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नयी प्रविष्टी लिखी
30 Jan 2010
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यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी है,....

मेरे मित्र आशीष से पहली पंक्ति उधर लेते हुए चार पंक्तियाँ लिख रहा हूँ ....यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी हैइसी क़यामत का था कब से इंतज़ार मुझकोवो जन्नतें और होंगी मिटते हैं जिसके लिए काफ़िरइस चमन के कांटे भी मंजूर बार बार मुझको
 
राकेश
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नए वर्ष का मंगल स्वागत

पल पल कर के आखिर फिर से, साल पुराना गुजर गयाएक बार फिर सुबह हुई तो नया नया उत्साह भर गयानया नया सा क्या है इसमे, क्यों अज्ञात ख़ुशी है मन में यहीं सोंच कर खोया हूँ मैं, झांक रहा हूँ मन दर्पण मेंनए साल का पहला दिन भी, बीत चला है न जाने कबनए वर्ष की नयी
 
राकेश
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मै मानसी, एक अनंत असाधारण कल्पना

अरविन्द पाण्डेय जी की परा वाणी पर कविता पढ़ी । बड़ी अच्छी शैली है । नारी पर उनकी कविता " मै नारी हूँ , नर को मैंने ही जन्म दिया " ने मुझे प्रेरित किया की मैं इस विषय पर अपनी ४ पंक्तियाँ जोड़ दूँ । प्रस्तुत है वो ४ पंक्तियाँ ..., अरविन्द जी को आभार सहित
 
राकेश
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लक्ष्य और दुविधा...

मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ बढ़ा कारवां लक्ष्य साध , मन दुविधा में , क्या रुक जाऊं ? सिमट सिमट के रह जाएगा , काल चक्र की परतों में बस बुना बटोरा तिनका तिनका रिश्तों का हर ताना बाना। धर्म कर्म कर्तव्य में उलझी अभिलाषा की जंजीरों से , मुक
 
राकेश
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एक शिकायत ज़िन्दगी से...

ए ज़िन्दगी कहाँ ले जा रही है तू मुझको न तो रास्ते की पहचान और न ही मंजिल की कुछ ख़बर बस कदम दर कदम सुबह से शाम तक दौड़ा रही है मुझको मेरी हमदर्द है तू या फ़िर कोई अजनबी समझना हो रहा है मुश्किल क्यूँ इतना धुंधला आइना दिखा रही है मुझको कामयाबी की उम्मीद
 
राकेश
Dec 29 2009 11:57 AM
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नन्हा आगंतुक

जन्म दे रहे इक सपने को आशाओं के ताने बाने हो गई पूरी एक प्रतीक्षा, खड़ी दूसरी सांसे थामे। जीवन की कोई बिन्दु कोख में, कुम्भकार की कच्ची माटी समय चक्र के पहिये पर ये, नए रूप में ढलती जाती। सपनों से सपनों का जुड़ना, आशाओं से आशाओं का जन्म हुआ माँ की ममत
 
राकेश
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कितना मधुरिम चंचल प्रभात - एक संस्कृतनिष्ट कविता का प्रयास

कितना मधुरिम चंचल प्रभात मंद मंद घूंघट उतार, केशों का नैसर्गिक श्रृंगार उषा विहंसी कर नयन खोल, हो गए रक्तवर्णी कपोल बाला का कोमल सरस गात कितना मधुरिम चंचल प्रभात। दे रहा दूत सबको संदेश, हो रहा दिवाकर का प्रवेश अरि करते गुंजित ह्रदय तार, करने को स्वाग
 
राकेश
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अनंत प्रतीक्षा

शाम हो चली धुंधली धुंधली, छूट गया आशा का अंचल ओंस रात की बन कर आंसू, पलकों से अब चली निकल सरक रहा है रेत रेत सा, समय हाथ से हर क्षण हर पल धुंआ धुंआ हो धीरे धीरे, घुल गए सब सपनों के बादल रात हो गई कितनी लम्बी, शांत पड़े सब तारा मंडल अंधियारे में भटक भट
 
राकेश
Dec 29 2009 11:57 AM
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होली और हंगामा

रंगों की धुंधली परछाईं मन आंगन में घूम गई कुछ गुजरे वक़्त की नटखट सी बातें मानस को चूम गयीं अब कुछ ही दिन बाकी हैं मस्ती और हल्ले गुल्ले में फ़िर वही पुरानी टोली और फ़िर से हुडदंग मुहल्ले में कोई नई शरारत सूझेगी, उत्साह भरा हर पल होगा मेरे रंगों की बौछा
 
राकेश
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यौवन वाही सराहा जाता ...

यौवन वही सराहा जाता जो मदिरा के रंग ढले नयनो में हो मधुशाला, वांणी का मधु दिन रात छले अन्तर की अग्नि धधकती हो, हर अंग पुष्प की माला हो ज्यों मधु प्याले में ज्वाला हो, ज्वाला जो मधु का प्याला हो कोमल मदमाते अधरों पे सुख सात स्वर्ग अपवर्ग मिले यौवन वही
 
राकेश
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रात और मदिरा

अग्नि पिघल के जल हुई प्रेम सुधा की बूंदे मिली, मदिरा बनी छलक पड़ी भर गई दो चमकती आँखों में आंखे चार हुई धूप छाँव में समा गई चाँद ने अंगडाई ली, पलकें झुक गयीं प्यास और मदिरा एक होने लगे प्रकृति ने नयन मूँद लिए शांत, स्तब्ध चाँद नीरवता की हलचल निहारता र
 
राकेश
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मै उंगली थामे चलता हूँ...

बचपन तो कब का बीत गया, पर स्वप्नों से मन छलता हूँ कहीं दूर क्षितिज पर यादों की मै उंगली थामे चलता हूँ | मेरे मन में भी फूटे हैं कुछ भावों के नटखट अंकुर, शब्दों की अर्ध सुप्त कलिका खिल जाने को अब है आतुर | नवपत्रों पे झिलमिल झिलमिल बूंदे बन कर मै ढलता
 
राकेश
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दिल तो हिदुस्तानी है मगर...

काव्य मञ्जूषा पे स्वप्न मंजूषा जी की अभिव्यक्ति "एक बार फ़िर मै पराधीन हो गई" पे मेरे अन्दर के कवि ने ४ पंक्तियों पे हाथ साफ़ कर लिया...प्रस्तुत हैं ये पंक्तियाँ स्वपन मंजूषा जी के लिए आभार सहित॥ ग्लोबलाइजेशन और देशभक्ति के द्वन्द्व में फंसे बेचारे हिन
 
राकेश
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ये मां है ....

पहली हलचल से पहली धड़कन तक पहली साँस से पहले कदम तक पहले शब्द से पहली शिकायत तक पहली हंसी से पहले आंसू तक। किसी का परिश्रम है, अनवरत, असाधारण और निष्काम। अनवरत इसलिए कि, नन्हा सा असक्षम जीवन निर्भर है किसी पर, जीवन की हर प्रक्रिया समझने के लिए और दुन
 
राकेश
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सिगरेट के कुछ आवारा पन्ने...

मै तो पीता नही हूँ पहले ही बता दूँ लेकिन उड़न तश्तरी के समीर लाल जी के लिए (जो कभी सिगरेट के कागज पे अभिव्यक्तियाँ लिखा करते थे) ४ पंक्तियाँ समर्पित की थी, वो यहाँ दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ। सिगरेट के कुछ आवारा पन्ने अपनी पहचान से पूरी तरह अनजान फ़िर
 
राकेश
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मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ

मन माला सब बिखर रही है गीत कौन सा मै गाऊँ बढ़ा कारवां लक्ष्य साध, मन दुविधा में, क्या रुक जाऊं? सिमट सिमट के रह जाएगा, काल चक्र की परतों में बस बुना बटोरा तिनका तिनका रिश्तों का हर ताना बाना। धर्म कर्म कर्तव्य में उलझी अभिलाषा की जंजीरों से, मुक्त हो
 
राकेश
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अंतर्मन पे अभिव्यक्ति (नीसू जी की कविता से प्रेरित)

नीसू जी की कविता पढ़ी मन (http://neeshooalld.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html), बड़ी सरल और छोटी। मेरे कवि ने भाव उधार लिए और चार पंक्तियाँ रच ली...:-) अंतर्मन बस एक झरोखा सच है या फ़िर कोई धोखा मन की गति तो मन ही जाने भला सोंच के भी क्या होगा चाल
 
राकेश
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कवि का बात कवि ही जाने

जीवन की किसी परिचर्चा में एक दिन किसी ने पूँछ लिया बड़ा मौलिक प्रश्न आखिर आप कविता लिखते कैसे है श्रीमान मैंने सोंचा प्रश्न वाकई मौलिक है और इतना भी नही है आसान तो क्या करूं, उत्तर कहा खोजूं, या फ़िर चुप ही रहूँ, हंस के टाल दूँ या फ़िर जीवनदर्शन की गहर
 
राकेश
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हमारी बिसरती परम्पराओं का आइना ये बक्सा

क़स्बा के ब्लॉग पे एल्मुनिम के बक्से की बहुत अच्छी कविता पढ़ी। मेरे अन्दर के कवि से रहा नही गया और मैंने कविता को अपनी तरफ़ से और विस्तार दे दिया। http://naisadak.blogspot.com/2009/03/blog-post_15.html कुछ सपने और ढेर सारी भावनाओ का अथाह समंदर बना जात
 
राकेश
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वो सुबह कभी तो आएगी...

बनते फूटते बुलबुलों में भी ढूंढ लेता है इन्द्रधनुष के हजारों रंग पल दो पल भर के लिए ही सही, आज कल भर के लिए ही सही मन के खिलौनों और सपनों के खेल में उलझा ये मजबूर आदमी बरसों चलने के बाद भी रहता है वहीं का वहीं मील के पत्थर की तरह किसी एक जगह रुका सा
 
Rakesh
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आज मेरा मन भर आया...

आज मेरा मन भर आया जब याद किए ये गुजरे दिन आँखे भी नम हो आयीं, आँसू न रुकेंगे छलके बिन सच, कितना प्यार समेटे है शिक्षा की ये भूमि महान समझ सका न कभी आज तक गता रहा दुखों का गान घर से तो आए दूर मगर, आज़ादी का अधिकार मिला जहाँ सब राजा अपने मन के, ऐसा मोहक
 
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