और न ही गर्मी । आम के पेड़ों पर मंजर आ जाता है , ज्यादातर फूलों के खिलने का मौसम भी यही होता है।'ऋतू बसंत बह त्रिविध ,
 
प्रियम्बरा
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... समय के साथ बदल रही है गाँधी जी की सीख

एक समय था जब गाँधी जी के बंदरों की कहानी जूनियर स्कूल की किताबों में हुआ करती थी। बचपन में ही गाँधी जी के बंदरों का महत्व बताया जाता था। एक बन्दर जो अपनी आँखें बंद किया है उसका अर्थ है बुरा मत देखो , दूसरा जो मुंह बंद किया है उसका मतलब है बुरा मत बोल
 
प्रियम्बरा