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जीवन के पदचिन्ह

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08 Jun 2010
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केहि बिधि मिट्टी से मिट्टी मिल जावे...

मित्रों,ऐसे ही फुर्सत के कुछ लम्हों में एक ताल के किनारे बैठे हुए, मेरोरियल डे के दिन (मई ५, २०१०) चंद पंक्तियाँ मन में उपजी...उन्हें सूफियाना रंग और विस्तार  देकर प्रस्तुत कर रहा हूँ,  वैसे तो सूफी गीतों पर मेरी कोई पकड़ नहीं हैं
 
Sudhir (सुधीर)
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उसका आया है ख़त कि भूल जाऊं उसे

आया है ख़त उसका कि अब भूल जाऊं उसे ग़ज़ल न रही वो मेरी, अब न गुनगुनाऊ उसे रहा यतीम ख्याल सुनहरा तेरे मेरे रिश्ते काजब न कोई निस्बत तुझसे तो क्या अपनाऊँ उसे उफ़क तक भी न पहुंचा अहसास अक़ीदत का खौफज़दा सजदों का सच, मैं क्या बतलाऊँ उसे बढ़ गया
 
Sudhir (सुधीर)
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मृत्यु से अनुरोध

शरणाकांक्षी अंतर्मन आहात देहखंडित दीपच्युत नेहरह रहकर गिरता मनज्योति दण्डिततम सघन नयन स्थिल मेधा विकल प्रतीक्षारत विभा रवि विह्वलआलंबनाकांक्षा अलिंगनानुरोध श्वांस समर्पण जीवन प्रतिरोध पाप-पुण्य से दूरस्वर्ग-नर्क से इतर हो साथ तेरावही मार्ग प्रखरहो
 
Sudhir (सुधीर)
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सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं

सुलग कर रह गया चाँद फलक पर, अंधियारी रातों में शोखियाँ चलती नहीं मांग लेता खुदा से मैं भी तुझको पर,सुना है कि खुदगर्ज दुआएँ मिलती नहीं क्या करता मैं नुमाइश इन ज़ख्मों कीमुर्दा-दिलों में टीस कोई उठती नहीं दौड़ना रही मजबूरी मेरी उम्र भर
 
Sudhir (सुधीर)
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दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं

दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं,सरेआम रों दूँ, पर ऐसी भी मेरी मजबूरी  तो नहीं ज़माने का दस्तूर निभाना, है हिदायत वाइज़  की फिर मिलेगी जन्नत पर यह उम्मीद पूरी तो नहींडरता हूँ बेअदबी की तोहमत न दे
 
Sudhir (सुधीर)
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कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ...

कुछ कथाओं की अपूर्णता ही देती हैं तृप्ति ... कौन जाने अन्यथा जीवन-पूर्णता भी क्या मुक्ति?स्वयं तराशता परिधियाँ अपनी  कामनाओं की उकेरता अदृश्य-खंडित सीमायें भावनाओं की हैं तो असंख्य आकांक्षाएं सहज समाधान की किन्तु दृष्टव्य
 
Sudhir (सुधीर)
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पुरानी तस्वीर

कल पलटते उस पुरानी एल्बम के पन्ने -फिर मिली एक तस्वीर पे, वो बेकरार शामकुछ शरारतें हमेशा की तरह मुठ्ठियों में भींचेवो शोख चंचल आँखे कुछ मस्ती में नीचे खीचें जुल्फे रब्त पर एक सवाल की तरह उलझी सी,और एक लम्बी चुप्पी की सिरहन,
 
Sudhir (सुधीर)
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गुमनाम सी मौत

कल जो मरा गली के नुक्कड़ पर,गुमनाम सी मौत,वो शायर ही होगा शायद....ताउम्र अहसासों की कुची सेरंग भरता रहा जिंदगी के,शफाक से कागजों पर...रंग ही न बचे उसकी -ज़िन्दगी के मुहाने पर कितनी सादगी से मौत ने
 
Sudhir (सुधीर)
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आशिक़ की थी आखिरी-आह....

आशिक़ की थी आखिरी-आह, नतीजा ज़माना-ए-बेइंसाफ कीसबको दे गया था वह दुआएं  बस शिकायत अपने खिलाफ की हुआ क़त्ल चुपचाप पर  कह न सका बेवफाई यार कीरहा सोचता शब-ए-क़यामत को होगी बात इंसाफ
 
Sudhir (सुधीर)
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गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता

गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जातातनहाइयों ने थामे रखा, वरना जमाने में किधर जाता सौ बार हुआ क़त्ल रहा फिर भी धड़कता मेरा दिलमाजी की थी चाहत नहीं तो इक झोके से बिखर जाता न छिपा ज़ालिम पर्दों में यूँ, इस गुल-ए-हुस्न को अपने होती
 
Sudhir (सुधीर)
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तेरे तसव्वुर से मैं कह पाता, मैं वो सब जो कहना भूल गया

तुम जाओगे तो क़यामत होगी, रुक जाओगे तो क़यामत होगी हाय! इसी कशमकश में,  मैं तुझसे हाल-ए-दिल कहना भूल गयाकाश थाम कर यादों का आइना, पलट कर कुछ वक्त के पन्ने,तेरे तसव्वुर से मैं कह पाता, मैं वो सब जो कहना भूल गया वो रब्त जिसे बाँध न
 
Sudhir (सुधीर)
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क्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर

पूछा जो हाल-ए-दिल, साकी ने  दो जाम देकरक्या कहता वो, बस रो पड़ा मेरा नाम लेकर गम-ए-हिजरा में होती हैं ऐसी भी हैं अदाएं,बतियाते हैं वो, आईने से मेरा नाम लेकरहालात का मारा है शायद, होगा खौफज़दा भी,सुनाता है वो,
 
Sudhir (सुधीर)
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Feb 26 2010 01:17 AM
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कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे को

हैं कई इल्जाम मुझ पर यूँ तो चुप रहने को कैसे सरेआम कर दूं तेरे कांधे के बोसे कोकुछ तो बरकत मिली होगी  भूखे पेट सोने से  वैसे तो मोमिन कहता है,
 
Sudhir (सुधीर)
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Feb 17 2010 05:16 AM
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यह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं

नाकिस सा गुस्सा उसका, बड़ी भोली सी अदाएँयह जवानी है मेरे दोस्त, इसे परदे क्या छिपाएं शिकवा उन्हें कि हिचकी नहीं आती, याद नहीं करतेकभी भूले ही नहीं जिसे, उसे कोई कैसे याद दिलाएं कासिद के साथ ही आई थी कुछ भीगी सी
 
Sudhir (सुधीर)
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अनुभव-बही में हुआ एक वर्ष और अर्जित,

मित्रों,कल अपने जन्मदिन पर कुछ क्षण ऐसे भी आये, जब चहुँ ओर की उल्लास और शोर शराबे के बीच मैं आत्म मनन में जुट गया - जीवन के बारे में सोचने लगा.
 
Sudhir (सुधीर)
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बीता हुआ कल...

बीता हुआ कल, मिल जाये कहीं, किसी मोड़ पर बढ़ जाना तुम हँसकर, सिसकता उसे छोड़करन सुनना उसकी कोई दिलकश कहानीन बहाना आँखों से दो बूँद पानी ...कसकर थामना तुम
 
Sudhir (सुधीर)
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यह मध्यम-मध्यम चढ़ती जीवन बेला है

मित्रों, शांतनु ने  जब प्रातः काल भ्रमण में रूपसी  गंगा का ऐश्वर्य प्रथम बार देखा होगा तो उनके मन में क्या विचार उत्पन्न हुए होंगे...इसी कल्पना को
 
Sudhir (सुधीर)
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बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएं

बचना वो हँसकर मिलता है दोनों बाहें फैलाएंमुश्किल में होगा न जाने कौन सा काम बताएचुनावी मौसम था, वादों की बयार में गुजर गयाआओ अब खुद सुलझाएं अपनी अपनी समस्याएँ  रही बाट जोहती शिक्षक की किनती सारी कक्षाएँ ट्युशन से पार लगेंगी इस साल की भी परीक्षाएं सच
 
Sudhir (सुधीर)
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कतरा कतरा मैं बह जाऊंगा

मकाँ इक पुराना हूँ मैं, तेरी गर्म सांसों से ढह जाऊंगान रो मेरे काँधों से लगकर, कतरा कतरा मैं बह जाऊंगा आशिक़ बनकर जिया हूँ मैं, आशिक़ बनकर मर जाऊँगा,छिपाया ताउम्र नाम जो आखिरी हिचकीं में कह जाऊंगारात-रात जागा हूँ मैं, चुभते हुए
 
Sudhir (सुधीर)
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'एक्सक्लूसिव' खबर

कल भूख से मर गए कुछ गरीब बच्चे मेरे शहर में यह हृदय-विदारक खबर जब किसी चैनल पर न आई इक नए युवा पत्रकार का दिल की धड़कन घबराई होकर परेशान उसने यह बात अपने संपादक से उठाई संपादक ने कहा - बड़े नौसिखिया हो यार ! किसने बना दिया हैं तुमको आज
 
Sudhir (सुधीर)
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रात भर....

जागा रात भर, सोया  न बिस्तर बेगाना मेरा, हर करवट सदाएँ देता था सपना पुराना  तेरा. सोचा रात भर, वजहें तेरी बज़्म में आने की, काश मुझको मालूम न होता ठिकाना  तेरा चर्चा रात भर, चलता रहा महफ़िल मे
 
Sudhir (सुधीर)
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माँगा खुदा से अब न हो रहबर ज़माना मेरा

माँगा खुदा से अब  न हो रहबर ज़माना मेरा | बस हुआ संगदिल रहनुमाओं से दिल आजमाना मेरा || अपनी अपनी दूकान पर यहाँ सबके अपने रसूल, बिकते मजहब,  बिकती मुहब्बत और बिकते उसूल अश्कों को कीम
 
Sudhir (सुधीर)
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हुआ इश्क में रुस्वां, इक नई पहचान ढूंढता हूँ

मुसाफिर हूँ यारों, इक शहर अनजान ढूंढता हूँ हुआ इश्क में रुस्वां,  इक नई पहचान ढूंढता हूँ मजहब के वादों पर मरते  रोज़ इंसान देखता  हूँ बता दे जो खुदा को मेरा दर्द,  वो अजान ढूंढता हूँ दहशत मे
 
Sudhir (सुधीर)
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मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !!

बड़ी मुद्दत के बाद आज तन्हा हूँ, मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !! आंसू न पोछो, मुझे धीर न दो मैं रोता हूँ, तो रो लेने दो !! अपनों  को परखने की, मुझको न थी आदत ही कभी, वो छलतें है मुझको, तो छल  लेने दो.   माँगा ही
 
Sudhir (सुधीर)
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हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!

हाय क्या थे वो दिन फ़ाका-मस्ती के !!  जब एक कट-चाय समोसे से, हम यह दुनिया नापा करते थे, एक ख्याली धागे के दम पर, हम  हर सिस्टम बांधा करते थे यूँ तो हर बात फलसफे पर होती थी एक हम ही ज्ञानी-विज्ञानी थे  
 
Sudhir (सुधीर)
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सम्पाति-प्रलाप

यह रचना गत माह (टोलेडो) चिडियाघर में एक एकाकी गिद्ध को देखकर उत्पन्न हुई. मन में विचार उठा कि जटायु की मृत्यु का समाचार सुनकर सम्पाति के ह्रदय को क्या अनुभूति हुई होगी और परिणाम स्वरूप इन पंक्तियों &n
 
Sudhir (सुधीर)
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सुना है उनकी तस्वीर ईनाम पाने को है

रोते बच्चे जो, मोहताज़ दाने-दाने को है सुना है उनकी तस्वीर ईनाम पाने को है फिर मुस्कुराती है, हर इक बात पर वो, आँखों में उसकी सावन छाने को है. सहमने लगा हैं यह शहर शाम ही से, लगता है कोई त्योहार आने को है बदलने
 
Sudhir (सुधीर)
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काश! हम भी एक मौसमी दरख्त हो पाते

मौसम की करवट पर,  हवाओं की छम-छम पाजेब पर, आशिक़ मिजाज पेडों को जब रंग बदलते देखता हूँ तो सोचता हूँ क्या यही प्यार है, इश्क का इज़हार है एक मौसम का साथ, चंद दोपहरियों का ताप जिनमे साथ कुछ धुप सही, कुछ छाया हवायों से फिर न जाने क्या रिश्
 
Sudhir (सुधीर)
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तेरी रुसवाई से, मेरी बेवफाई का इल्जाम अच्छा है

यह मेरे दर्द का फ़साना, कुछ झूठा कुछ सच्चा है शब-ए-हिज्र की हैं बातें, तुम ही सुनते तो अच्छा है कहकर तो देखो कभी, परियों की बातें उनसे हर संजीदा दिल में, सहमता हुआ एक बच्चा है इसी बहाने पहचान हो गई दोस्त दुश्मनों की, भरी रईसी से, मेरा मुफलिसी हाल अच्छ
 
Sudhir (सुधीर)
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दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ

दिल टूटने से, और बढ़ गई दिलों की दूरियाँ पर कोई क्या बताए क्यों थी दिलों में दूरियाँ दिल में रख छोड़ा था एक ख्याब सुनहरा सा जिनमे हमेशा वो रहा जिसके ख्याबों में मैं ही कहाँ था? और क्या कहें,  क्या रही हमारी मजबूरियाँ
 
Sudhir (सुधीर)
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जितना संभव हो पथ आलोकित करें (दीवाली शुभकामनाएँ)

जिस प्रकार दीपावली के असंख्य दीपो के अथक और निस्वार्थ श्रम से तिमिर प्रभावहीन हो जाता और अमावस की रात भी पूनम के तरह मधुर लगती हैं. उसी प्रकार आपका जीवन भी निस्वार्थ और अथक मानवीय श्रम से यश और कीर्ति की ज्योत्सना से आलोकित होकर अज्ञान और दारिद्रय के
 
Sudhir (सुधीर)
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दीप-पीड़ा

कभी-कभी ऐसा भी होता है, जिंदगी के रोज़ बदले चेहरों में, चुपचाप जलते दीप के नीचे खामोश पनपते अंधेरों में | मांगता हैं कोई, मौन ही अपना अंश का खोया प्रकाश, बाँटकर चहूँ ओर रश्मि-उल्लास| फिर देखकर अपना नीड़ निराश, सोचता है अनवरत निर्विकार देकर 
 
Sudhir (सुधीर)
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साँसों में लिपटी पड़ी है मिट्टी, लोग उठाते क्यों नहीं.

इश्क का है फ़साना, सबको खुल कर बताते क्यों नहीं. दिल पे हैं ज़ख्म कई, ग़ज़ल कोई गुनगुनाते क्यों नहीं वो कहते हैं कि इश्क में शर्म-औ'-हया हैं पिछले ज़माने की बातें, हमने तो कह दिया है खुलकर, तुम अब नजरें मिलाते क्यों नहीं बहुत मजाजी है मिजाज़-ए-यार
 
Sudhir (सुधीर)
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तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर

तुझे मुझसे प्यार न करना हैं, तो न कर ,फ़िर नज़रें भी न मिला, यूँ बेकरार भी न कर। न देख इन मस्त निगाहों से मुझे ,न हिला, रह रह कर गेसुओं की चिलमन। दिलफेक नहीं पर आशिक मिजाज है दिल ,रह-रह कर जुल्फ-ऐ-यार से उलझता है मन। न छोड़, ठण्डी ठण्डी आहें छिप-छिपकर,न
 
Sudhir (सुधीर)
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Oct 09 2009 01:18 AM
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तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता

मैंने तो सुना था कि दर्द है बड़ा खुदगर्ज होता,हर कोई सिर्फ़ अपनी ही किसी बात पर है रोता।तुझसे मिलकर जाना, दर्द का रिश्ता है साँझा होता,वरना मेरे हालत पर, ऐ दोस्त! तेरा चेहरा न भीगा होता ।तेरी झील सी गहरी आँखों में बसा समुंदर न होता,यूँ बिना किसी आवाज़,
 
Sudhir (सुधीर)
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Oct 09 2009 01:18 AM
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क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?

क्यों मन में एक शून्य हैं पनपा, क्या विराम दूँ अभिव्यक्ति को?न पाषाण हूँ, न मैं कोई बुद्ध, न पक्ष में, न मैं किसीके विरूद्व।क्यों फ़िर हृदय-संवेदना च्युत, सिर्फ़ शून्य! प्रवाह सभी अवरुद्ध।।न मुझे कामना की प्यास , न मुझे निर्वाण की कोई
 
Sudhir (सुधीर)
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Oct 09 2009 01:17 AM
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...कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले

वो पलटते हैं मेरी डायरी के सफे कि कोई तो मेरा किस्सा पुराना मिले, हर नज़्म नाम उनके औ' वो कहते हैं कोई तो मेरे यार का इशारा मिले कुछ उनकी नाजों-अदा और कुछ मेरी यह चुप रहने की आदत कभी तो समझे वो इन ज़ज्बातों को तो सबको एक फ़साना मिले अनुभव की चांदी जब ज
 
Sudhir (सुधीर)
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क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का...

क्या गिला करें हम अपने मासूम यार का।किस किस से छिपायें नाम नादाँ यार का।जिनके लिए बदनाम हुए, वो किस्से हमारे आम करे जाते हैंकोई तो सिखाओ यारों उन्हें सलीका इश्क के इज़हार का ।जिस पर भरोसा किया, उन्होंने ही तमाशा बनाया प्यार काउम्र हुई न जाने कब आयेगा अब
 
Sudhir (सुधीर)
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Sep 15 2009 11:30 PM
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...और किस मुकाम पर रूकती जिंदगी मेरी

(गुमनामी के सिवा) और किस मुकाम पर रूकती जिंदगी मेरी तपती दुपहरी की धुप में साथ निभाने को अपने साये नहीं होते। भरी भीड़ की भगदड़ में गिरनेवालों को उठानेवाले भी नहीं होते । सबका गम बाँटता आया हूँ उम्र-भर , तो फिर आज शिकवा क्यों यह गम ही तो हैं जिंदगी भर की
 
Sudhir (सुधीर)
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Sep 02 2009 12:32 AM
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एक निर्वस्त्र दर्द

एक जागती रात के सिरहाने बैठकर,आकाश की काली आँखों में झांककर,मैंने अपना एक निर्वस्त्र दर्द उठायाझूठे सपनो के तार-तार से कपड़े पहनायेजो बचा, उसे दुनियादारी के -फटेहाल पैबन्दों से छिपायान चेहरा देखा, न रूह नापीसिर्फ़ एक एहसास पर किएक दिन मेरे दायरों से निकल
 
Sudhir (सुधीर)
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Aug 25 2009 10:30 AM