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कबीरा खडा बाज़ार में .....

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31 Dec 2009
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कवि और कविता

नरेन्द्र गौड़ आम आदमी की ज़ुबान हैं । उनके भाषिक बिम्ब लोक जीवन में रचे-बसे हैं । उनकी साधारण चीज़ों पर गहरी पकड़ साधारण सी बात को असाधारण बना देती है । गौड़ की ज़्यादातर कविताएँ लम्बी हैं ,जो कथात्मक शैली में प्रस्तुत की गई हैं । शुरु में लगता है जैसे किस
Dec 29 2009 11:55 AM
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मानव संग्रहालय में "हबीब उत्सव"

हबीब तनवीर रंगमंच की ऎसी अज़ीम शख्सियत हैं जिन्होंने नाट्य शास्त्र में अपने तरह के नये अध्याय जोड़े । उन्होंने लोक कला और आधुनिक नाट्यकला का अनोखा संयोग कर कला संसार को चमत्कृत कर दिया । लोक परंपराओं की आत्मा को जीवित रखते हुए भी अपनी बात को थियेटर के
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उससे इंटरनेट पर मिलो

उसके हाथ की लिखी बरसों हुए कोई चिट्ठी नहीं मिली नाज़ुक अँगुलियाँ नेल पॉलिश के बिना गुलाबी नाखून सिंदूरी हथेलियों से शुरु होती उसकी लरजती देह की कल्पना किये बरसों बीत गये पप्पी वह भी यदाकदा मोबाइल पर लो-दो उससे मिलना है, तो इंटरनेट पर मिलो एक औरत को और
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सुई-धागे से सजा रंग संसार

कशीदाकारी भारत का पुराना और बेहद खूबसूरत हुनर है । बेहद कम साधनों और नाममात्र की लागत के साथ शुरु किये जा सकने वाली इस कला के कद्रदान कम नहीं हैं । रंग बिरंगे धागों और महीन सी दिखाई देने वाली सुई की मदद से कल्पनालोक का ऎसा संसार कपड़े पर उभर आता है कि
Sep 26 2009 04:34 PM
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पंद्रह राज्यों की लोक संस्कृति भोपाल में

आधुनिक जीवन शैली में हमारी संस्कृति कहीं पीछे छूट गई है । वन क्षेत्रों में रहकर अपनी परंपराओं को सहेजने वाले जनजातीय लोग भी इस बदलाव से अछूते नहीं रहे हैं । सरकारी योजनाओं के माध्यम से शहरी चमक-दमक सुदूर अंचलों में पैठ बनाने लगी है और अब लोकगीत- संगी
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जनजातीय गहनों के आगे फ़ीकी सोने की चमक

आभूषण हमेशा से ही स्त्री की कमज़ोरी माने जाते हैं । फ़िर चाहे वो सम्पन्न परिवार से ताल्लुक रखे या प्रकृति की गोद में जीवन गुज़ारने वाली काननबाला ही क्यों ना हो । हालाँकि कवियों , साहित्यकारों और कलाकारों की निगाह में गहने कभी कीमती नहीं रहे । गुणों और आ
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नाशुक्रे लोग

भोपाल की बड़ी झील सूख रही है । नेता ,अखबार और स्वयंसेवी संगठन मरते तालाब पर शोकमग्न हैं ,लेकिन ये अफ़सोस रस्म अदायगी बनकर रह गया है । तालाब गहरीकरण के नाम पर फ़ोटो सेशन का दौर चलता है। तालाब का पेट खाली है और सूख कर मैदान में तब्दील हो चुके हिस्से पर पू
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लालटेन,ढ़िबरी, चिमनी फ़िर याद आई

नरेन्द्र गौड़ का शब्द संसार जीवन से दूर जाती ज़िन्दगानी का मार्मिक वृतांत है । जब ज़िन्दगी से एहसास गुम होने लगते हैं और आनंद-उल्हास के पल-छिन मुरझाने से लगते हैं , तब नरेन्द्र के शब्द उन पर बारिश की पहली फ़ुहार से पड़कर नई जान फ़ूँक देते है , ऊर्जा से भर
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तुम मुझे मसीहा कर दो

कविता जनमानस की वाणी बन जाये तो उसका रचयिता जनकवि की उपाधि से स्वमेव सम्मानित हो जाता है । राजेन्द्र अनुरागी एक ऎसे ही जाने-पहचाने हस्ताक्षर रहे हैं । समाज उन्हें अलंकरणों और उपाधियों से विभूषित करता रहा ,मगर वे अपनी फ़क्कड़ अलमस्ती में ओज,श्रॄंगार और
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अपना - अपना गहरीकरण

भोपाल का बड़ा ताल क्या सूखा , लोगों की खुशियों पर मानो ग्रहण लग गया । राज भोज के शासन काल में बना यह तालाब किसी ज़माने में करीब एक सौ किलोमीटर के दायरे में फ़ैला था । लेकिन अब सूरज की तपिश बढ़ने के साथ तेज़ रफ़्तार से मैदान में तब्दील होता जा रहा है । वर्ष
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अतीत से साक्षात्कार

संस्कृति ,सभ्यता और परंपरा के संरक्षण के लिये स्थापित इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय ने राजधानी भोपाल को एक नई पहचान दी है । साथ ही भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में भारतीय संस्कृति की संपन्न्ता का परिचय दिया है । श्यामला हिल्स के खूबसूरत
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उन्मुक्त हँसी

पगडंडी पे चले जा रहे वे झुंड के झुंड स्त्रियों के सिर पर दितवार के हाट से खरीदे सामान की पोटलियाँ झुनझुना बजाते उनकी गोद में बच्चे ज़्यादातर आदमी ख़ाली हाथ धोंकते हुए बीड़ियाँ आपस की बातचीत में खिलखिलाते उन्मुक्त गूँज जाती हँसी सुनसान जंगल में भला क्या
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नए ज़माने में पुरानी माँ

नए ज़माने के हिसाब से ना ढलना था ना ढल पाई माँ बेडरुम और ड्राइंगरुम में फ़र्क नहीं समझती भले ही कोई कितना ही खास आदमी बैठा हो झट सोफ़े पर पसर जाती है माँ लेब्राडोर नस्ल के शानदार चिंकी को इतने बरस बीत गये अभी तक कुत्ता ही कहती है माँ घर का पोंछा लगाती ब
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नया जीवन

नरेन्द्र गौड़ के शब्दों में सघन सामाजिक अर्थ के साथ वैयक्तिक अर्थ की ध्वनियाँ भी होता हैं । ये खास तौर पर गौर करने की बात है । ऊपर-ऊपर से ये तत्व भले ही पकड़ में नहीं आते लेकिन साथ - साथ कई सवाल खड़े करते चले जाते हैं । गोया कविता वैयक्तिक- निजी सृजन है
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बहन जाएगी कब

पोटली लिए गाँव से आई बहन को पूरा एक माह हो गया घर का रेशा - रेशा ज़र्रा - ज़र्रा पूछ रहा है - कब जाएगी बहन ? जाएगी कब बहन बीड़ियाँ फ़ूँकता रहता है सब दिन बहन का पति रिया - रिया करता है बहन का बेटा चिमलाई - सी बहन बीमार लगती है जैसी भी लगे अपनी बला से पत्
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असल कविता

वही असल कविता थी रद्दी समझ टोकरी के हवाले कर दिया निर्ममता के साथ सखेद वापस किया वही असल कविता थी अनजाने हल्दी, राई, मिर्च की पुड़िया बँध गई ना जाने कहाँ से कहाँ तक पहुँची असंख्य हाथों की गर्माह्ट से गुज़री किसी पगडंडी से होती सुदूर बीहड़ में गई असल कवि
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काँप उठे पहाड़

हवा ने जब-जब भी बजाई सीटी, पेड़ों ने बजाए बिगुल और काँप उठे पहाड़ । जानता है सोमारु कि पेड़ों के तमतमाए चेहरे बता देते हैं मौसम का हाल । यह भी कि गुस्से से टूट पड़ते हैं पेड़, उभर आते हैं अनगिनत घाव पहाड़ों के सीनों पर । सोचता है सोमारु कि सच है- बड़े नहीं
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अनुत्तरित ही

पूछता हूँ तुमसे मैं कृष्ण उकसाया क्यों तुमने पार्थ को तुम तो परात्पर थे टाल सकते थे युद्ध बचा सकते थे पृथ्वी को रक्त में नहाने से ओ मायावी तुम फ़ूट सकते थे दुर्योधन के दिग्भ्रान्त हृदय में वैराग्य का अंकुर बन कर उसकी महत्वाकाँक्षा के दावानल पर छिड़क सक
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लडाता है मुर्गा

बेज़ुबान बस्तर को वस्त्र पहनाने की ओट में पिछले कई दशकों से उसे निर्वस्त्र किया जाता रहा है । वहाँ के यथार्थ से रचनाकारों की मुठभेड़ कितनी जीवंत है ,इसका नमूना बस्तर के नाम पर परोसी जा रही साहित्येतर अश्लीलता से ही लग जाता है । उनके लिए बस्तर एक नारा ह
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भूल पर

भूल पर , पछता रहा कोई ग़लतियाँ दोहरा रहा कोई फ़िर बुझे, मन की अँगीठी में, एक दुख, सुलगा रहा कोई मुट्ठियों में, भींच कर आँधी, मरुस्थल में, गा रहा कोई गुफ़ाओं से, खोजकर अवशेष, सभ्यता के, ला रहा कोई इस सदी की, त्रासदी अणुबम, बुद्ध - सा, समझा रहा कोई । ( लक
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देशी दवाएँ

देशी दवाएँ भी कभी - कभी बडी मुफ़ीद होती हैं सर्दियों में अदरक का काढ़ा भुनी हुई लोंग विधि विधान पूर्वक लिया जाए तो ग्वारपाठा बूढे को कर देता जवान बड़े तालाब की मिट्टी से सिर धोया जाए नियमित गंजों के बाल उग जाते हैं और चेहरा खिल जाता कमाल ! हर्र ,बहेड़ा ,
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पेड़ के जज़्बात

एक अच्छी कविता काल के सारे दबावों को व्यक्त करती हुई कहीं ना कहीं बची रहती है । का़ग़्ज़ पर मुमकिन नहीं होता तो यह ज़ेहन में बची रहती है ,जहाँ हथियार पराजित हो जाया करते हैं । पहले कविता संग्रह ’गुल्लक’ से की गई शुरुआत ’इतनी तो है जगह’ तक आते - आते रुप
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मैं तो बेचैन ...

मैं तो बेचैन हकीकत को ज़ुबाँ देता हूँ । आप कहते हैं,बगावत को हवा देता हूँ । निज़ाम कैसा ये , खुशबू को नहीं आज़ादी ? सुर्ख फ़ूलों को , दहकने की दुआ देता हूँ । उसने मासूम परिन्दों के उजाड़े सपने , अपनी पलकों में कफ़स , जिनको सदा देता हूँ । मेरा ज़्मीर था , कल
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चुप ही

लक्ष्मी नारायण पयोधि की ’ आखेटकों के विरुद्ध ’ संग्रह की रचनाएँ आंतरिक बोध को खँगालती हैं और मानवीय जीवन में सक्रियता लाती हैं । ये कविताएँ आधुनिकता के रंग में रंग गये इंसान की संस्कारगत प्रकृति और प्रवृत्ति पर सीधा फ़ोकस डालती है । मानवीय सम्वेदनाओं
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महुए की महक से गमक उठी है फ़िर गज़ल

वर्तमान कविता के दौर में लक्ष्मी नारायण पयोधि की कविताएं एक अलग ऊंचाई पर खडी नज़र आती हैं । पयोधि घनीभूत पीडा की अनुभूतियों के यथार्थवादी कवि हैं । वे समय की चालाकियों , धोखों ,फ़रेबों से पूरी तरह सावधान और चौकन्ने हैं । बाल साहित्य के साथ ही विभिन्न व
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टेसू

दंगा हो रहा शहर में मन करता है फ़ूलों पर फ़िर लिखूं कविताएं हालांकि हास्यास्पद लगेगा साइकिल के हैंडिल पर लगाऊं सुर्ख डाली कर्फ़्यू लगी गलियों से चीखता हुआ गुज़रुं मैं निहत्था कवि हूं देवियों - सज्जनों ! टेसू खूब खिले मार्च के महीने में । - नरेन्द्र गौड [